Friday, 30 November 2012

उषा पीसती नेह जतन से

उषा पीसती नेह जतन से
जांत चले भिनसारे
भोर लीपती रच रच आँगन
पूरे चौक उजारे .
मूसल छांटे बिपति दुपहरी
ओखली धरी ओसारे .
साँझ झोंकती थकी जवानी
चूल्हे में सिर डारे .
आधी रात बदलती करवट
आँख समय बिरुआरे .
चेहरे पर चौरासी झुर्री
मईया ठाढ़ दुआरे .
लाले लाले गोड़ कनईया
आँखें सपना बुनतीं .
काल कलौती उज्जर धोती
मंशा चुनती मोती,

मै अपने गाँव लौटूंगा

मै अपने गाँव लौटूंगा

झरवेरियों और बंसवारियों में उलझे

पंखो को बटोरते ,वंही कंही छूट गया बचपन

समेट लूँगा ,पहन लूँगा मोर पंख //

कोरी आँखों के सपने बिखरे होंगे ,वहीँ

... उड़ रही होंगी तितलियाँ

चुन लूँगा, बटोर लूँगा बीर बहूटियाँ/

मेरे चले आने के बाद

खलिहान में पुआलों की खरही के नीचे

छिपा कर रखे मेरे कंचे

सुबक रहे होंगे/भर लूँगा अपनी फटी जेबों में /

बांसों के झुरमुट में फंसी ,कहीं पड़ी होगी

मेरी कपडे की गेंद ,मेरे लौटने की प्रतीक्षा में

आँखे बिछाए बाट विसूरते ,तर तर हो रही होगी /

मेरी सिंकियाई धमनियां वहीं कहीं

गहूं के गांजों के बीच ,फिर से पा लेंगी

अपने लहू का आवेग /

मंदिर के बावली के किनारे

सिमटते चरागाह से सटी अमराई में

आकाश से उतर करसपनो जैसे सुग्गे

मुझे खोज रहे होंगे / धुंध से घिरे गन्ना और मकई के

लहलहाते खेतों के टेढ़े मेढ़े मेड़ों के मुजौटों के बीच

सावन की तेज बंवछारों में गदराये सांवाँ के बन्दर पुच्छी

बालों से झरते ,अक्षरों को समेट कर

अपने भीतर का स्वर मै पा लूँगा

मै अपने गाँव लौटूंगा

जीत भी हूँ हार भी हूँ

  1. जीत भी हूँ हार भी हूँ

    प्यार भी संताप भी हूँ


    मैं तुम्हारा मीत भी हूँ

    मैं तुम्हारा गीत भी हूँ


    मैं तुम्हारी कल्पना हूँ

    मैं तुम्हारी अल्पना भी

    मैं तुम्हारे राग का सुर हूँ

    मधुर अनुराग का गुर हूँ


    तुम्हारी प्रीत मे हूँ मैं

    तुम्हारी रीति मे हूँ मैं

    दीप हूँ, सघर्ष का मैं उद्धरण हूँ।।

    जो कभी रुकता नहीं,

    मैं वो चरण हूँ।। ...


    है अन्धेरा खूब लेकिन मैं जलूँगा।

    जब तलक हो ना उजाला, मैं डटूंगा।

    जो कहा, उसको किया

    वो आचरण हूँ।।



    लोग मिल कर के अँधेरे को हरेंगे.

    एक दिन हम जीत को बेशक वरेंगे.

    आप हैं पुस्तक ,

    मैं उसका आवरण हूँ।।


    दीप हूँ, सघर्ष का-

    मैं उद्धरण हूँ।।


    पवन तुम्हारी बतियां बोले
    सूरज अखियाँ तुम से खोले
    मैना मेरे अंतस डोले
    मन चंदन हो जाए

जैसी सुबहो शाम परिंदों की होती है .......

  1. .जैसी सुबहो शाम परिंदों की होती है .......

    .काश वैसे ही हमारी होती



    रोज सूरज निकलने के साथ

    नये जीवन की शुरुआत

    रोज सूरज डूबने के साथ

    चिताओं का अंत

    मन होता तो आकाश मे उड़ते

    मन होता घोसले मे सोते

    रोज नया घोसला बनाते



    रोज नई दुनिया हम बसाते .

    नये मीत हम रोज बनाते

    रोज नया हम गाना गाते

    मन होता आकाश मे उड़ते

    मन होता धरती पर चुगते

    नही किसी से होता बैर

    नही मानते किसी को गैर

    सारी धरती अपनी होती

    जहाँ हमारा अपना होता

    सूरज चंदा अपने होते

    ना होता अपना भगवान

    न होती कोई झूठी शान

    हर डाली पर रोज फुदकते

    मन माना हम जीवन जीते.

Tuesday, 27 November 2012

मौत तो निश्चित है .



मौत तो निश्चित है ..

आएगी ही

एक दिन दबे पाँव

चुपके से

जब उसका समय आ जाएगा .

सपने अपने सभी

धरे के धरे रह जाएँगे

पुत्र के कंधे से मोक्ष नही मिलने वाला

सब के सब निपोरते रहें अपनी खीस

उपरवाले की लीला मे बड़ा दम है


फिर हमे किस बात का गम है

एक लाख पूत सवा लाख नाती

उस रामन घर दिया न बाती

धृतराष्ट्र के सौ प...

अपने बीज को ..

अपने बीज को ..
अनुकूल मौसम मे
सौंप दी थी पूरी धारा |
उगेगा ,बढ़ेगा
धरती को, राही को
छाया देगा |
उगा ,बढ़ा ,फैला भी
मोहक ,आकर्षक
विशाल आकर मे
पूरा पेड़ बनाकर छा गया |

इतना की हमारे हिस्से की
अन्जुरी भर धूप
को भी ग्रहण लग गया |
फल और छाया तो दूर
वह तो रोशनी भी ले गया |

मैं उद्धरण हूँ।।


जीत भी हूँ हार भी हूँ

प्यार भी संताप भी हूँ


मैं तुम्हारा मीत भी हूँ

मैं तुम्हारा गीत भी हूँ


मैं तुम्हारी कल्पना हूँ

मैं तुम्हारी अल्पना भी

मैं तुम्हारे राग का सुर हूँ

मधुर अनुराग का गुर हूँ


तुम्हारी प्रीत मे हूँ मैं

तुम्हारी रीति मे हूँ मैं

दीप हूँ, सघर्ष का मैं उद्धरण हूँ।।

जो कभी रुकता नहीं,

मैं वो चरण हूँ।। ...


है अन्धेरा खूब लेकिन मैं जलूँगा।

जब तलक हो ना उजाला, मैं डटूंगा।

जो कहा, उसको किया

वो आचरण हूँ।।



लोग मिल कर के अँधेरे को हरेंगे.

एक दिन हम जीत को बेशक वरेंगे.

आप हैं पुस्तक ,

मैं उसका आवरण हूँ।।


दीप हूँ, सघर्ष का-

मैं उद्धरण हूँ।।