Saturday, 28 January 2017

बचपन की यादें आज एक लोकगीत सोहर . प्रोफ.सरोज मिश्र·19 अप्रैल 2016

.आज मन कहा रहा है अम्मा की गोद में सर रख कर सो जाएँ .बचपन में जब मा सुबह सुबह ४ बजे जाँता में गेहूं पीसती थी तो अक्सर गाती थी और मैं बिस्तर से उनींदा ही भागकर आता था उसके जांघ पर सर रखकर आँख बंद करके सो जाता था जांते की घुरुर घुरूर और मा के अमृतसुर में लोक धुन की अलौकिक संरचना में मैं डूब जाया करता था ऐसा अक्सर होता था मुझे वे सारे गीत याद हैं सुनाऊंगा आज एक सोहर
जब जब बाजे खझडिया त हिरनी विसुरै हो . राम का मुंडन है .सरयू के किनारे एक हिरन का जोड़ा घास चर रहा है ..हिरनी की नजर चहलकदमी पर पडी तो उसने ..हिरन से कहा ,प्रिय लगता है आज महाराज दशरथ के यहाँ कोई उत्सव है .चलो छिप जाओ ..नहीं तो तुम्हारा शिकार हो जाएगा .
.अभी बात पूरी हुई ही नहीं थी की हिरन को वान लग गया .वह मर गया .शिकारी उसे कंधे पर लेकर दशरथ के दरबार में गया, माता कौशल्या के हवाले किया .हिरनी उसके पीछे पीछे गयी ..कौशल्या ने हिरनी से आने का कारन पूछा तो उसने कहा ..माता तुम ऐसा करो हिरन का मांस निकाल लो राम के लिए व्यंजन बनाओ .. और खाल हमें दे दो .हमें खुसी होगी ..हम चले जायेंगे | कौशल्या बोली ..तुम खाल का क्या करोगी ....हिरनी हिरनी बोली....जंगल के किसी सूखे ठूठ पर लटका कर इसके इर्द गिर्द घास चरुन्गी .मुझे संतोष होगा की मेरा पति मेरे पास है . कौसल्या पहले तो राजी हो गयीं .पर तुरंत मना कर दिया ..बोलीं .... .जाहु हिरनी घर अपने खलारिया न देबय हो ..हिरनी खलरी क खझडी मढइबय बजईहैं राजा रघुबर .
..क्या करती हिरनी रोती विलखती चली गयी ....फिर क्या था हिरन के .खाल की खंझडी बनी|
राम लखन भारत सत्रुघन बजाते बजाते खेलते थे .खझडी. की आवाज हिरनी को जंगल में सुनाई पड़ती ..तो उसे अपने पति की याद आती, वह पति के स्मृति में विभोर हो जाती | लोक गीत कार लिखता है ...जब जब बाजे खझडिया त हिरनी वीसूरय हो ...... यह मार्मिक सोहर हम माँ से सुनते थे ..सुबह जब माँ जाता में गेंहू पीसती थी तो यही सोहर गाती थी .हम खटिया से उठ कर आते और माँ की जांघ में सर रख कर सो जाते जाते के घुरुर घुरू की ध्वनी और सोहर का राग ..अलौकिक संगीत का समा .वहअब कहाँ ......कैसी लगी कथा .....

संघियों का हठयोग बनाम नेहरु की भारतीयता प्रोफ.सरोज मिश्र·26 दिसंबर 2016

जब से भाजपा के नेतृत्व में केंद्र में सरकार बनी है तब से उसका प्रयास पंडित जवाहर लाल नेहरू के नामोनिशान मिटाने का रहा है। कुछ माह पहले ही बांडुंग सम्मेलन की वर्षगांठ मनाई गई है और उसमें हमारी विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने नेहरू का नाम भी नहीं लिया। इधर अनेक अफ्रीकी देशों के नेता भारत आए थे। हमारे प्रधानमंत्री ने उनके बीच उनका नाम भी नहीं लिया यद्यपि अफ्रीकी नेताओं ने पंडित नेहरू के योगदान को सराहा और रेखांकित किया कि नवस्वतंत्र देशों को एकजुट करने में उनके प्रयास को भुलाया नहीं जा सकता। तब से हमारे प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री ने नहीं चाहते हुए भी पंडित नेहरू का नाम लेना शुरू किया है। प्रधानमंत्री ब्रिटेन के दौरे पर थे जहां उन्होंने नेहरू का नाम अनेक बार लिया भले ही नहीं चाहते हुए। खैर, हमारा सत्तारूढ़ दल जितनी भी कोशिश करे वह न भारत का इतिहास बदल सकता है और न उसमें पं. नेहरू की भूमिका। आइए हम देखें कि नेहरू किस तरह के भारत का निर्माण आजादी के बाद करना चाहते थे। 1920 के दशक में उन्होंने पश्चिमी विश्व और तत्कालीन सोवियत संघ का दौरा किया और वहां समाजवादी उभार का अध्ययन किया। वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि राष्ट्रवादी दृष्टि भारत जैसे देश के स्वतंत्रता संग्राम के लिए बेहद जरूरी है मगर आजादी प्राप्त होने के बाद हम किस दिशा में जाएंगे उसका खाका भी तैयार होना चाहिए। उनका मानना था कि राष्ट्रवादी दृष्टि को समाजवाद से जोडऩा होगा। याद रहे कि समाजवाद की रूपरेखा भारत की परिस्थितियों के अनुकूल होगा। उन्हें पूरी उम्मीद थी कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस उसे अवश्य स्वीकार करेगी। स्वतंत्रता संग्राम में जुटे एशिया और अफ्रीका के देशों को समाजवाद के आधार पर जोड़ा जा सकता है। उनके सामने समस्या थी कि भारत की परिस्थितियों को देखते हुए समाजवाद की क्या रूपरेखा होनी चाहिए। स्पष्ट है कि सोवियत संघ में अपनाई जा रही समाजवाद की रूपरेखा की कार्बन कॉपी को भारत में लागू करने का प्रयास सफल नहीं हो सकता। वह हमारी परिस्थितियों के अनुकूल होना चाहिए। उन्होंने देश के विभिन्न भागों में जाकर अपने समाजवादी विचारों और दृष्टि पर लोगों के साथ विचार विमर्श आरंभ किया। 18 मार्च 1928 को युवा लोगों के सामने तीन बातों को रखा: 1. भारत को पूर्ण आ•ाादी मिलनी चाहिए, 2. धर्म को विशुद्ध व्यक्तिगत मामला होना चाहिए और उसे राजनैतिक, आर्थिक एवं सामाजिक मुद्दों में हस्तक्षेप की इजाजत नहीं दी जा सकती, और 3. देश के सभी नागरिकों को जाति, वर्ग और संपदा का बिना ख्याल किए समाज अवसर मिलना चाहिए। उन्होंने देश में घूमकर लोगों, विशेषकर कांग्रेस कर्मियों को, स्वतंत्रता के महत्व के विषय में समझाया और इस बात पर जोर दिया कि हमें एक नई अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की स्थापना की ओर बढऩा चाहिए। उन्होंने ऑल बंगाल स्टूडेंट्स कांफ्रेंस को बतलाया कि पूर्ण राष्ट्रीय आ•ाादी के बिना हम अपनी भावी प्रगति की दिशा और रूपरेखा तय नहीं कर सकते और न ही हम राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक स्वतंत्रता की ओर बढ़ सकते हैं। राष्ट्रीय आ•ाादी का यह मतलब कतई नहीं है कि हम दूसरे राष्ट्रों के साथ लड़ाई-भिड़ाई करने और अपना विस्तार करने में जुट जाएं। हमें एक विश्व राष्ट्रमंडल बनाने की दिशा में प्रयास करना चाहिए जिससे उनके बीच सहयोग और एकजुटता बढ़े। उन्होंने रेखांकित किया कि जब तक दुनिया में साम्राज्यवाद रहेगा तब तक उपर्युक्त विचार आगे नहीं बढ़ सकता क्योंकि साम्राज्यवाद कमजोर देशों पर कब्जा जमाने के फेर में रहता है। राजनीतिक स्वतंत्रता आवश्यक है मगर वह अंतिम लक्ष्य का मात्र एक भाग है। उसके अन्य भाग हैं : सामाजिक और आर्थिक मुक्ति और बिना भेदभाव के आर्थिक विकास हो। भारत में जनसंख्या का एक बड़ा भाग युगों से दबाया जाता रहा है और उसे धर्म या तथाकथित परंपरा के नाम पर प्रगति से वंचित रखा गया है। सारे देश में लाखों मजदूरों को उनके योगदान का उचित पारिश्रमिक नहीं मिलता है जिससे वे गरीबी और तंगहाली की जिंदगी जीने को मजबूर हैं। यह स्थिति तब तक नहीं बदलेगी जब तक हम समाजवादी व्यवस्था को नहीं अपनाएंगे। यदि हम सामाजिक समानता की दिशा में बढऩा चाहते हैं तो समाजवाद का कोई विकल्प नहीं हो सकता। पूरे देश में भ्रमण कर नेहरू ने लोगों को बतलाया कि देश की पूर्ण राजनीतिक आ•ाादी और सामाजिक-आर्थिक रूपांतरण का एक ही मार्ग है : समाजवाद। उन्होंने गरीबी और दरिद्रता को महिमामंडित करने के प्रयास पर करारा प्रहार किया। उन्होंने उन लोगों की कड़ी आलोचना की कि अभी गरीबी और दरिद्रता की जिंदगी जीने वालों को परलोक में संपूर्ण सुख एवं शांति मिलेगी। उन्होंने रेखांकित किया कि गरीबी कोई अच्छी चीज नहीं है। उसे जड़मूल से उखाड़ फेंकने की आवश्यकता है तभी आदमी का जीवन सुखमय हो सकेगा। गरीब पर न दया दिखाने की आवश्यकता है और न ही उसे किसी के दान पर निर्भर रहना चाहिए। नेहरू का मानना था कि गरीबी को जन्म देने वाली व्यवस्था का समूल नाश होना चाहिए। यह तभी संभव हो सकता है जब समाज में जन्मजात गरीबी का नाश हो। वर्तमान सामाजिक-अर्थव्यवस्था के स्थान पर भारत के लिए उपयुक्त समाजवादी व्यवस्था आए। नेहरू की इस नयी सोच को हम ''स्वराज और सोशियलिज्म में स्पष्ट रूप से देखते हैं। यह लेख 11 अगस्त 1928 को ''द न्यू लीडर नामक पत्रिका में छपा था। यहां प्रश्न उठाया गया था कि भारत के आजाद होने पर हम कौन सी व्यवस्था स्थापित करना चाहते हैं। हम भारत को आजादी के बाद किस दिशा में ले जाना चाहते हैं? इस प्रश्न का उत्तर तलाशने के लिए हमें देश की सीमाओं के बाहर देखना होगा और हमें देखना होगा कि पश्चिमी यूरोप में औद्योगिक क्रांति के बाद क्या परिवर्तन हुए हैं। आज हमारे देश में ऐसे अनेक लोग हैं जो हमारे इर्द-गिर्द क्या हो रहा है उसकी ओर ध्यान देने के बदले अब भी अतीत में जी रहे हैं। कुछ लोग वैदिक युग लाना चाहते हैं तो कई इस्लाम के आरंभिक दिनों को फिर से स्थापित करना चाहते हैं। हम इस बात को भुला रहे हैं कि हमारी प्राचीन सभ्यताएं बिल्कुल भिन्न स्थितियों में पनपी थीं। हमें बीते हुए कल को छोड़कर वर्तमान की ओर देखना होगा। पुराने मिथकों और धारणाओं को त्याग कर वर्तमान काल की परिस्थितियों और वास्तविकताओं की ओर देखना और उन्हें समझना होगा। यहां पर उन्होंने रूस का जिक्र किया और कहा कि किस प्रकार वह पूंजीवाद को त्याग कर सामाजिक-आर्थिक रूपांतरण की ओर बढ़ रहा है। उसने समझ लिया है कि पूंजीवाद का रास्ता देर-सबेर साम्राज्यवाद और औपनिवेशिक शोषण की ओर ले जाएगा। व्यापार के क्षेत्र में गैरबराबरी की शर्तों और युद्ध की ओर ढकेलेगा। आजादी के बाद भारत का सामाजिक-आर्थिक आधुनिकीकरण पूंजीवाद के रास्ते पर चल कर नहीं हो सकता क्योंकि एक व्यक्ति का शोषण दूसरे व्यक्ति तथा एक जनसमूह का शोषण दूसरे जनसमूह से बचना काफी कठिन है। हम ब्रिटिश साम्राज्यवाद और शोषण के विरुद्ध हैं। इसी से यह बात सामने आती है कि हम पूंजीवाद का रास्ता नहीं अपना सकते क्योंकि वही साम्राज्यवाद की जननी है। विकल्प है कि हम समाजवाद के किसी न किसी रूप को अपनाएं जो भारत की स्थितियों और परिस्थितियों के अनुरूप हो। इस प्रकार भारत पर ब्रिटिश दबदबे के खिलाफ हम उठ खड़े हों। ऐसा हम राष्ट्रवादी आधार पर ही न करें बल्कि सामाजिक एवं अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों को देखते हुए आवश्यक है। हम ध्यान से देखें तो पाएंगे कि पंडित नेहरू नवउपनिवेशवाद के विभिन्न पहलुओं से अवगत थे। उन्होंने रेखांकित किया कि ब्रिटेन हमें काफी हद तक राजनीतिक क्षेत्र में स्वतंत्रता दे सकता है। हम देश के अंदर चुनाव के आधार पर सरकार भी बना सकते हंै मगर वह अपना आर्थिक आधिपत्य नहीं छोड़ सकता। स्पष्ट है कि आर्थिक आजादी के बिना राजनीतिक स्वतंत्रता बेमानी है। एक स्वतंत्र अर्थव्यवस्था के बिना राजनीतिक आजादी काफी कुछ निरर्थक है। हम देश की आजादी की मांग अनेक दृष्टियों से कर सकते हैं मगर आर्थिक आ•ाादी के बिना यह सब बेमानी है। असल चीज तो आर्थिक आजादी है। हमें देश की जनता की समस्याओं को देखते हुए अर्थव्यवस्था की दिशा और उसकी आंतरिक स्थितियों को नियोजित करने की पूरी आजादी होनी चाहिए। नेहरू ने बार-बार इस बात की ओर ध्यान दिलाया कि हमारी आजादी की लड़ाई को अन्य देशों के स्वतंत्रता संग्राम के साथ जोड़कर देखना चाहिए। हम अलग-थलग नहीं रह सकते। देश की सीमाओं के बाहर जो कुछ हो रहा है हम उसकी उपेक्षा नहीं कर सकते। हमें आजादी मिलने के बाद देश के सामाजिक-आर्थिक रूपांतरण की दिशा क्या होगी उस पर पहले से विचार कर उसकी रूपरेखा बनानी चाहिए। आज नरेंद्र मोदी की सरकार मुख्य रूप से विदेशी प्रत्यक्ष निवेश पर निर्भर दिखती है। वह इस बात को नजरअंदाज कर रही है कि मूडी ने क्या कहा है। मूडी दुनिया की तीन बड़ी रेटिंग एजेंसियों में एक है। बाहर से आकर यहां निवेश करने वाले उससे मार्गदर्शन लेते हैं। मूडी ने रेखांकित किया है कि देश के अंदर ऐसी ताकतें हैं जो देश का सांप्रदायिक विभाजन करना चाहते हैं। इस स्थिति में यहां निवेश करना भारी जोखिम उठाना है। कहना न होगा कि नरेंद्र मोदी के तमाम विदेश भ्रमण के बावजूद आशानुकूल मात्रा में विदेशी निवेश नहीं आया है।

अब्दुल रहीम खानखाना .

अब्दुल रहीम खानखाना .अकबर के नौ रत्नों में सबसे नायब हीरा ,एक अद्भुत व्यक्ति .इतना बड़ा शूरमा की १६ से ७२ वर्ष की उम्र तक लडाइयां ही लड़ता और जीतता रहा /इतना बड़ा दानी की किसी ने कहा की मैंने एक लाख अशर्फियाँ एक साथ देखी नहीं.. तोउसे एक लाख अशर्फियाँ दे दी.. विनम्रता इतनी की देने के बाद भी शर्मिंदा थे ...देते समय उनकी आखे नीचे थीं ,किसी ने आँखे नीचे होने का कारन पूछा तो कहा . देन हार कोई और है भेजत है दिन रैन लोग भरम हमपर धरें यातें नीचे नैन .. सहृदय ऐसे की एक सिपाही की स्त्री के एक बर्वे पर प्रसन्न हो गए ;- प्रेम प्रीति को बिरवा चलेहु लगाय सींचनि की सुधि लीजै मुरझ न जांय. और सिपाही को धन धन्य देकर उसकी नवागत बधू के पास भेज दिया .और इसी चाँद पर एक पूरा ग्रन्थ ही लिख डाला गुण के ग्राहक ऐसे की अरबी/फ़ारसी ,हिन्दी के अनेक रचना कार इनके मित्र थे. चरित्रवान इतने की रूपवती के प्रणय निवेदन के कथन ..की मुझे अपने जैसा पुत्र दे दो .पर अपना सर उसकी गोद में डाल दिया ..माँ कहकर .तुलसी के मित्र थे .अकबर के विस्वास पात्र थे .जहाँगीर और शाहजहाँ के द्वन्द में इस कदर फंसे की पिस गए .जेल में डाल दिए गए उनके पुत्र दरब खान का सर काट कर उनके पास भेज दिया गया .उनके पूरे परिवार को जालिमो ने मार दिया फिर भी स्वाभि मान नहीं छोड़ा ... रहिमन मोहि न सुहाय अमिय पियावै मान बिन .बरु विष देई बुलाय मान सहित मरिबो भलो . और प्रेमी इतने गहरे की .. अंतर दाव लगी रहे धुंवा न प्रगट सोय कई जिय जाने आपनो या सर बीती होय .. जे सुलगे ते बुझ गए बुझे ते सुलगे नाहि रहिमन दाहे प्रेम के बुझी बुझी के सुल गाहि .. भक्त ऐसे की कृष्ण मय हो गए कवियों ने लिखा कोटिन हिन्दू वारिये मुस्लमान हरि जनन पर ,.कुल मिला कर एक ऐसा व्यक्तित्व जिसे पढ़ कर आप पूरी एक कौम के बारे में अपनी जान कारी को अधूरी मानने पर विवास होंगे .. कल से आगे ..कल के लेख में अशुद्धियाँ थीं बाद में दूर किया अब नही हैं .आज कोशिस की है की अशुद्ध न हो फिर भी होगा ही ..आज और अच्छा बना है पढ़िए रहीम को पढ़ते समय मुझे लगा की उनका पूरा जीवन -राजसी विलास का रहा हो ,.दर दर,मारे मारे फिरने का रहा हो, युद्ध और फतह का रहा हो ,राजा, के क्रोध काल का हो ,कुचाली दोस्तों के विश्वास घातके समय का रहा हो, एक आंवा था जो भीतर ही दहक रहा था / रहीम के बारे में एक कहानी मिलती है की तान सेन ने अकबर के दरबार में एक पद गाया, जो इस प्रकार था . जसुदा बार बार यों भाखै है कोऊ ब्रज में हितू हमारो चलत गोपालहिं राखै ... और अकबर ने अपने सभा सदों से इसका अर्थ कहने को कहा , तनसेन ने कहा --यशोदा बार बार अर्थात पुनः पुनः यह पुकार लगाती है की है कोई ऐसा हितू जो ब्रज में गोपाल को रोक ले . शेख फैजी ने अर्थ कहा ....बार बार का मतलब ..रो रो कर रट लगाती है .बीरबल ने कहा बार बार का अर्थ है द्वार द्वार जाकर यशोदा पुकार लगाती है ...खाने आजम कोका ने कहा बार का अर्थ दिन है और यशोदा प्रतिदिन यही रटती रहती है .अब रहीम की बरी थी .उन्होंने अर्थ कहा ...तानसेन गायक हैं इनको एक ही पद को अलापना रहता है इस लिए उन्हों ने बार बार का अर्थ पुनुरुक्ति किया शेख फैजी फ़ारसी का शायर हैं इन्हें रोने के सिवा कोई काम नहीं .राजा बीर बल द्वार द्वार घूमने वाले ब्राम्हण हैं इसलिए इनका बार बार का अर्थ द्वार द्वार ही उचित है, खाने आजम कोका नजूमी (ज्योतिषी) हैं उन्हें तिथि बार से ही वास्ता पड़ता है इसलिए बार बार का अर्थ उन्होंने दिन दिन किया ,. पर हुजूर वास्तविक अर्थ यह है की यशोदा का बार बारअर्थात रोम रोम पुकारता है की कोई तो मिले जो मेरे गोपाल को ब्रज में रोक ले .इस ब्य्ख्या से रहीम की विद्ग्घ्ता और साहित्य की समझ का पता चलता है इस से रहीम के उस गहरे हिन्दुस्तानी रंग का पता चलता है जो रोमांच को सात्विक भाव मानता हैऔर रोम रोम में ब्रम्हांड देखता . जो शरीर के रोम जैसे अंग को भी प्राणों का सन्देश वाहक मानता है जो वनस्पति मात्र को विरत अस्तित्व का रोमांच मानता है रहीम का जीवन एक पूरा दुखांत नाटक है .जिसमे बहुत से उतर चढाव हैं .महात्मा तुलसी से उनकी प्रगाढ़ मित्रता थी .बाप बैरम खान अकबर की ही तरह तुर्किस्तान के एक बहुत बड़े कबीले के सरदार थे वे सोलह वर्ष की आयु से ही हुमायू के साथ रहे .उन्ही की कूबत थी की हुमयू को फिर से दिल्ली की राजगद्दी पर बिठाया ,हुमायूँ के मरने पर वे ही अकबर के अभिभावक बनगए.जिस साल हुमायूँ मरे उसी साल लाहौर में रहीम का जन्म हुआ .रहीम की माँ अकबर की मौसी थीं .अकबर से दूसरा रिश्ता भी था ,बैरम खान की दूसरी शादी बाबर की नतिनी सलीमा बेगम सुल्ताना से हुई थी .बैरम खान के मरने के बाद अकबर के साथ सलीमा का पुनर्विवाह हुआ ,पर भाग्य का खेल ,चुगुल खोरों ने बैरम खान और अकबर के बीच भेद की गहरी खाई खोद दी .बैतररम खान ने विद्रोह किया परास्त हुए ,उन्हें हज करने जाने की सजा मिली.वे गुजरात पहुंचे थे की उनका डेरा लुट गया बैरम खान का क़त्ल हो गया ,बफदारों ने ओ परिवार बचाया ,चार वर्ष के रहीम बारह वर्ष की सलीमा सुल्ताना बेगम .अहमद बाद पहुंचे .जब रहीम पांच वर्ष के थे तभी अकबर ने उन्हें अपने संरक्षण में ले लिया .शिक्षा दीक्षा कराई.बड़े सरदार मिर्जा अजीज कोकलताश की बहन माह बनू बेगम से निकाह करवाया .उन्नीस वर्ष की आयु में गुजरात का युद्ध जीत कर वहा के सूबेदार बने .... वे तुलसी के परम मित्र थे .और तुलसी को बेहतरीन इंसान मानते थे .. सुरतिय नर तिय नागतिय सब चाहत अस होय गोद लिए हुलसी फिरें तुलसी सों सूत होय और रामचरित मानस को बेहतरीन ग्रन्थ ........ राम चरित मांनस विमल सब ग्रंथन को सार हिंदुआं को वेद सैम तुरकन प्रकट कुरान .... कबीर तुलसी रहीम और रसखन मध्यकाल के चार बेहतरीन इंसान ..कबीर संत थे एक बेहतरीन इंसान थे .अनपढ़ गृहस्त थे .जाति पांति धन धर्म से परे थे .मन से साफ़ थे .कबीर की भाषा आम आदमी की भाषा थी.वे लिखते नहीं थे केवल बोलते थे लोक जीवन के बहुत नजदीक थे .उनके प्रतीक दृष्टान्त लोक जीवन से आते थे . वे राम नाम जपते जरुर थे पर पूजा और आडम्बर के विरोधी थे उनके राम दशरथ के बेटे राम नही थे .इस धरती पर कबीर से बड़ा कोई इन्सान पैदा ही नहीं हुआ ,एक मुकम्मल इन्सान क्या होता है जानने के लिए हर किसी को कबीर पढ़ना चाहिए .अनगढ़ ,सहज ,भीतर- बाहर एक ,निर्भय ,आस्थावान ,जागृत विवेक .बिना पढ़े पूरी तरह ज्ञानी ,प्रेमानुभूति की पराकाष्ठा को समझाने वाला .मनुष्यता का रक्षक ,जागृत ,त्यागी गृहस्थ ,मनुष्यता की रक्षा के लिए भगवान से भी मुठभेड़ करने को आमादा ,जीवन और जगत को पूरी तरह समझाने वाला ,उसकी नश्वरता का गायक .मनुष्य इस धरती पर दूसरा कोई नहीं ...कबीर को जानना एक तपस्या है .उसे समझना मनुष्य बनने के रस्ते में एक सफल कदम है, उसे जीना ही मनुष्य होना है .कबीर सत्य है, कबीर नित्य है, कबीर .लोक है ,कबीर लोक राग है ,कबीर जिजीविषा है ..अपने लोक को ,अपने लोकराग को .अपने सत्य को अपने नित्य में जी पाना ही कबीर होना है .उसे पढ़ना एक रोमांच है .उसे समझना ब्रम्ह को ,प्राणी को जानना है ,उसे जीना एक ताकत है ,कबीर जीवन की हिम्मत है .जीवन की कला है ..आज कबीर की ही सबसे जादा जरूरत है . कबीर धर्म की ब्याख्या है .कबीर कर्म का प्रमाण है .वह निष्काम कर्मयोगी गृहस्थ ...वेद की ब्याख्या है .पुरानो की समीक्षा है वेदांत दर्शन का निचोड़ है ....तुलसी महात्मा थे . भक्त थे . पढ़े लिखे थे . गृहस्त नहीं थे .पर संत नहीं थे .उन्हों ने अपने काम को पीटपीट के राम बना दिया था .और राम के परम भक्त थे.संस्कृत के विद्वान थे पर अवधी में लिखते थे वे.उनमे भी वे सारे गुण थे जो कबीर में थे बल्कि वे पढ़े लिखे थे पुरानो के जादा नजदीक थे परन्तु वेद वेदांत के ज्ञाता थे . रहीम .के परम मित्र थे .और रहीम तुलसी को बेहतरीन इंसान मानते थे .. सुरतिय नर तिय नागतिय सब चाहत अस होयगोद लिए हुलसी फिरें तुलसी सों सूत होय और रामचरित मानस को बेहतरीन ग्रन्थ ........ राम चरित मांनस विमल सब ग्रंथन को सांन हिंदुअन को वेद सम तुरकन प्रकट कुरान .... रहीम अकबर के दरबारी थे तुलसी नही थे .हाँ अकबर ने चाहा था पर तुलसी ने अकबर को सीधा सा जबा दे दिया था .. होऊं चाकर रघुबीर को पटो लिखो दरबार .तुलसी अब का होंही गे नर के मंसब दार ...मतलब हिम्मती थे निडर थे ब्राम्हण थे .लिखते अवधी में थे . लोक जीवन के बहुत नजदीक थे .उनके प्रतीक दृष्टान्त लोक जीवन से आते थे .रहीमऔर तुलसी दोनों समकालीन थे.रहीम संस्कृत अवधि अरवी फारसी के जानकार थे .सभी भाषाओं का आदर करते थे सभी में लिखते थे .वे मुसलमान थे पर भक्त थे .राम के भी और कृष्ण के भी .कृष्ण के एक परम भक्त और थे रसखान .इन पर फिर कभी ..हाँ तो मैं कह रहा था की तुलसी ने कभी मुस्लिम धर्म की कोई बात नहीं की .अरवी और फारसी की चर्चा तक नहीं की ...रहीम अरवी फारसी के साथ हिन्दवी में भी लिखते रहे और नमाज के साथ साथ पूजा भी करते रहे .वे दरबारी थे .शासक थे तलवार के धनी थे फिर भी भक्त थे .महात्मा थे संत थे .उदार थे ..उन्हों ने तुलसी और मांनस दोनों की प्रशंसा की .पर तुलसी ने ऐसा कहीं नहीं किया कभी नहीं किया .एक बार भी रहीम का जिक्र नही किया अरवी फारसी का नाम तक नहीं लिया प्रशंसा की तो बात ही छोडिये .इसी लिए मैंने कहा तुलसी संत नहीं थे .उनमें हिंदुत्व .और हिंदी संकृत प्रेम तो होना लाजमी था पर अरवी फारसी को जानने की ललक भी नहीं थी यह समझ से परे है .सम्मान तो जाने दीजिये .रहीं म तो अपने को भक्त कहलाने में खुस थे पर तुलसी इस दिशा में मौन ही रहे.बाबा तुलसी दास ने मानस लिख कर राम को स्थापित किया .हिन्दुओं को संगठित किया .लेकिन अपने सम्पूर्ण लेखन में देशकी अधी जनसंख्या का कोई उल्लेख नहीं किया .शैव ,वैष्णव, स्मार्त, साधू ,संत ,योगी ,गृहस्त ऊँचनीच का भेद भाव त्याग कर एक होने और लड़ाई ख़तम करने की बात की .किन्तु उन्हों ने कहीं भी .हिन्दू मुसलमान ,अवधि फारसी संस्कृत और अरबी,की बात नहीं की ,बौद्धों की बात नहीं की जैनियों की बात नहीं की .मतलब वे हिन्दुओं को संगठित करते रहे ,पर मुसलमान बौद्ध ,जैन की चिंता नहीं की ..अवधी में लिखते रहे ..पर .अरबी और फारसी ..तथा अन्य बोलियों की चर्चा नहीं की ...जब की उस समय की सबसे बड़ी जरुरत यही थी ..आमिर खुसरो ,कबीर ,जायसी .रहीम ,रसखान ..जैसे नायक .हिन्दू मुसलमान .और भाषा की समस्या से दो चार होते रहे ..रहीम जैसे .रसखान जैसे विद्वानों ने कृष्ण भक्ति की प्रन्संशा की .रहीम ने तो तुलसी दास और मानस तक की प्रसंशा की ..पर तुलसी ने ऐसा कभी नहीं किया ..आखिर तुलसी दास ने ऐसा क्यों किया ..यह प्रश्न मेरे दिमाग को परेशान करता है .कोई भी बड़ा रचना कार अपने युग से उस काल की सबसे बड़ी समस्या से मुह मोड़ कर कैसे रह सकता है .बड़ी बड़ी लडाइयां हो रहीं थीं अकबर ने तोडर मल ने सभी ने हिन्दू मुसलमान को एक करने की कोशिस की .अकबर ने तो दीनेइलाही .लिखा .पर तुलसी ने इस दिशा में मौन क्यों साधे रखा ... .इस मायने में रहीम और रसखान दोनों कबीर की तरह तुलसी से बहुत आगे रहे .मैं तो सोचता हूँ की अगर तुलसी ने रहीम और रसखान की तरह का आचरण किया होता तो शायदहमारी बहुत बड़ी समस्या ख़त्म हो जाती कम से कम उर्दू भाषा का जन्म तो नहीं होता .इस मायने में आमिर खुसरो की भी चर्चा कभी करूँगा . आज इतना ही .. बहुरि बंदि खलगन सितभायें जे बिन काज दाहिने बाएं ..तुलसी की खल वंदना के साथ रहीम का चौथा एपिसोड लिखना शुरू कर रहा हूँ .सज्जन लोग पढेंगे ,आदर करेंगे ... अमित उदार अति पावन विचारी चारू ,जहाँ तहां आदरियो गंगा जी के नीर सों /खलन के घालिबे को खलक के पलिबे को ,खान खाना एक रामचन्द्र जी के तीर सों //गंगा जल की तरह पवित्र राम के तीर की तरह शत्रु विनाशक परन्तु जगत पालक ब्यक्तित्व को उनकी कृति में तलाश क रने की लालसा ,ललक ,जग उठी है / रहीम ने प्रेम पंथ का एक चित्र खींचा है ..रहिमन मैं तुरंग चढी चलिबो पावक मांहिप्रेम पंथ ऐसो कठिन सब सों निबहत नाहि /घोड़े पर सवार होकर आग पर चलाना .और निबाह लेना सब के बसबूते का नहीं.रहीम जिन्दगी भर घोडेपर सवार हो कर आग में दौड़ते रहे . रहीम के काब्य तुरंग की यात्रा भी अग्नि यात्रा ही तो है .वह अग्नि है जीवन के सहज प्यार की जो कभी बड़ी सुखद कभी बड़ी दुखद रही ,पहले पड़ाव तक चढ़ती जवानी के अनुभवों से गुजरे ,पर वे भी राजसी जीवन के नहीं थे ,बिभिन्न प्रकारके सामान्य जन की मानसिक स्थितियों में प्यार के अनुभव थे ,इनमे हांस -विलाश है सजने सजाने का भाव है लालसा विदग्धता छल है मान मनौवल है प्रतीक्षा है राग रंग है ईर्ष्या है उत्कंठा है और लगन है ,कुल मिला कर लौकिक श्रृंगार की लहक दार .ललक मय छटा है .इस काल की दो रचनाएँ हैं बरवै नईका भेद और नगर शोभा ,बरवै नईका भेदमें नायिका की बिभिन्न अवस्थाओं का चित्र है ,एक उदाहरन .-मितवा चलेऊ विदेसवा मन अनुरागि-पिय की सुरति गगरिया रहि मग लागिप्रिय की स्मृति का कलश लिए नायिका रास्ते में खड़ी है कब प्रिय लौटेंगे और स्मृतियों का कलश उनके लिए मंगल कलश बनेगा , दूसरा चित्र.भोरहिं बोल कोयलिया बढ़वति तापघरी एक धरि अलिया रहु चुप चाप ./रात भर स्मृतियों में खोये खोये नींद उचटी रही जरा सी आंख लगी तो कोयल सबेरे ही बोल पडी और सबेरे सबेरे ताप चढ़ गया एक घड़ी तक तो वह चुप रहती ,पहले लेखमे मैंने बताया है की अपने एक सिपाही की पत्नी के चाँद से प्रभावित हो कर रहीम ने उसे धन देकर छुट्टी भेजा और उसी छंद में पुस्तक लिख दी नईका भेद .इसी काल की दूसरी रचना नगर- शोभा में बिभिन्न ब्यावसायों वर्गों ,जातियों उपजातियों की रूपसी तरुणियों के चित्र हैं ,कुजडिन का एक रूप देखिये.भांटा वरन सु कौजरी बेचै सोवा सागनीलजु भई खेलत सदा गारी दै दै फाग ,--बैगन की तरह काली कुजडिन सोवा साग बेचती है और निर्लज्ज गली दे दे कर फाग खेलती है ..इस रचना में कोई नहीं छूटा हैदफाली गाडीवान महावत नाल वन्दिनी चिरवा दारीनि,सईस ,काम ग़री ,नगारची ,बाज दारिनी ,दाव ग़री,साबुनी ग़री ,कुंडी गरिन,जिले दारी नी तक न जाने कितनी रोजगार में लगीं महिलाओं के चित्र हैं .जिले दारिनी का चित्र ..औरन को घर सघन मन चले जो घूंघट माह ,वाके रंग सुरंग को जिले दार पर छांह रुतबा तो देखिये .जिले दार बेचारा उसके बस में है,.बस आज इतना ही बहुरि बंदि खलगन सितभायें जे बिन काज दाहिने बाएं ..तुलसी की खल वंदना के साथ रहीम का चौथा एपिसोड लिखना शुरू कर रहा हूँ .सज्जन लोग पढेंगे ,आदर करेंगे ... अमित उदार अति पवन विचारी चारू ,जहाँ तहां आदरियो गंगा जी के नीर सों /खलन के घालिबे को खलक के पलिबे को ,खान खाना एक रामचन्द्र जी के तीर सों //गंगा जल की तरह पवित्र राम के तीर की तरह शत्रुविनाशक परन्तु जगत पलक ब्यक्तित्व को उनकी कृति में तलाश्काराने की लालसा ,ललक ,जग उठी है /रहीम ने प्रेम पंथ का एक चित्र खींचा है ..रहिमन मैं तुरंग चढी चलिबो पावक मांहिप्रेम पंथ ऐसो कठिन सब सों निबहत नाहि /घोड़े पर सवार होकर आग पर चलाना .और निबाह लेना सब के बसबूते का नहीं.रहीम जिन्दगी भर घोडेपर सवार हो कर आग में दौड़ते रहे . रहीम के काब्य तुरंग की यात्रा भी अग्नि यात्रा ही तो है .वह अग्नि है जीवन के सहज प्यार की जो कभी बड़ी सुखद कभी बड़ी दुखद रही ,पहले पड़ाव तक चढ़ती जवानी के अनुभवों से गुजरे ,पर वे भी राजसी जीवन के नहीं थे ,बिभिन्न प्रकारके सामान्य जन की मानसिक स्थितियों में प्यार के अनुभव थे ,इनमे हस -विलाश है सजाने सजाने का भाव है लालसा विदग्धता छल है मन मनौवल है प्रतीक्षा है राग रंग है ईर्ष्या है उत्कंठा है और लगन है ,कुल मिला कर लौकिक श्रृंगार की लहक्दार .ललक माय छटा है .इस काल की दो रचनाएँ हैं बरवै नईका भेद और नगर शोभा ,बरवै नईका भेदमें नायिका की बिभिन्न अवस्थाओं का चित्र है ,एक उदाहरन .-मितवा चलेऊ विदेसवा मन अनुरागि-पिय की सुरति गगरिया रहि मग लागिप्रिय की स्मृति का कलश लिए नायिका रास्ते में खड़ी हैकब प्रिय लौटेंगे और स्मृतियों का कलश उनके लिए मंगल कलश बनेगा ,दूसरा चित्र.भोरहिं बोल कोयलिया बढ़वति तापघरी एक धरि अलिया रहु चुप चाप ./रात भर स्मृतियों में खोये खोये नींद उचटी रही जरा सी आंख लगी तो कोयल सबेरे ही बोल पडी और सबेरे सबेरे ताप चढ़ गया एक घड़ी तक तो वह चुप रहती ,पहले लेखमे मैंने बताया है की अपने एक सिपाही की पत्नी के चाँद से प्रभावित हो कर रहीम ने उसे धन देकर छुट्टी भेजा और उसी छंद में पुस्तक लिख दी नईका भेद .इसी काल की दूसरी रचना नगर- शोभा में बिभिन्न ब्यावसायों वर्गों ,जातियों उपजातियों की रूपसी तरुणियों के चित्र हैं ,कुजडिन का एक रूप देखिये.भांटा वरन सु कौजरी बेचै सोवा सागनीलजु भई खेलत सदा गारी दै दै फाग ,--बैगन की तरह काली कुजडिन सोवा साग बेचती है और निर्लज्ज गली दे दे कर फाग खेलती है ..इस रचना में कोई नहीं छूटा हैदफाली गाडीवान महावत नाल वन्दिनी चिरवा दारीनि,सईस ,काम ग़री ,नगारची ,बाज दारिनी ,दाव ग़री,साबुनी ग़री ,कुंडी गरिन,जिले दारी नी तक न जाने कितनी रोजगार में लगीं महिलाओं के चित्र हैं .जिले दारिनी का चित्र ..औरन को घर सघन मन चले जो घूंघट माह ,वाके रंग सुरंग को जिले दार पर छांह रुतबा तो देखिये .जिले दार बेचारा उसके बस में है,.बस आज इतना ही ,क्रमशः जारी..प्रस्तुतकर्ता saroj mishra पर 22:48 Email ThisBlogThis!Share to TwitterShare to FacebookShare to Pinterest

Monday, 7 November 2016

खोता सिक्का जब चल जाता है तब सही सिक्के चलन से बाहर हो जाते हैं

कई बार प्रयोग में खोटा सिक्का चल निकलता है ,एक बार चल निकला तो कुछ दिनों तक अपना सिक्का भी जमा लेता है.सही सिक्के चलन से बाहर हो जाते हैं . कुछ ऐसा ही अंनहोनी होगई हमारे नगर में .भाजपा के तथा कथित पितामह लखीराम जो खरसिया से नगरपालिका का भी चुनाव नहीं जीत सके उन्हों ने अपने पुत्र को बिलासपुर से चुनाव मैदान में उतार दिया .कांग्रेस की कलह ने उन्हें जीतने दिया .फिर तो दुबारा तिबारा चौ बारा कांग्रेसी कलह पराजित हुई .जीत का सेहरा लखी राम जी के मोहरे के सर बंधा . .फिर तो मंत्री पद मिला शहर के व्यापारी और मंत्री महोदय ......सिक्का चल पडा पर इसमे हमारा शहर बर्बाद हो गया .गुंडई लूट मार संगठित ढंग से चली .हजारों डकैती नगर के एक भाजपाई के संरक्षण में चली जो नगर निगम में ओहदे दार थे .पुलिस ऍफ़ आई आर सब हवा .परिणाम कुछ नहीं होना था यह सब को पता था .उनका रायपुर ट्रांसफर कर दिए ..भूल गया शहर परन्तु .शहर गड्ढा हो गया है जमीने और तालाब भी बिल्डरों के कब्जे में है .छुटभैये राम नामी दुपट्टा ओढ़े कहर ढहा रहे हैं गली गली.गुडाकू शराब देसी अंग्रेजी बिक रही है पीने वाले पी के टुन्न हैं .ट्राफिक व्यवस्था है ही नहीं .शाम को निकलना नरक के दरवाजे पर दस्तक देना है .बेजा कब्जा के कारण सडक ख़तम है बड़े होटल वालों ने बाकायदा सड़क को पार्किंग बना लिया है .जमीने हरियाणा के लालों ने खरीद ली ..और भी बीहुत कुछ .कराहता चरमराया शहर मुक्ति को छटपटा रहा है . हाँ शहर के आसमान पर १० /१२ करोड़ पति उभर गए .भैया की मिलकियत १० गुना हो गयी .एपा प्रोजेक्ट के कई सौ करोड़ कहाँ हैं प्रोजेक्ट कहाँ है ..मत पूछना ..देश द्रोही कहे जाओगे .
हमारे बिलासपुर में "दिल से" बहुत चल रहा है. ....भैया दिल से, .....भाभी दिल से.... एक परचा तो "दिल से" घर में पड़ा है. मुश्किल ये हैं कि पंद्रह साल से भैया डटे हुए हैं और गजब की राजनीति करते हैं. जनता बेहाल है एक रु किलो चाउर और दारु में मस्त है .अब तो गैस साईकिल दल न जाने क्या क्या .. और ठेकेदार, बिल्डर मालामाल हैं. भाभी को चार साल पहले ही मौका मिला, इस दरमियान यह बताने में सारा समय गुजर गया कि शहर की तकदीर संवारने की कवायद फेल क्यों हो गई... उनकी आरटीआई छाप, अदालत छाप संघर्ष के प्रशंसक कुछ जरूर हैं, लेकिन जनता को तो कुछ दिखना था, कभी भी दिखा नहीं. नारा भले ही "दिल से" हो.... मेरे शहर के लोग दिल पर पत्थर रखकर ही अपना विधायक चुनेंगे... यह तय है.अबकी नहीं बदला कुछ तो फिर पञ्च साल में गड्ढा हो जाएगा .इस लिए अभी नहीं तो कभी नहीं ...की चर्चा हर चुनाव में होती है .पर यह जो नया चुनाव का तरीका है घर बैठिये कमाइए वोट अगर भैया को नहीं देना तो वोट देने मत जाइए ..नायब है ..अब तो जोगी जी की पार्टी है समीकरण नए हैं ......बिलासपुर तुम्हे क्या मिला नया राज्य बन्ने से

Tuesday, 13 September 2016

हिंदी दिवस की औपचारिकता

कल देश हिन्दी दिवस की औपचारिकता निभाए गा ,संस्थाओं मे कार्यालयों मे चर्चा होगी .बस हो गया .हिन्दी को राष्ट्रभाषा तो छोडो संपर्क भाषा का दर्जा भी पूरे देश मे नही है .इसके दो दुश्मन है एक तो अँग्रेज़ी का क्रेज़ नही छूट रहा है दूसरे वोट की राजनीति ने क्षेत्रीय बोलियों को हिन्दी का प्रतिस्पर्धी बना रखा है .लोग या तो अँग्रेज़ी बोलते हैं या क्षेत्रीय बोली.
हिन्दी विश्व की सबसे वैज्ञानिक भाषा है .देवनागरी सबसे वैज्ञानिक लिपि ,दोनो ही हमारी सांस्कृतिक विरासत के संवाहक भी हैं
यही दुनिया की एक मात्र भाषा है जिसमे जो लिखा जाता है वही बोला जाता है .हमारे जातीय परिवारिक रिश्तों के हर इकाई के लिए शब्द हैं .पूजा पाठ एवं खेती खलिहान से लेकर संवेदनाओं की प्रस्तुति के शब्द हैं .पर फिर भी उपेक्षित है .स्वतंत्रता के बाद यही हमारी कमाई है हिन्दी का तिरस्कार .,गाँधी स्वामी दया नंद जैसे महान लोगों ने जिसे अपना हथियार बनाया ,पाठ्यक्र्मो मे औपचारिक हो कर रह गयी .जो हिन्दी का खाते हैं वे भी हिन्दी का गाते नही .या तो क्षेत्रीय बोली के नेता बनाते हैं या अँग्रेज़ी के मसीहा ...हमारी तहज़ीब .हमारी अस्मिता की पहचान है हिन्दी .
देवनागरी लिपि के रचना कारों ने कोई कसर नही छोड़ी हर एक सांस्कृतिक शब्द को ध्यान मे रख कर लिपि की रचना की काका मामा नाना नानी मामी चाचा काकी अम्मा बापू नाती पोताबाबा ताउ मौसी बुआ सास ससुर साली .लोहार बढ़ई धोबी नाउ कहार डॉली दुलहन प्रणाम चरण पदुका घड़ा पनघट पनिहारीन भोर दुपहरी उषा संध्या कुआँ सखी सखा बरहि कथा तरकारी सब्जी पूड़ी खीर भात डाल बासी ज्ञान ऋषिगुरु जैसे शब्द क्ष त्र स श ष .य व जैसी ध्वनियों का विशेस महत्व है हमारी संस्कृति मे ,और किसी भाषा मे नही पर हत भाग्य वह रे वोट की राजनीति ...नेताओं ने देश का सत्या नाश कर दिया धर्म की कर्मकांड की मोक्ष की माला जपते हैं .पर संस्कृति इन्हे समझ मे नही आती .

Sunday, 21 August 2016

नरेन्द्र मोदी की बेलगाम भाषा के खतरे


बेलगाम भाषा का टकराव पैदा करती है।साथ ही पीड़ादायक आनंद की सृष्टि भी करती है। सुनने वाला आनंद में रहता है लेकिन इस तरह की भाषा सामाजिक कष्टों की सृष्टि करती है और तनाव पैदा करती है। मोदी बाबू ने मैनस्ट्रीम मीडिया में बेलगाम भाषा को जनप्रिय बनाया है। हाल ही में वे जब हरियाणा में बोल रहे थे तो लोग समझ ही नहीं पाए कि उनके साथ क्या घट रहा है,यही हाल चुनावी सभाओं का भी था।
मोदी के भाषायी प्रयोगों को ध्यान से देखें तो पाएंगे कि मोदी ने वक्तृता का ऐसा इडियम विकसित किया है जिसमें रेशनल के लिए कोई जगह नहीं है। वे भाषा में शब्दों का प्रयोग करते समय पद,सामाजिकता और संस्थान की भाषा के मानकों का अतिक्रमण करते हैं। चुनावों में इस तरह का अतिक्रमण चलता है लेकिन सामान्य स्थितियों में पद और संस्थान की भाषा का ख्याल रखा जाना चाहिए।
मसलन मोदी का हाल ही में वैज्ञानिकों को यह कहना कि 'चलता है' का रवैय्या नहीं चलेगा। यह कथन अपने आप में बहुत कुछ कहता है।प्रधानमंत्री अपनी संस्थान की भाषा भूलकर और पेशेवरलोगों की भाषा भूलकर जिस मुहावरे में बोल रहे थे वह बेलगाम भाषा का नमूना है। नभाटा के अनुसार मोदी ने कहा ''अब 'चलता है' वाला रवैया बिल्कुल नहीं चलेगा और इसे छोड़ना ही होगा।'' । मोदी ने यह भी कहा '' डीआरडीओ ग्लोबल समुदाय को ध्यान में रखकर खुद में बदलाव लाए।'' , अफसोस की बात है कि मोदी को इतना ही नहीं मालूम कि यह संस्थान विश्व प्रतिस्पर्धा को ध्यान में रखकर अपनी प्राथमिकताएं तय करके काम कर रहा है। सबसे बेहतरीन वैज्ञानिक इसमें काम करते हैं।इन वैज्ञानिकों के बीच में प्रधानमंत्री की भाषा में बोलना चाहिए न कि गैर-सांस्थानिक भाषा में।इसके अलावा वैज्ञानिकों के बीच में बोलते समय यह भी ध्यान रहे कि वे गुलाम नहीं हैं जो आदेशों पर काम करें। वे जो तय करते हैं उसकी रोशनी में काम करते हैं। इसी तरह जब 15अगस्त को लालकिले से मोदी बोल रहे थे तो पद-संस्थान की भाषिक मर्यादा का अतिक्रमण करके बोल रहे थे।मसलन् , बिना संसद की अनुमति के उन्होंने योजना आयोग को खत्म करने की घोषणा कर डाली।साथ में हिदायतों और नसीहतों की जड़ी लगा दी। नसीहतें तानाशाह देते हैं,लेकिन मोदी तो लोकतंत्र के नायक के रुप में बोल रहे थे उनको नसीहतें देने की जरुरत नहीं थी।
मोदी ने अपनी भाषा को पद-संस्थान की भाषा के अनुकूल भाषा परिवर्तन नहीं किया तो वह दिन दूर नहीं कि वे देश में भाषा में भिडंत करते-कराते नजर आएंगे। हाल ही में हरियाणा में हाइवे के उदघाटन पर उनका जो भाषण था वह प्रधानमंत्री का उदघाटन भाषण नहीं था वह तो भिड़ंत भाषण था ,जाहिरा तौर पर परिणाम सामने है,कांग्रेस के कई नेताओं ने तेज और सही प्रतिक्रिया व्यक्त की है। इस तथ्य को मोदी समझें और दुरुस्त करें कि वे देश के प्रधानमंत्री हैं और उस पद और संस्थान की भाषायी परंपरा है,वह परंपरा यदि टूटती है तो जमीनी स्तर पर सामाजिक बिखराव और टकराव पैदा होना लाजिमी है।
मोदी की भाषा में हेकड़ी,उपदेश,दादागिरी के साथ फासिस्ट भाषायी भावबोध छिपा है ,मोदी को इसको सचेत रुप से अपने भाषिक संसार से बेदखल करना होगा वरना टकरावों का जन्म होगा।...

Saturday, 6 August 2016

आरएसएस शांति का पक्षधर नहीं है

मनोहर परिकर ने अभी कुछ दिनों पहले एक बयान देते हुए आमिरखान और किरण को कुछ कुछ कह गए .जो उन्हें नहीं कहना था .असल में यह उनकी आदत है .एक साल पहले उन्हों ने एक बयांन दिया था .
."सेना के महत्व का ह्रास हुवा है क्यों की पिछले ४० ५० सालों में देश ने कोई युद्ध नहीं लड़ा .....
दो बातें .
एक तो मनोहर परिकर खाना क्या चाहते हैं क्या हर रोज युद्ध लड़ा जाना चाहिए
दूसरी की बांगला देश का निर्माण युद्ध और कारगिल का युद्ध हुए ४० ५० साल हो गए क्या ......
आखिर मनोहर परिकर खाना क्या चाहते थे क्या वे अगली लोकसभा के पहले सेना के महत्व को बढाने के नाम पर देश को किसी युद्ध में झोंकने की सोच रहे हैं क्या
मनोहर परिकर अगर ऐसा सोच रहे हैं तो कोई आश्चर्य नहीं क्यों की आरएसएस शांति का पक्षधर नहीं है वह अशांति के माध्यम से भय पैदा करके अपनी शक्ति बढ़ता है शक्ति की पूजा करता है शस्त्र  की पूजा करता है .उसका शास्त्र से कुछ लेना देना नही .वह शिवाजी और झांसी की रानी का पक्षधर है .इसीलिए उन्हें गाँधी नेहरू पटेल खटकते थे .आरएसएस न तो सामाजिक नियमन और सहिष्णुता में विशवास करता न शांति में ...मनोहर परिकर के दोनों कथन पर संसद में बंहस होनी चाहिए थी लेकिन यहाँ तो हमारे विपक्षी नेता बस बोलते हैं सोचते नहीं पढ़ते नहीं .पाकिस्तान मो फद्गोबरी खेल कर लौटे राजनाथ ने संसद को गुमराह कर दिया और लोग झांसे में आ गए .काश्मीर में अशांति असम में अशांति उत्तरप्रदेश में अशांति राजस्थान छत्तीसगढ़ में अशांति ..गुजरात में आंध्र में अशान्ति ....
न्याय शांति का प्रथम न्यास है .......और संघियों से न्याय दिवा स्वपन है
 मानव जाति का इतिहास दो प्रकार के युद्धों का साक्षी है .न्याय पूर्ण युद्ध और अन्याय पूर्ण युद्ध ..न्य्याय पूर्ण युद्ध का सम्बन्ध समाज की प्रगति और निरंतर क्रांतिकारी विकास से होता है ..जब की अन्य्याय पूर्ण युद्ध ठीक इसके बिपरीत ..केवल सत्ता सुख भोगने की नीयत से . यह युद्ध उन भौतिक शक्तियों का साथ देता है जो समाज की गत्यात्मकता को पंगु बनाने की असफल चेष्टा करती हैं .हमारा देश इसी दूसरे प्रकार की शक्तियों के अन्य्याय पूर्ण युद्ध की विभीषिका झेल रहा है