Thursday, 7 July 2022

संघ क्या ? और उसकी विचारधारा क्या

 

संघ क्या ? और उसकी विचारधारा क्या?काफी लिखा जा चुका .. आखिर संघ नही तो क्या?? और अभी संघ है तो आगे क्या? शायद दूसरा सवाल ज्यादा महत्वपूर्ण होगा। इसके लिए इतिहास और घटनाओ का भी जिक्र करना जरूरी है। जो इस प्रकार है- आर.एस.एस., यानी कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ खुद को एक सांस्कृतिक संगठन व “सच्चे देशभक्तों” का संगठन बताता है। उसका दावा है कि उसकी विचारधारा हिन्दुत्व और “राष्ट्रवाद” है। अपनी “प्रार्थना” और “प्रतिज्ञा” में संघी हिन्दू धर्म, हिन्दू संस्कृति और हिन्दू समाज की रक्षा की बात करते हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विचारधारा क्या है? अगर संघ के सबसे लोकप्रिय सरसंघचालक गोलवलकर और संस्थापक हेडगेवार के प्रेरणा-स्रोतों में से एक मुंजे की जुबानी सुनें तो संघ की विचारधारा स्पष्ट तौर पर फ़ासीवाद कह सकते है। गोलवलकर ने अपनी पुस्तकों ‘वी ऑर अवर नेशनहुड डिफाइण्ड’ और ‘बंच ऑफ थॉट्स’ में स्पष्ट शब्दों में इटली के फासीवाद और जर्मनी के नात्सीवाद की हिमायत की। हिटलर ने यहूदियों के सफाये के तौर पर जो ‘अन्तिम समाधान’ पेश किया, गोलवलकर ने उसकी भूरि-भूरि प्रशंसा की है और लिखा है कि हिन्दुस्तान में भी हिन्दू जाति की शुद्धता की हिफ़ाज़त के लिए इसी प्रकार का ‘अन्तिम समाधान’ करना होगा। संघ का सांगठनिक ढांचा भी मुसोलिनी और हिटलर की पार्टी से हूबहू मेल खाता है। इटली का फ़ासीवादी नेता मुसोलिनी जनतंत्र का कट्टर विरोधी था और तानाशाही में आस्था रखता था। मुसोलिनी के मुताबिक “एक व्यक्ति की सरकार एक राष्ट्र के लिए किसी जनतंत्र के मुकाबले ज़्यादा असरदार होती है।” फ़ासीवादी पार्टी में ‘ड्यूस’ के नाम पर शपथ ली जाती थी, जबकि हिटलर की नात्सी पार्टी में ‘फ़्यूहरर’ के नाम पर। संघ का ‘एक चालक अनुवर्तित्व’ जिसके अन्तर्गत हर सदस्य सरसंघचालक के प्रति पूर्ण कर्मठता और आदरभाव से हर आज्ञा का पालन करने की शपथ लेता है, उसी तानाशाही का प्रतिबिम्बन है जो संघियों ने अपने जर्मन और इतावली पिताओं से सीखी है। संघ ‘कमाण्ड स्ट्रक्चर’ यानी कि एक केन्द्रीय कार्यकारी मण्डल, जिसे स्वयं सरसंघचालक चुनता है, के ज़रिये काम करता है, जिसमें जनवाद की कोई गुंजाइश नहीं है। यही विचारधारा है जिसके अधीन गोलवलकर (जो संघ के सबसे पूजनीय सरसंघचालक थे) ने 1961 में राष्ट्रीय एकता परिषद् के प्रथम अधिवेशन को भेजे अपने सन्देश में भारत में संघीय ढाँचे (फेडरल स्ट्रक्चर) को समाप्त कर एकात्म शासन प्रणाली को लागू करने का आह्वान किया था। ((अब आगे आप लोगो को निष्कर्ष निकालना है)
Manoj Shukla और Vikas Sahu
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पहले प्रधानमंत्री कि जानकारी रखना कांग्रेसी होना नही होता

 

पहले प्रधानमंत्री कि जानकारी रखना कांग्रेसी होना नही होता भक्तों। तुम तुलना ही गलत करते हो समय ओर हालात विपरीत थे उस दौर में उसने प्रतिमाये नहीं बनवाई
संस्थानों के प्रतिमान बनाये !
उसकी आँखों के सामने एक ऐसा भारत था जहां आदमी की उम्र 32 साल थी। अन्न का संकट था। बंगाल के अकाल में ही पंद्रह लाख से ज्यादा लोग मौत का निवाला बन गए थे। टी बी ,कुष्ठ रोग , प्लेग और चेचक जैसी बीमारिया महामारी बनी हुई थी। पूरे देश में 15 मेडिकल कॉलेज थे। उसने विज्ञानं को तरजीह दी।
यह वह घड़ी थी जब देश में 26 लाख टन सीमेंट और नो लाख टन लोहा पैदा हो रहा था। बिजली 2100 मेगावाट तक सीमित थी। यह नेहरू की पहल थी। 1952 में पुणे में नेशनल वायरोलोजी इन्स्टिटूट खड़ा किया गया। कोरोना में यही जीवाणु विज्ञानं संस्थान सबसे अधिक काम आया है। टीबी एक बड़ी समस्या थी। 1948 में मद्रास में प्रयोगशाला स्थापित की गई और 1949 ,में टीका तैयार किया गया। देश की आधी आबादी मलेरिया के चपेट में थी। इसके लिए 1953 में अभियान चलाया गया । एक दशक में मलेरिया काफी हद तक काबू में आ गया।
छोटी चेचक बड़ी समस्या थी। 1951 में एक लाख 48 हजार मौते दर्ज हुई। अगले दस साल में ये मौते 12 हजार तक सीमित हो गई। भारत की 3 फीसद जनसंख्या प्लेग से प्रभावित रहती थी। 1950 तक इसे नियंत्रित कर लिया गया। 1947 में पंद्रह मेडिकल कॉलेजों में 1200 डॉक्टर तैयार हो रहे थे। 1965 में मेडिकल कॉलेजों की संख्या 81 और डॉक्टरस की तादाद दस हजार हो गई। 1956 में भारत को पहला AIMS मिल गया। यही एम्स अभी कोरोना में मुल्क का निर्देशन कर रहा है। 1958 में मौलाना आज़ाद मेडिकल कॉलेज और 1961 में गोविन्द बल्ल्भ पंत मेडिकल संस्थान खड़ा किया गया।
पंडित नेहरू उस दौर के नामवर वैज्ञानिको से मिलते और भारत में ज्ञान विज्ञानं की प्रगति में मदद मांगते। वे जेम्स जीन्स और आर्थर एडिंग्टन जैसे वैज्ञानिको के सम्पर्क में रहे। नेहरू ने सर सी वी रमन ,विक्रम साराभाई ,होमी भाभा ,सतीश धवन और अस अस भटनागर सरीखे वैज्ञानिको को साथ लिया। इसरो तभी स्थापित किया गया/ विक्रम साराभाई इसरो के पहले पहले प्रमुख बने। भारत आणविक शक्ति बने। इसकी बुनियाद नेहरू ने ही रखी। 1954 में भारत ने आणविक ऊर्जा का विभाग और रिसर्च सेंटर स्थापित कर लिया था। फिजिकल रीसर्च लैब ,कौंसिल ऑफ़ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रीसर्च ,नेशनल केमिकल लेबोरटरी ,राष्ट्रिय धातु संस्थान ,फ्यूल रिसर्च सेंटर और गिलास एंड सिरेमिक रिसर्च केंद्र जैसे संस्थान खड़े किये। आज दुनिया की महफ़िल में भारत इन्ही उपलब्धियों के सबब मुस्कराता है। अमेरिका की अम आई टी MIT का तब भी संसार में बड़ा नाम था। नेहरू 1949 में अमेरिका में MIT गए ,जानकारी ली और भारत लौटते ही IIT आइ आइ टी स्थापित करने का काम शुरू कर दिया। प्रयास रंग लाये। 1950 में खड़गपुर में भारत को पहला IIT मिल गया। आज इसमें दाखिला अच्छे भविष्य की जमानत देता है./ आइ आइ टी प्रवेश इतना अहम पहलु है कि एक शहर की अर्थव्यवस्था इसने नाम हो गई है। 1958 में मुंबई ,1959 में मद्रास और कानपुर और आखिर में 1961 में दिल्ली IIT वाले शहर हो गए।
उसने बांध बनवाये ,इस्पात के कारखाने खड़े किये और इन सबको आधुनिक भारत के तीर्थ स्थल कहा।
नेहरू ने जब संसार को हमेशा के लिए अलविदा कहा ,बलरामपुर के नौजवान सांसद वाजपेयी [29 मई 1964] संसद मुखातिब हुए / नेहरू के अवसान को वाजपेयी ने इन शब्दों में बांधा '' एक सपना था जो अधूरा रह गया ,एक गीत था जो गूंगा हो गया ,एक लौ अनंत में विलीन हो गई , एक ऐसी लो जो रात भर अँधेरे से लड़ती रही ,हमे रास्ता दिखा कर प्रभात में निर्वाण को प्राप्त हो गई। और भी बहुत कुछ कहा।
आज़ादी की लड़ाई लड़ते हुए वो 3259 दिन जेल में रहा। उसने सच में कुछ नहीं किया। लेकिन कोई पीढ़ियों की सोचता है ,कोई रूढ़ियों की।
शत शत नमन/


 

हाँ दोषी हैं प.नेहरू,मगर किसके?तब सुनिए जरा
कश्मीर के शेख अब्दुल्लाह को वर्षों जेल में डालकर सड़ाया था नेहरू ने जब उसने भारत के खिलाफ आंख उठाया और अपना मनमानी करने लगा।
ओबैसी खानदान के आका और हिंदुओं को हैदराबाद में कत्ल करवाने वाले गद्दार कासिम रिजवी को भी प.नेहरू ने आजादी के बाद लगभग 10 साल तक जेल में डालकर सड़ा दिया था और अंत मे वह गद्दार पाकिस्तान चला गया और फिर कासिम रिजवी पाकिस्तान जाते वक्त ओबैसी के पिता को अपने संगठन का मुखिया बना दिया और आज ओबैसी उसी संगठन से सांसद हैं।
मतलब कासिम रिजवी ने अपने गुलामों को जाते वक्त अपना संगठन खैरात या इनाम में बांटकर गया।जिस तरीके से हिंदुओं का कत्ल ओबैसी खानदान की मदद से हैदराबाद में कासिम रिजवी ने अपने रजाकारों द्वारा करवाया था उसकी एक झलक ओबैसी के भाई के बयानों में मिलता है जिसमें उसने कहा था कि
"ऐ हिंदुस्तान 15 मिनट के लिए पुलिस हटा लो,तब 100 करोड़ के साथ क्या होता है देख लेना"।
ओबैसी के पिता यदि रिजवी के नजदीक न होते तब रिजवी उन्हें अपना संगठन न सौंपता।इससे एक बात तो जाहिर है कि ओबैसी के पिता भी हिंदुओं के कत्लेआम में शामिल थे।यह और बात है वह इंसान भी सांसद बना रहा आजाद भारत में और आज उन्हीं का बेटा सांसद हैं असददुद्दीन ओबैसी।
पंडित जी की बेटी इंद्रा गांधी ने भी वही किया भिंडरवाले के साथ।पंजाब के घरेलू राजनीति में अकालियों के प्रभाव को खत्म करने के लिए और कांग्रेस को स्थापित करने के लिए भिंडरवाले का इस्तेमाल किया उन्होंने फैक्ट है यह।
जब उस सांप ने भारत माता के खिलाफ फन उठाया तब नेहरू पुत्री इंद्रा गांधी ने उस फन को कुचल दिया।इंद्रा जी देश हित मे साम, दाम, दंड,भेद सब करना जानती थीं।यह और बात है धोखे में रखकर आस्तीन के उन सांपों ने उन्हें शहीद कर दिया।
1 व्यक्ति और खड़े रहना की फ़ोटो हो सकती है
आप, Manoj Shukla, Anil Tiwari और 2 अन्य लोग


 

इज़राइली यहूदियों के वंशज हैं RSS के संस्थापक चितपावन ब्राह्मण
आरएसएस. की स्थापना चितपावन ब्राह्मणों ने की और इसके ज्यादातर सरसंघचालक अर्थात् मुखिया अब तक सिर्फ चितपावन ब्राह्मण ही होते आए हैं। क्या आप जानते हैं ये चितपावन ब्राह्मण कौन होते हैं ?
चितपावन ब्राह्मण भारत के पश्चिमी किनारे स्थित कोंकण के निवासी हैं। चितपावन ब्राह्मणों को देशस्थ ब्राह्मणों द्वारा 18वीं शताब्दी तक निम्न स्तर का समझा जाता था। यहां तक कि देशस्थ ब्राह्मण नासिक और गोदावरी स्थित घाटों को भी पेशवा समेत समस्त चितपावन ब्राह्मणों को उपयोग नहीं करने देते थे।
दरअसल कोंकण वह इलाका है जिसे मध्यकाल में विदशों से आने वाले तमाम समूहों ने अपना निवास बनाया। जिनमें पारसी, बेने इज़राइली, कुडालदेशकर गौड़ ब्राह्मण, कोंकणी सारस्वत ब्राह्मण और चितपावन ब्राह्मण, जो सबसे अंत में भारत आए, प्रमुख हैं। आज भी भारत की महानगरी मुंबई के कोलाबा में रहने वाले बेन इज़राइली लोगों की लोककथाओं में इस बात का जिक्र आता है कि चितपावन ब्राह्मण उन्हीं 14 इज़राइली यहूदियों के खानदान से हैं जो किसी समय कोंकण के तट पर आए थे।
चितपावन ब्राह्मणों के बारे में 1707 से पहले बहुत कम जानकारी मिलती है। इसी समय के आसपास चितपावन ब्राह्मणों में से एक बालाजी विश्वनाथ भट्ट रत्नागिरी से चलकर पुणे-सतारा क्षेत्र में पहुँचा। उसने किसी तरह छत्रपति शाहूजी का दिल जीत लिया और शाहूजी ने प्रसन्न होकर बालाजी विश्वनाथ भट्ट को अपना पेशवा यानी कि प्रधानमंत्री नियुक्त कर दिया। यहीं से चितपावन ब्राह्मणों ने सत्ता पर पकड़ बनानी शुरू कर दी क्योंकि वे समझ गए थे कि सत्ता पर पकड़ बनाए रखना बहुत जरूरी है। मराठा साम्राज्य का अंत होने तक पेशवा का पद इसी चितपावन ब्राह्मण बालाजी विश्वनाथ भट्ट के परिवार के पास रहा।
एक चितपावन ब्राह्मण के मराठा साम्राज्य का पेशवा बन जाने का असर यह हुआ कि कोंकण से चितपावन ब्राह्मणों ने बड़ी संख्या में पुणे आना शुरू कर दिया, जहाँ उन्हें महत्वपूर्ण पदों पर बैठाया जाने लगा। चितपावन ब्राह्मणों को न सिर्फ मुफ़्त में जमीनें आबंटित की गईं बल्कि उन्हें तमाम करों से भी मुक्ति प्राप्त थी। चितपावन ब्राह्मणों ने अपनी जाति को सामाजिक और आर्थिक रूप से ऊपर उठाने के इस अभियान में जबरदस्त भ्रष्टाचार किया। इतिहासकारों के अनुसार 1818 में मराठा साम्राज्य के पतन का यह प्रमुख कारण था। रिचर्ड मैक्सवेल ने लिखा है कि राजनीतिक अवसर मिलने पर सामाजिक स्तर में ऊपर उठने का यह बेमिसाल उदाहरण है (Richard Maxwell Eaton. A social history of the Deccan, 1300-1761: eight Indian lives, Volume 1. p. 192)।
चितपावन ब्राह्मणों की भाषा भी इस देश के भाषा-परिवार से नहीं मिलती थी। 1940 तक ज्यादातर कोंकणी चितपावन ब्राह्मण अपने घरों में चितपावनी कोंकणी बोली बोलते थे जो उस समय तेजी से विलुप्त होती बोलियों में शुमार थी। आश्चर्यजनक रूप से चितपावन ब्राह्मणों ने इस बोली को बचाने का कोई प्रयास नहीं किया। उद्देश्य उनका सिर्फ एक ही था कि खुद को मुख्यधारा में स्थापित कर उच्च स्थान पर काबिज़ होना। खुद को बदलने में चितपावन ब्राह्मण कितने माहिर हैं इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अंग्रेजों ने जब देश में इंग्लिश एजुकेशन की शुरुआत की तो इंग्लिश मीडियम स्कूलों में अपने बच्चों का दाखिला कराने वालों में चितपावन ब्राह्मण सबसे आगे थे।
इस तरह अत्यंत कम जनसंख्या वाले चितपावन ब्राह्मणों ने, जो मूलरूप से इज़राइली यहूदी थे, न सिर्फ इस देश में खुद को स्थापित किया बल्कि आरएसएस. नाम का संगठन बना कर वर्तमान में देश के नीति-नियंत्रण करने की स्थिति तक खुद को पहुँचाया।
आप, Nilotpal Shukla, Shyam Singh Rawat और 76 अन्य लोग
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Saturday, 2 April 2022

 

*मेरे बच्चे अब बड़े हो गए हैं और हम अकेले हो गए हैं*
बिस्तरों पर अब सलवटें नहीं पड़ती
ना ही इधर उधर छितराए हुए कपड़े हैं
रिमोट के लिए भी अब झगड़ा नहीं होता
ना ही खाने की नई नई फ़रमाइशें हैं
*मेरे बच्चे अब बड़े हो गए हैं और हम अकेले हो गए हैं*
सुबह अख़बार के लिए भी नहीं होती मारा मारी
घर बहुत बड़ा और सुंदर दिखता है
पर हर कमरा बेजान सा लगता है
अब तो वक़्त काटे भी नहीं कटता
बचपन की यादें कुछ दिवार पर, फ़ोटो में सिमट गयी हैं
*मेरे बच्चे अब बड़े हो गए हैं और हम अकेले हो गए हैं*
अब मेरे गले से कोई नहीं लटकता
ना ही घोड़ा बनने की ज़िद होती है
खाना खिलाने को अब चिड़िया नहीं उड़ती
खाना खिलाने के बाद की तसल्ली भी, अब नहीं मिलती
ना ही रोज की बहसों और तर्कों का संसार है
ना अब झगड़ों को निपटाने का मजा है
ना ही बात बेबात गालों पर मिलता दुलार है
बजट की खींच तान भी अब नहीं है
*मेरे बच्चे अब बड़े हो गए हैं और हम अकेले हो गए हैं*
पलक झपकते ही जीवन का स्वर्ण काल निकल गया
पता ही नहीं चला
इतना ख़ूबसूरत अहसास कब पिघल गया
पता ही नहीं चला
तोतली सी आवाज़ में हर पल उत्साह था
पल में हँसना, पल में रो देना
बेसाख़्ता गालों पर उमड़ता प्यार था
कंधे पर थपकी और गोद में सो जाना
सीने पर लिटाकर वो लोरी सुनाना
बार बार उठ कर रज़ाई को ओढ़ाना
अब तो बिस्तर बहुत बड़ा हो गया है
मेरे बच्चों का प्यारा बचपन, कहीं खो गया है
*मेरे बच्चे अब बडे हो गए हैं और हम अकेले हो गए हैं*
अब कोई जुराबें इधर उधर नहीं फेंकता है..
अब फ्रिज भी घर की तरह खाली रहता है
बाथरूम भी सूखा रहता है
किचन हर दम सिमटा रहता है
अब हर घंटी पर लगता है कि, शायद कोई surprise है
और बच्चों की कोई नयी फरमाइश है
अब तो रोज सुबह शाम मेरी सेहत फोन पर पूछते हैं
मुझे अब आराम की हिदायत देते हैं
पहले हम उनके झगड़े निपटाते थे
आज वे हमें समझाते हैं
लगता है अब शायद हम बच्चे हो गए हैं ,
उनके सब के सास ससुर है, जिन्हे वे मम्मी जी पापा जी कहते हैं।
 बच्चों के नाना नानी हैं ,उनकी पत्नियों के मम्मी पापा हैं ,
हम गैर जरूरी सामान हो गए हैं,
बात बात पर अपनी समस्या लेकर आने वाले बच्चों को हम बड़ी समस्या लगते हैं।
उन्हे यह भी गंवारा नही की उनके बच्चे हम से बात करे,जाने की पिता के पिता और मां बहन होती हैं । मेरे बच्चे अब बड़े हो गए हैं, और हम अकेले हो गए हैं*
*मेरे बच्चे अब बडे़ हो गए हैं, और हम अकेले हो गए हैं*

 

जब मैं बूढ़ा हो जाऊँगा।
_________________
जब मैं बूढ़ा हो जाऊँगा, एकदम जर्जर बूढ़ा, तब तू क्या थोड़ा मेरे पास रहेगा? मुझ पर थोड़ा धीरज तो रखेगा न? मान ले, तेरे महँगे काँच का बर्तन मेरे हाथ से अचानक गिर जाए? या फिर, सब्ज़ी की कटोरी मैं उलट दूँ टेबल पर? मैं तब बहुत अच्छे से नहीं देख सकूँगा न! मुझे तू चिल्लाकर डाँटना मत प्लीज़! बूढ़े लोग सब समय ख़ुद को उपेक्षित महसूस करते रहते हैं, तुझे नहीं पता?
एक दिन मुझे कान से सुनाई देना बंद हो जाएगा, एक बार में मुझे समझ में नहीं आएगा कि तू क्या कह रहा है, लेकिन इसलिए तू मुझे बहरा मत कहना! ज़रूरत पड़े तो कष्ट उठाकर एक बार फिर से वह बात कह देना, या फिर लिख ही देना काग़ज़ पर। मुझे माफ़ कर देना, मैं तो कुदरत के नियम से बुढ़ा गया हूँ, मैं क्या करूँ बता?
और जब मेरे घुटने काँपने लगेंगे, दोनों पैर इस शरीर का वज़न उठाने से इनकार कर देंगे, तू थोड़ा-सा धीरज रखकर मुझे उठ खड़े होने में मदद नहीं करेगा, बोल? जिस तरह तूने मेरे पैरों के पंजों पर खड़े होकर पहली बार चलना सीखा था, उसी तरह?
कभी-कभी टूटे रेकॉर्ड प्लेयर की तरह मैं बकबक करता रहूँगा, तू थोड़ा कष्ट करके सुनना। मेरी खिल्ली मत उड़ाना प्लीज़, मेरी बकबक से बेचैन मत हो जाना। तुझे याद है, बचपन में तू एक गुब्बारे के लिए मेरे कान के पास कितनी देर तक भुनभुन करता रहता था, जब तक न मैं तुझे वह ख़रीद देता था, याद आ रहा है तुझे?
हो सके तो मेरे शरीर की गंध को भी माफ़ कर देना। मेरी देह में बुढ़ापे की गंध पैदा हो रही है! तब नहाने के लिए मुझसे ज़बर्दस्ती मत करना। मेरा शरीर उस समय बहुत कमज़ोर हो जाएगा, ज़रा-सा पानी लगते ही ठण्ड लग जाएगी! मुझे देखकर नाक मत सिकोड़ना प्लीज़! तुझे याद है, मैं तेरे पीछे दौड़ता रहता था, क्योंकि तू नहाना नहीं चाहता था? तू विश्वास कर, बुडढों को ऐसा ही होता है, हो सकता है एक दिन तुझे यह समझ में आए, हो सकता है, एक दिन!
तेरे पास अगर समय रहे, हम लोग साथ में गप्पें लड़ाएँगे, ठीक है? भले ही कुछेक पल के लिए क्यों न हो। मैं तो दिन भर अकेला ही रहता हूँ, अकेले-अकेले मेरा समय नहीं कटता! मुझे पता है, तू अपने कामों में बहुत व्यस्त रहेगा, मेरी बुढ़ा गई बातें तुझे सुनने में अच्छी न भी लगें तो भी थोड़ा मेरे पास रहना। तुझे याद है, मैं कितनी ही बार तेरी छोटे गुड्डे की बातें सुना करता था, सुनता ही जाता था? और तू बोलता ही रहता था, बोलता ही रहता था। मैं भी तुझे कितनी ही कहानियाँ सुनाया करता था, तुझे याद है?
एक दिन आएगा जब बिस्तर पर पड़ा रहूँगा, तब तू मेरी थोड़ी देखभाल करेगा? मुझे माफ़ कर देना यदि ग़लती से मैं बिस्तर गीला कर दूँ, अगर चादर गंदी कर दूँ, मेरे अंतिम समय में मुझे छोड़कर दूर मत रहना, प्लीज़!
जब समय हो जाएगा, मेरा हाथ तू अपनी मुट्ठी में भर लेना। मुझे थोड़ी हिम्मत देना ताकि मैं निर्भय होकर मृत्यु का आलिंगन कर सकूँ। चिंता मत करना, जब मुझे मेरे सृष्टा दिखाई दे जाएँगे, उनके कानों में फुसफुसाकर कहूँगा, कि वे तेरा कल्याण करें, कारण कि तू मुझसे प्यार करता था, मेरे बुढ़ापे के समय तूने मेरी देखभाल की थी।
मैं तुझसे बहुत-बहुत प्यार करता हूँ रे, तू ख़ूब अच्छे-से रहना। इसके अलावा और क्या कह सकता हूँ, क्या दे सकता हूँ भला।
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