Wednesday, 22 June 2016

भोर हो गयी


भोर हो गई
अस्ताचल में सूरज छिपा ही था कि
कि शुक्र तारे कि बिंदी लगाये
उतर गई संध्या मेरे अगन में
पसर गई पूरे घर में चुपके से
विभ्रम कि लोरी ,स्नेह कि थपकी ,ममता सा दुलार
बिन किसी भेद भाव बाँट दिया सबको
सो गया घर बार ,वह होगई प्रौढ़
उस ने बदल लिए नाम
वह अब रजनी हो गई थी /
भोर कि आहट से अभी कुनमुनाई ही थी रजनी
सखी उषा ने खट खटा दिया द्वार
निकल पड़ी रजनी पनघट कि ओर
सखी उषा से मिलने धवल वस्त्रों में सकुचाई,अलसाई छुई मुई
सूरज ने उलट दिए अनुराग उसके आँचल में
अरुणिम किरणों के सिन्दूर से भर दी उसकी मांग
कम्पित थे अरुण गात/भोर हो गई ,
दोनों हाथो ढँक लिया मुह छिप गई रजनी .....

जीवन साथी

सुनो .!
धीरज रखो ..
कुछ भी स्थाई नहीं रहता
सुख नहीं ....तो दुःख भी नहीं !
देखना
एक दिन फिर से
आएँगी खुशियाँ
तब तुम बटोर लेना
अपने आँचल में ...
देखो .
अभी मैं थका नहीं हूँ
तुम पगली जाने क्यों घबडाती हो
चलो इसी बहाने मेरे
आस पास तो मडराती हो .
सुनो!!
दुखी मत हो ..
ज़रा हंसो
तुम नहीं जानती कि
कितनी अच्छी लगाती हो
जब तुम खिलखिला कर हंसती हो .
देखो देखो!!
तुम अपनी बिटिया को देखो
नहीं है श्रृष्टि में कोई इतना सुन्दर फूल
यह मात्र बिटिया ही नहीं
हमारी जीवनी शक्ति है .जो असरदार बना देती है
मेरी कोशिशों को .अपनी मुस्कराहट से.......................

Tuesday, 24 May 2016

मीडिया'.....राहुल और मोदी और प्रधान मंत्री पद

मीडिया के द्वारा बार बार राहुल और मोदी की तुलना और प्रधान मंत्री पद के लिए पसंद ना पसंद की चर्चा सुन कर मैंने एक पोस्ट डाली जिसमे लिखा की मोदी और राहुल की तुलना नहीं की जानी चाहिए .कुछ संघी इतने बौखला गए की गालियाँ बकने लगे एक श्री कृष्ण शर्मा तो चड्डी उतार कर अभद्र हो गया .
सच मानिये मैंने वह पोस्ट सामान्य तौर पर लिख दिया था 'पर आज पूरी तरह संजीदा हूँ .
एक कहावत है की... उड़द और अरहर की क्या तुलना ..किसान जानते हैं की दोनों खरीफ की फसल हैं दोनों एक ही खेत में बोते हैं .पर उड़द घास पात तथा एनी फसलों को रौंद कर उन को दबा कर..चबा जाती है. राहर और अन्य अनाजो को लपेट कर तीन महीने में पक जाता है .काटने में देर हुई तो चिटक जाता है .राहर आठ दस महीने में पकती है .सीधे खडी रहती है .रहर की तासीर सहज है उड़द की बादी . चूँकि दोनों राजनीति में है लिहाजा मोदी उड़द हैं राहुल राहर .मोदी बादी हैं राहुल फायदे मंद .
मोदी का उदय संघ की पीठिका शिक्षा दीक्षा में अस्त्र शास्त्र और नफ़रत ,घृणा हिंदुत्व की घुट्टी पी कर हूवा. और संघ अंग्रेजी साम्रज्य्बाद का पोषक हो कर स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के विरोध हेतुअंग्रजों द्वारा पैदा किया गया ( सन्दर्भ ..गोलवलकर की पुस्तक )महात्मा गाँधी की नियोजित ह्त्या किसने करवाई मैं क्यों कहूँ .सभी को पता है .मोदी .दम्भी अकडू घुटे पीर खुर्राट राजनीतिग्य गुजरात की प्रगति और अवगति के रचयिता .गोधरा जैसे कई संहारों में विवादित .
राहुल .मोतीलाल नेहरू जवाहरलाल. इंदिरा. राजीव के त्याग बलिदान और स्वतंत्रता संग्राम से लेकर आज तक की कांग्रस की परम्परा का वाहक शांत सौम्य आम आदमी का पैरोकार जागरूक युवा .सपने गढ़ने और उसे जमीनी हकीकत बनाने में तल्लीन बिना पद की लालसा के .भारत के समस्त लोगों के लिए सक्रीय .प्रधान मंत्री पद को त्यागा देने वाली भारतीयता को अंगी कर कर जीने में तल्लीन सोनिया की देख रेख में पला बाधा साधारण सा युवक .विवाद हीन
मोदी दिल्ली पहुँचाने की जल्दी में आडवाणी को धकेल कर आगे जा रहे हैं रहूल दिल्ली में सब कुछ हो कर भी कुछ नहीं चाहते बड़ों का साम्मान करते है .मोदी का मैं दंभ हो गया है राहुल में मैं है ही नहीं ..अब आप ही बताइए दोनों की क्या तुलना .कौन है सही नायक देश का किसे देखना चाहेंगे लोग .कौन जादा अनुकूल है भारतीय संबिधान के ..उत्तर है रहल राहुल राहुल .......

Wednesday, 11 May 2016

मैं अपने गाँव लौटूंगा

मैं अपने गाँव लौटूंगा

मेरे गाँव के बीचोबीचपुश्तों से खड़ा बरगद का पेड़अब बूढा हो चला है .
काल के निर्मम थपेड़ों मेंएक एक कर ढहतीं रहींइसकी विशाल भुजाएं
विकलांग श्रद्धा के अभिशाप भोगने को विवश
यह बरगद मूलोच्छेदित हो जाय,
उसके पहलेउसके पांवों में एक बरगद उगाउंगा.
उसकी बांहों में नया संसार बसाऊंगा
जहाँ मेरा लोक फिर से लौट कर बतियाये गा ,
धामा चौकड़ी मचाये गा .गायेगा ,
फगुआ .चैता .आल्हा.कजरी और कन्हरवा .
मेरे आंगन में पुश्तों से खड़ा तुलसी का चौरा
उसमे फिर से लगाऊंगा एक नन्हा पौधा
सींचूँगा अपने संस्कार बोध से
प्रत्येक संध्या कच्ची मिटटी के नन्हे दीपकजलायेगी मेरी सह धर्मिणी .
संझौती लेसेगी मेरी पुत्र बधू
टिमटिमाते दिए की मद्धिम लव में
अँधेरे के शाश्वत सत्ता को पिघलते मैं जी भरके देखूँगा .
अपनी पुस्तैनी देहरी पर माथा झुकऊँ गा
,उस चौखट पर फिर एक बार अपनी नन्ही बिटिया को
ओका बोका तीन तलोका खिलाऊंगा .
देहरी का लालित्य ,
चौखट का मर्म
और चौखट लांघने का अर्थ समझाऊंगा

Friday, 15 April 2016

चाय गरम ...गरम चाय ..गरमा गरम चाय



मोदी जी भारत के लिए ईश्वर का बरदान है ..शिवराज . मोदी भगवान् का अवतार हैं .बेन्कैया .....बर्तन मांजने वाली का बेटा प्रधान मंत्री बन गया ...मोदी जी, को इतना न फुलाओ कि फट जाए देवकांत बरुआ नामक शख्स का भारतीय राजनीति में एकमात्र और संभवत: सबसे बड़ा योगदान वही एक वाक्य - इंडिया इज इंदिरा’ रहा है जिसकी वजह से कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष हमेशा याद किए जाते हैं। आज दशकों बाद एक और शख्स ‘वोट फॉर इंडिया’ के जरिए ‘बीजेपी इज इंडिया’ बता रहे हैं। किसी एक पार्टी को राष्ट्रीयता का पर्यायवाची बनाने की यह कोशिश वास्तव में एक खतरनाक सोच का परिणाम है। एक ऐसी विचारधारा जिससे धुर दक्षिणपंथी बू आ रही है। भाषणों से जताना चाहते हैं कि वे और केवल उनकी पार्टी ही देशभक्त है। जनाब, राष्ट्रीयता किसी व्यक्ति और पार्टी की जागीर नहीं होती। न तो BJP की, न कांग्रेस की और न ही AAP की। हम इस सत्य को कब स्वीकार करेंगे कि हम विभिन्न धर्मों के अस्तित्वों की धरती पर जी रहे हैं और इस वक्त व्याप्त विश्वव्यापी बदलाव की लहर में अब सहजीवन ही हमारा सहअस्तित्व बचा है। दक्षिणपंथ को मिली तनिक सी हवा किसी और स्वरूप में देश को टुकड़े-टुकड़े कर के रख देगी। ऐसा खतरनाक खेल न खेलें। विश्व ऐसे उदाहरणों से पटा पड़ा है। भले ही ये लच्छेदार मुहावरे भाड़े से लाए गए लोगों की तालियां बजवा लें, लेकिन आम जनता राजनीतिज्ञों द्वारा अपने दिमाग और सोच के साथ किए ‘चिंतन बलात्कार’ को कभी स्वीकार नहीं करती। इमर्जेंसी हो या विभिन्न पार्टियों के ‘बिरयानी प्रयोग’ या प्रमोद महाजन का ‘इंडिया शाइनिंग’, जनता ने तो इंदिरा गांधी और अटल बिहारी जैसे PM को भी कूड़ेदान के हवाले कर दिया। खुद और अपनी पार्टी को सही बताना कोई बुरी बात नहीं, लेकिन यह कैसे जायज ठहराया जा सकता है कि ‘फलां, फलां गलत है, इसलिए मैं सही हूं।’ वास्तव में तो यह संपूर्ण अप्रोच ही गलत और नकारात्मक विचार वाला है। PM पद का ख्वाब देखनेवाले को अपनी सोच स्तरीय बनानी होगी। बदलाव की लड़ाई लड़नेवाले को सबसे पहले सामाजिक अहंकारों के खिलाफ लड़ना पड़ता है। अपने आप को अलहदा दिखाना ही नहीं बल्कि बनना पड़ता है, न कि अहंकारी भाषा का प्रयोग करना। दूसरों पर जो उंगली उठाते हैं उन्हें पहले अपनी ओर भी देखना चाहिए। गुब्बारे को इतना भी न फुलाओ की वह फट जाए? ओबामा के मैनरिजम की नकल कर लेने भर से कोई PM नहीं बन जाता। देश के आर्थिक, कूटनीतिक, सामाजिक संकटों व वैश्विक प्रश्नों को सुलझाने के लिए अपने तरीकों, नीतियों, अप्रोच और समाधान को भी सामने रखना पड़ता है। पिछले तीन महीनों से देश के कोने-कोने में करोड़ों-अरबों के खर्च से हो रहे तमाशों में PM बनने के बाद देश के लिए अपनी योजनाओं, कार्यक्रमों और प्राथमिकताओं के बारे में एक शब्द भी नहीं बोला जाता। इनमें सिर्फ होता है कांग्रेस के नाम से विधवा विलाप, वह भी सीना पीट-पीट कर। अरे, आखिर कब होगी देश की बेरोजगारी, आर्थिक मंदी से निपटने के तरीकों, गरीबी उन्मूलन, जीडीपी ग्रोथ, इंडस्ट्रियल ग्रोथ, देशवासियों की मूलभूत जरूरतों को उपलब्ध कराने की आपकी योजनाओं की बात? महीनों से सिर्फ कांग्रेस के कुशासन को गिनाने से काम नहीं बनेगा। प्रश्न करने के बाद जनता के सामने उत्तर भी रखना जरूरी होता है। वास्तव में तो देश का मतदाता इस विधवा प्रलाप से ऊब चुका है। अजी, खत्म हो गया हनीमून पीरियड, अब आओ सचाई के धरातल पर और बताओ की एक PM कंडिडेट के पास क्या भावी योजनाएं हैं देश के लिए। कुछ कॉर्पोरेट समूहों को कौड़ी के मोल जमीन देकर सारे टैक्स माफ कर देने को ‘विकास’ कह देने की परिभाषा आपकी होगी क्योंकि इसका मोल तो गुजरात राज्य की जनता ने चुकाया है। दूध का दूध हो जाए जब अगर जनाब से किसी मंच पर लाइव व खुली बहस की जाए और देश के सारे विकट आर्थिक प्रश्नों की वन-टू-वन चर्चा हो। सारी पोल एक मिनट में खुल जाएगी। चाय गरम...चाय गरम!!

Wednesday, 6 April 2016

अच्छा बनाने की कोशिस में सारी अच्छाई झर गयी अच्छा बनना फिर भी शेष रह गया

अच्छा बनना फिर भी शेष रह गया

अच्छा बननाशेष रह गया
मै उतना अच्छा आदमी नहीं निकला
जितनी की मुझे उम्मीद थी कि मै हो पाउँगा
कई बार अच्छा बनाने कि कोशिश में सारी अच्छाई झर जाती है
और अच्छा बनाना फिर भी शेष रह जता है
मुझे भरोषा तो था लेकिन जाहिर है
मैंने उतनी कोशिश नहीं कि जितनी कि जरूरत थी|
मुझे अपने बच्चों कि पढ़ाई लिखाई का जादा तो नहीं
पर इतना अता पता तो रहा कि वे किस दर्जे में पढ़ते हैं
मैंने उन्हें बहुत सलाह नहीं दी और नसीहत या उपदेश भी नहीं
पर उन्हें साफ सफाई से जीवन बसर करना ,किसी पर निर्भर न रहना
अपना कम खुद करना. सर न झुकना ,किसी का एहसान न लेना ,भरसक मददगार होना
अपने पद ,पोजीशन का नजायज फायदा न उठाना वगौरह वगैरह तो आ ही गया /
उनकी अपनी मुश्किलें हैं ,तो मेरी ही कौन सी कम हैं
एक अच्छा पिता ,उन्हें अवसर का लाभ उठाने आज कि दुनिया में
अपना काम निकालने कि कुछ हिकमतें तो बता ही सकता था
जो मैंने नहीं किया....... क्यों कि -
चौंसठ बरस कि उम्र हो जाने के बाद भी
मुझे खुद ही पता नहीं है कि
हमारे समय में जिन्दगी जी कैसे जाती है .
सिर्फ इतना ही समझ पाया कि कैसे
जुटाया जाता है ,छत छप्पर जगह और राहत का सामान .
नहीं समझ पाया कि कैसे खडी की जाती हैं दीवारें ,तोड़े जाते हैं रिश्ते .
क्या होता है चरित्र का छल ,कैसे बनाया जाता है घर को बाजार
इस मायने में पूरा राज कपूर ही रहा -
सब कुछ सीखा हमने न सीखी होशयारी....
सच है दुनिया वालों कि हम हैं अनारी .
मेरे बच्चों ! अगर तुम सफल नहीं होते
तो इसका जिम्मा मेरा जरूर होता.!
हला की आज तुम मुझ पर निर्भर नहीं हो .
जिन्दगी तुम्हारे साथ कल क्या करेगी
इस बारे में मैं कोई अटकल लगना नहीं चाहता
पर अगर मैं अच्छा पिता होता ,तो
तुम्हे इतना अबोध न छोड़ देता जितना
मैंने तुम्हे इस खूंखार वक्त में छोड़ दिया है.
तभी तो चालाक चालों की शरारत ने..
तुम्हे आमूल चूल बदल दिया है..
हालाँकि तुम सब अब भी
मेरी प्यारी संताने हो .
मैं तुम्हे बेहद प्यार करता हूँ .
मैं अच्छा पिता तो नहीं बन सका
तो अच्छा इन्सान बनाने का तो सवाल ही नहीं उठाता
चूक मुझसे कहीं वफादारी में भी हुई है ,
शायद अपने लालच में मैंने सोचा कि
कई जगहें हैं ,हो सकती हैं ,और एक जगह दूसरी को रद्द नहीं करती
मुझे ख्याल तो था कि दुनिया के इतने विशाल होने के बावजूद जगहें बहुत कम ही हैं
जिसे जितनी मिली है उसी पर जम कर काबिज है
और इसकी मोहलत नहीं कि आप जगहों के बीच आवा जाही करते रहें .
मैंने प्रेम ,बांटा नहीं बल्कि पाया कि यह एक ओर बढ़ने से
दूसरी ओर कमतर नहीं होता बढ़ता ही है
आसमान कि तरह एक शून्य बना रहता है
जिसे कई कई सूरज भरते रहते हैं
उन्ही कि धुप में मैं खिलाता और कुम्हिलता रहा .
मैंने जीवन और कविता को आपस में उल्झादिया
जीवन की कई सच्चाइयों और सपनो को कविता में ले गया
आश्वश्त हुआ कि जो शब्दों में है वह बचा रहेगा कविता में .
भले ही जीवन में नहीं..........,गलती यह हुई कि.
जो कविता में हुआ उसे जीवन में हुआ माँन कर संतोष करता रहा .
अपने सुख और दुःख को अपने से बड़ा माँनकर
दूसरों के पास उसे शब्दों में ले जाने कि कोशिश में
वे सब बदल गए और मैं भी
और जो कुछ पन्हुच सका शायद न मैं था न मेरे सुख दुःख ,
मुझे ठीक से पता ही नहीं था कि
हमारे समय में अच्छे दोस्त ही सच्चे दुश्मन होते हैं
अपने ही पक्के पराये .क्यों कि औरों को आप या आप कि
जिन्दगी में दखल देने कि फुर्सत कहाँ है.
कभी कभार के भावुक विष्फोट के अलावा
किसी से अपने दुःख का साझा नहीं किया
न मदद मांगी न शक किया,
गप्पबाजी में ही मन के शक को बह जाने दिया.
कुछ शोहरत ,खासी बदनामी मिली ,
पर बुढ़ापे के लिए ,अपने लिए ,मुश्किल वक्त के लिए ,
कुछ बचाया और जोड़ा नहीं .
किसी दोस्त ने कभी ऐसा करने कि गंभीर सलाह भी नहीं दी.
इसी आपा धापी में किसी कदर
आदमी बनाने कि कोशिश में
चौंसठ बरस गुजर गये पर अच्छा बनाना शेष रह गया
अब तो जो होना था हो गया
डाल के पक्षी अचानक उड़ गए सब फुर्र से
बया बेचारा अकेला रहा गया ,घोसले के द्वार पर लटका हुआ /

Thursday, 28 January 2016

अंग्रेजों के यार आज सबसे बड़े देशभक्त बन गए


अंग्रेजों के यार आज सबसे बड़े देशभक्त बन गए



जब नेताजी और पं. नेहरू गोरों की सरकार के खिलाफ गोलबंदी कर रहे थे,तब आप कहाँ थे मिस्टर स्वयंसेवक ?

आजादी की लड़ाई में नाखून तक नहीं कटाने वाले आज सबसे बड़े देशभक्त बन गए हैं।

आजादी की लड़ाई में नाखून तक नहीं कटाने वाले आज सबसे बड़े देशभक्त बन गए हैं। इस मुल्क के लिए इससे बड़ी विडंबना और क्या हो सकती है?
 बात खुद के तमगे तक होती तो कोई बात नहीं थी लेकिन इन लोगों ने अब बाकायदा देशभक्ति की सर्टिफिकेट भी बांटनी शुरू कर दी है। इसके लिए देशभक्ति का खजाना ना सही लेकिन चंद खोटे सिक्के तो अपनी जेब में होने ही चाहिए। इसी लक्ष्य से इन्होंने नेता जी सुभाष चंद्र बोस और जवाहर लाल नेहरू को चुना है। और फिर दोनों के बीच फर्जी तरीके से दरार पैदा करने की कोशिश की जा रही है। यह कुछ और नहीं बल्कि राष्ट्रभक्ति में अपनी साझेदारी दिखाने की उसी कोशिश का हिस्सा है।
बोस और नेहरू के बीच के इन मूसरचंदों से यह जरूर पूछा जाना चाहिए कि जब नेताजी देश से बाहर रहकर अंग्रेजी हुकूमत की चूलें हिला रहे थे। और नेहरू कांग्रेस की अगुवाई में ‘न एक भाई, न एक पाई’ के नारे के साथ गोरों की सरकार के खिलाफ गोलबंदी कर रहे थे। तब ये और इनके हमराह कहां थे और वो क्या कर रहे थे?

श्यामा प्रसाद मुखर्जी उस समय मुस्लिम लीग के साथ मिलकर अंग्रेजों की छत्रछाया में बंगाल में सरकार चला रहे थे।

इनके झूठ, भ्रम और अफवाह की आंधी में बहने से पहले दो मिनट ठहरकर सोचने की जरूरत है। इनके सबसे बड़े नेता और नेहरू के नेतृत्व वाली अंतरिम कैबिनेट के सदस्य श्यामा प्रसाद मुखर्जी, जिनकी भगीरथी चोटी से बीजेपी निकली है। उस समय मुस्लिम लीग के साथ मिलकर अंग्रेजों की छत्रछाया में बंगाल में सरकार चला रहे थे। मुस्लिम लीग के नेता फ़जलुल हक़ सूबे के मुख्यमंत्री थे और मुखर्जी साहब उप मुख्यमंत्री।
इसी तरह से सिंध और उत्तर पश्चिम फ्रंटियर प्रांत (एनडब्ल्यूएफपी) में भी इसी गठबंधन की सरकारें थीं। सिंध में तो पहले अल्लाह बख्श की सरकार थी। इत्तेहाद पार्टी के नेतृत्व में गठित इस सेकुलर सरकार में हिंदू, मुस्लिम और सिख सभी शामिल थे। लेकिन अंग्रेजों की मदद से मुस्लिम लीग के गुंडों ने 1943 में अल्लाह बख्श की हत्या कर दी। फिर उसके बाद सिंध में मुस्लिम लीग और हिंदू महासभा के गठबंधन की संयुक्त सरकार बनी। उस समय दक्षिणपंथी खेमे के सबसे बड़े वीर वीर सावरकर ने इसे व्यावहारिक राजनीति की जरूरत करार दिया था। सावरकर उस समय हिंदू महासभा के अध्यक्ष थे।

अंग्रेजी सेना में सैनिकों की भर्ती के लिए हिंदू महासभा ने बाकायदा कैंप लगवाए थे

अंग्रेजों से इनकी यारी यहीं तक महदूद नहीं थी। अंग्रेजी सेना में सैनिकों की भर्ती के लिए हिंदू महासभा और उसके मुखिया ने बाकायदा जगह-जगह भर्ती कैंप लगवाए थे। फिर इन्हीं जवानों को उत्तर-पूर्व के मोर्चे पर सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व वाले आईएनए के सैनिकों का सीना छलनी करने के लिए भेजा जाता था। सावरकर ने तब कहा था कि
“जापान के द्वितीय युद्ध में शामिल होने से हम सीधे ब्रिटेन के शत्रुओं की जद में आ गए हैं। नतीजतन हम पसंद करें या ना करें युद्ध की विभीषिकाओं की चपेट में आने से हमें अपनी मातृभूमि को बचाना होगा। और यह भारत की रक्षा की दिशा में भारत सरकार (तब ब्रिटिश सरकार) के प्रयासों को तेज करने के जरिये ही संभव है। इसलिए हिंदू महासभा को खासकर बंगाल और असम के हिंदुओं को सैन्य बलों में शामिल होने के लिए प्रेरित करने की जरूरत है।” [ वी डी सावरकर, समग्र सावरकर वांगमय: हिंदू राष्ट्र दर्शन, खंड 6, महाराष्ट्र प्रांतिक हिंदू महासभा, पुणे, 1963, पेज-460 ]
 इन तथ्यों के बाद कम से कम बीजेपी-आरएसएस या फिर किसी भी दक्षिणपंथी संगठन को इस मसले पर बोलने का कोई नैतिक अधिकार नहीं रह जाता है। इस मामले में किसी तथ्य पर आधारित आलोचना की गुंजाइश न होने पर अब इन्हें झूठ और अफवाहों का सहारा लेना पड़ रहा है। दरअसल नेताजी से जुड़ी 100 फाइलों के सार्वजनिक होने के बाद भी उन्हें नेहरू के खिलाफ कुछ नहीं मिला। फाइलों के पहाड़ से कुछ नहीं मिला तो अब फर्जी चिट्ठी तैयार की गई है। इसी के सहारे काम चलाया जा रहा है। लेकिन इसका भी पर्दाफाश हो गया है। इसलिए नेताजी और नेहरू के बारे में बात करने से पहले संघ और बीजेपी को एक बार अपने गिरेबान में जरूर झांक लेना चाहिए। क्योंकि एक अंगुली अगर कोई उठाता है तो चार खुद पर भी उठ रही होती हैं।
महेंद्र मिश्र, लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।
महेंद्र मिश्र, लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।