Thursday, 7 July 2022

 

इज़राइली यहूदियों के वंशज हैं RSS के संस्थापक चितपावन ब्राह्मण
आरएसएस. की स्थापना चितपावन ब्राह्मणों ने की और इसके ज्यादातर सरसंघचालक अर्थात् मुखिया अब तक सिर्फ चितपावन ब्राह्मण ही होते आए हैं। क्या आप जानते हैं ये चितपावन ब्राह्मण कौन होते हैं ?
चितपावन ब्राह्मण भारत के पश्चिमी किनारे स्थित कोंकण के निवासी हैं। चितपावन ब्राह्मणों को देशस्थ ब्राह्मणों द्वारा 18वीं शताब्दी तक निम्न स्तर का समझा जाता था। यहां तक कि देशस्थ ब्राह्मण नासिक और गोदावरी स्थित घाटों को भी पेशवा समेत समस्त चितपावन ब्राह्मणों को उपयोग नहीं करने देते थे।
दरअसल कोंकण वह इलाका है जिसे मध्यकाल में विदशों से आने वाले तमाम समूहों ने अपना निवास बनाया। जिनमें पारसी, बेने इज़राइली, कुडालदेशकर गौड़ ब्राह्मण, कोंकणी सारस्वत ब्राह्मण और चितपावन ब्राह्मण, जो सबसे अंत में भारत आए, प्रमुख हैं। आज भी भारत की महानगरी मुंबई के कोलाबा में रहने वाले बेन इज़राइली लोगों की लोककथाओं में इस बात का जिक्र आता है कि चितपावन ब्राह्मण उन्हीं 14 इज़राइली यहूदियों के खानदान से हैं जो किसी समय कोंकण के तट पर आए थे।
चितपावन ब्राह्मणों के बारे में 1707 से पहले बहुत कम जानकारी मिलती है। इसी समय के आसपास चितपावन ब्राह्मणों में से एक बालाजी विश्वनाथ भट्ट रत्नागिरी से चलकर पुणे-सतारा क्षेत्र में पहुँचा। उसने किसी तरह छत्रपति शाहूजी का दिल जीत लिया और शाहूजी ने प्रसन्न होकर बालाजी विश्वनाथ भट्ट को अपना पेशवा यानी कि प्रधानमंत्री नियुक्त कर दिया। यहीं से चितपावन ब्राह्मणों ने सत्ता पर पकड़ बनानी शुरू कर दी क्योंकि वे समझ गए थे कि सत्ता पर पकड़ बनाए रखना बहुत जरूरी है। मराठा साम्राज्य का अंत होने तक पेशवा का पद इसी चितपावन ब्राह्मण बालाजी विश्वनाथ भट्ट के परिवार के पास रहा।
एक चितपावन ब्राह्मण के मराठा साम्राज्य का पेशवा बन जाने का असर यह हुआ कि कोंकण से चितपावन ब्राह्मणों ने बड़ी संख्या में पुणे आना शुरू कर दिया, जहाँ उन्हें महत्वपूर्ण पदों पर बैठाया जाने लगा। चितपावन ब्राह्मणों को न सिर्फ मुफ़्त में जमीनें आबंटित की गईं बल्कि उन्हें तमाम करों से भी मुक्ति प्राप्त थी। चितपावन ब्राह्मणों ने अपनी जाति को सामाजिक और आर्थिक रूप से ऊपर उठाने के इस अभियान में जबरदस्त भ्रष्टाचार किया। इतिहासकारों के अनुसार 1818 में मराठा साम्राज्य के पतन का यह प्रमुख कारण था। रिचर्ड मैक्सवेल ने लिखा है कि राजनीतिक अवसर मिलने पर सामाजिक स्तर में ऊपर उठने का यह बेमिसाल उदाहरण है (Richard Maxwell Eaton. A social history of the Deccan, 1300-1761: eight Indian lives, Volume 1. p. 192)।
चितपावन ब्राह्मणों की भाषा भी इस देश के भाषा-परिवार से नहीं मिलती थी। 1940 तक ज्यादातर कोंकणी चितपावन ब्राह्मण अपने घरों में चितपावनी कोंकणी बोली बोलते थे जो उस समय तेजी से विलुप्त होती बोलियों में शुमार थी। आश्चर्यजनक रूप से चितपावन ब्राह्मणों ने इस बोली को बचाने का कोई प्रयास नहीं किया। उद्देश्य उनका सिर्फ एक ही था कि खुद को मुख्यधारा में स्थापित कर उच्च स्थान पर काबिज़ होना। खुद को बदलने में चितपावन ब्राह्मण कितने माहिर हैं इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अंग्रेजों ने जब देश में इंग्लिश एजुकेशन की शुरुआत की तो इंग्लिश मीडियम स्कूलों में अपने बच्चों का दाखिला कराने वालों में चितपावन ब्राह्मण सबसे आगे थे।
इस तरह अत्यंत कम जनसंख्या वाले चितपावन ब्राह्मणों ने, जो मूलरूप से इज़राइली यहूदी थे, न सिर्फ इस देश में खुद को स्थापित किया बल्कि आरएसएस. नाम का संगठन बना कर वर्तमान में देश के नीति-नियंत्रण करने की स्थिति तक खुद को पहुँचाया।
आप, Nilotpal Shukla, Shyam Singh Rawat और 76 अन्य लोग
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Saturday, 2 April 2022

 

*मेरे बच्चे अब बड़े हो गए हैं और हम अकेले हो गए हैं*
बिस्तरों पर अब सलवटें नहीं पड़ती
ना ही इधर उधर छितराए हुए कपड़े हैं
रिमोट के लिए भी अब झगड़ा नहीं होता
ना ही खाने की नई नई फ़रमाइशें हैं
*मेरे बच्चे अब बड़े हो गए हैं और हम अकेले हो गए हैं*
सुबह अख़बार के लिए भी नहीं होती मारा मारी
घर बहुत बड़ा और सुंदर दिखता है
पर हर कमरा बेजान सा लगता है
अब तो वक़्त काटे भी नहीं कटता
बचपन की यादें कुछ दिवार पर, फ़ोटो में सिमट गयी हैं
*मेरे बच्चे अब बड़े हो गए हैं और हम अकेले हो गए हैं*
अब मेरे गले से कोई नहीं लटकता
ना ही घोड़ा बनने की ज़िद होती है
खाना खिलाने को अब चिड़िया नहीं उड़ती
खाना खिलाने के बाद की तसल्ली भी, अब नहीं मिलती
ना ही रोज की बहसों और तर्कों का संसार है
ना अब झगड़ों को निपटाने का मजा है
ना ही बात बेबात गालों पर मिलता दुलार है
बजट की खींच तान भी अब नहीं है
*मेरे बच्चे अब बड़े हो गए हैं और हम अकेले हो गए हैं*
पलक झपकते ही जीवन का स्वर्ण काल निकल गया
पता ही नहीं चला
इतना ख़ूबसूरत अहसास कब पिघल गया
पता ही नहीं चला
तोतली सी आवाज़ में हर पल उत्साह था
पल में हँसना, पल में रो देना
बेसाख़्ता गालों पर उमड़ता प्यार था
कंधे पर थपकी और गोद में सो जाना
सीने पर लिटाकर वो लोरी सुनाना
बार बार उठ कर रज़ाई को ओढ़ाना
अब तो बिस्तर बहुत बड़ा हो गया है
मेरे बच्चों का प्यारा बचपन, कहीं खो गया है
*मेरे बच्चे अब बडे हो गए हैं और हम अकेले हो गए हैं*
अब कोई जुराबें इधर उधर नहीं फेंकता है..
अब फ्रिज भी घर की तरह खाली रहता है
बाथरूम भी सूखा रहता है
किचन हर दम सिमटा रहता है
अब हर घंटी पर लगता है कि, शायद कोई surprise है
और बच्चों की कोई नयी फरमाइश है
अब तो रोज सुबह शाम मेरी सेहत फोन पर पूछते हैं
मुझे अब आराम की हिदायत देते हैं
पहले हम उनके झगड़े निपटाते थे
आज वे हमें समझाते हैं
लगता है अब शायद हम बच्चे हो गए हैं ,
उनके सब के सास ससुर है, जिन्हे वे मम्मी जी पापा जी कहते हैं।
 बच्चों के नाना नानी हैं ,उनकी पत्नियों के मम्मी पापा हैं ,
हम गैर जरूरी सामान हो गए हैं,
बात बात पर अपनी समस्या लेकर आने वाले बच्चों को हम बड़ी समस्या लगते हैं।
उन्हे यह भी गंवारा नही की उनके बच्चे हम से बात करे,जाने की पिता के पिता और मां बहन होती हैं । मेरे बच्चे अब बड़े हो गए हैं, और हम अकेले हो गए हैं*
*मेरे बच्चे अब बडे़ हो गए हैं, और हम अकेले हो गए हैं*

 

जब मैं बूढ़ा हो जाऊँगा।
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जब मैं बूढ़ा हो जाऊँगा, एकदम जर्जर बूढ़ा, तब तू क्या थोड़ा मेरे पास रहेगा? मुझ पर थोड़ा धीरज तो रखेगा न? मान ले, तेरे महँगे काँच का बर्तन मेरे हाथ से अचानक गिर जाए? या फिर, सब्ज़ी की कटोरी मैं उलट दूँ टेबल पर? मैं तब बहुत अच्छे से नहीं देख सकूँगा न! मुझे तू चिल्लाकर डाँटना मत प्लीज़! बूढ़े लोग सब समय ख़ुद को उपेक्षित महसूस करते रहते हैं, तुझे नहीं पता?
एक दिन मुझे कान से सुनाई देना बंद हो जाएगा, एक बार में मुझे समझ में नहीं आएगा कि तू क्या कह रहा है, लेकिन इसलिए तू मुझे बहरा मत कहना! ज़रूरत पड़े तो कष्ट उठाकर एक बार फिर से वह बात कह देना, या फिर लिख ही देना काग़ज़ पर। मुझे माफ़ कर देना, मैं तो कुदरत के नियम से बुढ़ा गया हूँ, मैं क्या करूँ बता?
और जब मेरे घुटने काँपने लगेंगे, दोनों पैर इस शरीर का वज़न उठाने से इनकार कर देंगे, तू थोड़ा-सा धीरज रखकर मुझे उठ खड़े होने में मदद नहीं करेगा, बोल? जिस तरह तूने मेरे पैरों के पंजों पर खड़े होकर पहली बार चलना सीखा था, उसी तरह?
कभी-कभी टूटे रेकॉर्ड प्लेयर की तरह मैं बकबक करता रहूँगा, तू थोड़ा कष्ट करके सुनना। मेरी खिल्ली मत उड़ाना प्लीज़, मेरी बकबक से बेचैन मत हो जाना। तुझे याद है, बचपन में तू एक गुब्बारे के लिए मेरे कान के पास कितनी देर तक भुनभुन करता रहता था, जब तक न मैं तुझे वह ख़रीद देता था, याद आ रहा है तुझे?
हो सके तो मेरे शरीर की गंध को भी माफ़ कर देना। मेरी देह में बुढ़ापे की गंध पैदा हो रही है! तब नहाने के लिए मुझसे ज़बर्दस्ती मत करना। मेरा शरीर उस समय बहुत कमज़ोर हो जाएगा, ज़रा-सा पानी लगते ही ठण्ड लग जाएगी! मुझे देखकर नाक मत सिकोड़ना प्लीज़! तुझे याद है, मैं तेरे पीछे दौड़ता रहता था, क्योंकि तू नहाना नहीं चाहता था? तू विश्वास कर, बुडढों को ऐसा ही होता है, हो सकता है एक दिन तुझे यह समझ में आए, हो सकता है, एक दिन!
तेरे पास अगर समय रहे, हम लोग साथ में गप्पें लड़ाएँगे, ठीक है? भले ही कुछेक पल के लिए क्यों न हो। मैं तो दिन भर अकेला ही रहता हूँ, अकेले-अकेले मेरा समय नहीं कटता! मुझे पता है, तू अपने कामों में बहुत व्यस्त रहेगा, मेरी बुढ़ा गई बातें तुझे सुनने में अच्छी न भी लगें तो भी थोड़ा मेरे पास रहना। तुझे याद है, मैं कितनी ही बार तेरी छोटे गुड्डे की बातें सुना करता था, सुनता ही जाता था? और तू बोलता ही रहता था, बोलता ही रहता था। मैं भी तुझे कितनी ही कहानियाँ सुनाया करता था, तुझे याद है?
एक दिन आएगा जब बिस्तर पर पड़ा रहूँगा, तब तू मेरी थोड़ी देखभाल करेगा? मुझे माफ़ कर देना यदि ग़लती से मैं बिस्तर गीला कर दूँ, अगर चादर गंदी कर दूँ, मेरे अंतिम समय में मुझे छोड़कर दूर मत रहना, प्लीज़!
जब समय हो जाएगा, मेरा हाथ तू अपनी मुट्ठी में भर लेना। मुझे थोड़ी हिम्मत देना ताकि मैं निर्भय होकर मृत्यु का आलिंगन कर सकूँ। चिंता मत करना, जब मुझे मेरे सृष्टा दिखाई दे जाएँगे, उनके कानों में फुसफुसाकर कहूँगा, कि वे तेरा कल्याण करें, कारण कि तू मुझसे प्यार करता था, मेरे बुढ़ापे के समय तूने मेरी देखभाल की थी।
मैं तुझसे बहुत-बहुत प्यार करता हूँ रे, तू ख़ूब अच्छे-से रहना। इसके अलावा और क्या कह सकता हूँ, क्या दे सकता हूँ भला।
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Friday, 21 August 2020

आरती ॐ जय जगदीश हरे के लेखक

 

प्रसिद्ध आरती, *'ओम जय जगदीश हरे'* के रचयिता कौन हैं ? "
इसके उत्तर में किसी ने कहा, ये आरती तो पौराणिक काल से गाई जाती है।
किसी ने इस आरती को वेदों का एक भाग बताया।
और एक ने तो ये भी कहा कि, सम्भवत: इसके रचयिता अभिनेता-निर्माता-निर्देशक मनोज कुमार हैं!
" ओम जय जगदीश हरे " आरती आज हर हिन्दू घर में गाई जाती है। इस आरती की तर्ज पर अन्य देवी देवताओं की आरतियाँ बन चुकी हैं और गाई जाती हैं।
परंतु इस मूल आरती के रचयिता के बारे में काफी कम लोगों को पता है।
*इस आरती के रचयिता थे पं. श्रद्धाराम शर्मा या श्रद्धाराम फिल्लौरी।*
*पं. श्रद्धाराम शर्मा* का जन्म *पंजाब* के जिले जालंधर में स्थित *फिल्लौर नगर* में हुआ था।
वे सनातन धर्म प्रचारक, ज्योतिषी, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, संगीतज्ञ तथा हिन्दी और पंजाबी के प्रसिद्ध साहित्यकार थे।
उनका विवाह सिख महिला *महताब कौर* के साथ हुआ था। बचपन से ही उन्हें ज्योतिष और साहित्य के विषय में उनकी गहरी रूचि थी।
उन्होनें वैसे तो किसी प्रकार की शिक्षा हासिल नहीं की थी परंतु उन्होंने सात साल की उम्र तक गुरुमुखी में पढाई की और दस साल की उम्र तक वे *संस्कृत, हिन्दी, फ़ारसी भाषाओं तथा ज्योतिष* की विधा में पारंगत हो चुके थे।
उन्होने पंजाबी (गुरूमुखी) में *'सिक्खां दे राज दी विथियाँ' और 'पंजाबी बातचीत'* जैसी पुस्तकें लिखीं।
*'सिक्खां दे राज दी विथियाँ'* उनकी पहली किताब थी। इस किताब में उन्होनें सिख धर्म की स्थापना और इसकी नीतियों के बारे में बहुत सारगर्भित रूप से बताया था।
यह पुस्तक लोगों के बीच बेहद लोकप्रिय साबित हुई थी और अंग्रेज सरकार ने तब होने वाली *आई.सी.एस* (जिसका भारतीय नाम अब *आई.ए.एस* हो गया है) परीक्षा के कोर्स में इस पुस्तक को शामिल किया था।
*पं. श्रद्धाराम शर्मा गुरूमुखी और पंजाबी* के अच्छे जानकार थे और उन्होनें अपनी पहली पुस्तक गुरूमुखी मे ही लिखी थी परंतु वे मानते थे कि हिन्दी के माध्यम से ही अपनी बात को अधिकाधिक लोगों तक पहुँचाया जा सकता है।
हिन्दी के जाने माने लेखक और साहित्यकार पं. रामचंद्र शुक्ल ने *पं. श्रद्धाराम शर्मा और भारतेंदु हरिश्चंद्र* को हिन्दी के पहले दो लेखकों में माना है।
उन्होनें 1877 में *भाग्यवती* नामक एक उपन्यास लिखा था जो हिन्दी में था। माना जाता है कि यह हिन्दी का *पहला* उपन्यास है।
इस उपन्यास का *प्रकाशन 1888* में हुआ था। इसके प्रकाशन से पहले ही *पं. श्रद्धाराम का निधन* हो गया परंतु उनकी मृत्यु के बाद उनकी पत्नी ने काफी कष्ट सहन करके भी इस उपन्यास का प्रकाशन करावाया था।
वैसे *पं. श्रद्धाराम शर्मा धार्मिक कथाओं और आख्यानों* के लिए काफी प्रसिद्ध थे.
वे महाभारत का उध्दरण देते हुए अंग्रेजी हुकुमत के खिलाफ जनजागरण का ऐसा वातावरण तैयार कर देते थे उनका आख्यान सुनकर प्रत्येक व्यक्ति के भीतर देशभक्ति की भावना भर जाती।
*इससे अंग्रेज सरकार की नींद उड़ने लगी और उसने 1865 में पं. श्रद्धाराम को फुल्लौरी* से निष्कासित कर दिया और आसपास के गाँवों तक में उनके प्रवेश पर पाबंदी लगा दी।
लेकिन उनके द्वारा लिखी गई किताबों का पठन विद्यालयों में हो रहा था और वह जारी रहा।
निष्कासन का उन पर कोई असर नहीं हुआ, बल्कि उनकी लोकप्रियता और बढ गई।
निष्कासन के दौरान उन्होनें कई पुस्तकें लिखीं और लोगों के सम्पर्क में रहे।
*पं. श्रद्धाराम* ने अपने व्याख्यानों से लोगों में अंग्रेज सरकार के खिलाफ क्रांति की मशाल ही नहीं जलाई बल्कि साक्षरता के लिए भी ज़बर्दस्त काम किया।
*1870 में उन्होंने एक ऐसी आरती लिखी* जो भविष्य में घर घर में गाई जानी थी। वह आरती थी- ओम जय जगदीश हरे...
पं. शर्मा जहाँ कहीं व्याख्यान देने जाते *ओम जय जगदीश हरे* की आरती गाकर सुनाते।
उनकी यह आरती लोगों के बीच लोकप्रिय होने लगी और फिर तो आज कई पीढियाँ गुजर जाने के बाद भी यह आरती गाई जाती रही है और कालजई हो गई है।
इस आरती का उपयोग प्रसिद्ध निर्माता निर्देशक मनोज कुमार ने अपनी एक फिल्म 'पूरब और पश्चिम' में किया था और इसलिए कई लोग इस आरती के साथ मनोज कुमार का नाम जोड़ देते हैं।
पं. शर्मा सदैव प्रचार और आत्म प्रशंसा से दूर रहे थे। शायद यह भी एक वजह हो कि उनकी रचनाओं को चाव से पढ़ने वाले लोग भी उनके जीवन और उनके कार्यों से परिचित नहीं हैं।
*24 जून 1881 को लाहौर* में पं. श्रद्धाराम शर्मा ने आखिरी सांस ली।
ॐ जय जगदीश हरे,
स्वामी जय जगदीश हरे |
भक्त जनों के संकट,
दास जनों के संकट,
क्षण में दूर करे |
ॐ जय जगदीश हरे ||🙏
जो ध्यावे फल पावे,
दुःखबिन से मन का,
स्वामी दुःखबिन से मन का |
सुख सम्पति घर आवे,
सुख सम्पति घर आवे,
कष्ट मिटे तन का |
ॐ जय जगदीश हरे ||🙏
मात पिता तुम मेरे,
शरण गहूं किसकी,
स्वामी शरण गहूं मैं किसकी |
तुम बिन और न दूजा,
तुम बिन और न दूजा,
आस करूं मैं जिसकी |
ॐ जय जगदीश हरे ||🙏
तुम पूरण परमात्मा,
तुम अन्तर्यामी,
स्वामी तुम अन्
तर्यामी |
पारब्रह्म परमेश्वर,
पारब्रह्म परमेश्वर,
तुम सब के स्वामी |
ॐ जय जगदीश हरे ||🙏
तुम करुणा के सागर,
तुम पालनकर्ता,
स्वामी तुम पालनकर्ता |
मैं मूरख फलकामी
मैं सेवक तुम स्वामी,
कृपा करो भर्ता |
ॐ जय जगदीश हरे ||🙏
तुम हो एक अगोचर,
सबके प्राणपति,
स्वामी सबके प्राणपति |
किस विधि मिलूं दयामय,
किस विधि मिलूं दयामय,
तुमको मैं कुमति |
ॐ जय जगदीश हरे ||🙏
दीन-बन्धु दुःख-हर्ता,
ठाकुर तुम मेरे,
स्वामी रक्षक तुम मेरे |
अपने हाथ उठाओ,
अपने शरण लगाओ
द्वार पड़ा तेरे |
ॐ जय जगदीश हरे ||🙏
विषय-विकार मिटाओ,
पाप हरो देवा,
स्वमी पाप हरो देवा |
श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ,
श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ,
सन्तन की सेवा |
*!! ॐ जय जगदीश हरे !!*🙏

Friday, 31 May 2019

अब्दुल रहीम खानखाना .


अब्दुल रहीम खानखाना .अकबर के नौ रत्नों में सबसे नायब हीरा ,एक अद्भुत व्यक्ति .इतना बड़ा शूरमा की १६ से ७२ वर्ष की उम्र तक लडाइयां ही लड़ता और जीतता रहा /इतना बड़ा दानी की किसी ने कहा की मैंने एक लाख अशर्फियाँ एक साथ देखी नहीं.. तोउसे एक लाख अशर्फियाँ दे दी.. विनम्रता इतनी की देने के बाद भी शर्मिंदा थे ...देते समय उनकी आखे नीचे थीं ,किसी ने आँखे नीचे होने का कारन पूछा तो कहा .
देन हार कोई और है भेजत है दिन रैन
लोग भरम हमपर धरें यातें नीचे नैन ..
सहृदय ऐसे की एक सिपाही की स्त्री के एक बर्वे पर प्रसन्न हो गए ;-
प्रेम प्रीति को बिरवा चलेहु लगाय
सींचनि की सुधि लीजै मुरझ न जांय.
और सिपाही को धन धन्य देकर उसकी नवागत बधू के पास भेज दिया .और इसी चाँद पर एक पूरा ग्रन्थ ही लिख डाला
गुण के ग्राहक ऐसे की अरबी/फ़ारसी ,हिन्दी के अनेक रचना कार इनके मित्र थे.
चरित्रवान इतने की रूपवती के प्रणय निवेदन के कथन ..की मुझे अपने जैसा पुत्र दे दो .पर अपना सर उसकी गोद में डाल दिया ..माँ कहकर
.तुलसी के मित्र थे .अकबर के विस्वास पात्र थे .जहाँगीर और शाहजहाँ के द्वन्द में इस कदर फंसे की पिस गए .जेल में डाल दिए गए उनके पुत्र दरब खान का सर काट कर उनके पास भेज दिया गया .उनके पूरे परिवार को जालिमो ने मार दिया फिर भी स्वाभि मान नहीं छोड़ा ...
रहिमन मोहि न सुहाय अमिय पियावै मान बिन
.बरु विष देई बुलाय मान सहित मरिबो भलो .
और प्रेमी इतने गहरे की ..
अंतर दाव लगी रहे धुंवा न प्रगट सोय
कई जिय जाने आपनो या सर बीती होय ..
जे सुलगे ते बुझ गए बुझे ते सुलगे नाहि
रहिमन दाहे प्रेम के बुझी बुझी के सुल गाहि ..
भक्त ऐसे की कृष्ण मय हो गए कवियों ने लिखा कोटिन हिन्दू वारिये मुस्लमान हरि जनन पर ,.कुल मिला कर एक ऐसा व्यक्तित्व
जिसे पढ़ कर आप पूरी एक कौम के बारे में अपनी जान कारी को अधूरी मानने पर विवास होंगे ..
कल से आगे ..कल के लेख में अशुद्धियाँ थीं बाद में दूर किया अब नही हैं .आज कोशिस की है की अशुद्ध न हो फिर भी होगा ही ..आज और अच्छा बना है पढ़िए
रहीम को पढ़ते समय मुझे लगा की उनका पूरा जीवन -राजसी विलास का रहा हो ,.दर दर,मारे मारे फिरने का रहा हो, युद्ध और फतह का रहा हो ,राजा, के क्रोध काल का हो ,कुचाली दोस्तों के विश्वास घातके समय का रहा हो, एक आंवा था जो भीतर ही दहक रहा था /
रहीम के बारे में एक कहानी मिलती है की तान सेन ने अकबर के दरबार में एक पद गाया, जो इस प्रकार था .
जसुदा बार बार यों भाखै है
कोऊ ब्रज में हितू हमारो चलत गोपालहिं राखै ...
और अकबर ने अपने सभा सदों से इसका अर्थ कहने को कहा ,
तनसेन ने कहा --यशोदा बार बार अर्थात पुनः पुनः यह पुकार लगाती है की है कोई ऐसा हितू जो ब्रज में गोपाल को रोक ले .
शेख फैजी ने अर्थ कहा ....बार बार का मतलब ..रो रो कर रट लगाती है .बीरबल ने कहा बार बार का अर्थ है द्वार द्वार जाकर यशोदा पुकार लगाती है ...खाने आजम कोका ने कहा बार का अर्थ दिन है और यशोदा प्रतिदिन यही रटती रहती है .अब रहीम की बरी थी .उन्होंने अर्थ कहा ...तानसेन गायक हैं इनको एक ही पद को अलापना रहता है इस लिए उन्हों ने बार बार का अर्थ पुनुरुक्ति किया शेख फैजी फ़ारसी का शायर हैं इन्हें रोने के सिवा कोई काम नहीं .राजा बीर बल द्वार द्वार घूमने वाले ब्राम्हण हैं इसलिए इनका बार बार का अर्थ द्वार द्वार ही उचित है, खाने आजम कोका नजूमी (ज्योतिषी) हैं उन्हें तिथि बार से ही वास्ता पड़ता है इसलिए बार बार का अर्थ उन्होंने दिन दिन किया ,.
पर हुजूर वास्तविक अर्थ यह है की
यशोदा का बार बारअर्थात रोम रोम पुकारता है की कोई तो मिले जो मेरे गोपाल को ब्रज में रोक ले .इस ब्य्ख्या से रहीम की विद्ग्घ्ता और साहित्य की समझ का पता चलता है
इस से रहीम के उस गहरे हिन्दुस्तानी रंग का पता चलता है जो रोमांच को सात्विक भाव मानता हैऔर रोम रोम में ब्रम्हांड देखता . जो शरीर के रोम जैसे अंग को भी प्राणों का सन्देश वाहक मानता है जो वनस्पति मात्र को विरत अस्तित्व का रोमांच मानता है रहीम का जीवन एक पूरा दुखांत नाटक है .जिसमे बहुत से उतर चढाव हैं .महात्मा तुलसी से उनकी प्रगाढ़ मित्रता थी .बाप बैरम खान अकबर की ही तरह तुर्किस्तान के एक बहुत बड़े कबीले के सरदार थे वे सोलह वर्ष की आयु से ही हुमायू के साथ रहे .उन्ही की कूबत थी की हुमयू को फिर से दिल्ली की राजगद्दी पर बिठाया ,हुमायूँ के मरने पर वे ही अकबर के अभिभावक बनगए.जिस साल हुमायूँ मरे उसी साल लाहौर में रहीम का जन्म हुआ .रहीम की माँ अकबर की मौसी थीं .अकबर से दूसरा रिश्ता भी था ,बैरम खान की दूसरी शादी बाबर की नतिनी सलीमा बेगम सुल्ताना से हुई थी .बैरम खान के मरने के बाद अकबर के साथ सलीमा का पुनर्विवाह हुआ ,पर भाग्य का खेल ,चुगुल खोरों ने बैरम खान और अकबर के बीच भेद की गहरी खाई खोद दी .बैतररम खान ने विद्रोह किया परास्त हुए ,उन्हें हज करने जाने की सजा मिली.वे गुजरात पहुंचे थे की उनका डेरा लुट गया बैरम खान का क़त्ल हो गया ,बफदारों ने ओ परिवार बचाया ,चार वर्ष के रहीम बारह वर्ष की सलीमा सुल्ताना बेगम .अहमद बाद पहुंचे .जब रहीम पांच वर्ष के थे तभी अकबर ने उन्हें अपने संरक्षण में ले लिया .शिक्षा दीक्षा कराई.बड़े सरदार मिर्जा अजीज कोकलताश की बहन माह बनू बेगम से निकाह करवाया .उन्नीस वर्ष की आयु में गुजरात का युद्ध जीत कर वहा के सूबेदार बने ....
वे तुलसी के परम मित्र थे .और तुलसी को बेहतरीन इंसान मानते थे ..
सुरतिय नर तिय नागतिय सब चाहत अस होय
गोद लिए हुलसी फिरें तुलसी सों सूत होय
और रामचरित मानस को बेहतरीन ग्रन्थ ........
राम चरित मांनस विमल सब ग्रंथन को सार
हिंदुआं को वेद सैम तुरकन प्रकट कुरान ....
कबीर तुलसी रहीम और रसखन मध्यकाल के चार बेहतरीन इंसान ..कबीर संत थे एक बेहतरीन इंसान थे .अनपढ़ गृहस्त थे .जाति पांति धन धर्म से परे थे .मन से साफ़ थे .कबीर की भाषा आम आदमी की भाषा थी.वे लिखते नहीं थे केवल बोलते थे लोक जीवन के बहुत नजदीक थे .उनके प्रतीक दृष्टान्त लोक जीवन से आते थे . वे राम नाम जपते जरुर थे पर पूजा और आडम्बर के विरोधी थे उनके राम दशरथ के बेटे राम नही थे .इस धरती पर कबीर से बड़ा कोई इन्सान पैदा ही नहीं हुआ ,एक मुकम्मल इन्सान क्या होता है जानने के लिए हर किसी को कबीर पढ़ना चाहिए .अनगढ़ ,सहज ,भीतर- बाहर एक ,निर्भय ,आस्थावान ,जागृत विवेक .बिना पढ़े पूरी तरह ज्ञानी ,प्रेमानुभूति की पराकाष्ठा को समझाने वाला .मनुष्यता का रक्षक ,जागृत ,त्यागी गृहस्थ ,मनुष्यता की रक्षा के लिए भगवान से भी मुठभेड़ करने को आमादा ,जीवन और जगत को पूरी तरह समझाने वाला ,उसकी नश्वरता का गायक .मनुष्य इस धरती पर दूसरा कोई नहीं ...कबीर को जानना एक तपस्या है .उसे समझना मनुष्य बनने के रस्ते में एक सफल कदम है, उसे जीना ही मनुष्य होना है .कबीर सत्य है, कबीर नित्य है, कबीर .लोक है ,कबीर लोक राग है ,कबीर जिजीविषा है ..अपने लोक को ,अपने लोकराग को .अपने सत्य को अपने नित्य में जी पाना ही कबीर होना है .उसे पढ़ना एक रोमांच है .उसे समझना ब्रम्ह को ,प्राणी को जानना है ,उसे जीना एक ताकत है ,कबीर जीवन की हिम्मत है .जीवन की कला है ..आज कबीर की ही सबसे जादा जरूरत है . कबीर धर्म की ब्याख्या है .कबीर कर्म का प्रमाण है .वह निष्काम कर्मयोगी गृहस्थ ...वेद की ब्याख्या है .पुरानो की समीक्षा है वेदांत दर्शन का निचोड़ है ....तुलसी महात्मा थे . भक्त थे . पढ़े लिखे थे . गृहस्त नहीं थे .पर संत नहीं थे .उन्हों ने अपने काम को पीटपीट के राम बना दिया था .और राम के परम भक्त थे.संस्कृत के विद्वान थे पर अवधी में लिखते थे वे.उनमे भी वे सारे गुण थे जो कबीर में थे बल्कि वे पढ़े लिखे थे पुरानो के जादा नजदीक थे परन्तु वेद वेदांत के ज्ञाता थे . रहीम .के परम मित्र थे .और रहीम तुलसी को बेहतरीन इंसान मानते थे ..
सुरतिय नर तिय नागतिय सब चाहत अस होयगोद लिए हुलसी फिरें तुलसी सों सूत होय
और रामचरित मानस को बेहतरीन ग्रन्थ ........
राम चरित मांनस विमल सब ग्रंथन को सांन हिंदुअन को वेद सम तुरकन प्रकट कुरान ....
रहीम अकबर के दरबारी थे तुलसी नही थे .हाँ अकबर ने चाहा था पर तुलसी ने अकबर को सीधा सा जबा दे दिया था .. होऊं चाकर रघुबीर को पटो लिखो दरबार .तुलसी अब का होंही गे नर के मंसब दार ...मतलब हिम्मती थे निडर थे ब्राम्हण थे .लिखते अवधी में थे . लोक जीवन के बहुत नजदीक थे .उनके प्रतीक दृष्टान्त लोक जीवन से आते थे .रहीमऔर तुलसी दोनों समकालीन थे.रहीम संस्कृत अवधि अरवी फारसी के जानकार थे .सभी भाषाओं का आदर करते थे सभी में लिखते थे .वे मुसलमान थे पर भक्त थे .राम के भी और कृष्ण के भी .कृष्ण के एक परम भक्त और थे रसखान .इन पर फिर कभी ..हाँ तो मैं कह रहा था की तुलसी ने कभी मुस्लिम धर्म की कोई बात नहीं की .अरवी और फारसी की चर्चा तक नहीं की ...रहीम अरवी फारसी के साथ हिन्दवी में भी लिखते रहे और नमाज के साथ साथ पूजा भी करते रहे .वे दरबारी थे .शासक थे तलवार के धनी थे फिर भी भक्त थे .महात्मा थे संत थे .उदार थे ..उन्हों ने तुलसी और मांनस दोनों की प्रशंसा की .पर तुलसी ने ऐसा कहीं नहीं किया कभी नहीं किया .एक बार भी रहीम का जिक्र नही किया अरवी फारसी का नाम तक नहीं लिया प्रशंसा की तो बात ही छोडिये .इसी लिए मैंने कहा तुलसी संत नहीं थे .उनमें हिंदुत्व .और हिंदी संकृत प्रेम तो होना लाजमी था पर अरवी फारसी को जानने की ललक भी नहीं थी यह समझ से परे है .सम्मान तो जाने दीजिये .रहीं म तो अपने को भक्त कहलाने में खुस थे पर तुलसी इस दिशा में मौन ही रहे.बाबा तुलसी दास ने मानस लिख कर राम को स्थापित किया .हिन्दुओं को संगठित किया .लेकिन अपने सम्पूर्ण लेखन में देशकी अधी जनसंख्या का कोई उल्लेख नहीं किया .शैव ,वैष्णव, स्मार्त, साधू ,संत ,योगी ,गृहस्त ऊँचनीच का भेद भाव त्याग कर एक होने और लड़ाई ख़तम करने की बात की .किन्तु उन्हों ने कहीं भी .हिन्दू मुसलमान ,अवधि फारसी संस्कृत और अरबी,की बात नहीं की ,बौद्धों की बात नहीं की जैनियों की बात नहीं की .मतलब वे हिन्दुओं को संगठित करते रहे ,पर मुसलमान बौद्ध ,जैन की चिंता नहीं की ..अवधी में लिखते रहे ..पर .अरबी और फारसी ..तथा अन्य बोलियों की चर्चा नहीं की ...जब की उस समय की सबसे बड़ी जरुरत यही थी ..आमिर खुसरो ,कबीर ,जायसी .रहीम ,रसखान ..जैसे नायक .हिन्दू मुसलमान .और भाषा की समस्या से दो चार होते रहे ..रहीम जैसे .रसखान जैसे विद्वानों ने कृष्ण भक्ति की प्रन्संशा की .रहीम ने तो तुलसी दास और मानस तक की प्रसंशा की ..पर तुलसी ने ऐसा कभी नहीं किया ..आखिर तुलसी दास ने ऐसा क्यों किया ..यह प्रश्न मेरे दिमाग को परेशान करता है .कोई भी बड़ा रचना कार अपने युग से उस काल की सबसे बड़ी समस्या से मुह मोड़ कर कैसे रह सकता है .बड़ी बड़ी लडाइयां हो रहीं थीं अकबर ने तोडर मल ने सभी ने हिन्दू मुसलमान को एक करने की कोशिस की .अकबर ने तो दीनेइलाही .लिखा .पर तुलसी ने इस दिशा में मौन क्यों साधे रखा ... .इस मायने में रहीम और रसखान दोनों कबीर की तरह तुलसी से बहुत आगे रहे .मैं तो सोचता हूँ की अगर तुलसी ने रहीम और रसखान की तरह का आचरण किया होता तो शायदहमारी बहुत बड़ी समस्या ख़त्म हो जाती कम से कम उर्दू भाषा का जन्म तो नहीं होता .इस मायने में आमिर खुसरो की भी चर्चा कभी करूँगा . आज इतना ही ..
बहुरि बंदि खलगन सितभायें जे बिन काज दाहिने बाएं ..तुलसी की खल वंदना के साथ रहीम का चौथा एपिसोड लिखना शुरू कर रहा हूँ .सज्जन लोग पढेंगे ,आदर करेंगे ...
अमित उदार अति पावन विचारी चारू ,जहाँ तहां आदरियो गंगा जी के नीर सों /खलन के घालिबे को खलक के पलिबे को ,खान खाना एक रामचन्द्र जी के तीर सों //गंगा जल की तरह पवित्र राम के तीर की तरह शत्रु विनाशक परन्तु जगत पालक ब्यक्तित्व को उनकी कृति में तलाश क रने की लालसा ,ललक ,जग उठी है /
रहीम ने प्रेम पंथ का एक चित्र खींचा है ..रहिमन मैं तुरंग चढी चलिबो पावक मांहिप्रेम पंथ ऐसो कठिन सब सों निबहत नाहि /घोड़े पर सवार होकर आग पर चलाना .और निबाह लेना सब के बसबूते का नहीं.रहीम जिन्दगी भर घोडेपर सवार हो कर आग में दौड़ते रहे . रहीम के काब्य तुरंग की यात्रा भी अग्नि यात्रा ही तो है .वह अग्नि है जीवन के सहज प्यार की जो कभी बड़ी सुखद कभी बड़ी दुखद रही ,पहले पड़ाव तक चढ़ती जवानी के अनुभवों से गुजरे ,पर वे भी राजसी जीवन के नहीं थे ,बिभिन्न प्रकारके सामान्य जन की मानसिक स्थितियों में प्यार के अनुभव थे ,इनमे हांस -विलाश है सजने सजाने का भाव है लालसा विदग्धता छल है मान मनौवल है प्रतीक्षा है राग रंग है ईर्ष्या है उत्कंठा है और लगन है ,कुल मिला कर लौकिक श्रृंगार की लहक दार .ललक मय छटा है .इस काल की दो रचनाएँ हैं बरवै नईका भेद और नगर शोभा ,बरवै नईका भेदमें नायिका की बिभिन्न अवस्थाओं का चित्र है ,एक उदाहरन .-मितवा चलेऊ विदेसवा मन अनुरागि-पिय की सुरति गगरिया रहि मग लागिप्रिय की स्मृति का कलश लिए नायिका रास्ते में खड़ी है कब प्रिय लौटेंगे और स्मृतियों का कलश उनके लिए मंगल कलश बनेगा , दूसरा चित्र.भोरहिं बोल कोयलिया बढ़वति तापघरी एक धरि अलिया रहु चुप चाप ./रात भर स्मृतियों में खोये खोये नींद उचटी रही जरा सी आंख लगी तो कोयल सबेरे ही बोल पडी और सबेरे सबेरे ताप चढ़ गया एक घड़ी तक तो वह चुप रहती ,पहले लेखमे मैंने बताया है की अपने एक सिपाही की पत्नी के चाँद से प्रभावित हो कर रहीम ने उसे धन देकर छुट्टी भेजा और उसी छंद में पुस्तक लिख दी नईका भेद .इसी काल की दूसरी रचना नगर- शोभा में बिभिन्न ब्यावसायों वर्गों ,जातियों उपजातियों की रूपसी तरुणियों के चित्र हैं ,कुजडिन का एक रूप देखिये.भांटा वरन सु कौजरी बेचै सोवा सागनीलजु भई खेलत सदा गारी दै दै फाग ,--बैगन की तरह काली कुजडिन सोवा साग बेचती है और निर्लज्ज गली दे दे कर फाग खेलती है ..इस रचना में कोई नहीं छूटा हैदफाली गाडीवान महावत नाल वन्दिनी चिरवा दारीनि,सईस ,काम ग़री ,नगारची ,बाज दारिनी ,दाव ग़री,साबुनी ग़री ,कुंडी गरिन,जिले दारी नी तक न जाने कितनी रोजगार में लगीं महिलाओं के चित्र हैं .जिले दारिनी का चित्र ..औरन को घर सघन मन चले जो घूंघट माह ,वाके रंग सुरंग को जिले दार पर छांह रुतबा तो देखिये .जिले दार बेचारा उसके बस में है,.बस आज इतना ही
बहुरि बंदि खलगन सितभायें जे बिन काज दाहिने बाएं ..तुलसी की खल वंदना के साथ रहीम का चौथा एपिसोड लिखना शुरू कर रहा हूँ .सज्जन लोग पढेंगे ,आदर करेंगे ...
अमित उदार अति पवन विचारी चारू ,जहाँ तहां आदरियो गंगा जी के नीर सों /खलन के घालिबे को खलक के पलिबे को ,खान खाना एक रामचन्द्र जी के तीर सों //गंगा जल की तरह पवित्र राम के तीर की तरह शत्रुविनाशक परन्तु जगत पलक ब्यक्तित्व को उनकी कृति में तलाश्काराने की लालसा ,ललक ,जग उठी है /रहीम ने प्रेम पंथ का एक चित्र खींचा है ..रहिमन मैं तुरंग चढी चलिबो पावक मांहिप्रेम पंथ ऐसो कठिन सब सों निबहत नाहि /घोड़े पर सवार होकर आग पर चलाना .और निबाह लेना सब के बसबूते का नहीं.रहीम जिन्दगी भर घोडेपर सवार हो कर आग में दौड़ते रहे . रहीम के काब्य तुरंग की यात्रा भी अग्नि यात्रा ही तो है .वह अग्नि है जीवन के सहज प्यार की जो कभी बड़ी सुखद कभी बड़ी दुखद रही ,पहले पड़ाव तक चढ़ती जवानी के अनुभवों से गुजरे ,पर वे भी राजसी जीवन के नहीं थे ,बिभिन्न प्रकारके सामान्य जन की मानसिक स्थितियों में प्यार के अनुभव थे ,इनमे हस -विलाश है सजाने सजाने का भाव है लालसा विदग्धता छल है मन मनौवल है प्रतीक्षा है राग रंग है ईर्ष्या है उत्कंठा है और लगन है ,कुल मिला कर लौकिक श्रृंगार की लहक्दार .ललक माय छटा है .इस काल की दो रचनाएँ हैं बरवै नईका भेद और नगर शोभा ,बरवै नईका भेदमें नायिका की बिभिन्न अवस्थाओं का चित्र है ,एक उदाहरन .-मितवा चलेऊ विदेसवा मन अनुरागि-पिय की सुरति गगरिया रहि मग लागिप्रिय की स्मृति का कलश लिए नायिका रास्ते में खड़ी हैकब प्रिय लौटेंगे और स्मृतियों का कलश उनके लिए मंगल कलश बनेगा ,दूसरा चित्र.भोरहिं बोल कोयलिया बढ़वति तापघरी एक धरि अलिया रहु चुप चाप ./रात भर स्मृतियों में खोये खोये नींद उचटी रही जरा सी आंख लगी तो कोयल सबेरे ही बोल पडी और सबेरे सबेरे ताप चढ़ गया एक घड़ी तक तो वह चुप रहती ,पहले लेखमे मैंने बताया है की अपने एक सिपाही की पत्नी के चाँद से प्रभावित हो कर रहीम ने उसे धन देकर छुट्टी भेजा और उसी छंद में पुस्तक लिख दी नईका भेद .इसी काल की दूसरी रचना नगर- शोभा में बिभिन्न ब्यावसायों वर्गों ,जातियों उपजातियों की रूपसी तरुणियों के चित्र हैं ,कुजडिन का एक रूप देखिये.भांटा वरन सु कौजरी बेचै सोवा सागनीलजु भई खेलत सदा गारी दै दै फाग ,--बैगन की तरह काली कुजडिन सोवा साग बेचती है और निर्लज्ज गली दे दे कर फाग खेलती है ..इस रचना में कोई नहीं छूटा हैदफाली गाडीवान महावत नाल वन्दिनी चिरवा दारीनि,सईस ,काम ग़री ,नगारची ,बाज दारिनी ,दाव ग़री,साबुनी ग़री ,कुंडी गरिन,जिले दारी नी तक न जाने कितनी रोजगार में लगीं महिलाओं के चित्र हैं .जिले दारिनी का चित्र ..औरन को घर सघन मन चले जो घूंघट माह ,वाके रंग सुरंग को जिले दार पर छांह रुतबा तो देखिये .जिले दार बेचारा उसके बस में है,

Friday, 10 May 2019

कौवा मामा आम गिरावो

कौवा मामा आम गिरावो हम तुम दोनों खायेंगे
चलो बजार लायेंगे दुल्हन कोने में बैठाएंगे /
कौवा बैठा पेड़ पर फुलवा पहुंची दौड़ कर
बड़ी चाव से खड़ी निहारे देवता पुरखा सभी पुकारे
मनोभाव की सरबस मारआँखों से टपकाती लार
. हाथ जोड़ कर बोली फुलवा कौवा मामा आम गिरावो
हम तुम दोनों खायेंगे चलो बजार लायेंगे दुल्हन
कोने में बैठाएंगे /
पना अमावट सपन भये सब कोइलासी नही मिलती
गिरी कटुहिली बदा न होती मुनियाँ दिन भर रोती
मंहगा महंगा आम बिक रहा कैसे हम चख पायें
दस बीघा का सोन बगीचा एक आम नहीं खाए
कौवा मामा आम गिरावो हम तुम दोनों खायेंगे
चलो बजार लायेंगे दुलहन कोने में बैठाएंगे
एक कटुहिली चोंच दबाये कौवा था कुछ ऐंठा
बड़े शान से निरख रहा था एक दल पर बैठा
सहज भाव से बोली फुलवा मामा कुछ तो बोलो
टुकुर टुकुर क्या देख रहे हो अपना मुह तो खोलो
अपनी इस गुमसुम चुप्पी काराज कोई बतलाओ
तुम्हरी बोली बड़ी मधुर है कोई गीत सुनाओ
कांव कांव कर बोला कौवा आम गिरा धरती पर
झट से लेकर भागी फलवा पैर धरे निज सर पर
भाग रही थी ऐसे जैसे सरबस मिला सहज था
थी प्रसन्न कुछ ऐसे जैसे जीवन सफल हुआ था
जोर जोर चिल्लाई फुलवा कौवा मामा आम गिरावो
हम तुम दोनों खायेंगे चलो बजार लायेंगे दुलहन ............