बसंत पंचमी से होली तक का समय भारतीय परम्परा में उद्दीपन का काल है ठूंठ भी पल्लवित हो जाते हैं ,अशोक के फूल ,बौराए आम ,कोयल की पंचम ,रक्ताभ टेसू ,मद्धिम मद्धिम फगुनहट, भ्रमर की गुनगुनाहट ,,उरठ धूप,उचटा उचटा मन सचेत संजीदा आंखे फागुन के आने के संकेत हैं ..फागुन घुस गया बाग में झरन लगे मधु गंध पोर पोर गाने लगे मॉलकौस के छंद .. ऐसे में दूर से आती हुई ढोलक की थाप के साथ होली गीत के सुर ...फागुन भर बाबा देवर लागे ......हंसी ठिठोली ..जबाब नहीं इस मौसम का ..वातावरण ही रंगीन हो तो मिजाज भी रंगीन हो जाता है ...समझने में देर नहीं लगती ..मस्ती ही मस्ती ....
जिस रोज तुम्हारी गागर से सतरंगी रंग छलक जाये
उस रोज समझना धरती पर फिर से फागुन आने वाला है /.
जब कलियों की कंचुकी स्वयं हो जाय बिलग उसके तन से ,
जब चंपा जूही की कलियाँ शरमायें भृग के नर्तन से
उस रोज समझना उपवन में ऋतुराज समाने वाला है /
जब अनचाहे कगना खनके कागा बोले जब आँगन में
जब मुरझाये मनकुसुम खिले अनगिन उमंग हो जीवन में
उस रोज समझना परदेशी प्रीतम घर आने वाला है /
जब सर से घूंघट खिसक खिसक ढल जाये तेरे मुखड़े से
तुम मुह में अंगुली तनिक दबा मुस्कवो हौले हौले से
उस रोज समझना पूनम का चंदा मुस्काने वाला है /
Monday, 13 February 2012
Sunday, 12 February 2012
आजादी के तराने (जप्त शुदा )-३ विश्व नाथ शर्मा ..१९३०
आजादी के तराने (जप्त शुदा )-३ विश्व नाथ शर्मा ..१९३०
मित्रो आपने विजयी विश्व तिरंगा प्यारा पढ़ा था अब आज पदिये एक ऐसा तराना जो मुर्दे को भी खड़ा करदेता था ,जरा इसकी भाषा पर भी ध्यान दीजिये गा यही हमारे स्वतंत्रता संग्राम की भाषा थी .यही उर्दू है जो देवनागरी में लिखी जाती थी ....
कौम के खादिम की है जागीर वन्दे मातरम
मुल्क के है वास्ते अकसीर वन्दे मातरम /
जालिमो को है उधर बन्दूक अपनी पर गुरुर
है इधर हम बे कसों का तीर बन्दे मातरम /
कत्ल कर हमको न कातिल तू हमारे खून से
तेग पर हो जायेगा तहरीर वन्दे मातरम /
जुल्म से गर कर दिया खामोश मुझको देखना
बोल उट्ठे गी मेरी तस्बीर वन्दे मातरम /
सरजमी इंग्लैण्ड की हिल जाएगी दो रोज में
गर दिखायेगी कभी तासीर वन्दे मातरम /
संतरी भी मुज्तारिब है जब की हर झंकार से
बोलती है जेल में जंजीर वन्दे मातरम /जय हिंद .वन्दे मातरम
मित्रो आपने विजयी विश्व तिरंगा प्यारा पढ़ा था अब आज पदिये एक ऐसा तराना जो मुर्दे को भी खड़ा करदेता था ,जरा इसकी भाषा पर भी ध्यान दीजिये गा यही हमारे स्वतंत्रता संग्राम की भाषा थी .यही उर्दू है जो देवनागरी में लिखी जाती थी ....
कौम के खादिम की है जागीर वन्दे मातरम
मुल्क के है वास्ते अकसीर वन्दे मातरम /
जालिमो को है उधर बन्दूक अपनी पर गुरुर
है इधर हम बे कसों का तीर बन्दे मातरम /
कत्ल कर हमको न कातिल तू हमारे खून से
तेग पर हो जायेगा तहरीर वन्दे मातरम /
जुल्म से गर कर दिया खामोश मुझको देखना
बोल उट्ठे गी मेरी तस्बीर वन्दे मातरम /
सरजमी इंग्लैण्ड की हिल जाएगी दो रोज में
गर दिखायेगी कभी तासीर वन्दे मातरम /
संतरी भी मुज्तारिब है जब की हर झंकार से
बोलती है जेल में जंजीर वन्दे मातरम /जय हिंद .वन्दे मातरम
अमीर खुसरो -५
अमीर खुसरो -५
तो मित्रों हो जाय अमीर खुसरो पर कुछ बात चीत
दिल्ली की भाषा उनके रक्त में माँ के दूध की तरह संचरित हो रही थी ,उनकी हिंदी देहलवी अर्थात कड़ी बोली का प्रारंभिक रूप ,मैंने बताया था की उनकी एक पुस्तक खालिक-बारी का उल्लेख मिलता है ,खान -ये -आरजू में भी इसका उल्लेख है,किन्तु कुछ लोग इसे प्रमाणिक नहीं मानते,,पर हम मानते हैं , खुसरो संगीत के भी जानकर थे ,वे सूफी थे ,जो गीत ,बसंत ,झूला ,सावन ,आदि से सम्बंधित है वह संगीत निबद्ध है ,हमने आप को पहेलियाँ और मुकरियों का भी अंतर बताया था .आज पहेलियाँ .
१-मुह खोले जब तिरिया आई ढीले हो गए सभी सिपाही
कोई सोना लेने जाता वह सोना आप ही आता /
२-सोने में जो देखी बात सूझे और रूप के साथ
व्यान किया जब मिल कर चार नै तरह से दिया विचार /(दोनों का उत्तर सपना ,ख्वाब )
३- सेत बरन देखी एक नारी पी के विरोग पड़ी विचारी
नक़सुक सों निकसत यक अंग प्राण गए प्रीतम के संग /(सांप केंचुली वाला )
४- गला कटे वो चूँ न करेऔर मुंह रक्त बहाय
सो प्यारी बातें करे फ़िक्र कथा दिख लाय / (पान)
मित्रों खुसरो हमारी जमीनी हकीकत रहनुमा था ,लोक का पैरोकार था,बोली भाषा का मुरीद था ,भारतीयता का पुजारी था ,जितना भी लिखा जय कम होगा/उन्हें दिल्ली छोड़ कर जाना पडा/वे हैदर बाद चले गए /हैदर बाद के लोंगो ने उन्हें सर आँखों पर बिठाया ,वहीँ रहने लगे ,उन्ही की बोली दक्खिनी हिंदी के नाम से जानी जाती है ,वे अरबी फ़ारसी और भारतीय बोलियों के जानकर थे पर लिखते देव नगरी और फ़ारसी में थे /उर्दू का जन्म बाद में हुआ /
तो मित्रों हो जाय अमीर खुसरो पर कुछ बात चीत
दिल्ली की भाषा उनके रक्त में माँ के दूध की तरह संचरित हो रही थी ,उनकी हिंदी देहलवी अर्थात कड़ी बोली का प्रारंभिक रूप ,मैंने बताया था की उनकी एक पुस्तक खालिक-बारी का उल्लेख मिलता है ,खान -ये -आरजू में भी इसका उल्लेख है,किन्तु कुछ लोग इसे प्रमाणिक नहीं मानते,,पर हम मानते हैं , खुसरो संगीत के भी जानकर थे ,वे सूफी थे ,जो गीत ,बसंत ,झूला ,सावन ,आदि से सम्बंधित है वह संगीत निबद्ध है ,हमने आप को पहेलियाँ और मुकरियों का भी अंतर बताया था .आज पहेलियाँ .
१-मुह खोले जब तिरिया आई ढीले हो गए सभी सिपाही
कोई सोना लेने जाता वह सोना आप ही आता /
२-सोने में जो देखी बात सूझे और रूप के साथ
व्यान किया जब मिल कर चार नै तरह से दिया विचार /(दोनों का उत्तर सपना ,ख्वाब )
३- सेत बरन देखी एक नारी पी के विरोग पड़ी विचारी
नक़सुक सों निकसत यक अंग प्राण गए प्रीतम के संग /(सांप केंचुली वाला )
४- गला कटे वो चूँ न करेऔर मुंह रक्त बहाय
सो प्यारी बातें करे फ़िक्र कथा दिख लाय / (पान)
मित्रों खुसरो हमारी जमीनी हकीकत रहनुमा था ,लोक का पैरोकार था,बोली भाषा का मुरीद था ,भारतीयता का पुजारी था ,जितना भी लिखा जय कम होगा/उन्हें दिल्ली छोड़ कर जाना पडा/वे हैदर बाद चले गए /हैदर बाद के लोंगो ने उन्हें सर आँखों पर बिठाया ,वहीँ रहने लगे ,उन्ही की बोली दक्खिनी हिंदी के नाम से जानी जाती है ,वे अरबी फ़ारसी और भारतीय बोलियों के जानकर थे पर लिखते देव नगरी और फ़ारसी में थे /उर्दू का जन्म बाद में हुआ /
Saturday, 11 February 2012
मायाराम सुरजन ट्रस्ट द्वारा आयोजित "संबाद" कार्यक्रम में बच्चों को संबोधित बक्तब्य का अंश
मायाराम सुरजन ट्रस्ट द्वारा आयोजित "संबाद" कार्यक्रम में बच्चों को संबोधित बक्तब्य का अंश. देवता और राक्षस दो छोर हैं दोनों के ही पास ढेर सारा धन और सत्ता है हम धन या सत्ता से देवताओं के सामान विलासी और राक्षसों के सामान दुष्ट बन सकते हैं पर अच्छा इन्सान नहीं /निश्चित रूप से धन सब कुछ नहीं है /अच्छा इन्सान बनाने के लिए तो बिलकुल जरूरी नहीं है /जीवन की आप धापी में माता पिता को बच्चों के लिए समय देना जरूरी है /आज लोग यह नहीं सोचते की बच्चे अच्छे इन्सान बने /वह क्या बने माता पिता तय करते हैं /यह गलत है आप अच्छा इन्सान बनाइये बाकि उन्हें बनाने दीजिये इसपर विचार किया जाना चाहिए /यह टालने का विषय नहीं है /अभिभावक विचार करें/
साहित्य हमारे रोजमर्रा के जीवन में है ,माँ का प्यार /चिड़ियों की चहचहाहट ,सूरज का उगाना ,तारों का टिमटिमाना ,चंद्रमा की कलाएं ,हवा की रुनझुन ,पत्तों का खड़कना ,पानी बरसना ,इन सब से साहित्य ही निकलता है ,अगर आप ने सूरज को उगते चंद्रमा को चमकते नहीं देखा, पेड़ से आम नहीं तोडा ,कदम की डाल तक हाथ नहीं बढाया ,बरसते पानी में नहीं भीगा ,बूंदों का संगीत नहीं सुना ,तो समझ लीजिये की आप मनुष्य होने के असली सुख से वंचित हैं ,यही तो संगीत साहित्य और कला के जनक हैं ,बचपन के झगड़ों ,और लड़कपन के अपने सुख हैं इसी लिए सूर की पंक्ति -मैया मोरी मै नहीं माखन खायो .आज भी हमें अच्छा लगता है/ , मनुष्य के तीन मन होते हैं तीसरा अचेतन मन ही हमें झिंझोड़ता है ,जगाता है ,पश्चाताप कराता है ,पश्चताप सबसे बड़ा सदगुण है /तीसरे मन की बात सुनाने की कोशिस करनी चाहिए /अच्छा बनाने का यही उपाय है /
साहित्य हमारे रोजमर्रा के जीवन में है ,माँ का प्यार /चिड़ियों की चहचहाहट ,सूरज का उगाना ,तारों का टिमटिमाना ,चंद्रमा की कलाएं ,हवा की रुनझुन ,पत्तों का खड़कना ,पानी बरसना ,इन सब से साहित्य ही निकलता है ,अगर आप ने सूरज को उगते चंद्रमा को चमकते नहीं देखा, पेड़ से आम नहीं तोडा ,कदम की डाल तक हाथ नहीं बढाया ,बरसते पानी में नहीं भीगा ,बूंदों का संगीत नहीं सुना ,तो समझ लीजिये की आप मनुष्य होने के असली सुख से वंचित हैं ,यही तो संगीत साहित्य और कला के जनक हैं ,बचपन के झगड़ों ,और लड़कपन के अपने सुख हैं इसी लिए सूर की पंक्ति -मैया मोरी मै नहीं माखन खायो .आज भी हमें अच्छा लगता है/ , मनुष्य के तीन मन होते हैं तीसरा अचेतन मन ही हमें झिंझोड़ता है ,जगाता है ,पश्चाताप कराता है ,पश्चताप सबसे बड़ा सदगुण है /तीसरे मन की बात सुनाने की कोशिस करनी चाहिए /अच्छा बनाने का यही उपाय है /
Friday, 10 February 2012
अमीर खुसरो 5
अमीर खुसरो भारतीय साहित्य ही नहीं भारतीय समाज की भी धरोहर हैं .,उन्होंने हमारी गंगाजमुनी समृद्ध संस्कृति की तहजीब को भाषा का मुहाबरा दिया /वे जन नायक थे /उन्हें घर घर में पहचाना जाता था /घर घर उनकी स्वीकृति थी /सम्मान था आज तक कोई इतना स्वीकृत नहीं हुआ ,एक दिन खुसरो किसी गाँव से गुजर रहे थे उन्हें प्यास लगी थी पनघट पर औरतों को पानी भरता देख कर वे उसी और मुड गए /पानी हरिनियाँ उन्हें पहचान गईं /सबने उन्हें खूब तंग किया /ठिठोली की /कोई बोले चलनी पर कविता कहो कोई मौनी पर, कोई दौरी पर,कोई खांची , कोई जांता, कोई चक्की,कोई कुत्ता, कोई आंटा कोइ खीर कोई चरखा सब की अलग अलग फरमाइस खुसरो ने सभी को एक में लपेट दिया पानी पिया चलते बने ..इसी को मुकरी कहते हैं मुकरियों और पहेलियों में अंतर है /
*मुकरी
१-खीर पकाई, जतन से ,चरखा दिया चलाय आया कुत्ता खा गया तू बैठा ढोल बजे
२-दौरी थी पिय मिलन को खांची मन में रेख,
अब मौनी क्यों हो गयी चल नीके कै देख
मैंनेअपनी पुस्तक 'काल कलौती' में लिखा था
पनघट पर पनिहारिनी मटकें फंस जाय कोई खुसरो
लिखदे कुछ कुछ नै मुकरियां कास दे कोई फिकरो /
उपरोक्त नंबर दो फिक्र है /नंबर एक मुकरी
*पहेली
बिरह का मारा गया चमन में इश्क छाना है स्याह बरन में
जोर गुलों के सहता है पर बोले बिन नहीं रहता है (भँवरा )
आग लगे फुनग सों और जल गई वाकी जड़
एक बिरवा निख बोलता सो बूझान हरा नर (हुक्का )
मेरा ख्याल है की आज के लिए बस करें कल फिर...क्रमशः
*मुकरी
१-खीर पकाई, जतन से ,चरखा दिया चलाय आया कुत्ता खा गया तू बैठा ढोल बजे
२-दौरी थी पिय मिलन को खांची मन में रेख,
अब मौनी क्यों हो गयी चल नीके कै देख
मैंनेअपनी पुस्तक 'काल कलौती' में लिखा था
पनघट पर पनिहारिनी मटकें फंस जाय कोई खुसरो
लिखदे कुछ कुछ नै मुकरियां कास दे कोई फिकरो /
उपरोक्त नंबर दो फिक्र है /नंबर एक मुकरी
*पहेली
बिरह का मारा गया चमन में इश्क छाना है स्याह बरन में
जोर गुलों के सहता है पर बोले बिन नहीं रहता है (भँवरा )
आग लगे फुनग सों और जल गई वाकी जड़
एक बिरवा निख बोलता सो बूझान हरा नर (हुक्का )
मेरा ख्याल है की आज के लिए बस करें कल फिर...क्रमशः
आजादी के जप्त शुदा तराने ..२
तो पहले आजादी के जप्त शुदा तराने ..२
आजादी के जप्त तरानों का संकलन १९ ७६ में किया था .जो हिंदी अंग्रेजी मराठी बंगाली उड़िया गुजराती ,उर्दू में प्रकाशित है ...
आज झंडा गीत.लेखक ......श्यामलाल गुप्त पार्षद
विजयी विश्व तिरंगा प्यारा झंडा ऊँचा रहे हमारा
सदा शक्ति बरसाने वाला प्रेम शुदा सरसाने वाला
वीरों को हरसाने वाला मत्री भूमि का तन मन सारा //
स्वतंत्रता के भीषण रन में लाख कर बढे जोश क्षण क्षण में
कांपे शत्रु देख कर मन में मिट जाये भय संकट सारा //
इस झंडे के नीचे निर्भय लें स्वराज्य यह अविचल निश्चय
बोलेन भारत माता की जय स्वतंत्रता हो ध्येय हमारा //
आओ प्यारे बीरों आओ देश द्गार्म पर बलि बलि जाओ
एक साथ सब मिल कर गाओप्यारा भारत देश हमारा //
इसकी शान न जाने पाए चाहे जन भले ही जाये
विश्व विजय करके दिखलायें तब होवे प्राण पूर्ण हमारा //
विजी विश्व तिरंगा प्यारा ,झंडा ऊँचा रहे हमारा ......
आजादी के जप्त तरानों का संकलन १९ ७६ में किया था .जो हिंदी अंग्रेजी मराठी बंगाली उड़िया गुजराती ,उर्दू में प्रकाशित है ...
आज झंडा गीत.लेखक ......श्यामलाल गुप्त पार्षद
विजयी विश्व तिरंगा प्यारा झंडा ऊँचा रहे हमारा
सदा शक्ति बरसाने वाला प्रेम शुदा सरसाने वाला
वीरों को हरसाने वाला मत्री भूमि का तन मन सारा //
स्वतंत्रता के भीषण रन में लाख कर बढे जोश क्षण क्षण में
कांपे शत्रु देख कर मन में मिट जाये भय संकट सारा //
इस झंडे के नीचे निर्भय लें स्वराज्य यह अविचल निश्चय
बोलेन भारत माता की जय स्वतंत्रता हो ध्येय हमारा //
आओ प्यारे बीरों आओ देश द्गार्म पर बलि बलि जाओ
एक साथ सब मिल कर गाओप्यारा भारत देश हमारा //
इसकी शान न जाने पाए चाहे जन भले ही जाये
विश्व विजय करके दिखलायें तब होवे प्राण पूर्ण हमारा //
विजी विश्व तिरंगा प्यारा ,झंडा ऊँचा रहे हमारा ......
आजादी के जप्तशुदा तराने
मित्रों अमीर खुसरो पर जो मुझे आता है या जो सामग्री मेरे पास है वह तो फेस बुक पर /ब्लाग में भी आप के लिए जारी है /आज से एक नई सीरीज और शुरू कर रहा हूँ.... आजादी के जप्तशुदा तराने .....कुछ पुराने लेखकों /कवियों/ शायरों की ऐसी रचनाएँ जिनको नई पीढ़ी नहीं पढ़ पाई/उन्ही के लिए .अनेक भाषाओँ /जातियों और धर्मो से मिलकर बनी हमारी संमृद्ध संस्कृति में आजादी के तराने गूंजते रहे हैं ..,,
१-- असगर १९३०--.
मुर्ग दिल मत रो यहाँ आंसू बहाना है मना ,अद्लीबों को कफस में चहचहानाहै मना हाय!जल्लादी तो देखो कहरहा सैय्याद ये वक्ते-जिबह बुलबुलों को फडफडाना है मना
वक्ते -जिबह मुर्ग को भी देते है पानी पिला हजरते इन्सान को पानी पिलाना मना है
मेरे खूं से हाथ रंग कर बोले क्या अच्छा है रंग अब हमें तो उम्र भर मरहम लगाना मना है
ऐ मेरे जख्मे-जिगर !नासूर बनाना है तोबन क्या करूँ इस जख्म पर मरहम लगना मना है
खूं दिल पीते हैं"असगर"खाते हैं लख्ते-जिगर इस कफस में कैदियों को आबोदाना है मना है
ये ओ तराने है जो जब्त शुदा रहे जिनके गाने पर प्रति बन्ध था /क्रमशः जारी रहेगा ..कैसा लगता है जरूर लिखे .
१-- असगर १९३०--.
मुर्ग दिल मत रो यहाँ आंसू बहाना है मना ,अद्लीबों को कफस में चहचहानाहै मना हाय!जल्लादी तो देखो कहरहा सैय्याद ये वक्ते-जिबह बुलबुलों को फडफडाना है मना
वक्ते -जिबह मुर्ग को भी देते है पानी पिला हजरते इन्सान को पानी पिलाना मना है
मेरे खूं से हाथ रंग कर बोले क्या अच्छा है रंग अब हमें तो उम्र भर मरहम लगाना मना है
ऐ मेरे जख्मे-जिगर !नासूर बनाना है तोबन क्या करूँ इस जख्म पर मरहम लगना मना है
खूं दिल पीते हैं"असगर"खाते हैं लख्ते-जिगर इस कफस में कैदियों को आबोदाना है मना है
ये ओ तराने है जो जब्त शुदा रहे जिनके गाने पर प्रति बन्ध था /क्रमशः जारी रहेगा ..कैसा लगता है जरूर लिखे .
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