Friday, 31 May 2019

अब्दुल रहीम खानखाना .


अब्दुल रहीम खानखाना .अकबर के नौ रत्नों में सबसे नायब हीरा ,एक अद्भुत व्यक्ति .इतना बड़ा शूरमा की १६ से ७२ वर्ष की उम्र तक लडाइयां ही लड़ता और जीतता रहा /इतना बड़ा दानी की किसी ने कहा की मैंने एक लाख अशर्फियाँ एक साथ देखी नहीं.. तोउसे एक लाख अशर्फियाँ दे दी.. विनम्रता इतनी की देने के बाद भी शर्मिंदा थे ...देते समय उनकी आखे नीचे थीं ,किसी ने आँखे नीचे होने का कारन पूछा तो कहा .
देन हार कोई और है भेजत है दिन रैन
लोग भरम हमपर धरें यातें नीचे नैन ..
सहृदय ऐसे की एक सिपाही की स्त्री के एक बर्वे पर प्रसन्न हो गए ;-
प्रेम प्रीति को बिरवा चलेहु लगाय
सींचनि की सुधि लीजै मुरझ न जांय.
और सिपाही को धन धन्य देकर उसकी नवागत बधू के पास भेज दिया .और इसी चाँद पर एक पूरा ग्रन्थ ही लिख डाला
गुण के ग्राहक ऐसे की अरबी/फ़ारसी ,हिन्दी के अनेक रचना कार इनके मित्र थे.
चरित्रवान इतने की रूपवती के प्रणय निवेदन के कथन ..की मुझे अपने जैसा पुत्र दे दो .पर अपना सर उसकी गोद में डाल दिया ..माँ कहकर
.तुलसी के मित्र थे .अकबर के विस्वास पात्र थे .जहाँगीर और शाहजहाँ के द्वन्द में इस कदर फंसे की पिस गए .जेल में डाल दिए गए उनके पुत्र दरब खान का सर काट कर उनके पास भेज दिया गया .उनके पूरे परिवार को जालिमो ने मार दिया फिर भी स्वाभि मान नहीं छोड़ा ...
रहिमन मोहि न सुहाय अमिय पियावै मान बिन
.बरु विष देई बुलाय मान सहित मरिबो भलो .
और प्रेमी इतने गहरे की ..
अंतर दाव लगी रहे धुंवा न प्रगट सोय
कई जिय जाने आपनो या सर बीती होय ..
जे सुलगे ते बुझ गए बुझे ते सुलगे नाहि
रहिमन दाहे प्रेम के बुझी बुझी के सुल गाहि ..
भक्त ऐसे की कृष्ण मय हो गए कवियों ने लिखा कोटिन हिन्दू वारिये मुस्लमान हरि जनन पर ,.कुल मिला कर एक ऐसा व्यक्तित्व
जिसे पढ़ कर आप पूरी एक कौम के बारे में अपनी जान कारी को अधूरी मानने पर विवास होंगे ..
कल से आगे ..कल के लेख में अशुद्धियाँ थीं बाद में दूर किया अब नही हैं .आज कोशिस की है की अशुद्ध न हो फिर भी होगा ही ..आज और अच्छा बना है पढ़िए
रहीम को पढ़ते समय मुझे लगा की उनका पूरा जीवन -राजसी विलास का रहा हो ,.दर दर,मारे मारे फिरने का रहा हो, युद्ध और फतह का रहा हो ,राजा, के क्रोध काल का हो ,कुचाली दोस्तों के विश्वास घातके समय का रहा हो, एक आंवा था जो भीतर ही दहक रहा था /
रहीम के बारे में एक कहानी मिलती है की तान सेन ने अकबर के दरबार में एक पद गाया, जो इस प्रकार था .
जसुदा बार बार यों भाखै है
कोऊ ब्रज में हितू हमारो चलत गोपालहिं राखै ...
और अकबर ने अपने सभा सदों से इसका अर्थ कहने को कहा ,
तनसेन ने कहा --यशोदा बार बार अर्थात पुनः पुनः यह पुकार लगाती है की है कोई ऐसा हितू जो ब्रज में गोपाल को रोक ले .
शेख फैजी ने अर्थ कहा ....बार बार का मतलब ..रो रो कर रट लगाती है .बीरबल ने कहा बार बार का अर्थ है द्वार द्वार जाकर यशोदा पुकार लगाती है ...खाने आजम कोका ने कहा बार का अर्थ दिन है और यशोदा प्रतिदिन यही रटती रहती है .अब रहीम की बरी थी .उन्होंने अर्थ कहा ...तानसेन गायक हैं इनको एक ही पद को अलापना रहता है इस लिए उन्हों ने बार बार का अर्थ पुनुरुक्ति किया शेख फैजी फ़ारसी का शायर हैं इन्हें रोने के सिवा कोई काम नहीं .राजा बीर बल द्वार द्वार घूमने वाले ब्राम्हण हैं इसलिए इनका बार बार का अर्थ द्वार द्वार ही उचित है, खाने आजम कोका नजूमी (ज्योतिषी) हैं उन्हें तिथि बार से ही वास्ता पड़ता है इसलिए बार बार का अर्थ उन्होंने दिन दिन किया ,.
पर हुजूर वास्तविक अर्थ यह है की
यशोदा का बार बारअर्थात रोम रोम पुकारता है की कोई तो मिले जो मेरे गोपाल को ब्रज में रोक ले .इस ब्य्ख्या से रहीम की विद्ग्घ्ता और साहित्य की समझ का पता चलता है
इस से रहीम के उस गहरे हिन्दुस्तानी रंग का पता चलता है जो रोमांच को सात्विक भाव मानता हैऔर रोम रोम में ब्रम्हांड देखता . जो शरीर के रोम जैसे अंग को भी प्राणों का सन्देश वाहक मानता है जो वनस्पति मात्र को विरत अस्तित्व का रोमांच मानता है रहीम का जीवन एक पूरा दुखांत नाटक है .जिसमे बहुत से उतर चढाव हैं .महात्मा तुलसी से उनकी प्रगाढ़ मित्रता थी .बाप बैरम खान अकबर की ही तरह तुर्किस्तान के एक बहुत बड़े कबीले के सरदार थे वे सोलह वर्ष की आयु से ही हुमायू के साथ रहे .उन्ही की कूबत थी की हुमयू को फिर से दिल्ली की राजगद्दी पर बिठाया ,हुमायूँ के मरने पर वे ही अकबर के अभिभावक बनगए.जिस साल हुमायूँ मरे उसी साल लाहौर में रहीम का जन्म हुआ .रहीम की माँ अकबर की मौसी थीं .अकबर से दूसरा रिश्ता भी था ,बैरम खान की दूसरी शादी बाबर की नतिनी सलीमा बेगम सुल्ताना से हुई थी .बैरम खान के मरने के बाद अकबर के साथ सलीमा का पुनर्विवाह हुआ ,पर भाग्य का खेल ,चुगुल खोरों ने बैरम खान और अकबर के बीच भेद की गहरी खाई खोद दी .बैतररम खान ने विद्रोह किया परास्त हुए ,उन्हें हज करने जाने की सजा मिली.वे गुजरात पहुंचे थे की उनका डेरा लुट गया बैरम खान का क़त्ल हो गया ,बफदारों ने ओ परिवार बचाया ,चार वर्ष के रहीम बारह वर्ष की सलीमा सुल्ताना बेगम .अहमद बाद पहुंचे .जब रहीम पांच वर्ष के थे तभी अकबर ने उन्हें अपने संरक्षण में ले लिया .शिक्षा दीक्षा कराई.बड़े सरदार मिर्जा अजीज कोकलताश की बहन माह बनू बेगम से निकाह करवाया .उन्नीस वर्ष की आयु में गुजरात का युद्ध जीत कर वहा के सूबेदार बने ....
वे तुलसी के परम मित्र थे .और तुलसी को बेहतरीन इंसान मानते थे ..
सुरतिय नर तिय नागतिय सब चाहत अस होय
गोद लिए हुलसी फिरें तुलसी सों सूत होय
और रामचरित मानस को बेहतरीन ग्रन्थ ........
राम चरित मांनस विमल सब ग्रंथन को सार
हिंदुआं को वेद सैम तुरकन प्रकट कुरान ....
कबीर तुलसी रहीम और रसखन मध्यकाल के चार बेहतरीन इंसान ..कबीर संत थे एक बेहतरीन इंसान थे .अनपढ़ गृहस्त थे .जाति पांति धन धर्म से परे थे .मन से साफ़ थे .कबीर की भाषा आम आदमी की भाषा थी.वे लिखते नहीं थे केवल बोलते थे लोक जीवन के बहुत नजदीक थे .उनके प्रतीक दृष्टान्त लोक जीवन से आते थे . वे राम नाम जपते जरुर थे पर पूजा और आडम्बर के विरोधी थे उनके राम दशरथ के बेटे राम नही थे .इस धरती पर कबीर से बड़ा कोई इन्सान पैदा ही नहीं हुआ ,एक मुकम्मल इन्सान क्या होता है जानने के लिए हर किसी को कबीर पढ़ना चाहिए .अनगढ़ ,सहज ,भीतर- बाहर एक ,निर्भय ,आस्थावान ,जागृत विवेक .बिना पढ़े पूरी तरह ज्ञानी ,प्रेमानुभूति की पराकाष्ठा को समझाने वाला .मनुष्यता का रक्षक ,जागृत ,त्यागी गृहस्थ ,मनुष्यता की रक्षा के लिए भगवान से भी मुठभेड़ करने को आमादा ,जीवन और जगत को पूरी तरह समझाने वाला ,उसकी नश्वरता का गायक .मनुष्य इस धरती पर दूसरा कोई नहीं ...कबीर को जानना एक तपस्या है .उसे समझना मनुष्य बनने के रस्ते में एक सफल कदम है, उसे जीना ही मनुष्य होना है .कबीर सत्य है, कबीर नित्य है, कबीर .लोक है ,कबीर लोक राग है ,कबीर जिजीविषा है ..अपने लोक को ,अपने लोकराग को .अपने सत्य को अपने नित्य में जी पाना ही कबीर होना है .उसे पढ़ना एक रोमांच है .उसे समझना ब्रम्ह को ,प्राणी को जानना है ,उसे जीना एक ताकत है ,कबीर जीवन की हिम्मत है .जीवन की कला है ..आज कबीर की ही सबसे जादा जरूरत है . कबीर धर्म की ब्याख्या है .कबीर कर्म का प्रमाण है .वह निष्काम कर्मयोगी गृहस्थ ...वेद की ब्याख्या है .पुरानो की समीक्षा है वेदांत दर्शन का निचोड़ है ....तुलसी महात्मा थे . भक्त थे . पढ़े लिखे थे . गृहस्त नहीं थे .पर संत नहीं थे .उन्हों ने अपने काम को पीटपीट के राम बना दिया था .और राम के परम भक्त थे.संस्कृत के विद्वान थे पर अवधी में लिखते थे वे.उनमे भी वे सारे गुण थे जो कबीर में थे बल्कि वे पढ़े लिखे थे पुरानो के जादा नजदीक थे परन्तु वेद वेदांत के ज्ञाता थे . रहीम .के परम मित्र थे .और रहीम तुलसी को बेहतरीन इंसान मानते थे ..
सुरतिय नर तिय नागतिय सब चाहत अस होयगोद लिए हुलसी फिरें तुलसी सों सूत होय
और रामचरित मानस को बेहतरीन ग्रन्थ ........
राम चरित मांनस विमल सब ग्रंथन को सांन हिंदुअन को वेद सम तुरकन प्रकट कुरान ....
रहीम अकबर के दरबारी थे तुलसी नही थे .हाँ अकबर ने चाहा था पर तुलसी ने अकबर को सीधा सा जबा दे दिया था .. होऊं चाकर रघुबीर को पटो लिखो दरबार .तुलसी अब का होंही गे नर के मंसब दार ...मतलब हिम्मती थे निडर थे ब्राम्हण थे .लिखते अवधी में थे . लोक जीवन के बहुत नजदीक थे .उनके प्रतीक दृष्टान्त लोक जीवन से आते थे .रहीमऔर तुलसी दोनों समकालीन थे.रहीम संस्कृत अवधि अरवी फारसी के जानकार थे .सभी भाषाओं का आदर करते थे सभी में लिखते थे .वे मुसलमान थे पर भक्त थे .राम के भी और कृष्ण के भी .कृष्ण के एक परम भक्त और थे रसखान .इन पर फिर कभी ..हाँ तो मैं कह रहा था की तुलसी ने कभी मुस्लिम धर्म की कोई बात नहीं की .अरवी और फारसी की चर्चा तक नहीं की ...रहीम अरवी फारसी के साथ हिन्दवी में भी लिखते रहे और नमाज के साथ साथ पूजा भी करते रहे .वे दरबारी थे .शासक थे तलवार के धनी थे फिर भी भक्त थे .महात्मा थे संत थे .उदार थे ..उन्हों ने तुलसी और मांनस दोनों की प्रशंसा की .पर तुलसी ने ऐसा कहीं नहीं किया कभी नहीं किया .एक बार भी रहीम का जिक्र नही किया अरवी फारसी का नाम तक नहीं लिया प्रशंसा की तो बात ही छोडिये .इसी लिए मैंने कहा तुलसी संत नहीं थे .उनमें हिंदुत्व .और हिंदी संकृत प्रेम तो होना लाजमी था पर अरवी फारसी को जानने की ललक भी नहीं थी यह समझ से परे है .सम्मान तो जाने दीजिये .रहीं म तो अपने को भक्त कहलाने में खुस थे पर तुलसी इस दिशा में मौन ही रहे.बाबा तुलसी दास ने मानस लिख कर राम को स्थापित किया .हिन्दुओं को संगठित किया .लेकिन अपने सम्पूर्ण लेखन में देशकी अधी जनसंख्या का कोई उल्लेख नहीं किया .शैव ,वैष्णव, स्मार्त, साधू ,संत ,योगी ,गृहस्त ऊँचनीच का भेद भाव त्याग कर एक होने और लड़ाई ख़तम करने की बात की .किन्तु उन्हों ने कहीं भी .हिन्दू मुसलमान ,अवधि फारसी संस्कृत और अरबी,की बात नहीं की ,बौद्धों की बात नहीं की जैनियों की बात नहीं की .मतलब वे हिन्दुओं को संगठित करते रहे ,पर मुसलमान बौद्ध ,जैन की चिंता नहीं की ..अवधी में लिखते रहे ..पर .अरबी और फारसी ..तथा अन्य बोलियों की चर्चा नहीं की ...जब की उस समय की सबसे बड़ी जरुरत यही थी ..आमिर खुसरो ,कबीर ,जायसी .रहीम ,रसखान ..जैसे नायक .हिन्दू मुसलमान .और भाषा की समस्या से दो चार होते रहे ..रहीम जैसे .रसखान जैसे विद्वानों ने कृष्ण भक्ति की प्रन्संशा की .रहीम ने तो तुलसी दास और मानस तक की प्रसंशा की ..पर तुलसी ने ऐसा कभी नहीं किया ..आखिर तुलसी दास ने ऐसा क्यों किया ..यह प्रश्न मेरे दिमाग को परेशान करता है .कोई भी बड़ा रचना कार अपने युग से उस काल की सबसे बड़ी समस्या से मुह मोड़ कर कैसे रह सकता है .बड़ी बड़ी लडाइयां हो रहीं थीं अकबर ने तोडर मल ने सभी ने हिन्दू मुसलमान को एक करने की कोशिस की .अकबर ने तो दीनेइलाही .लिखा .पर तुलसी ने इस दिशा में मौन क्यों साधे रखा ... .इस मायने में रहीम और रसखान दोनों कबीर की तरह तुलसी से बहुत आगे रहे .मैं तो सोचता हूँ की अगर तुलसी ने रहीम और रसखान की तरह का आचरण किया होता तो शायदहमारी बहुत बड़ी समस्या ख़त्म हो जाती कम से कम उर्दू भाषा का जन्म तो नहीं होता .इस मायने में आमिर खुसरो की भी चर्चा कभी करूँगा . आज इतना ही ..
बहुरि बंदि खलगन सितभायें जे बिन काज दाहिने बाएं ..तुलसी की खल वंदना के साथ रहीम का चौथा एपिसोड लिखना शुरू कर रहा हूँ .सज्जन लोग पढेंगे ,आदर करेंगे ...
अमित उदार अति पावन विचारी चारू ,जहाँ तहां आदरियो गंगा जी के नीर सों /खलन के घालिबे को खलक के पलिबे को ,खान खाना एक रामचन्द्र जी के तीर सों //गंगा जल की तरह पवित्र राम के तीर की तरह शत्रु विनाशक परन्तु जगत पालक ब्यक्तित्व को उनकी कृति में तलाश क रने की लालसा ,ललक ,जग उठी है /
रहीम ने प्रेम पंथ का एक चित्र खींचा है ..रहिमन मैं तुरंग चढी चलिबो पावक मांहिप्रेम पंथ ऐसो कठिन सब सों निबहत नाहि /घोड़े पर सवार होकर आग पर चलाना .और निबाह लेना सब के बसबूते का नहीं.रहीम जिन्दगी भर घोडेपर सवार हो कर आग में दौड़ते रहे . रहीम के काब्य तुरंग की यात्रा भी अग्नि यात्रा ही तो है .वह अग्नि है जीवन के सहज प्यार की जो कभी बड़ी सुखद कभी बड़ी दुखद रही ,पहले पड़ाव तक चढ़ती जवानी के अनुभवों से गुजरे ,पर वे भी राजसी जीवन के नहीं थे ,बिभिन्न प्रकारके सामान्य जन की मानसिक स्थितियों में प्यार के अनुभव थे ,इनमे हांस -विलाश है सजने सजाने का भाव है लालसा विदग्धता छल है मान मनौवल है प्रतीक्षा है राग रंग है ईर्ष्या है उत्कंठा है और लगन है ,कुल मिला कर लौकिक श्रृंगार की लहक दार .ललक मय छटा है .इस काल की दो रचनाएँ हैं बरवै नईका भेद और नगर शोभा ,बरवै नईका भेदमें नायिका की बिभिन्न अवस्थाओं का चित्र है ,एक उदाहरन .-मितवा चलेऊ विदेसवा मन अनुरागि-पिय की सुरति गगरिया रहि मग लागिप्रिय की स्मृति का कलश लिए नायिका रास्ते में खड़ी है कब प्रिय लौटेंगे और स्मृतियों का कलश उनके लिए मंगल कलश बनेगा , दूसरा चित्र.भोरहिं बोल कोयलिया बढ़वति तापघरी एक धरि अलिया रहु चुप चाप ./रात भर स्मृतियों में खोये खोये नींद उचटी रही जरा सी आंख लगी तो कोयल सबेरे ही बोल पडी और सबेरे सबेरे ताप चढ़ गया एक घड़ी तक तो वह चुप रहती ,पहले लेखमे मैंने बताया है की अपने एक सिपाही की पत्नी के चाँद से प्रभावित हो कर रहीम ने उसे धन देकर छुट्टी भेजा और उसी छंद में पुस्तक लिख दी नईका भेद .इसी काल की दूसरी रचना नगर- शोभा में बिभिन्न ब्यावसायों वर्गों ,जातियों उपजातियों की रूपसी तरुणियों के चित्र हैं ,कुजडिन का एक रूप देखिये.भांटा वरन सु कौजरी बेचै सोवा सागनीलजु भई खेलत सदा गारी दै दै फाग ,--बैगन की तरह काली कुजडिन सोवा साग बेचती है और निर्लज्ज गली दे दे कर फाग खेलती है ..इस रचना में कोई नहीं छूटा हैदफाली गाडीवान महावत नाल वन्दिनी चिरवा दारीनि,सईस ,काम ग़री ,नगारची ,बाज दारिनी ,दाव ग़री,साबुनी ग़री ,कुंडी गरिन,जिले दारी नी तक न जाने कितनी रोजगार में लगीं महिलाओं के चित्र हैं .जिले दारिनी का चित्र ..औरन को घर सघन मन चले जो घूंघट माह ,वाके रंग सुरंग को जिले दार पर छांह रुतबा तो देखिये .जिले दार बेचारा उसके बस में है,.बस आज इतना ही
बहुरि बंदि खलगन सितभायें जे बिन काज दाहिने बाएं ..तुलसी की खल वंदना के साथ रहीम का चौथा एपिसोड लिखना शुरू कर रहा हूँ .सज्जन लोग पढेंगे ,आदर करेंगे ...
अमित उदार अति पवन विचारी चारू ,जहाँ तहां आदरियो गंगा जी के नीर सों /खलन के घालिबे को खलक के पलिबे को ,खान खाना एक रामचन्द्र जी के तीर सों //गंगा जल की तरह पवित्र राम के तीर की तरह शत्रुविनाशक परन्तु जगत पलक ब्यक्तित्व को उनकी कृति में तलाश्काराने की लालसा ,ललक ,जग उठी है /रहीम ने प्रेम पंथ का एक चित्र खींचा है ..रहिमन मैं तुरंग चढी चलिबो पावक मांहिप्रेम पंथ ऐसो कठिन सब सों निबहत नाहि /घोड़े पर सवार होकर आग पर चलाना .और निबाह लेना सब के बसबूते का नहीं.रहीम जिन्दगी भर घोडेपर सवार हो कर आग में दौड़ते रहे . रहीम के काब्य तुरंग की यात्रा भी अग्नि यात्रा ही तो है .वह अग्नि है जीवन के सहज प्यार की जो कभी बड़ी सुखद कभी बड़ी दुखद रही ,पहले पड़ाव तक चढ़ती जवानी के अनुभवों से गुजरे ,पर वे भी राजसी जीवन के नहीं थे ,बिभिन्न प्रकारके सामान्य जन की मानसिक स्थितियों में प्यार के अनुभव थे ,इनमे हस -विलाश है सजाने सजाने का भाव है लालसा विदग्धता छल है मन मनौवल है प्रतीक्षा है राग रंग है ईर्ष्या है उत्कंठा है और लगन है ,कुल मिला कर लौकिक श्रृंगार की लहक्दार .ललक माय छटा है .इस काल की दो रचनाएँ हैं बरवै नईका भेद और नगर शोभा ,बरवै नईका भेदमें नायिका की बिभिन्न अवस्थाओं का चित्र है ,एक उदाहरन .-मितवा चलेऊ विदेसवा मन अनुरागि-पिय की सुरति गगरिया रहि मग लागिप्रिय की स्मृति का कलश लिए नायिका रास्ते में खड़ी हैकब प्रिय लौटेंगे और स्मृतियों का कलश उनके लिए मंगल कलश बनेगा ,दूसरा चित्र.भोरहिं बोल कोयलिया बढ़वति तापघरी एक धरि अलिया रहु चुप चाप ./रात भर स्मृतियों में खोये खोये नींद उचटी रही जरा सी आंख लगी तो कोयल सबेरे ही बोल पडी और सबेरे सबेरे ताप चढ़ गया एक घड़ी तक तो वह चुप रहती ,पहले लेखमे मैंने बताया है की अपने एक सिपाही की पत्नी के चाँद से प्रभावित हो कर रहीम ने उसे धन देकर छुट्टी भेजा और उसी छंद में पुस्तक लिख दी नईका भेद .इसी काल की दूसरी रचना नगर- शोभा में बिभिन्न ब्यावसायों वर्गों ,जातियों उपजातियों की रूपसी तरुणियों के चित्र हैं ,कुजडिन का एक रूप देखिये.भांटा वरन सु कौजरी बेचै सोवा सागनीलजु भई खेलत सदा गारी दै दै फाग ,--बैगन की तरह काली कुजडिन सोवा साग बेचती है और निर्लज्ज गली दे दे कर फाग खेलती है ..इस रचना में कोई नहीं छूटा हैदफाली गाडीवान महावत नाल वन्दिनी चिरवा दारीनि,सईस ,काम ग़री ,नगारची ,बाज दारिनी ,दाव ग़री,साबुनी ग़री ,कुंडी गरिन,जिले दारी नी तक न जाने कितनी रोजगार में लगीं महिलाओं के चित्र हैं .जिले दारिनी का चित्र ..औरन को घर सघन मन चले जो घूंघट माह ,वाके रंग सुरंग को जिले दार पर छांह रुतबा तो देखिये .जिले दार बेचारा उसके बस में है,

Friday, 10 May 2019

कौवा मामा आम गिरावो

कौवा मामा आम गिरावो हम तुम दोनों खायेंगे
चलो बजार लायेंगे दुल्हन कोने में बैठाएंगे /
कौवा बैठा पेड़ पर फुलवा पहुंची दौड़ कर
बड़ी चाव से खड़ी निहारे देवता पुरखा सभी पुकारे
मनोभाव की सरबस मारआँखों से टपकाती लार
. हाथ जोड़ कर बोली फुलवा कौवा मामा आम गिरावो
हम तुम दोनों खायेंगे चलो बजार लायेंगे दुल्हन
कोने में बैठाएंगे /
पना अमावट सपन भये सब कोइलासी नही मिलती
गिरी कटुहिली बदा न होती मुनियाँ दिन भर रोती
मंहगा महंगा आम बिक रहा कैसे हम चख पायें
दस बीघा का सोन बगीचा एक आम नहीं खाए
कौवा मामा आम गिरावो हम तुम दोनों खायेंगे
चलो बजार लायेंगे दुलहन कोने में बैठाएंगे
एक कटुहिली चोंच दबाये कौवा था कुछ ऐंठा
बड़े शान से निरख रहा था एक दल पर बैठा
सहज भाव से बोली फुलवा मामा कुछ तो बोलो
टुकुर टुकुर क्या देख रहे हो अपना मुह तो खोलो
अपनी इस गुमसुम चुप्पी काराज कोई बतलाओ
तुम्हरी बोली बड़ी मधुर है कोई गीत सुनाओ
कांव कांव कर बोला कौवा आम गिरा धरती पर
झट से लेकर भागी फलवा पैर धरे निज सर पर
भाग रही थी ऐसे जैसे सरबस मिला सहज था
थी प्रसन्न कुछ ऐसे जैसे जीवन सफल हुआ था
जोर जोर चिल्लाई फुलवा कौवा मामा आम गिरावो
हम तुम दोनों खायेंगे चलो बजार लायेंगे दुलहन ............

Monday, 16 July 2018

अमीर खुसरो.हिन्दवी बोली और मुकरी

अमीर खुसरो.हिन्दवी बोली और मुकरी
(पढ़िए और टिप्पड़ी जरुर कीजिये )
अमीर खुसरो देवनागरी में लिखना शुरू करने वाला पहला फकीर
इस भाषा को उस ज़माने में /आज भी हिन्दवी नाम से पुकारते है खुसरो को दिल्ली की आबोहवा नहीं जमी इस लिए
खुसरो हैदराबाद चले गए थे वंही लिखते थे
इस लिए आज लोग इसे दक्खिनी हिंदी के नाम से पुकारते हैं
मुकरी शब्द खुसरो की देंन है यह फारसी में नहीं था .
उस समय प्रचालन में इसके दो प्रकार थे
मुहमुकरी या कहमुकरी.मतलब है कह के मुकर जाना या सुन के मुकर जाना .इसकी शुरुआत खुसरो ने ही की थी .पहेली तो हिंदी में लोग कहने लगे यह हिन्दवी का शब्द है मुकरी
१)गुप्त घाव तन में लगे और जिया रहत बेचैन
ओखत (औषधि )खाय दुःख बढे सो करो सखी कुछ बैन
२)दिल का तो दुम्बल(फोड़ा)भया और नैनं का नासूर
जो ओखत से दुःख कटे तो मै भी करूं जरूर (दोनों का उत्तर -इश्क (प्रेम )
३)अपने समय में इक नार आय
तुक देखे और फिर छुप जाय
बूझ के उठियो कसम है तुम पर
आग बिना उजियारा दुम पर (जुगुनू )
४)फूल तो वा का ओखद सहाय
फल सब जग के कम में आय
उजड़ी खेती जावे नास
जब देखो जब पास का पास (कपास)
५)ठौर नीर पर होत है और भीतर के जल जाय
हांथी घोडा ऊंट शलीता वाही के बल जांय (पुल )
यह है हिंदी का प्रारंभिक रूप जो अमीर खुसरो ने शुरू किया .हिट होगया था
मित्रों अमीर खुसरो के नाम से जो भी हिन्दी काब्य में प्रचलित है वह जन श्रुति का हिस्सा है कोई लिखित प्रमाण नहीं है /अवध के शाही पुस्तकालय में खुसरो की कुछ पांडुलिपियाँ सुरक्षित थीं /उनके हिंदी काब्य पर पहला लेख १८५२ में जर्नल ऑफ़ एसियाटिक सोसाइटी बंगाल ने प्रकाशित किया था ...इस प्रस्तुति का मूल आधार वही लेख है ...
पहेली /मुकरी ....
१)जल का उपजा देखा जल में, कांटे हैं वाके कल कल में
गीला हो तो हाट बिकाय,सूखे से कई कम आये /(सिंघाड़ा )
2)दो नर में है एक ही नार, यही रहें हैं सबके द्वार
दो नर से वह नारी जूझे, जब जानो जब चट पट बूझे/ (कुंडा /सांकल )
३)एक नारी में जब नर जाय, काला मुंह कर उलटा आय
छाती घाव अपनी सहे, मन के वचन पर आय कहे/ (दावत -कलम )
४)काला मुंह कर जग दिखलावे, भूला बिसरा याद दिलावे
रैन दिना चातर गम खाता, मूरख को लेखा नहीं आता /(खाता बही कलम )
५)मुंह से उगले मुंह से खाय ,मुंह से मुंह को लगाती जाय
ठोक बदन कहलाती है, हर दम में बन चलती है /(तुफंग अर्थात प्रक्षिप्त )
६)बिलक बिलक भोजन करे, और कास कास में बीठ
जनवर है पर जो नहीं लेत सवारी पीठ ( ढेंकुली )
खुसरो की पहेलियों .का संग्रह खालिक बरी के नाम से प्रचलित है किन्तु इसके भाषिक तथा कलात्मक दोष के कारन कुछ लोग इसे खुसरो की कृति नहीं मानते /खुसरो प्रतिभा शाली बुद्धि मान और हिन्दवी की बोलियों ठोलियों में रचे बसे थे अरबी फ़ारसी में निष्णात थे इन्हें हिन्दवी -तथा अरबी फ़ारसी शब्दों के अलंकारिक अर्थ सम्बन्ध जोड़ने में दक्षता प्राप्त थी /
अमीर खुसरो के नाम से जिस हिंदी उर्दू या हिन्दुस्तानी काब्य को जोड़ा जाता है उसके बारे में पहला सवाल यह उठता है की उसे कौन सी संज्ञा दी जाय क्यों की हिंदी उर्दू हिन्दुस्तानी का वर्तमान भाषिक अर्थ तेरहवीं शताब्दी में नहीं था ग्रियर्सन ने पूर्वी हिंदी और पश्चिमी हिंदी का जो विभाजन और शब्दावली निर्माण बिहार से पंजाब तक के भारतीय आर्य बोलियों के वर्गीकरण के लिए किया था उसे अमीर खुसरो की भाषा पर चस्पा कर देना ठीक नहीं /क्यों की एक तो यह शब्दावली मात्र है ,इस नाम की कोई भाषा या बोली नहीं है दूसरे उसकी संकल्पना भी बहुत बाद की है ,खड़ी बोली ,ब्रज ,हरियाणवी के नाम भी बाद में ही प्रचलित हुए .उस काल की बोलियों के नाम मध्य युग श्रोतों से जो भी प्राप्त है दोष युक्त या अधूरे है ,लेखकों ने उन्ही बोलियों के नाम का उल्लेख किया है जिन्हें वे जानते थे जिनके प्रदेशों से परिचित थे ,१५ वीं शदी के अंत में शेख बहाउद्दीन वाजन की भाषा "जबान- ये -देहलवी'कहलाती थी/ १६ वीं शदी में अबुल फजल ने, आईन-ये-अकबरी में हिंदी की केवल दो भाषा देहलवी और मारवाड़ी (राजस्थानी) का उल्लेख किया है जाहिर है इनके आलावा और भी बहुत सी बोलियाँ थीं..
..अब कुछ मुकरियां .
1-माथे वाके छेक है और चरण थूर कर यहांव
बहियन पर छाती टिकी रहे और पीठ पर वाके पांव /(चोली)
२-सर बल जावे नारी एक छोटी ऊपर छोटी देख
सीना व का सब को भावे सभी जगत के कम में आवे/ (सोजन )
३-भूके प्यासे आते हैं वो बुजुर्ग क्यों कहलाते हैं
फ़िक्र से उनको मुंह में रखे बैकुंठो में भोजन चखे/ (रोजा )
४-आई थी भोजन करन भोजन हो गई आप
पिछलों से कहती गई की भोजन नहीं यह पाप /
५-भोजन था सो जल गया और या में मीन न मेख
छेड़ छाड़ जाती रही सो कांता खटकत देख/ (१४/१५ बंसी -ओ -माही)
६- एक थाल मोती से भरा सब के सर पर औधा धरा .थाली चारो और फिरे मोती उसमे से एक न गिरे
७ -दौरी थी पिय मिलन को खांची मन में रेख अब मौनी क्यों हो गयी चलनी के कई देख
८-खीर पकाई जतन से चरखा दिया चलाय आया कुत्ता खा गया तू बैठी ढोल बजाय
मैं बिभिन्न बोलियों की चर्चा कर रहा था /शेख बहाउद्दीन वाजन /अबुल फजल /आईने अकबरी की चर्चा की थी ..आधुनिक भाषा वैज्ञानिक अनुसन्धान के सन्दर्भ में यह तथ्य जान लिया गया है की उस समय हरियाना दिल्ली और प. उत्तर प्रदेश में शौरसेनी अपभ्रंश की प्रधानता थी /अपभ्रंश का कोई एक ब्यवस्थित रूप नहीं होता निश्चय ही प्रत्येक अपभ्रंश में गौण प्रादेशिक बोलियाँ भी सन्निहित रही होंगी ,जिन्हों ने सम्बंधित प्रदेश की बोलियों को जन्म दिया होगा /हमें पता है की ब्रज भाषा की परम्परा अकबर से भी पहले की है और अकबर के काल में ब्रज भाषा में कृष्ण भक्तिअवधी में राम भक्ति की रचनाएँ हो रही थींतुलसी और सूर दो महान रचना कार लिख रहे थे तो अबुल फजल के कथन में शुद्धता का अभाव दिखता है/ यही दिल्ली के आस पास की बोलियों की होगी जो आगे चल कर खड़ी बोली कहलाईं ...
.अब कुछ और मुकरियां
१-एक नार है घेर घुमेली भीतर वाके लकड़ी मैली
फिरा करे चलने की आन उसकी इसमें बूझ आ सान /..सान
2 -बंद किये से निकला जाय छोड़ दिए से जावे आय
मूरख को देही नहीं सूझे ज्ञानी हो एक दम में बूझे /.दम
३नर नारी में कुश्ती है कुश्ती है बे पुश्ती है
बूझ पहेली जो कोई जाये बैकुंठे में बासा पाए /...रूह
४-जिसके पैरों वा पड़ी उसका जी घबराय ,
बहुत दुखों से कदम उठे ,रह न निबडी जाय /...बेड़ी
५-सागर बासा भोजन रक्त फूल रहत है क्यों
सीस छेद जबदह लिया फिर वह ज्यों की त्यों /...जोंक
६- ओ पक्षी है जगत में जो बसत भुइं से दूर
रैन को उसको बीना देखा दिन में देखा सूर /....चमगादर
(सान ,दम ,रूह ,बेड़ी ,जोंक ,चमगादर )

Friday, 6 April 2018

इतिहास बयान करते हैं इलाहाबाद के पुराने मोहल्ले

इतिहास बयान करते हैं इलाहाबाद के पुराने मोहल्ले
एक रशियन दार्शनिक सोरोवस्की का विचार है कि यदि किसी नगर, स्थान या क्षेत्र का इतिहास जानना हो तो पहले उसके नाम का इतिहास जानें, क्योंकि नाम उसकी ऐतिहासिकता का प्रतीक होता है। इलाहाबाद शहर के पुराने मोहल्लों का नामकरण कैसे हुआ, इस पर गौर करें तो यह बात पूरी तरह सही साबित होती है, क्योंकि ये नाम इतिहास बयान करते हैं। मुट्ठीगंज, कीडगंज, रामबाग, चौक, खुल्दाबाद, जानसेनगंज, गढ़ीसराय, सरायमीर खां, शाहगंज, रोशनबाग, अहियापुर, कटरा, सिविल लाइंस, ममफोर्डगंज आदि बहुत पहले आबाद हुए मोहल्ले हैं। शहर लंबे समय तक मुगलों और अंग्रेजों की हुकूमत में रहा। यहां के पुराने मोहल्ले में से कुछ मुगलों के बसाए हैं तो कुछ अंग्रेजों के। इनकी तह में जाएं तो अतीत की कई अनछुई दास्तानें परत दर परत खुलती हैं।
सौ बरस पहले के और अब के इलाहाबाद में जमीन आसमान का अंतर है। आज का भीड़भाड़ वाला चौक इलाका सौ साल पहले एक साधारण गांव जैसा था। यहां मुगलों के समय की बनीं दो सराएं थीं, खुल्दाबाद सराय और गढ़ी सराय। शहर के सबसे खास कारोबारी इलाकों में शुमार मुट्ठीगंज का नाम अंग्रेजी हुकूमत के पहले कलेक्टर मिस्टर आर. अहमुटी के नाम पर पड़ा। जबकि शहर की पहचान माने जाने वाले पंडों व प्रयागवालों के परंपरागत क्षेत्र कीडगंज का नाम किले के अंग्रेज कमांडेंट जनरल कीड के नाम पर पड़ा। मुगल शासक शाहजहां का बड़ा लड़का दारा शिकोह था, जिसके नाम पर दारागंज मोहल्ला आबाद हुआ।
ईस्वी सन 1906 के आसपास संयुक्त प्रांत के उपराज्यपाल मिस्टर जेम्स डिग्स लाटूश ने स्टेशन के आगे सरकारी कर्मचारियों के रहने के लिए एक मोहल्ला बसाया, जिसका नाम उन्होंने गवर्नमेंट प्रेस के तत्कालीन सुपरिटेंडेंट मिस्टर एफ. लूकर के नाम पर लूकरगंज रखा। इलाहाबाद आर्कियोलॉजिकल सोसायटी के लिए हिंदुस्तानी एकेडमी से प्रकाशित प्रयाग प्रदीप में डॉ. सालिग्राम श्रीवास्तव ने चौक व इसके आसपास के इलाकों की तत्कालीन दशा पर लिखा - ' जहां आज चौक मोहल्ला है, वहां चारों ओर कच्चे घर थे। कोई-कोई मकान पक्के और कुछ बिना प्लास्टर की पक्की ईंटों के बने थे। बीच में एक पक्की गड़ही थी, जिसमें आस-पास का पानी इकट्ठा होता था तथा कूड़ा-करकट फेंका जाता था। लोग उसे लाल डिग्गी कहते थे। उसके किनारे कुछ बिसाती, कुंजड़े और अन्य छोटे-छोटे दुकानदार चबूतरों पर बैठते थे। जांस्टनगंज घनी बस्ती थी। चौक से कटरे की ओर जाने के लिए ठठेरी बाजार, शाहगंज, लीडर रोड का रास्ता था।'
1864 के आसपास जिले के कलेक्टर मि. विलियम जांस्टन ने चौक की पुरानी बस्ती की जगह नया बाजार व पक्की सड़क बनवाई थी, जिसे जांस्टनगंज कहा जाने लगा। चौक में जहां बरामदा के नाम से सौंदर्य प्रसाधन की दुकानें हैं, वहां पहले एक विशाल कुआं था। इसके ठीक सामने गिरजाघर के पास नीम के सात पेड़ों का समूह था, जिन पर अंग्रेजी पुलिस क्रांतिकारियों को फांसी देती थी और कुएं में दफन कर देती थी। 1873 में लाल डिग्गी की गड़ही को शहर के माने हुए रईस बाबू रामेश्वर राय चौधरी ने पटवाकर सब्जी मंडी बनवाई। बाबू साहब कचहरी के प्रसिद्ध गुमाश्ता थे। सब्जी मंडी के पास ही यहां की मशहूर तवायफ जानकी बाई इलाहाबादी उर्फ छप्पन छूरी की कोठी थी।
1874 में कोतवाली बनी। कोतवाली के पीछे रानी मंडी है, जिसका नामकरण इंग्लैंड की महारानी विक्टोरिया के शासन की शुरुआत की याद में रखा गया। रानी मंडी व भारतीय भवन पुस्तकालय के पीछे पहले एक पठार था, जिसे खुशहाल पर्वत कहा जाता था। इसी नाम से वहां पर एक बस्ती अभी भी आबाद है। पास ही में पहले साधु गंगादास रहते थे, जिनके नाम पर चौक गंगादास मोहल्ला बसा। खुशहाल पर्वत से नीचे की तरफ के खाली स्थान में मालवीय लोगों के डेरा जमा लेने से मालवीय नगर मोहल्ला बसा। इसी के पास दक्षिण की ओर पहले किसी सती (देवी) का चौरा (चबूतरा) था, जिसे सत्ती चौरा मोहल्ला कहा जाता है। राजा अहिच्छत्र के नाम पर अहियापुर मोहल्ला बसा। दरिया (यमुना) के किनारे होने के कारण मुगलकाल से ही दरियाबाद नाम से एक मोहल्ला आबाद है।
जहां अब कंपनीबाग है, वहां पहले सम्दाबाद व छीतपुर नाम के दो गांव थे। अंग्रेजों के विरुद्ध गदर से नाराज कंपनी की पलटन ने दोनों गांव तबाह कर दिया और वहां कंपनी बाग (अल्फ्रेड पार्क) की नींव रखी। इंग्लैंड से इलाहाबाद भेजे गए सर विलियम म्योर को इलाहाबाद बहुत सुहाया। माना जाता है कि उन्हीं के जमाने में इलाहाबाद सबसे ज्यादा चमका। हाईकोर्ट का विशाल भवन (पुराना), गवर्नमेंट प्रेस, रोमन कैथोलिक चर्च, पत्थर का बड़ा गिरजा (आल सेंट्स कैथेड्रल) तथा सबसे महत्वपूर्ण म्योर सेंट्रल कालेज उन्हीं के समय में बना। उनके नाम से म्योराबाद बस्ती भी बसाई गई। इलाहाबाद का सबसे पुराना अखबार पायनियर, जो बाद में लखनऊ चला गया, के संस्थापक सर जार्ज एलन व म्यूनिसिपल बोर्ड के चेयरमैन रहे मिस्टर ममफोर्डगंज के नाम पर एलनगंज व ममफोर्डगंज मोहल्ले बसे।
मुगल शासक अकबर के उत्तराधिकारियों में औरंगजेब की ख्याति कट्टर इस्लामी शासक की रही। संत मलूकदास ने भी उसे एक नाम 'मीर राघव' दिया था। इसी के नाम पर चौक के बगल में सराय मीर खां मोहल्ला बसा, जो बाद में भगवान शंकर के नाम पर लोकनाथ कहा जाने लगा। शायद मीरापुर और मीरगंज मोहल्ले भी इसी नाम पर बने। परन्तु इसकी कोई लिखित दास्तान उपलब्ध नहीं है। चौक व जांस्टनगंज के बीच स्थित घंटाघर सन 1913 में यहां के रईस रायबहादुर लाला रामचरन दास तथा उनके भतीजे लाला विशेशर दास ने अपने-अपने पुत्र लाला मुन्नीलाल की याद में बनवाया था। घंटाघर ठीक उसी आकार व रंगरूप का बनवाया गया था जैसा कि दिसंबर सन 1910 में यमुना किनारे किले के पश्चिम में लगी प्रदर्शनी में बना था। दो सौ बीघा जमीन पर तीन महीने तक लगी रही इस राष्ट्रीय स्तर की प्रदर्शनी को देखने देश-विदेश के आठ लाख लोग आए थे। जिसमें जर्मनी के युवराज व हिंदुस्तान के लगभग सभी रियासतों के राजे-महराजे शामिल थे। माना जाता है कि कुंभ मेले के बाद इतनी भीड़ इसी प्रदर्शनी में देखी गई थी। प्रदर्शनी पर साढ़े इक्कीस लाख रुपये व्यय हुए थे। इसकी दास्तान 1931 के सरकारी गजेटियर में भी है। देश में इसी साल पहली बार हवाई जहाज उड़ाया गया था।
रायबहादुर के नाम पर बहादुरगंज मोहल्ला बसा तथा इस प्रांत के उप राज्यपाल रहे सर जार्ज हिवेट के नाम पर हिवेट रोड (विवेकानंद मार्ग) बनी। जबकि उस समय के ख्याति प्राप्त अंग्रेजी अखबार लीडर के नाम पर लीडर रोड (स्टेशन रोड) मोहल्ला बसा। इसका प्रकाशन वहीं होता था, जहां से आजकल दैनिक आज अखबार निकलता है। तब हाईकोर्ट के प्रसिद्ध वकील और कुछ समय तक डिप्टी कलेक्टर रहे शहर के जैन रईस बाबू शिवचरण लाल के नाम पर एक सड़क राधा थिएटर मानसरोवर सिनेमा के सामने बनाई गई थी, जो अब भी इसी नाम से जानी जाती है। म्यूनिसिपल बोर्ड के चेयरमैन रहे कामता प्रसाद कक्कड़ के नाम पर केपी कक्कड़ रोड (जीरो रोड) बनी। 1931 में रोशन बाग मोहल्ला नवाब सर बुलंद खां के नायब रोशन खां के नाम पर बसा। मुगल शासक जहांगीर ने अपनी पदवी बादशाही के नाम पर पहले बादशाही मंडी बनवाई थी जो अब मोहल्ला बन गया है।
सिविल लाइन पहले एक पिछड़ा हुआ इलाका था। इसका विकास कार्य 1858 में शुरू हुआ, जो 17 वर्षों तक चलता रहा। पहले इसे कैनिंग टाउन (कैनिंगटन) कहा जाता था। 1920-21 के पहले अंग्रेजी सेना के कर्नल व अन्य अधिकारी आनंद भवन के आसपास रहते थे, जिसे कर्नलगंज कहा जाने लगा। लेकिन बाद में उन्हें दूसरी जगह बसा दिया गया जिसे छावनी क्षेत्र (कैंटोनमेंट) कहा जाता है। यहां के तत्कालीन कमिश्नर मिस्टर थार्नहिल के नाम पर थार्नहिल रोड (दयानंद मार्ग) बना।
जयपुर के प्रसिद्ध राजा महाराज जयसिंह ने औरंगजेब द्वारा दी गई जागीर पर इलाहाबाद सहित कई जिलों में कटरा मोहल्ला बसाया। यहां के पुराने आमिल (दीवान) राजा नवल राय के नाम से कीडगंज व बैरहना के बीच मोहल्ला तालाब नवल राय बना। दीवान नवलराय लखनऊ की शिया रियासत के वजीर और सिपहसालार थे। अवध की सुबेदारी और हुकूमत के वे मजबूत स्तंभ थे और अवध के नवाब के भरोसेमंद सामंतों में गिने जाते थे। इन्होंने दारागंज में राधाकृष्ण का एक मंदिर बनवाया था। मंदिर में पूजा के लिए जिस खूबसूरत फुलवारी से फूल लिए जाते थे, वह फुलवारी रोड (कच्ची सड़क दारागंज) कहा जाता है।
नगर की प्रसिद्ध पथरचट्टी राम लीला कराने के लिए डेढ़ सौ साल पहले शहर के कारोबारियों में माने हुए सेठ लाला दत्ती लाल कपूर ने मुट्ठीगंज के आगे लंबी चौड़ी जमीन खरीदकर उसका नाम रामबाग रखा। बाद में इसी नाम से यहां एक मोहल्ला आबाद हुआ। मुगल काल व इससे पहले इलाहाबाद की ख्याति धर्म व मजहबी तौर पर ज्यादा थी। बहुत कम लोग जानते हैं कि अकबर ने शहर के मंदिरों, मठों, अखाड़ों, मुस्लिम दायरों, दरगाहों, संतों, फकीरों, सूफियों व औघड़ों को देखकर पहले इसका नाम फकीराबाद रखा था। बाद में कुछ समय तक यह इलाहाबास (सरकारी गजेटियर में भी यही नाम मिलता है) नाम से जाना गया। मजहबी प्रेरणा से ही अकबर ने इस नगर को अंत में 'अल्लाह से आबाद ' कहा जो बाद में इलाहाबाद हो गया। तब से यही नाम बदस्तूर जारी है। धार्मिक वजहों से कुछ और मोहल्ले भी जाने गए। कल्याणी देवी, अलोपी देवी और सूर्यकुंड जैसे प्राचीन मंदिरों के नाम से कल्याणी देवी, अलोपीबाग और सूरजकुंड मोहल्ले बने। अत्रि ऋषि और अनसुइया आश्रम होने के कारण
अतरसुइया मोहल्ला बसा।
शहर के पुराने पुरोहित 72 वर्षीय पं. नवरंग महराज के अनुसार गंगागंज व बेनीगंज मोहल्ले करीब डेढ़ सौ साल पहले गंगेश्वर नाथ महादेव के भक्त पं. गंगाराम तिवारी व पं, बेनी प्रसाद के नाम पर बसाए गए थे। जबकि पुराने समय में यमुना के किनारे गउओं (गायों) का मेला लगने के कारण गऊघाट मोहल्ला बसा। शहर के दक्षिणी भाग का नाम नैनी पहाड़ों की देवी (नयना देवी) के नाम पर पड़ा।
सरकारी अभिलेखों के अनुसार 1868 व 1896 में यमुना पार में भयंकर दुर्भिक्ष पड़ा। इसी दौरान कुमाऊं व गढ़वाल से कुछ पहाड़ी लोग यहां काम की तलाश में आए। वे अपने साथ नयना देवी की मूर्ति लाए और उसे यहीं स्थापित कर देवी के नाम पर नयनी (नैनी) कहने लगे। इसके पहले यहां सिर्फ जंगल था।
शहर के कुछ और मोहल्ले स्थानीय काम-धंधों के नाम से जाने जाते थे, जो अब भी जारी है। इनमें शामिल है ठठेरी बाजार (बर्तन), घास सट्टी, भूसौली (भूसा) टोला, गाड़ीवान टोला, बजाजा (कपड़ा) पट्टी, इत्यादि

अगर नेहरू ना होते…

अगर नेहरू ना होते……
नेहरू के पिता का नाम ग्यासुद्दीन गाजी था। जवाहर अपने आप में अरबी शब्द है, कोई कश्मीरी पंडित अपने बेटे का नाम जवाहर क्यों रहेगा? नेहरू मुगलिया खानदान की औलाद था। अय्याश तो इतना बड़ा था, कि विदेशी लड़कियों के साथ सिगरेट ही पीता रहता था। बताओ तो, प्रमाण के लिए प्रत्यक्ष फ़ोटो दिखाऊं! नेहरू की वजह से कश्मीर समस्या खड़ी हुई। चीन के साथ युद्ध नेहरू ने जानकर हरवा दिया। नेहरू अंग्रेजों का चमचा था। दरअसल, नेहरू को उसके चाटुकार बुद्धजीवियों ने महान बना दिया, नहीं तो बताओ जिन अंग्रेजों ने देश को गुलाम बनाया उन्हीं अंग्रेज की पत्नी ऐडविना के साथ चोंच लड़ाता था, कहो तो प्रमाण के लिए प्रत्यक्ष फोटो पेश करूं.
केवल इतनी ‘किवदंतियां’ (बातें) एक दो और भी होंगीं, जैसे सरकारी आईपी एड्रेस से नेहरू की वीकिपीडिया में परिवर्तन करना, इन चार सालों में एक विशेष विचारधारा के पेड समर्थकों ने गढ़/फैला पाई हैं। अब मैं बहुत सारा माल आपको दे रहा हूं, अपनी-अपनी व्हाट्स एप यूनिवर्सिटी में सर्कुलेट कर दीजिएगा। सौ फीसदी नया है, मार्केट में पहली बार।
अगर नेहरू ना होते तो हम हिंदू राष्ट्र होते। हम पाकिस्तान होते। यहां मुसलमान नहीं होते। अगर होते तो जैसे पाकिस्तान में हिंदू हैं, वैसे होते। कितना अच्छा होता। अगर नेहरू ना होते तो भारत के संविधान की प्रस्तावना के विशेष फिचर- लोकतंत्र, समाजवाद, फंडामेंडल राइट्स, सेकुलरिज़्म नहीं होते, कितना अच्छा होता। अगर नेहरू नहीं होते, तो भारत एक भारत नहीं होता, ऐसे 20-30 भारत होते, जो हर तरह (धार्मिक, क्षेत्रीय, भाषाई, जातीय) की कट्टरता के अपने-अपने अलग-अलग पाकिस्तान होते। कितना अच्छा होता। अगर नेहरू ना होते, आधुनिक सोच नहीं होती, आधुनिक शिक्षा नहीं होती, आधुनिक विचारों की तरफ हम नहीं मुड़ते, वैज्ञानिक सोच को हम तवज्जो नहीं देते और हम प्रधान सेवक (मोदी जी) के शब्दों में सपेरा होते. बीन बजाते हुए सपेरा। जंगलों में नागिन के ढूंढ़ने के लिए जटा बढ़ाए हुए घुम रहे होते, सॉफ्टवेयर एक्सपर्ट! छि! क्या बना दिया नेहरू ने, सपेरा होते, सोचो कितना अच्छा होता। अगर नेहरू ना होते, तो दुनिया में क्षेत्रफल की दृष्टि से सातवें और जनसंख्या की दृष्टि से दूसरे सबसे बड़े देश में बिजली नहीं होती! क्योंकि बांध ही नहीं होते, मंदिर होते- वाउ ! मंदिर ही मंदिर या फिर मस्जिद ही मस्जिद ही। हर नुक्कड़ पर एक मंदिर-एक मस्जिद, सोचो कितना अच्छा होता। अगर नेहरू ना होते, तो गांधी को कितनी जल्दी मार सकते थे, सरदार पटेल के विचारों कितनी जल्दी धूल में मिला सकते थे, देश को कट्टरता की तरफ मोड़ने में हमें 70 साल थोड़ी ना लगते, सोचिए कितना अच्छा होता। अगर नेहरू ना होते, संविधान भी होता और सुप्रीम कोर्ट भी होता, लेकिन बिलकुल वैसा ही जैसा पाकिस्तान का सालों पहले तक रहा है। अगर नेहरू ना होते तो हम चीन से नहीं हारते, क्या जाता था युद्ध ही नहीं करते- हमें तो गुलामी की आदत पड़ी थी दे देते जमीन, बच्ची हुई जमीन में अपना हिंदू राष्ट्र चलाते/बनाते। सोचिए...सोचिए...कितना अच्छा होता। अगर नेहरू ना होते....
नेहरू आज भी नासूर हैं क्योंकि-
भगत सिंह ने जेल में नेहरू और गांधी में से नेहरू को चुना था। गांधी ने पटेल और नेहरू में से नेहरू को चुना था। गांधी की शव यात्रा में नेहरू आंसूओं से रो रहे थे। बच्चे की तरह भागते फिर रहे थे। पटेल के साथ वैचारिक मतभेद होने के बाद भी राज्यों को एक करने के वक्त पटेल के पीछे दीवार की तरह खड़े रहे थे। हजार विरोध होने के बावजदू, अपने मंत्री (अंबेडकर) के इस्तीफा देने के बाद भी हिंदू मैरिज एक्ट समेत कई बिल पारित कराकर हिंदू धर्म में सुधार का जिम्मा उठाया था। जेल में बैठकर किताबें लिखने वाले नेहरू को इस देश की जनता ने सर आंखों पर बिठाया। लोगों ने नेहरू को पत्थर मारे, नेहरू ने उन्हें पुचकारा। नेहरू कोई सड़क पर घूमता हुआ दो कौड़ी का ‘ब्लडी इंडियन’ नहीं था, चाहता तो जिंदगी भर विदेशों में मौज से रहता और उसकी सात पीढ़ियां अमेरिका में रहिशी से जीती लेकिन, एक करीब-करीब उज़ड़े देश को उसने बनाया, और देश ने इसे समझा, हाथों-हाथ लिया। नेहरू ने इस देश को हमेशा खुद से और खुद की पार्टी से ऊपर रखा।
लोग आज नेहरू के छोटे-छोटे किस्से फेसबुक पर लिख रहे हैं- मैं तो कहता हूं, नेहरू की महानता के कितने किस्से सुनने हैं, मुझे बताओ-
वो सुनाऊं जब आनंद भवन में स्कूल के लड़कों ने बरसात में किताबें भीगने की बात कही तो कैनवास के बस्ते और बरसाती कोट दिल्ली से नेहरू ने भिजवाए थे।
या फिर वो जब पिता मोतीलाल के मना करने पर भी छिपकर 101 रूपए बुंदेलखंड राहत कोष के लिए चंदा मांगने आए लड़कों को दिये थे।
या फिर वो जब पार्टीशन के वक्त आदमपुर के पास कमालपुर में मुस्लिम शरणार्थियों के कैंप में नेहरू गए तो ‘हत्यारा आ गया…जल्लाद आ गया…जालिम आ गया’ के नारे मुसलमान लगा रहे थे, जब कैंप से वापस लौटे तो- ‘गांधी नेहरू हमारे माई-बाप हैं…वजीरे आज़म हिंदुस्तान, जिंदाबाद’ के नारे लग रहे थे।
या फिर वो जब इलाहाबाद वापस लौट रहे थे तो सर्दियों में अंधेरे के दिनों में उनकी कार से एक गाय टकरा गई, उसका सींग टूट गया तो नेहरू सड़क पर खड़े रहे पता किया ये किसकी गाय है, फिर उस व्यक्ति को इलाज के लिए पैसे दिए।
या फिर वो जब उन्होंने खुद ही मॉडर्न रिव्यू में आर्टिकल लिख कर देश को आगाह किया कि नेताओं के फैन मत बनिए, नहीं तो वो तानाशाह बन सकते हैं। आप लोग जितना प्यार मुझे करते हैं, ऐसे वक्त में मैं भी तानाशाह बन सकता हूं।
छोड़िए, इस देश के हर शहर में, हर कस्बे में नेहरू को लेकर हजार कहानियां हैं। आप सुनेंगे तो कहेंगे कि ऐसा नेता भी हो सकता है क्या ? इसका मतलब ये कतई नहीं है कि मैं नेहरू को सौ फिसदी सही या परफेक्ट मानता हूं, नहीं मानता लेकिन हां, भारत का अब तक का सबसे बड़ा लीडर जरूर मानता हूं। सबसे महान। जो कहता था कि ‘मुझे मीडिया का ज्यादा हस्तक्षेप भी पसंद है, मीडिया के जड़ होने की बजाय।’ या फिर ‘अख़बार सरकार की आलोचना नहीं करेंगे तो कौन करेगा।’
प्रधानमंत्री मोदी जी ने ट्विटर पर छह शब्दों के एक ट्विट में नेहरू को आज याद किया। मुझे खुशी है, क्योंकि मैं समझ सकता हूं, मजबूरियां। प्रधानमंत्री होते हुए प्रचारक का धर्म निभाना आसान काम नहीं है। खैर, नेहरू को लेकर मैं बिलकुल भावुक नहीं हूं। आपसे एक ही गुजारिश है, धर्म और राजनीति का मिश्रण किसी भी देश के लिए खतरनाक है। खुद को कट्टर होने से बचाइए। आधुनिकता, उदारता और धर्मनिरपेक्षता के साथ रहिए चाहे अकेला ही क्यों ना रहना पड़े। यही राष्ट्रवाद है, यही देश भक्ति है।
#नेहरू_जन्मतिथि
Chaman Mishra (hamare shahar se )

भारत का मर्म और पंडित नेहरू ....

भारत का मर्म और पंडित नेहरू ....

भारत की आत्मा को समझने में पंडित जवाहरलाल नेहरू से बढ़कर और कोई बुद्धिजीवी हमारी मदद नहीं कर सकता।पंडितजी की भारत को लेकर जो समझ रही है ,वह काबिलेगौर है।वे भारतीय समाज,धर्म,संस्कृति,इतिहास आदि को जिस नजरिए से व्यापक फलक पर रखकर देखते हैं वह विरल चीज है।
पंडित नेहरू ने लिखा है ''जो आदर्श और मकसद कल थे,वही आज भी हैं,लेकिन उन पर से मानो एक आब जाता रहा है और उनकी तरफ बढ़ते दिखाई देते हुए भी ऐसा जान पड़ता है कि वे अपनी चमकीली सुंदरता खो बैठे हैं,जिससे दिल में गरमी और जिस्म में ताकत पैदा होती थी।बदी की बहुत अकसर हमेशा जीत होती रही है लेकिन इससे भी अफसोस की बात यह है कि जो चीजें पहले इतनी ठीक जान पड़ती थीं,उनमें एक भद्दापन और कुरूपता आ गई है। '' चीजें क्रमशःभद्दी और कुरूप हुई हैं,सवाल यह है कि यह भद्दापन और कुरूपता आई कहां से ॽक्या इससे बचा जा सकता था ॽयदि हां तो उन पहलुओं की ओर पंडितजी ने जब ध्यान खींचा तो सारा देश उस देश में सक्रिय क्यों नहीं हुआ ॽ
पंडित जवाहरलाल नेहरू ने लिखा है" हिंदुस्तान में जिंदगी सस्ती है। इसके साथ ही यहां जिंदगी खोखली है,भद्दी है,उसमें पैबंद लगे हुए हैं और गरीबी का दर्दनाक खोल उसके चारों तरफ है।हिंदुस्तान का वातावरण बहुत कमजोर बनानेवाला हो गया है।उसकी वजहें कुछ बाहर से लादी हुई हैं,और कुछ अंदरूनी हैं,लेकिन वे सब बुनियादी तौर पर गरीबी का नतीजा हैं। हमारे यहां के रहन-सहन का दर्जा बहुत नीचा है और हमारे यहां मौत की रफ्तार बहुत तेज है।" पंडितजी और उनकी परंपरा ´मौत की रफ्तार´ को रोकने में सफल क्यों नहीं हो पायी ॽ पंडित जानते थे कि भारत में जहां गरीबी सबसे बड़ी चुनौती है वहीं दूसरी ओर धर्म और धार्मिकचेतना सबसे बड़ी चुनौती है।
पंडित नेहरू ने लिखा है- "अगर यह माना जाये कि ईश्वर है,तो भी यह वांछनीय हो सकता है कि न तो उसकी तरफ ध्यान दिया जाये और न उस पर निर्भर रहा जाये। दैवी शक्तियों में जरूरत से ज्यादा भरोसा करने से अकसर यह हुआ भी है और अब भी हो सकता है कि आदमी का आत्म-विश्वास घट जाए और उसकी सृजनात्मक योग्यता और सामर्थ्य कुचल जाये।"
धर्म के प्रसंग में नेहरूजी ने लिखा- "धर्म का ढ़ंग बिलकुल दूसरा है।प्रत्यक्ष छान-बीन की पहुंच के परे जो प्रदेश है,धर्म का मुख्यतःउसीसे संबंध है और वह भावना और अंतर्दृष्टि का सहारा लेता है। संगठित धर्म धर्म-शास्त्रों से मिलकर ज्यादातर निहित स्वार्थों से संबंधित रहता है और उसे प्रेरक भावना का ध्यान नहीं होता।वह एक ऐसे स्वभाव को बढ़ावा देता है,जो विज्ञान के स्वभाव से उलटा है। उससे संकीर्णता,गैर-रवादारी, भावुकता,अंधविश्वास,सहज-विश्वास और तर्क-हीनता का जन्म होता है। उसमें आदमी के दिमाग को बंद कर देने का सीमित कर देने का,रूझान है।वह ऐसा स्वभाव बनाता है,जो गुलाम आदमी का,दूसरों का सहारा टटोलनेवाले आदमी का, होता है।" आम आदमी के दिमाग को खोलने के लिए कौन सी चीज करने की जरूरत है ॽक्या तकनीकी वस्तुओं की बाढ़ पैदा करके आदमी के दिमाग को खोल सकते हैं या फिर समस्या की जड़ कहीं और है ॽ
पंडित नेहरू का मानना है - "हिन्दुस्तान को बहुत हद तक बीते हुए जमाने से नाता तोड़ना होगा और वर्तमान पर उसका जो आधिपत्य है,उसे रोकना होगा। इस गुजरे जमाने के बेजान बोझ से हमारी जिंदगी दबी हुई है। जो मुर्दा है और जिसने अपना काम पूरा कर लिया है,उसे जाना होता है।लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि गुजरे जमाने की उन चीजों से हम नाता तोड़ दें या उनको भूल जाएं ,जो जिंदगी देनेवाली हैं और जिनकी अहमियत है।" यह भी लिखा, "पिछली बातों के लिए अंधी भक्ति बुरी होती है।साथ ही उनके लिए नफ़रत भी उतनी ही बुरी होती है।उसकी वजह है कि इन दोनों में से किसी पर भविष्य की बुनियाद नहीं रखी जा सकती।"
"गुजरे हुए जमाने का -उसकी अच्छाई और बुराई दोनों का ही-बोझ एक दबा देने वाला और कभी-कभी दम घुटाने वाला बोझ है,खासकर हम लोगों में से उनके लिए ,जो ऐसी पुरानी सभ्यता में पले हैं,जैसी चीन या हिन्दुस्तान की है। जैसाकि नीत्शे ने कहा है- " न केवल सदियों का ज्ञान,बल्कि ,सदियों का पागलपन भी हममें फूट निकलता है।वारिस होना खतरनाक है।"इसमें सबसे महत्वपूर्ण है ´वारिस´वाला पहलू।इस पर हम सब सोचें।हमें वारिस बनने की मनोदशा से बाहर निकलना होगा।
पंडित नेहरू ने लिखा है- "मार्क्स और लेनिन की रचनाओं के अध्ययन का मुझ पर गहरा असर पड़ा और इसने इतिहास और मौजूदा जमाने के मामलों को नई रोशनी में देखने में मदद पहुँचाई। इतिहास और समाज के विकास के लंबे सिलसिले में एक मतलब और आपस का रिश्ता जान पड़ा और भविष्य का धुंधलापन कुछ कम हो गया।" भविष्य का धुंधलापन कम तब होता है जब भविष्य में दिलचस्पी हो,सामाजिक मर्म को पकड़ने, समझने और बदलने की आकांक्षा हो।इसी प्रसंग में पंडित नेहरू ने कहा "असल में मेरी दिलचस्पी इस दुनिया में और इस जिंदगी में है,किसी दूसरी दुनिया या आनेवाली जिंदगी में नहीं।आत्मा जैसी कोई चीज है भी या नहीं मैं नहीं जानता.और अगरचे ये सवाल महत्व के हैं,फिर भी इनकी मुझे कुछ भी चिंता नहीं।"पंडितजी जानते थे भारत में धर्म सबसे बड़ी वैचारिक चुनौती है।सवाल यह है धर्म को कैसे देखें ॽ
पंडितजी का मानना है " 'धर्म' शब्द का व्यापक अर्थ लेते हुए हम देखेंगे कि इसका संबंध मनुष्य के अनुभव के उन प्रदेशों से है,जिनकी ठीक-ठीक मांग नहीं हुई है,यानी जो विज्ञान की निश्चित जानकारी की हद में नहीं आए हैं।" फलश्रुति यह कि जीवन के सभी क्षेत्रों में विज्ञान को पहुँचाएं,विज्ञान को पहुँचाए वगैर धर्म की विदाई संभव नहीं है।