सागर के सूजे लिजलिजे
हलके सिरहाने पर सिर धरे
रो रहा है अपनी नियति पर सूर्य /
दिन दिन भर खारे पानी को चाटती
बालू के लहरों के मांसल गदराये अंगों पर
तीब्र वासना की अंगुलियाँ फेर फेर
हांथों से छू छू कर निश्चेष्ट श्लथ थकी हारी दूर...
वह जो सामने नारियल पर जा कर औंधा मुह किये
उलटी टंग गयी हवा !
संज्ञा शून्य इंजक्सन आकर रात ने कोंच दिया मार्फिया का
बीज जो अँधेरे के इधर उधर छितराए सभी उग आये
डर से बदनामी के उजाला छपाक ..
पानी में कूद आत्म हत्या कर मर गया
उस नारियल के पीछे जरा ऊपर
आसमान में लटकता मांस का लोथड़ा
कचर कच कचा कच कच कच चबाता भेड़िया
क्षितिज के गह्वर में कंही खो गया.....!!
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