Friday, 6 April 2018

इतिहास बयान करते हैं इलाहाबाद के पुराने मोहल्ले

इतिहास बयान करते हैं इलाहाबाद के पुराने मोहल्ले
एक रशियन दार्शनिक सोरोवस्की का विचार है कि यदि किसी नगर, स्थान या क्षेत्र का इतिहास जानना हो तो पहले उसके नाम का इतिहास जानें, क्योंकि नाम उसकी ऐतिहासिकता का प्रतीक होता है। इलाहाबाद शहर के पुराने मोहल्लों का नामकरण कैसे हुआ, इस पर गौर करें तो यह बात पूरी तरह सही साबित होती है, क्योंकि ये नाम इतिहास बयान करते हैं। मुट्ठीगंज, कीडगंज, रामबाग, चौक, खुल्दाबाद, जानसेनगंज, गढ़ीसराय, सरायमीर खां, शाहगंज, रोशनबाग, अहियापुर, कटरा, सिविल लाइंस, ममफोर्डगंज आदि बहुत पहले आबाद हुए मोहल्ले हैं। शहर लंबे समय तक मुगलों और अंग्रेजों की हुकूमत में रहा। यहां के पुराने मोहल्ले में से कुछ मुगलों के बसाए हैं तो कुछ अंग्रेजों के। इनकी तह में जाएं तो अतीत की कई अनछुई दास्तानें परत दर परत खुलती हैं।
सौ बरस पहले के और अब के इलाहाबाद में जमीन आसमान का अंतर है। आज का भीड़भाड़ वाला चौक इलाका सौ साल पहले एक साधारण गांव जैसा था। यहां मुगलों के समय की बनीं दो सराएं थीं, खुल्दाबाद सराय और गढ़ी सराय। शहर के सबसे खास कारोबारी इलाकों में शुमार मुट्ठीगंज का नाम अंग्रेजी हुकूमत के पहले कलेक्टर मिस्टर आर. अहमुटी के नाम पर पड़ा। जबकि शहर की पहचान माने जाने वाले पंडों व प्रयागवालों के परंपरागत क्षेत्र कीडगंज का नाम किले के अंग्रेज कमांडेंट जनरल कीड के नाम पर पड़ा। मुगल शासक शाहजहां का बड़ा लड़का दारा शिकोह था, जिसके नाम पर दारागंज मोहल्ला आबाद हुआ।
ईस्वी सन 1906 के आसपास संयुक्त प्रांत के उपराज्यपाल मिस्टर जेम्स डिग्स लाटूश ने स्टेशन के आगे सरकारी कर्मचारियों के रहने के लिए एक मोहल्ला बसाया, जिसका नाम उन्होंने गवर्नमेंट प्रेस के तत्कालीन सुपरिटेंडेंट मिस्टर एफ. लूकर के नाम पर लूकरगंज रखा। इलाहाबाद आर्कियोलॉजिकल सोसायटी के लिए हिंदुस्तानी एकेडमी से प्रकाशित प्रयाग प्रदीप में डॉ. सालिग्राम श्रीवास्तव ने चौक व इसके आसपास के इलाकों की तत्कालीन दशा पर लिखा - ' जहां आज चौक मोहल्ला है, वहां चारों ओर कच्चे घर थे। कोई-कोई मकान पक्के और कुछ बिना प्लास्टर की पक्की ईंटों के बने थे। बीच में एक पक्की गड़ही थी, जिसमें आस-पास का पानी इकट्ठा होता था तथा कूड़ा-करकट फेंका जाता था। लोग उसे लाल डिग्गी कहते थे। उसके किनारे कुछ बिसाती, कुंजड़े और अन्य छोटे-छोटे दुकानदार चबूतरों पर बैठते थे। जांस्टनगंज घनी बस्ती थी। चौक से कटरे की ओर जाने के लिए ठठेरी बाजार, शाहगंज, लीडर रोड का रास्ता था।'
1864 के आसपास जिले के कलेक्टर मि. विलियम जांस्टन ने चौक की पुरानी बस्ती की जगह नया बाजार व पक्की सड़क बनवाई थी, जिसे जांस्टनगंज कहा जाने लगा। चौक में जहां बरामदा के नाम से सौंदर्य प्रसाधन की दुकानें हैं, वहां पहले एक विशाल कुआं था। इसके ठीक सामने गिरजाघर के पास नीम के सात पेड़ों का समूह था, जिन पर अंग्रेजी पुलिस क्रांतिकारियों को फांसी देती थी और कुएं में दफन कर देती थी। 1873 में लाल डिग्गी की गड़ही को शहर के माने हुए रईस बाबू रामेश्वर राय चौधरी ने पटवाकर सब्जी मंडी बनवाई। बाबू साहब कचहरी के प्रसिद्ध गुमाश्ता थे। सब्जी मंडी के पास ही यहां की मशहूर तवायफ जानकी बाई इलाहाबादी उर्फ छप्पन छूरी की कोठी थी।
1874 में कोतवाली बनी। कोतवाली के पीछे रानी मंडी है, जिसका नामकरण इंग्लैंड की महारानी विक्टोरिया के शासन की शुरुआत की याद में रखा गया। रानी मंडी व भारतीय भवन पुस्तकालय के पीछे पहले एक पठार था, जिसे खुशहाल पर्वत कहा जाता था। इसी नाम से वहां पर एक बस्ती अभी भी आबाद है। पास ही में पहले साधु गंगादास रहते थे, जिनके नाम पर चौक गंगादास मोहल्ला बसा। खुशहाल पर्वत से नीचे की तरफ के खाली स्थान में मालवीय लोगों के डेरा जमा लेने से मालवीय नगर मोहल्ला बसा। इसी के पास दक्षिण की ओर पहले किसी सती (देवी) का चौरा (चबूतरा) था, जिसे सत्ती चौरा मोहल्ला कहा जाता है। राजा अहिच्छत्र के नाम पर अहियापुर मोहल्ला बसा। दरिया (यमुना) के किनारे होने के कारण मुगलकाल से ही दरियाबाद नाम से एक मोहल्ला आबाद है।
जहां अब कंपनीबाग है, वहां पहले सम्दाबाद व छीतपुर नाम के दो गांव थे। अंग्रेजों के विरुद्ध गदर से नाराज कंपनी की पलटन ने दोनों गांव तबाह कर दिया और वहां कंपनी बाग (अल्फ्रेड पार्क) की नींव रखी। इंग्लैंड से इलाहाबाद भेजे गए सर विलियम म्योर को इलाहाबाद बहुत सुहाया। माना जाता है कि उन्हीं के जमाने में इलाहाबाद सबसे ज्यादा चमका। हाईकोर्ट का विशाल भवन (पुराना), गवर्नमेंट प्रेस, रोमन कैथोलिक चर्च, पत्थर का बड़ा गिरजा (आल सेंट्स कैथेड्रल) तथा सबसे महत्वपूर्ण म्योर सेंट्रल कालेज उन्हीं के समय में बना। उनके नाम से म्योराबाद बस्ती भी बसाई गई। इलाहाबाद का सबसे पुराना अखबार पायनियर, जो बाद में लखनऊ चला गया, के संस्थापक सर जार्ज एलन व म्यूनिसिपल बोर्ड के चेयरमैन रहे मिस्टर ममफोर्डगंज के नाम पर एलनगंज व ममफोर्डगंज मोहल्ले बसे।
मुगल शासक अकबर के उत्तराधिकारियों में औरंगजेब की ख्याति कट्टर इस्लामी शासक की रही। संत मलूकदास ने भी उसे एक नाम 'मीर राघव' दिया था। इसी के नाम पर चौक के बगल में सराय मीर खां मोहल्ला बसा, जो बाद में भगवान शंकर के नाम पर लोकनाथ कहा जाने लगा। शायद मीरापुर और मीरगंज मोहल्ले भी इसी नाम पर बने। परन्तु इसकी कोई लिखित दास्तान उपलब्ध नहीं है। चौक व जांस्टनगंज के बीच स्थित घंटाघर सन 1913 में यहां के रईस रायबहादुर लाला रामचरन दास तथा उनके भतीजे लाला विशेशर दास ने अपने-अपने पुत्र लाला मुन्नीलाल की याद में बनवाया था। घंटाघर ठीक उसी आकार व रंगरूप का बनवाया गया था जैसा कि दिसंबर सन 1910 में यमुना किनारे किले के पश्चिम में लगी प्रदर्शनी में बना था। दो सौ बीघा जमीन पर तीन महीने तक लगी रही इस राष्ट्रीय स्तर की प्रदर्शनी को देखने देश-विदेश के आठ लाख लोग आए थे। जिसमें जर्मनी के युवराज व हिंदुस्तान के लगभग सभी रियासतों के राजे-महराजे शामिल थे। माना जाता है कि कुंभ मेले के बाद इतनी भीड़ इसी प्रदर्शनी में देखी गई थी। प्रदर्शनी पर साढ़े इक्कीस लाख रुपये व्यय हुए थे। इसकी दास्तान 1931 के सरकारी गजेटियर में भी है। देश में इसी साल पहली बार हवाई जहाज उड़ाया गया था।
रायबहादुर के नाम पर बहादुरगंज मोहल्ला बसा तथा इस प्रांत के उप राज्यपाल रहे सर जार्ज हिवेट के नाम पर हिवेट रोड (विवेकानंद मार्ग) बनी। जबकि उस समय के ख्याति प्राप्त अंग्रेजी अखबार लीडर के नाम पर लीडर रोड (स्टेशन रोड) मोहल्ला बसा। इसका प्रकाशन वहीं होता था, जहां से आजकल दैनिक आज अखबार निकलता है। तब हाईकोर्ट के प्रसिद्ध वकील और कुछ समय तक डिप्टी कलेक्टर रहे शहर के जैन रईस बाबू शिवचरण लाल के नाम पर एक सड़क राधा थिएटर मानसरोवर सिनेमा के सामने बनाई गई थी, जो अब भी इसी नाम से जानी जाती है। म्यूनिसिपल बोर्ड के चेयरमैन रहे कामता प्रसाद कक्कड़ के नाम पर केपी कक्कड़ रोड (जीरो रोड) बनी। 1931 में रोशन बाग मोहल्ला नवाब सर बुलंद खां के नायब रोशन खां के नाम पर बसा। मुगल शासक जहांगीर ने अपनी पदवी बादशाही के नाम पर पहले बादशाही मंडी बनवाई थी जो अब मोहल्ला बन गया है।
सिविल लाइन पहले एक पिछड़ा हुआ इलाका था। इसका विकास कार्य 1858 में शुरू हुआ, जो 17 वर्षों तक चलता रहा। पहले इसे कैनिंग टाउन (कैनिंगटन) कहा जाता था। 1920-21 के पहले अंग्रेजी सेना के कर्नल व अन्य अधिकारी आनंद भवन के आसपास रहते थे, जिसे कर्नलगंज कहा जाने लगा। लेकिन बाद में उन्हें दूसरी जगह बसा दिया गया जिसे छावनी क्षेत्र (कैंटोनमेंट) कहा जाता है। यहां के तत्कालीन कमिश्नर मिस्टर थार्नहिल के नाम पर थार्नहिल रोड (दयानंद मार्ग) बना।
जयपुर के प्रसिद्ध राजा महाराज जयसिंह ने औरंगजेब द्वारा दी गई जागीर पर इलाहाबाद सहित कई जिलों में कटरा मोहल्ला बसाया। यहां के पुराने आमिल (दीवान) राजा नवल राय के नाम से कीडगंज व बैरहना के बीच मोहल्ला तालाब नवल राय बना। दीवान नवलराय लखनऊ की शिया रियासत के वजीर और सिपहसालार थे। अवध की सुबेदारी और हुकूमत के वे मजबूत स्तंभ थे और अवध के नवाब के भरोसेमंद सामंतों में गिने जाते थे। इन्होंने दारागंज में राधाकृष्ण का एक मंदिर बनवाया था। मंदिर में पूजा के लिए जिस खूबसूरत फुलवारी से फूल लिए जाते थे, वह फुलवारी रोड (कच्ची सड़क दारागंज) कहा जाता है।
नगर की प्रसिद्ध पथरचट्टी राम लीला कराने के लिए डेढ़ सौ साल पहले शहर के कारोबारियों में माने हुए सेठ लाला दत्ती लाल कपूर ने मुट्ठीगंज के आगे लंबी चौड़ी जमीन खरीदकर उसका नाम रामबाग रखा। बाद में इसी नाम से यहां एक मोहल्ला आबाद हुआ। मुगल काल व इससे पहले इलाहाबाद की ख्याति धर्म व मजहबी तौर पर ज्यादा थी। बहुत कम लोग जानते हैं कि अकबर ने शहर के मंदिरों, मठों, अखाड़ों, मुस्लिम दायरों, दरगाहों, संतों, फकीरों, सूफियों व औघड़ों को देखकर पहले इसका नाम फकीराबाद रखा था। बाद में कुछ समय तक यह इलाहाबास (सरकारी गजेटियर में भी यही नाम मिलता है) नाम से जाना गया। मजहबी प्रेरणा से ही अकबर ने इस नगर को अंत में 'अल्लाह से आबाद ' कहा जो बाद में इलाहाबाद हो गया। तब से यही नाम बदस्तूर जारी है। धार्मिक वजहों से कुछ और मोहल्ले भी जाने गए। कल्याणी देवी, अलोपी देवी और सूर्यकुंड जैसे प्राचीन मंदिरों के नाम से कल्याणी देवी, अलोपीबाग और सूरजकुंड मोहल्ले बने। अत्रि ऋषि और अनसुइया आश्रम होने के कारण
अतरसुइया मोहल्ला बसा।
शहर के पुराने पुरोहित 72 वर्षीय पं. नवरंग महराज के अनुसार गंगागंज व बेनीगंज मोहल्ले करीब डेढ़ सौ साल पहले गंगेश्वर नाथ महादेव के भक्त पं. गंगाराम तिवारी व पं, बेनी प्रसाद के नाम पर बसाए गए थे। जबकि पुराने समय में यमुना के किनारे गउओं (गायों) का मेला लगने के कारण गऊघाट मोहल्ला बसा। शहर के दक्षिणी भाग का नाम नैनी पहाड़ों की देवी (नयना देवी) के नाम पर पड़ा।
सरकारी अभिलेखों के अनुसार 1868 व 1896 में यमुना पार में भयंकर दुर्भिक्ष पड़ा। इसी दौरान कुमाऊं व गढ़वाल से कुछ पहाड़ी लोग यहां काम की तलाश में आए। वे अपने साथ नयना देवी की मूर्ति लाए और उसे यहीं स्थापित कर देवी के नाम पर नयनी (नैनी) कहने लगे। इसके पहले यहां सिर्फ जंगल था।
शहर के कुछ और मोहल्ले स्थानीय काम-धंधों के नाम से जाने जाते थे, जो अब भी जारी है। इनमें शामिल है ठठेरी बाजार (बर्तन), घास सट्टी, भूसौली (भूसा) टोला, गाड़ीवान टोला, बजाजा (कपड़ा) पट्टी, इत्यादि

अगर नेहरू ना होते…

अगर नेहरू ना होते……
नेहरू के पिता का नाम ग्यासुद्दीन गाजी था। जवाहर अपने आप में अरबी शब्द है, कोई कश्मीरी पंडित अपने बेटे का नाम जवाहर क्यों रहेगा? नेहरू मुगलिया खानदान की औलाद था। अय्याश तो इतना बड़ा था, कि विदेशी लड़कियों के साथ सिगरेट ही पीता रहता था। बताओ तो, प्रमाण के लिए प्रत्यक्ष फ़ोटो दिखाऊं! नेहरू की वजह से कश्मीर समस्या खड़ी हुई। चीन के साथ युद्ध नेहरू ने जानकर हरवा दिया। नेहरू अंग्रेजों का चमचा था। दरअसल, नेहरू को उसके चाटुकार बुद्धजीवियों ने महान बना दिया, नहीं तो बताओ जिन अंग्रेजों ने देश को गुलाम बनाया उन्हीं अंग्रेज की पत्नी ऐडविना के साथ चोंच लड़ाता था, कहो तो प्रमाण के लिए प्रत्यक्ष फोटो पेश करूं.
केवल इतनी ‘किवदंतियां’ (बातें) एक दो और भी होंगीं, जैसे सरकारी आईपी एड्रेस से नेहरू की वीकिपीडिया में परिवर्तन करना, इन चार सालों में एक विशेष विचारधारा के पेड समर्थकों ने गढ़/फैला पाई हैं। अब मैं बहुत सारा माल आपको दे रहा हूं, अपनी-अपनी व्हाट्स एप यूनिवर्सिटी में सर्कुलेट कर दीजिएगा। सौ फीसदी नया है, मार्केट में पहली बार।
अगर नेहरू ना होते तो हम हिंदू राष्ट्र होते। हम पाकिस्तान होते। यहां मुसलमान नहीं होते। अगर होते तो जैसे पाकिस्तान में हिंदू हैं, वैसे होते। कितना अच्छा होता। अगर नेहरू ना होते तो भारत के संविधान की प्रस्तावना के विशेष फिचर- लोकतंत्र, समाजवाद, फंडामेंडल राइट्स, सेकुलरिज़्म नहीं होते, कितना अच्छा होता। अगर नेहरू नहीं होते, तो भारत एक भारत नहीं होता, ऐसे 20-30 भारत होते, जो हर तरह (धार्मिक, क्षेत्रीय, भाषाई, जातीय) की कट्टरता के अपने-अपने अलग-अलग पाकिस्तान होते। कितना अच्छा होता। अगर नेहरू ना होते, आधुनिक सोच नहीं होती, आधुनिक शिक्षा नहीं होती, आधुनिक विचारों की तरफ हम नहीं मुड़ते, वैज्ञानिक सोच को हम तवज्जो नहीं देते और हम प्रधान सेवक (मोदी जी) के शब्दों में सपेरा होते. बीन बजाते हुए सपेरा। जंगलों में नागिन के ढूंढ़ने के लिए जटा बढ़ाए हुए घुम रहे होते, सॉफ्टवेयर एक्सपर्ट! छि! क्या बना दिया नेहरू ने, सपेरा होते, सोचो कितना अच्छा होता। अगर नेहरू ना होते, तो दुनिया में क्षेत्रफल की दृष्टि से सातवें और जनसंख्या की दृष्टि से दूसरे सबसे बड़े देश में बिजली नहीं होती! क्योंकि बांध ही नहीं होते, मंदिर होते- वाउ ! मंदिर ही मंदिर या फिर मस्जिद ही मस्जिद ही। हर नुक्कड़ पर एक मंदिर-एक मस्जिद, सोचो कितना अच्छा होता। अगर नेहरू ना होते, तो गांधी को कितनी जल्दी मार सकते थे, सरदार पटेल के विचारों कितनी जल्दी धूल में मिला सकते थे, देश को कट्टरता की तरफ मोड़ने में हमें 70 साल थोड़ी ना लगते, सोचिए कितना अच्छा होता। अगर नेहरू ना होते, संविधान भी होता और सुप्रीम कोर्ट भी होता, लेकिन बिलकुल वैसा ही जैसा पाकिस्तान का सालों पहले तक रहा है। अगर नेहरू ना होते तो हम चीन से नहीं हारते, क्या जाता था युद्ध ही नहीं करते- हमें तो गुलामी की आदत पड़ी थी दे देते जमीन, बच्ची हुई जमीन में अपना हिंदू राष्ट्र चलाते/बनाते। सोचिए...सोचिए...कितना अच्छा होता। अगर नेहरू ना होते....
नेहरू आज भी नासूर हैं क्योंकि-
भगत सिंह ने जेल में नेहरू और गांधी में से नेहरू को चुना था। गांधी ने पटेल और नेहरू में से नेहरू को चुना था। गांधी की शव यात्रा में नेहरू आंसूओं से रो रहे थे। बच्चे की तरह भागते फिर रहे थे। पटेल के साथ वैचारिक मतभेद होने के बाद भी राज्यों को एक करने के वक्त पटेल के पीछे दीवार की तरह खड़े रहे थे। हजार विरोध होने के बावजदू, अपने मंत्री (अंबेडकर) के इस्तीफा देने के बाद भी हिंदू मैरिज एक्ट समेत कई बिल पारित कराकर हिंदू धर्म में सुधार का जिम्मा उठाया था। जेल में बैठकर किताबें लिखने वाले नेहरू को इस देश की जनता ने सर आंखों पर बिठाया। लोगों ने नेहरू को पत्थर मारे, नेहरू ने उन्हें पुचकारा। नेहरू कोई सड़क पर घूमता हुआ दो कौड़ी का ‘ब्लडी इंडियन’ नहीं था, चाहता तो जिंदगी भर विदेशों में मौज से रहता और उसकी सात पीढ़ियां अमेरिका में रहिशी से जीती लेकिन, एक करीब-करीब उज़ड़े देश को उसने बनाया, और देश ने इसे समझा, हाथों-हाथ लिया। नेहरू ने इस देश को हमेशा खुद से और खुद की पार्टी से ऊपर रखा।
लोग आज नेहरू के छोटे-छोटे किस्से फेसबुक पर लिख रहे हैं- मैं तो कहता हूं, नेहरू की महानता के कितने किस्से सुनने हैं, मुझे बताओ-
वो सुनाऊं जब आनंद भवन में स्कूल के लड़कों ने बरसात में किताबें भीगने की बात कही तो कैनवास के बस्ते और बरसाती कोट दिल्ली से नेहरू ने भिजवाए थे।
या फिर वो जब पिता मोतीलाल के मना करने पर भी छिपकर 101 रूपए बुंदेलखंड राहत कोष के लिए चंदा मांगने आए लड़कों को दिये थे।
या फिर वो जब पार्टीशन के वक्त आदमपुर के पास कमालपुर में मुस्लिम शरणार्थियों के कैंप में नेहरू गए तो ‘हत्यारा आ गया…जल्लाद आ गया…जालिम आ गया’ के नारे मुसलमान लगा रहे थे, जब कैंप से वापस लौटे तो- ‘गांधी नेहरू हमारे माई-बाप हैं…वजीरे आज़म हिंदुस्तान, जिंदाबाद’ के नारे लग रहे थे।
या फिर वो जब इलाहाबाद वापस लौट रहे थे तो सर्दियों में अंधेरे के दिनों में उनकी कार से एक गाय टकरा गई, उसका सींग टूट गया तो नेहरू सड़क पर खड़े रहे पता किया ये किसकी गाय है, फिर उस व्यक्ति को इलाज के लिए पैसे दिए।
या फिर वो जब उन्होंने खुद ही मॉडर्न रिव्यू में आर्टिकल लिख कर देश को आगाह किया कि नेताओं के फैन मत बनिए, नहीं तो वो तानाशाह बन सकते हैं। आप लोग जितना प्यार मुझे करते हैं, ऐसे वक्त में मैं भी तानाशाह बन सकता हूं।
छोड़िए, इस देश के हर शहर में, हर कस्बे में नेहरू को लेकर हजार कहानियां हैं। आप सुनेंगे तो कहेंगे कि ऐसा नेता भी हो सकता है क्या ? इसका मतलब ये कतई नहीं है कि मैं नेहरू को सौ फिसदी सही या परफेक्ट मानता हूं, नहीं मानता लेकिन हां, भारत का अब तक का सबसे बड़ा लीडर जरूर मानता हूं। सबसे महान। जो कहता था कि ‘मुझे मीडिया का ज्यादा हस्तक्षेप भी पसंद है, मीडिया के जड़ होने की बजाय।’ या फिर ‘अख़बार सरकार की आलोचना नहीं करेंगे तो कौन करेगा।’
प्रधानमंत्री मोदी जी ने ट्विटर पर छह शब्दों के एक ट्विट में नेहरू को आज याद किया। मुझे खुशी है, क्योंकि मैं समझ सकता हूं, मजबूरियां। प्रधानमंत्री होते हुए प्रचारक का धर्म निभाना आसान काम नहीं है। खैर, नेहरू को लेकर मैं बिलकुल भावुक नहीं हूं। आपसे एक ही गुजारिश है, धर्म और राजनीति का मिश्रण किसी भी देश के लिए खतरनाक है। खुद को कट्टर होने से बचाइए। आधुनिकता, उदारता और धर्मनिरपेक्षता के साथ रहिए चाहे अकेला ही क्यों ना रहना पड़े। यही राष्ट्रवाद है, यही देश भक्ति है।
#नेहरू_जन्मतिथि
Chaman Mishra (hamare shahar se )

भारत का मर्म और पंडित नेहरू ....

भारत का मर्म और पंडित नेहरू ....

भारत की आत्मा को समझने में पंडित जवाहरलाल नेहरू से बढ़कर और कोई बुद्धिजीवी हमारी मदद नहीं कर सकता।पंडितजी की भारत को लेकर जो समझ रही है ,वह काबिलेगौर है।वे भारतीय समाज,धर्म,संस्कृति,इतिहास आदि को जिस नजरिए से व्यापक फलक पर रखकर देखते हैं वह विरल चीज है।
पंडित नेहरू ने लिखा है ''जो आदर्श और मकसद कल थे,वही आज भी हैं,लेकिन उन पर से मानो एक आब जाता रहा है और उनकी तरफ बढ़ते दिखाई देते हुए भी ऐसा जान पड़ता है कि वे अपनी चमकीली सुंदरता खो बैठे हैं,जिससे दिल में गरमी और जिस्म में ताकत पैदा होती थी।बदी की बहुत अकसर हमेशा जीत होती रही है लेकिन इससे भी अफसोस की बात यह है कि जो चीजें पहले इतनी ठीक जान पड़ती थीं,उनमें एक भद्दापन और कुरूपता आ गई है। '' चीजें क्रमशःभद्दी और कुरूप हुई हैं,सवाल यह है कि यह भद्दापन और कुरूपता आई कहां से ॽक्या इससे बचा जा सकता था ॽयदि हां तो उन पहलुओं की ओर पंडितजी ने जब ध्यान खींचा तो सारा देश उस देश में सक्रिय क्यों नहीं हुआ ॽ
पंडित जवाहरलाल नेहरू ने लिखा है" हिंदुस्तान में जिंदगी सस्ती है। इसके साथ ही यहां जिंदगी खोखली है,भद्दी है,उसमें पैबंद लगे हुए हैं और गरीबी का दर्दनाक खोल उसके चारों तरफ है।हिंदुस्तान का वातावरण बहुत कमजोर बनानेवाला हो गया है।उसकी वजहें कुछ बाहर से लादी हुई हैं,और कुछ अंदरूनी हैं,लेकिन वे सब बुनियादी तौर पर गरीबी का नतीजा हैं। हमारे यहां के रहन-सहन का दर्जा बहुत नीचा है और हमारे यहां मौत की रफ्तार बहुत तेज है।" पंडितजी और उनकी परंपरा ´मौत की रफ्तार´ को रोकने में सफल क्यों नहीं हो पायी ॽ पंडित जानते थे कि भारत में जहां गरीबी सबसे बड़ी चुनौती है वहीं दूसरी ओर धर्म और धार्मिकचेतना सबसे बड़ी चुनौती है।
पंडित नेहरू ने लिखा है- "अगर यह माना जाये कि ईश्वर है,तो भी यह वांछनीय हो सकता है कि न तो उसकी तरफ ध्यान दिया जाये और न उस पर निर्भर रहा जाये। दैवी शक्तियों में जरूरत से ज्यादा भरोसा करने से अकसर यह हुआ भी है और अब भी हो सकता है कि आदमी का आत्म-विश्वास घट जाए और उसकी सृजनात्मक योग्यता और सामर्थ्य कुचल जाये।"
धर्म के प्रसंग में नेहरूजी ने लिखा- "धर्म का ढ़ंग बिलकुल दूसरा है।प्रत्यक्ष छान-बीन की पहुंच के परे जो प्रदेश है,धर्म का मुख्यतःउसीसे संबंध है और वह भावना और अंतर्दृष्टि का सहारा लेता है। संगठित धर्म धर्म-शास्त्रों से मिलकर ज्यादातर निहित स्वार्थों से संबंधित रहता है और उसे प्रेरक भावना का ध्यान नहीं होता।वह एक ऐसे स्वभाव को बढ़ावा देता है,जो विज्ञान के स्वभाव से उलटा है। उससे संकीर्णता,गैर-रवादारी, भावुकता,अंधविश्वास,सहज-विश्वास और तर्क-हीनता का जन्म होता है। उसमें आदमी के दिमाग को बंद कर देने का सीमित कर देने का,रूझान है।वह ऐसा स्वभाव बनाता है,जो गुलाम आदमी का,दूसरों का सहारा टटोलनेवाले आदमी का, होता है।" आम आदमी के दिमाग को खोलने के लिए कौन सी चीज करने की जरूरत है ॽक्या तकनीकी वस्तुओं की बाढ़ पैदा करके आदमी के दिमाग को खोल सकते हैं या फिर समस्या की जड़ कहीं और है ॽ
पंडित नेहरू का मानना है - "हिन्दुस्तान को बहुत हद तक बीते हुए जमाने से नाता तोड़ना होगा और वर्तमान पर उसका जो आधिपत्य है,उसे रोकना होगा। इस गुजरे जमाने के बेजान बोझ से हमारी जिंदगी दबी हुई है। जो मुर्दा है और जिसने अपना काम पूरा कर लिया है,उसे जाना होता है।लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि गुजरे जमाने की उन चीजों से हम नाता तोड़ दें या उनको भूल जाएं ,जो जिंदगी देनेवाली हैं और जिनकी अहमियत है।" यह भी लिखा, "पिछली बातों के लिए अंधी भक्ति बुरी होती है।साथ ही उनके लिए नफ़रत भी उतनी ही बुरी होती है।उसकी वजह है कि इन दोनों में से किसी पर भविष्य की बुनियाद नहीं रखी जा सकती।"
"गुजरे हुए जमाने का -उसकी अच्छाई और बुराई दोनों का ही-बोझ एक दबा देने वाला और कभी-कभी दम घुटाने वाला बोझ है,खासकर हम लोगों में से उनके लिए ,जो ऐसी पुरानी सभ्यता में पले हैं,जैसी चीन या हिन्दुस्तान की है। जैसाकि नीत्शे ने कहा है- " न केवल सदियों का ज्ञान,बल्कि ,सदियों का पागलपन भी हममें फूट निकलता है।वारिस होना खतरनाक है।"इसमें सबसे महत्वपूर्ण है ´वारिस´वाला पहलू।इस पर हम सब सोचें।हमें वारिस बनने की मनोदशा से बाहर निकलना होगा।
पंडित नेहरू ने लिखा है- "मार्क्स और लेनिन की रचनाओं के अध्ययन का मुझ पर गहरा असर पड़ा और इसने इतिहास और मौजूदा जमाने के मामलों को नई रोशनी में देखने में मदद पहुँचाई। इतिहास और समाज के विकास के लंबे सिलसिले में एक मतलब और आपस का रिश्ता जान पड़ा और भविष्य का धुंधलापन कुछ कम हो गया।" भविष्य का धुंधलापन कम तब होता है जब भविष्य में दिलचस्पी हो,सामाजिक मर्म को पकड़ने, समझने और बदलने की आकांक्षा हो।इसी प्रसंग में पंडित नेहरू ने कहा "असल में मेरी दिलचस्पी इस दुनिया में और इस जिंदगी में है,किसी दूसरी दुनिया या आनेवाली जिंदगी में नहीं।आत्मा जैसी कोई चीज है भी या नहीं मैं नहीं जानता.और अगरचे ये सवाल महत्व के हैं,फिर भी इनकी मुझे कुछ भी चिंता नहीं।"पंडितजी जानते थे भारत में धर्म सबसे बड़ी वैचारिक चुनौती है।सवाल यह है धर्म को कैसे देखें ॽ
पंडितजी का मानना है " 'धर्म' शब्द का व्यापक अर्थ लेते हुए हम देखेंगे कि इसका संबंध मनुष्य के अनुभव के उन प्रदेशों से है,जिनकी ठीक-ठीक मांग नहीं हुई है,यानी जो विज्ञान की निश्चित जानकारी की हद में नहीं आए हैं।" फलश्रुति यह कि जीवन के सभी क्षेत्रों में विज्ञान को पहुँचाएं,विज्ञान को पहुँचाए वगैर धर्म की विदाई संभव नहीं है।

इंदिरा प्रिदार्शिनी

इंदिरा गांधी की मौत पे बीबीसी में रेहान फ़ज़ल की रपट पढ़ी, तब से बेचैन था। भला ये कैसे हो सकता है कि एक प्रधानमंत्री ने ऑपरेशन ब्लू स्टार चलाकर धर्मभीरू सिखों को आहत कर दिया हो और जब खुफिया रिपोर्ट उनकी टेबल पे आए कि सिख सुरक्षाकर्मी उनकी जान के लिए खतरा हो सकते हैं तो प्रधानमंत्री उस फाइल पर सिर्फ तीन शब्द लिखें- Aren't we secular?
इतना बड़ा दिल, इतनी हिम्मत और देश की संस्कृति और इसके मिजाज के समझने का ऐसा नजरिया सिर्फ इंदिरा गांधी के पास हो सकता था, जिन्होंने अपना बचपन बापू के साए में बिताया था. वो जानती थीं कि अगर धर्म के नाम पर उन्होंने सिख सुरक्षाकर्मियों को अपनी सिक्योरिटी से हटाया तो इतिहास हमेशा ये लिखेगा कि देश के प्रधानमंत्री ने धर्म के नाम पर अपने सुरक्षा गार्डों से भेदभाव किया. ये जानते हुए कि तत्कालीन परिस्थितियों में उनकी जान को गंभीर खतरा है, उन्होंने राजधर्म का पालन किया. ये मामूली बात नहीं है.
आज जब छोटे से छोटा टुटपुजिया राजनेता ओछी राजनीति के लिए धर्म का खुलेआम बेजा इस्तेमाल करता है और धर्म के नाम पर जनता में जहर बोता है और फिर अपनी सुरक्षा में सैकड़ों जवान लिए घूमता है कि कहीं कोई उनको मार ना दे, इस भीड़ में इंदिरा जी एक मिसाल थीं, आदर्श थीं. और अपने आदर्श के लिए उन्होंने अपनी जान तक की परवाह नहीं की.
आज मैं ये कहने का साहस कर रहा हूं कि स्वर्गीय इंदिरा गांधी की हत्या नहीं की गई थी. उन्होंने आत्महत्या की थी, देश की एकता और अखंडता के लिए. ये कोई सोच भी सकता है भला कि प्रधानमंत्री को उन्हीं की सुरक्षा में तैनात जवान 28-30 गोली मार के उनके जिस्म को छलनी-छलनी कर सकते हैं??!! वो भी तब जब सैकड़ों सिक्युरिटी लेयर से गुजरने के बाद इन जवानों को प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति की सुरक्षा में लगाया जाता है. इंदिरा गांधी के लिए बहुत आसान था कि ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद वो सिख सुरक्षाकर्मियों को अपनी सिक्योरिटी से हटा देतीं, वो भी तब जब इस बाबत खुफिया रिपोर्ट उनकी टेबल पर थी, पर उन्होंने ऐसा नहीं किया.
आगे की कहानी तो और दर्दनाक है. खून से लथपथ प्रधानमंत्री को एम्स ले जाया जा रहा है और उनका सिर बहू सोनिया गांधी की गोद में है. सोनिया का पूरा गाउन इंदिरा के खून से सनकर लाल हो चुका है. उस दृश्य की जी रही सोनिया के दिलोदिमाग पर क्या असर पड़ा होगा, ये बस अंदाजा ही लगाया जा सकता है. फिर जब मृतप्राय इंदिरा जी को लेकर कार एम्स पहुंची तो पता चला कि देश के प्रधानमंत्री को गोलियों से छलनी करने की खबर किसी ने एम्स को नहीं दी ताकि स्टैंड बाई में उनके लिए डॉक्टर और इमरजेंसी सेवाएं खड़ी रहतीं. सिर्फ गेट खुलवाने में 3-4 मिनट का कीमती समय बर्बाद हो गया. इतनी सादगी, इतना समर्पण !!! वो देश की सबसे ताकतवर और लोकप्रिय प्रधानमंत्री थीं, जिसने पाकिस्तान के दो टुकड़े कर दिए. कोई मजाक नहीं था. और जब वो जिंदगी मौत से जूझ रही थीं तो देश की राजधानी में उन तक इमरजेंसी मेडिकल सर्विस भी वक्त तक नहीं पहुंचीं, बहुत अफसोसनाक है ये सब कुछ.
और इस हृदय विदारक हादसे से गुजरने के बाद सोनिया गांधी ने अपने पति की लाश के टुकड़े देखे होंगे तो उन पे क्या एहसास गुजरा होगा, ये क्लपनातीत है. घर के दोनों बच्चे प्रियंका और राहुल ने ये सब अपनी आंखों के सामने घटते देखा और इनकी स्मृतियां उनके मस्तिष्क पर कैसी उभरी होंगी, किसी को नहीं मालूम. ठीक उसी तरह जब आज दुनिया को मालूम चल रहा है कि राहुल गांधी ने चुपचाप निर्भया के भाई को पायलट बनाने में मदद की और उनके पिता की टेम्परेरी नौकरी पक्की करवाई पर सख्त हिदायत दी कि इसका ढिंढोरा ना पीटा जाए. ये संस्कार हैं, जो इन्हें परिवार से मिले हैं.
सो मेरे लिए आज के बाद राहुल गांधी ना तो पप्पू हैं और ना बाबा. वो एक मैच्योर युवा हैं, जिनको पता है कि देश के हालात आज क्या हैं और अब वो इसे अपनी अगुुवाई में हैंडल करने के आतुर दिखते हैं. परिवार में दो-दो क्रूर हत्याएं देखने के बाद सत्ता संभालने की जो हिचक सोनिया-राहुल में दिखती थी, वो अब मुझे नहीं दिखती. सत्ता के शीर्ष पर होकर दो-दो जानें देश के लिए कुर्बान करने की ये मिसाल मुझे दुनिया में कहीं नहीं दिखतीं. अगर राहुल में कोई कमी है तो वो धीरे-धीरे सीख जाएंगे पर अब मुझे इस बात में कोई संदेह नहीं कि राहुल को एक बार देश की कमान सौंपकर आजमाने का वक्त आ गया है.
सो लोकतंत्र के यज्ञ में देश की जनता राहुल को लिए आहुति देगी या नहीं, ये तो उसे तय करन है

Saturday, 18 November 2017

दुर्लभं भारते जन्मः !!! भारतीय हेाने का गर्व करे !

1. अलबर्ट आइन्स्टीन - हम भारत के बहुत ऋणी हैं, जिसने हमें गिनती सिखाई, जिसके बिना कोई भी सार्थक वैज्ञानिक खोज संभव नहीं हो पाती।
2. रोमां रोलां (फ्रांस) - मानव ने आदिकाल से जो सपने देखने शुरू किये, उनके साकार होने का इस धरती पर कोई स्थान है, तो वो है भारत।
3. हू शिह (अमेरिका में चीन राजदूत)- सीमा पर एक भी सैनिक न भेजते हुए भारत ने बीस सदियों तक सांस्कृतिक धरातल पर चीन को जीता और उसे प्रभावित भी किया।
4. मैक्स मुलर- यदि मुझसे कोई पूछे की किस आकाश के तले मानव मन अपने अनमोल उपहारों समेत पूर्णतया विकसित हुआ है, जहां जीवन की जटिल समस्याओं का गहन विश्लेषण हुआ और समाधान भी प्रस्तुत किया गया, जो उसके भी प्रसंशा का पात्र हुआ जिन्होंने प्लेटो और कांट का अध्ययन किया, तो मैं भारत का नाम लूँगा।
5. मार्क ट्वेन- मनुष्य के इतिहास में जो भी मूल्यवान और सृजनशील सामग्री है, उसका भंडार अकेले भारत में है।
6. आर्थर शोपेन्हावर - विश्व भर में ऐसा कोई अध्ययन नहीं है जो उपनिषदों जितना उपकारी और उद्दत हो। यही मेरे जीवन को शांति देता रहा है, और वही मृत्यु में भी शांति देगा।
7. हेनरी डेविड थोरो - प्रातः काल मैं अपनी बुद्धिमत्ता को अपूर्व और ब्रह्माण्डव्यापी #गीता के तत्वज्ञान से स्नान करता हूँ, जिसकी तुलना में हमारा आधुनिक विश्व और उसका साहित्य अत्यंत क्षुद्र और तुच्छ जान पड़ता है।
8. राल्फ वाल्डो इमर्सन - मैं भगवत #गीता का अत्यंत ऋणी हूँ। यह पहला ग्रन्थ है जिसे पढ़कर मुझे लगा की किसी विराट शक्ति से हमारा संवाद हो रहा है।
9. विल्हन वोन हम्बोल्ट- #गीता एक अत्यंत सुन्दर और संभवतः एकमात्र सच्चा दार्शनिक ग्रन्थ है जो किसी अन्य भाषा में नहीं।
वह एक ऐसी गहन और उन्नत वस्तु है जिस पर सारी दुनिया गर्व कर सकती है।
10. एनी बेसेंट -विश्व के विभिन्न धर्मों का लगभग ४० वर्ष अध्ययन करने के बाद मैं इस नतीजे पर पहुंची हूँ की हिंदुत्व जैसा परिपूर्ण, वैज्ञानिक, दार्शनिक और अध्यात्मिक धर्म और कोई नहीं।
११.चर्चिल .....दुनिया में और कहीं भगवान् हो या न हो भारत में अवश्य है
१२ चर्चिल.. महात्मा गाँधी .के लिए  आने वाली पीढियां यह सहज ही नही मानेगी की गाँधी की तरह कोई हद मांस का आदमी धरती पर था .अहिंसा जिसका ब्रम्हास्त्र था
दुर्लभं भारते जन्मः !!!
भारतीय हेाने का गर्व करे !

Wednesday, 15 November 2017

वंशवादी’ नेहरू ने इंदिरा को नहीं, सरदार पटेल की बेटी-बेटे को संसद भेजा था !


वंशवादी’ नेहरू ने इंदिरा को नहीं, सरदार पटेल की बेटी-बेटे को संसद भेजा था !
नरेंद्र मोदी की बीजेपी को इसके लिए धन्यवाद ज़रूर देना चाहिए कि उसने इतिहास में लोगों की दिलचस्पी नए सिरे से पैदा की। बीजेपी और संघ के प्रचारतंत्र ने नेहरू को विलेन बनाने के लिए जैसा अविश्वसनीय अभियान चलाया, उसने लोगों को मजबूर किया कि वे हक़ीक़त का पता करने के लिए व्हाट्सऐप और फ़ेसबुक जैसे सोशल मीडिया के प्लेटफ़ॉर्म से उतर कर किताबों की धूल झाड़ें।
संघ संप्रदाय ने पटेल और सुभाष बोस का इस्तेमाल हमेशा नेहरू को निशाना बनाने के लिए किया। कुछ ऐसे अंदाज़ में जैसे कि जैसे उनमें कोई निजी दुश्मनी थी। लेकिन जब आप इतिहास के पन्नो से गुज़रते हैं तो पता चलता है कि तमाम विषयों पर मतभेद के बावजूद उनमें एक दूसरे के प्रति सम्मान की भावना में कोई कमी नहीं थी। पटेल ने ख़ुद लिखा है कि वे ‘नेहरू के वफ़ादार सिपाही हैं’ और सुभाष बोस ने आज़ाद हिंद फ़ौज में ‘नेहरू ब्रिगेड’ की स्थापना की थी।
इन दिनों, ख़ासकर गुजरात चुनाव को ध्यान में रखते हुए लगातार सोशलमीडिया में ऐसी कहानियाँ प्रचारित की जा रही हैं जिनमें कहा जा रहा है कि पटेल की मौत के बाद उनके बच्चों का कोई ख़्याल नहीं रखा गया। उन्होंने बड़े दुर्दिन देखे। तमाम सच्चे-झूठे क़िस्से प्रचारित किए जा रहे हैं जिसके निशाने पर पटेल विरोधी ‘वंशवादी’ नेहरू हैं, जिन्होंने अपने ख़ानदान को राजनीति में आगे बढ़ाया।
आख़िर सच्चाई क्या है ?
सच्चाई यह है कि वंशवादी नेहरू ने अपने जीते जी कभी इंदिरा गाँधी को संसद का मुँह नहीं देखने दिया, जबकि पटेल के बेटे और बेटी को लगातार संसद भेजा। ( भेजा का अर्थ यही है कि उन्हें काँग्रेस का टिकट देकर चुनाव में जिताया। )
इंदिरा गाँधी, स्वतंत्रता सेनानी थी, उन्हीं के बीच पली बढ़ी थीं। जब नेहरू प्रधानमंत्री बने तो उनकी सहायक के रूप में लगातार काम करती रहीं, लेकिन नेहरू ने उन्हें सांसद या मंत्री बनाने के बारे में नहीं सोचा। 1959 के दिल्ली अधिवेशन में वे काँग्रेस की अध्यक्ष ज़रूर चुनी गई थीं, लेकिन 1960 में ही इस पद पर नीलम संजीव रेड्डी आ गए थे। 1964 में नेहरू की मौत के बाद काँग्रेस ने इंदिरा गाँधी को राज्यसभा भेजा। इस तरह वे पहली बार सांसद बनीं। राज्यसभा की इस ‘गूँगी गुड़िया’ को काँग्रेस दिग्गजों ने प्रधानमंत्री बनाया था, न कि नेहरू ने।
अब आइए देखते हैं कि नेहरू ने अपने अनन्य सहयोगी सरदार पटेल के बच्चों के साथ क्या किया जिनकी 1950 में मृत्यु हो गई थी।
मणिबेन अपने पिता सरदार पटेल के लिए उसी तरह थीं जैसे कि इंदिरा, नेहरू के लिए। वे सरदार पटेल के साथ साये की तरह रहती थीं। पटेल की मृत्यु के बाद उनके दुख को नेहरू से ज़्यादा कौन समझ सकता था। लिहाज़ा 1952 के पहले ही आम चुनाव में ही नेहरू जी ने उन्हें काँग्रेस का टिकट दिलवाया। वे दक्षिण कैरा लोकसभा क्षेत्र से सांसद बनीं। 1957 में वे आणंद लोकसभा क्षेत्र से चुनी गईं। 1964 में उन्हें काँग्रेस ने राज्यसभा भेजा। वे 1953 से 1956 के बीच गुजरात प्रदेश काँग्रेस कमेटी की सचिव और 1957 से 1964 के बीच उपाध्यक्ष रहीं।
इस तरह नेहरू के रहते मणिबेन को काँग्रेस में पूरा मान-सम्मान मिला। यही नहीं, नेहरू के समय ही सरदार पटेल के बेटे डाह्याभाई पटेल को भी लोकसभा का टिकट मिला। वे 1957 और 1962 में लोकसभा के लिए चुने गए और फिर 1973 में अपनी मौत तक राज्यसभा सदस्य रहे। (यह सहज ही समझा जा सकता है कि काँग्रेस प्रत्याशी बतौर मणिबेन और दाह्याभाई को संघ और जनसंघ के विरोध का सामना करना पड़ा होगा।)
यानी एक समय ऐसा भी था जब सरदार पटेल के बेटे और बेटी, दोनों ही एक साथ लोकसभा और फिर राज्यसभा में थे। भाई-बहन के लिए ऐसा संयोग ‘वंशवादी नेहरू’ ने ही निर्मित किया था जिन्होंने अपनी बेटी इंदिरा को जीते-जी काँग्रेस का टिकट नहीं मिलने दिया। नेहरू के बाद लालबहादुर शास्त्री प्रधानमंत्री बने थे, न कि इंदिरा गाँधी।
ऐसा ही कुछ मामला नेता जी सुभाषचंद्र बोस को लेकर भी है। लगातार दुष्प्रचार किया गया कि सुभाष बोस से जुड़ी ‘फाइलों’ में ऐसी गोपनीय बातें हैं जिससे नेहरू शर्मसार हो सकते हैं, इसलिए उन्हें सार्वजनिक नहीं किया जाता। यह बात भुला दी गई कि दोनों ही काँग्रेस के समाजवादी खेमे के नेता थे। कोई निजी मतभेद नहीं था। सुभाषचंद्र बोस की ‘सैन्यवाद प्रवृत्ति’ को गाँधी और उनके अनुयायी उचित नहीं मानते थे। नेहरू भी उनमें थे। लेकिन परस्पर सम्मान ऐसा कि जब सुभाष बोस ने आज़ाद हिंद फ़ौज बनाई तो एक ब्रिगेड का नाम नेहरू के नाम पर रखा। गाँधी जी को ‘राष्ट्रपिता’ का संबोधन भी नेता जी ने ही दिया था।
बहरहाल, मोदी जी के प्रधानमंत्री बनने के बाद एक बार फिर ‘बोस फ़ाइल्स’ का हल्ला मचा। जनवरी 2016 में कई फ़ाइलें सार्वजनिक की गईं तो जो सामने आये वह प्रचार से बिलकुल उलट था। पता चला कि नेहरू ने सुभाष बोस की, विदेश में पल रही बेटी के लिए हर महीने आर्थिक मदद भिजवाने की व्यवस्था की थी। 
इन गोपनीय फाइलों से खुलासा हुआ कि ‘अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी’ (एआईसीसी) ने 1954 में नेताजी की बेटी की मदद के लिए एक ट्रस्ट बनाया था, जिससे उन्हें 500 रुपये प्रति माह आर्थिक मदद दी जाती थी। दस्तावेजों के मुताबिक, 23 मई, 1954 को अनिता बोस के लिए दो लाख रुपये का एक ट्रस्ट बनाया गया था। प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री बी. सी. रॉय उसके ट्रस्टी थे।
नेहरू द्वारा 23 मई, 1954 को हस्ताक्षरित एक दस्तावेज के अनुसार, “डॉ. बी. सी. राय और मैंने आज वियना में सुभाष चंद्र बोस की बच्ची के लिए एक ट्रस्ट डीड पर हस्ताक्षर किए हैं। दस्तावेजों को सुरक्षित रखने के लिए मैंने उनकी मूल प्रति एआईसीसी को दे दी है।”
एआईसीसी ने 1964 तक अनिता को 6,000 रुपये वार्षिक की मदद की। 1965 में उनकी शादी के बाद यह आर्थिक सहयोग बंद कर दिया गया। यह मत समझिए कि तब 500 रुपये महीने कोई छोटी रकम थी। बड़े-बड़े अफ़सरों को भी इतना वेतन नहीं मिलता था।‘वंशवादी’ नेहरू ने इंदिरा को नहीं, सरदार पटेल की बेटी-बेटे को संसद भेजा था !
नरेंद्र मोदी की बीजेपी को इसके लिए धन्यवाद ज़रूर देना चाहिए कि उसने इतिहास में लोगों की दिलचस्पी नए सिरे से पैदा की। बीजेपी और संघ के प्रचारतंत्र ने नेहरू को विलेन बनाने के लिए जैसा अविश्वसनीय अभियान चलाया, उसने लोगों को मजबूर किया कि वे हक़ीक़त का पता करने के लिए व्हाट्सऐप और फ़ेसबुक जैसे सोशल मीडिया के प्लेटफ़ॉर्म से उतर कर किताबों की धूल झाड़ें।
संघ संप्रदाय ने पटेल और सुभाष बोस का इस्तेमाल हमेशा नेहरू को निशाना बनाने के लिए किया। कुछ ऐसे अंदाज़ में जैसे कि जैसे उनमें कोई निजी दुश्मनी थी। लेकिन जब आप इतिहास के पन्नो से गुज़रते हैं तो पता चलता है कि तमाम विषयों पर मतभेद के बावजूद उनमें एक दूसरे के प्रति सम्मान की भावना में कोई कमी नहीं थी। पटेल ने ख़ुद लिखा है कि वे ‘नेहरू के वफ़ादार सिपाही हैं’ और सुभाष बोस ने आज़ाद हिंद फ़ौज में ‘नेहरू ब्रिगेड’ की स्थापना की थी।
इन दिनों, ख़ासकर गुजरात चुनाव को ध्यान में रखते हुए लगातार सोशलमीडिया में ऐसी कहानियाँ प्रचारित की जा रही हैं जिनमें कहा जा रहा है कि पटेल की मौत के बाद उनके बच्चों का कोई ख़्याल नहीं रखा गया। उन्होंने बड़े दुर्दिन देखे। तमाम सच्चे-झूठे क़िस्से प्रचारित किए जा रहे हैं जिसके निशाने पर पटेल विरोधी ‘वंशवादी’ नेहरू हैं, जिन्होंने अपने ख़ानदान को राजनीति में आगे बढ़ाया।
आख़िर सच्चाई क्या है ?
सच्चाई यह है कि वंशवादी नेहरू ने अपने जीते जी कभी इंदिरा गाँधी को संसद का मुँह नहीं देखने दिया, जबकि पटेल के बेटे और बेटी को लगातार संसद भेजा। ( भेजा का अर्थ यही है कि उन्हें काँग्रेस का टिकट देकर चुनाव में जिताया। )
इंदिरा गाँधी, स्वतंत्रता सेनानी थी, उन्हीं के बीच पली बढ़ी थीं। जब नेहरू प्रधानमंत्री बने तो उनकी सहायक के रूप में लगातार काम करती रहीं, लेकिन नेहरू ने उन्हें सांसद या मंत्री बनाने के बारे में नहीं सोचा। 1959 के दिल्ली अधिवेशन में वे काँग्रेस की अध्यक्ष ज़रूर चुनी गई थीं, लेकिन 1960 में ही इस पद पर नीलम संजीव रेड्डी आ गए थे। 1964 में नेहरू की मौत के बाद काँग्रेस ने इंदिरा गाँधी को राज्यसभा भेजा। इस तरह वे पहली बार सांसद बनीं। राज्यसभा की इस ‘गूँगी गुड़िया’ को काँग्रेस दिग्गजों ने प्रधानमंत्री बनाया था, न कि नेहरू ने।
अब आइए देखते हैं कि नेहरू ने अपने अनन्य सहयोगी सरदार पटेल के बच्चों के साथ क्या किया जिनकी 1950 में मृत्यु हो गई थी।
मणिबेन अपने पिता सरदार पटेल के लिए उसी तरह थीं जैसे कि इंदिरा, नेहरू के लिए। वे सरदार पटेल के साथ साये की तरह रहती थीं। पटेल की मृत्यु के बाद उनके दुख को नेहरू से ज़्यादा कौन समझ सकता था। लिहाज़ा 1952 के पहले ही आम चुनाव में ही नेहरू जी ने उन्हें काँग्रेस का टिकट दिलवाया। वे दक्षिण कैरा लोकसभा क्षेत्र से सांसद बनीं। 1957 में वे आणंद लोकसभा क्षेत्र से चुनी गईं। 1964 में उन्हें काँग्रेस ने राज्यसभा भेजा। वे 1953 से 1956 के बीच गुजरात प्रदेश काँग्रेस कमेटी की सचिव और 1957 से 1964 के बीच उपाध्यक्ष रहीं।
इस तरह नेहरू के रहते मणिबेन को काँग्रेस में पूरा मान-सम्मान मिला। यही नहीं, नेहरू के समय ही सरदार पटेल के बेटे डाह्याभाई पटेल को भी लोकसभा का टिकट मिला। वे 1957 और 1962 में लोकसभा के लिए चुने गए और फिर 1973 में अपनी मौत तक राज्यसभा सदस्य रहे। (यह सहज ही समझा जा सकता है कि काँग्रेस प्रत्याशी बतौर मणिबेन और दाह्याभाई को संघ और जनसंघ के विरोध का सामना करना पड़ा होगा।)
यानी एक समय ऐसा भी था जब सरदार पटेल के बेटे और बेटी, दोनों ही एक साथ लोकसभा और फिर राज्यसभा में थे। भाई-बहन के लिए ऐसा संयोग ‘वंशवादी नेहरू’ ने ही निर्मित किया था जिन्होंने अपनी बेटी इंदिरा को जीते-जी काँग्रेस का टिकट नहीं मिलने दिया। नेहरू के बाद लालबहादुर शास्त्री प्रधानमंत्री बने थे, न कि इंदिरा गाँधी।
ऐसा ही कुछ मामला नेता जी सुभाषचंद्र बोस को लेकर भी है। लगातार दुष्प्रचार किया गया कि सुभाष बोस से जुड़ी ‘फाइलों’ में ऐसी गोपनीय बातें हैं जिससे नेहरू शर्मसार हो सकते हैं, इसलिए उन्हें सार्वजनिक नहीं किया जाता। यह बात भुला दी गई कि दोनों ही काँग्रेस के समाजवादी खेमे के नेता थे। कोई निजी मतभेद नहीं था। सुभाषचंद्र बोस की ‘सैन्यवाद प्रवृत्ति’ को गाँधी और उनके अनुयायी उचित नहीं मानते थे। नेहरू भी उनमें थे। लेकिन परस्पर सम्मान ऐसा कि जब सुभाष बोस ने आज़ाद हिंद फ़ौज बनाई तो एक ब्रिगेड का नाम नेहरू के नाम पर रखा। गाँधी जी को ‘राष्ट्रपिता’ का संबोधन भी नेता जी ने ही दिया था।
बहरहाल, मोदी जी के प्रधानमंत्री बनने के बाद एक बार फिर ‘बोस फ़ाइल्स’ का हल्ला मचा। जनवरी 2016 में कई फ़ाइलें सार्वजनिक की गईं तो जो सामने आये वह प्रचार से बिलकुल उलट था। पता चला कि नेहरू ने सुभाष बोस की, विदेश में पल रही बेटी के लिए हर महीने आर्थिक मदद भिजवाने की व्यवस्था की थी। 
इन गोपनीय फाइलों से खुलासा हुआ कि ‘अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी’ (एआईसीसी) ने 1954 में नेताजी की बेटी की मदद के लिए एक ट्रस्ट बनाया था, जिससे उन्हें 500 रुपये प्रति माह आर्थिक मदद दी जाती थी। दस्तावेजों के मुताबिक, 23 मई, 1954 को अनिता बोस के लिए दो लाख रुपये का एक ट्रस्ट बनाया गया था। प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री बी. सी. रॉय उसके ट्रस्टी थे।
नेहरू द्वारा 23 मई, 1954 को हस्ताक्षरित एक दस्तावेज के अनुसार, “डॉ. बी. सी. राय और मैंने आज वियना में सुभाष चंद्र बोस की बच्ची के लिए एक ट्रस्ट डीड पर हस्ताक्षर किए हैं। दस्तावेजों को सुरक्षित रखने के लिए मैंने उनकी मूल प्रति एआईसीसी को दे दी है।”
एआईसीसी ने 1964 तक अनिता को 6,000 रुपये वार्षिक की मदद की। 1965 में उनकी शादी के बाद यह आर्थिक सहयोग बंद कर दिया गया। यह मत समझिए कि तब 500 रुपये महीने कोई छोटी रकम थी। बड़े-बड़े अफ़सरों को भी इतना वेतन नहीं मिलता था।

नेहरू की सादगी, ग़ुस्सा और आशिक़ी..!

नेहरू की सादगी, ग़ुस्सा और आशिक़ी..!



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नेहरू की मौत के तुरंत बाद चीन के प्रधानमंत्री चू एन लाई ने चीन की यात्रा पर आए श्रीलंकाई प्रतिनिधिमंडल से कहा था, "मैं खुश्चेव से मिला हूँ, मैं चांग काई शेक से मिला हूँ, अमरीकी जनरलों से भी मेरी मुलाक़ात रही है, लेकिन नेहरू से ज़्यादा अहंकारी शख़्स मैंने नहीं देखा."
बांडुंग सम्मेलन में जब श्रीलंका के प्रधानमंत्री सर जॉन कोटलेवाला ने इस ओर ध्यान दिलाया कि पोलैंड, हंगरी, बुलगारिया और रोमानिया जैसे देश उसी तरह सोवियत संघ के उपनिवेश हैं जैसे एशिया और अफ़्रीका के दूसरे उपनिवेश हैं तो नेहरू को बहुत बुरा लगा.
वो उनके पास गए और आवाज़ ऊँची करके बोले, "सर जॉन आपने ऐसा क्यों किया? अपना भाषण देने से पहले आपने उसे मुझे क्यों नहीं दिखाया?"
सर जॉन ने छूटते ही जवाब दिया, "मैं क्यों दिखाता अपना भाषण आपको? क्या आप अपना भाषण देने से पहले मुझे दिखाते हैं?"

ग़ुस्से से लाल नेहरू

इतना सुनना था कि नेहरू का चेहरा ग़ुस्से से लाल हो गया. इंदिरा गाँधी ने उनका हाथ पकड़ कर उनके कान में फुसफुसाया कि 'आप शांत हो जाइए'. लेकिन दो पड़ोसी देशों के प्रधानमंत्री स्कूली बच्चों की तरह लड़ते रहे.
वहाँ मौजूद चू एन लाई ने अपनी टूटी फूटी अंग्रेज़ी में सर जॉन को समझाना चाहा, ‘मी यॉर फ़्रेंड!’ सब लोगों ने स्तब्ध होकर देखा कि किस तरह महान लोग भी साधारण इंसानों की तरह व्यवहार कर सकते थे.
सुबह होने तक ये तूफ़ान निकल गया. सर जॉन ने बहुत गरिमापूर्ण ढंग से माफ़ी मांगते हुए कहा, "मेरा उद्देश्य इस सम्मेलन में व्यवधान पहुँचाने का कतई नहीं था."
बाद में सर जॉन कोटलेवाला ने अपनी किताब 'एन एशियन प्राइम मिनिस्टर्स स्टोरी' में लिखा, "मैं और नेहरू हमेशा बेहतरीन दोस्त रहे. मुझे विश्वास है कि नेहरू ने मेरी उस धृष्टता को भुला दिया होगा."

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नेहरू के सचिव रहे एमओ मथाई अपनी किताब 'रेमिनिसेंसेस ऑफ़ नेहरू एज' में लिखते हैं कि नेहरू इतने सुसंस्कृत थे कि अहंकारी हो ही नहीं सकते थे. लेकिन ये सही है कि उनमें धीरज नहीं था और वो बेवकूफ़ों को बर्दाश्त नहीं कर पाते थे.
वैसे भी चू एन लाई को नेहरू पर फ़ैसला सुनाने का कोई हक़ नहीं था, क्योंकि उन्होंने ख़ुद भारत पर चीन के हमले में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी.

धैर्य का अभाव

नेहरू के ग़ुस्से पर पूर्व विदेश मंत्री नटवर सिंह ने एक क़िस्सा सुनाया कि एक बार नेहरू उनसे इस बात पर बहुत नाराज़ हो गए कि उन्होंने उनके नेपाल नरेश को लिखे गए पत्र को विदेश मंत्रालय के सेक्रेट्री जनरल को न दिखा कर अपनी आलमारी में रख लिया था.

नेहरूइमेज कॉपीरइटNEHRUCHURCHIL
Image captionनेहरू आधुनिक भारत के निर्माताओं में एक माने जाते हैं

उस ज़माने में नटवर सिंह सेक्रेट्री जनरल के सहायक हुआ करते थे. वो याद करते हैं, "शाम साढ़े छह बजे नेहरू का नेपाल नरेश महेंद्र को लिखा पत्र मेरे पास आया. मैंने सोचा कि सुबह इसे पढ़ूंगा. सुबह मैं सेक्रेट्री जनरल को छोड़ने हवाई अड्डे चला गया जो सरकारी यात्रा पर मंगोलिया जा रहे थे. वहाँ उनका विमान लेट हो गया."
नटवर सिंह आगे कहते हैं, "वहीं एक शख़्स मेरे पास आ कर बोला कि आपको पंडित जी बुला रहे हैं. मैं तुरंत साउथ ब्लॉक पहुँचा. वहाँ नेहरू के निजी सचिव खन्ना ने मुझसे कहा कि प्रधानमंत्री के कमरे में मत घुसिएगा. वो इतने ग़ुस्से में हैं कि कोई चीज़ आपके ऊपर फेंक कर मार देंगे. हुआ ये कि अगले दिन जैसा कि उनकी आदत थी, नेहरू विदेश सचिव के कमरे में जा पहुंचे और पूछा कि नेपाल नरेश को जो पत्र मैंने लिखा है, क्या आपने देखा है? विदेश सचिव ने कहा कि नहीं क्योंकि वो पत्र तो मेरे पास आया ही नहीं."

हमेशा फ़िट रहे नेहरू

नटवर सिंह आगे बताते हैं, "बाद में पता चला कि पत्र तो नटवर सिंह के पास है. विदेश सचिव ने नटवर को बचाने के उद्देश्य से कहा कि शायद नटवर को वो पत्र बहुत पसंद आया है. उन्होंने पढ़ने के लिए रख लिया होगा. ये सुनना था कि नेहरू का पारा सातवें आसमान को पहुंच गया. बोले मैंने वो ख़त नटवर सिंह को ख़ुश करने के लिए नहीं लिखा. फ़ौरन पुलिस बुलाइए. उनकी आलमारी तुड़वाइए और वो पत्र मेरे सामने पेश करिए. इस घटना के सात दिनों बाद तक मैं नेहरू के दफ़्तर के सामने से नहीं गुज़रा."
नेहरू के सुरक्षा अधिकारी रहे केएम रुस्तमजी अपनी किताब 'आई वाज़ नेहरूज़ शैडो' में लिखते हैं, "जब मैं उनके स्टाफ़ में आया तो वो 63 साल के थे लेकिन 33 के लगते थे. लिफ़्ट का इस्तेमाल बिल्कुल नहीं करते थे. और तो और एक बार में दो सीढ़ियाँ चढ़ा करते थे. एक बार डिब्रूगढ़ की यात्रा के दौरान मैं उनका सिगरेट केस लेने उनके कमरे में घुसा तो मैंने देखा कि उनका सहायक हरि उनके फटे मौज़ों की सिलाई कर रहा है. उन्हें चीज़ों को बरबाद करना पसंद नहीं था. एक बार सऊदी अरब की यात्रा के दौरान वो उस महल के हर कमरे में जा कर बत्तियाँ बुझाते रहे, जिसे ख़ासतौर से उनके लिए बनवाया गया था."


उसी यात्रा के दौरान नेहरू को रसूल-अस-सलाम कह कर पुकारा गया था जिसका अरबी में अर्थ होता है शाँति का संदेश वाहक. लेकिन उर्दू में ये शब्द पैग़म्बर मोहम्मद के लिए इस्तेमाल होता है. नेहरू के लिए ये शब्द इस्तेमाल करने के लिए पाकिस्तान में शाह सऊद की काफ़ी आलोचना भी हुई थी.

दरियादिल नेहरू

तब जाने माने कवि रईस अमरोहवी ने एक मिसरा लिखा था जिसे कराची से छपने वाले अख़बार डॉन ने प्रकाशित भी किया था –
जप रहे हैं माला एक हिंदू की अरब,
ब्राहमनज़ादे में शाने दिलबरी ऐसी तो हो.
हिकमते पंडित जवाहरलाल नेहरू की कसम,
मर मिटे इस्लाम जिस पर काफ़िरी ऐसी तो हो.
नेहरू के पर्सनल असिस्टेंट के रूप में काम करने वाले डॉक्टर जनकराज जय ने बीबीसी से बात करते हुए एक दिलचस्प किस्सा सुनाया, "नेहरू के बाल काटने के लिए राष्ट्रपति भवन से एक नाई आया करता था. एक बार नेहरू ने उससे कहा हम विलायत जा रहे हैं. बोलो तुम्हारे लिए क्या लाएं? नाई ने शर्माते हुए कहा हज़ूर कभी-कभी आने में देर हो जाती है. अगर घड़ी ले आएं तो अच्छा होगा. जब नेहरू विलायत से लौटे तो वो नाई फिर उनका बाल काटने आया. नेहरू बोले तुम पूछोगे नहीं कि मैं तुम्हारे लिए घड़ी लाया हूँ या नहीं. जाओ सेशन (उनके निजी सहायक) से जा कर घड़ी ले लो."

नेहरू और वो टैक्सी वाला

डॉक्टर जनकराज जय एक और क़िस्सा सुनाते हैं, ''एक बार जब जवाहरलाल दफ़्तर जा रहे थे तो साउथ एवेन्यू के पास उनकी कार पंक्चर हो गई. दूर से एक सरदार टैक्सी वाले ने देख लिया. वो अपनी टैक्सी ले कर पहुंचा और बोला मैरा सौभाग्य होगा अगर आप मेरी टैक्सी में बैठ जाएं. मैं आपको दफ़्तर ले कर चलूँगा. नेहरू बिना किसी की सुने उसकी टैक्सी में बैठ गए. दफ़्तर पहुँचकर वो अपनी जेब टटोलने लगे लेकिन उनकी जेब में पैसे तो होते नहीं थे. टैक्सी वाला बोला आप क्यों शर्मिंदा कर रहे हैं. क्या मैं आपसे पैसे लूँगा? अब तो मैं पाँच दिनों तक किसी को इस सीट पर बैठाउंगा भी नहीं!"

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पूर्व विदेश सचिव दिनशॉ गुंडेविया ने अपनी आत्मकथा 'आउटसाइड आर्काइव्स' में लिखा है कि एक बार स्विट्ज़रलैंड में मशहूर अभिनेता चार्ली चैपलिन ने नेहरू को अपने घर खाने पर आमंत्रित किया. खाने से पहले एक ट्रे में शैम्पेन की कई बोतलें लाई गईं.
चैपलिन ने एक गिलास उठा कर नेहरू के हाथ में दे दिया. नेहरू बोले क्या आपको पता नहीं कि मैं पीता नहीं हूँ. चैपलिन ने कहा, "प्रधानमंत्री महोदय, आप कैसे मुझे मेरी शेंपेन पीने के सम्मान से वंचित कर सकते हैं?" नेहरू फिर भी झिझके. चार्ली झुके और उन्होंने शैम्पेन से भरा गिलास नेहरू के होठों से लगा दिया.
नेहरू ने गिलास से एक सिप लिया और पूरे वक़्त तक उस गिलास को अपने बगल में रखे बैठे रहे.
रुस्तमजी भी लिखते हैं कि उन्होंने कभी नेहरू को शराब पीते नहीं देखा. हाँ वो सिगरेट ज़रूर पिया करते थे और वो भी स्टेट एक्सप्रेस 555 जो कि उस ज़माने का ख़ासा मशहूर ब्रैंड होता था.

नेहरू का इश्क

नेहरू को लॉर्ड माउंटबेटन की पत्नी एडविना माउंटबेटन से इश्क था. मशहूर पत्रकार कुलदीप नैयर ने बीबीसी को बताया कि जब वो ब्रिटेन में भारत के उच्चायुक्त थे तब उनको पता चला कि एयर इंडिया की फ़्लाइट से नेहरू रोज़ एडविना को पत्र भेजा करते थे.
एडविना उसका जवाब देती थीं और उच्चायोग का आदमी उन पत्रों को एयर इंडिया के विमान तक पहुंचाया करता था.

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नैयर ने एक बार एडविना के नाती लार्ड रैमसे से पूछ ही लिया कि क्या उनकी नानी और नेहरू के बीच इश्क था? रैमसे का जवाब था, "उनके बीच आध्यात्मिक प्रेम था." इसके बाद नैयर ने उन्हें नहीं कुरेदा. नेहरू के एडविना को लिखे पत्र तो छपे हैं लेकिन एडविना के नेहरू को लिखे पत्रों के बारे में किसी को कुछ भी पता नहीं हैं.
कुलदीप नैयर ने एक बार इंदिरा गाँधी से उन पत्रों को देखने की अनुमति मांगी थी लेकिन उन्होंने उन पत्रों को दिखाने से साफ़ इनकार कर दिया था.
एडविना ही नहीं सरोजिनी नायडू की पुत्री पद्मजा नायडू के लिए भी नेहरू के दिल में सॉफ़्ट कॉर्नर था. कैथरीन फ़्रैंक इंदिरा गाँधी की जीवनी में लिखती हैं कि विजयलक्ष्मी पंडित ने उन्हें बताया था कि नेहरू और पद्मजा का इश्क ‘सालों’ चला.

इंदिरा की ख़ातिर

नेहरू ने उनसे इसलिए शादी नहीं की क्योंकि वो अपनी बेटी इंदिरा का दिल नहीं दुखाना चाहते थे. इंदिरा, नेहरू के जीवनीकार एस गोपाल से इस बात पर नाराज़ भी हो गई थी क्योंकि उन्होंने नेहरू के 'सेलेक्टेड वर्क्स' में उनके पद्मजा के लिखे प्रेम पत्र प्रकाशित कर दिए थे.

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Image captionब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री चर्चिल के साथ नेहरू

1937 में नेहरू ने पद्मजा को लिखा था, "तुम 19 साल की हो (जबकि वो उस समय 37 साल की थीं)... और मैं 100 या उससे भी से ज़्यादा. क्या मुझे कभी पता चल पाएगा कि तुम मुझे कितना प्यार करती हो."
एक बार और मलाया से नेहरू ने पद्मजा को लिखा था, "मैं तुम्हारे बारे में जानने के लिए मरा जा रहा हूँ.. मैं तुम्हें देखने, तुम्हें अपनी बाहों में लेने और तुम्हारी आँखों में देखने के लिए तड़प रहा हूँ."(सेलेक्टेड वर्क्स ऑफ़ नेहरू, सर्वपल्ली गोपाल, पृष्ठ 694)

जानवरों से लगाव

नेहरू को पालतू जानवर बहुत पसंद थे. एक बार उनके कुत्ते सोना ने एडविना माउंटबेटन का उस समय हाथ काट लिया था जब वो उसे सहलाने की कोशिश कर रही थीं. नेहरू को दुःखी मन से उस कुत्ते को प्रधानमंत्री निवास से बाहर भेजना पड़ा था.
ख्रुश्चेव ने एक बार नेहरू को एक घोड़ा भेंट किया था. सऊदी शाह ने भी नेहरू को दो शानदार घोड़ियाँ भेंट में दी थीं जिन्हें कुछ दिन रखने के बाद नेहरू ने सेना को दे दिया था.
नेहरू के पास पिंजड़े में बाघ और तेंदुए के बच्चे भी रहा करते थे जो उन्हें मध्य प्रदेश के कुछ लोगों ने भेंट में दिए थे. छह महीने तक रखने के बाद नेहरू ने उन्हें दिल्ली चिड़ियाघर भिजवा दिया था.

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मथाई ने अपनी किताब 'माई डेज़ विद नेहरू' में लिखा है, "एक बार नेहरू बीमार पड़ गए और पालतू पांडा भीमसा को खाना खिलाने के लिए उनके बाड़े में नहीं जा पाए. मैं भीमसा को घर के दरवाजे पर ले आया. वो सीढ़ियाँ चढ़ कर नेहरू के शयन कक्ष में पहुंच गया. मैंने नेहरू को बांस की पत्तियाँ दी जिसे उन्होंने अपने हाथों से भीमसा को खिलाया और बहुत ख़ुश हुए."
1964 में 27 मई को पूरे भारत को पता था कि नेहरू मौत से जूझ रहे हैं. 'ब्लिट्ज़' के संपादक रूसी करंजिया ने अपने सबसे काबिल स्तंभकार ख़्वाजा अहमद अब्बास को बुलाया और कहा कि 'नेहरू किसी भी मिनट मर सकते हैं. तुम्हें चार घंटे के अंदर उनकी ऑबिट लिखनी है'.
अब्बास ने अपने को एक कमरे में बंद किया. तभी आर्ट विभाग का एक शख़्स आया और बोला पहले हेड लाइन लिखिए. अब्बास ने लिखा ‘नेहरू डाइज़,’ फिर लिखा, ‘नेहरू डेड’, फिर लिखा ‘नेहरू नो मोर.’ फिर उन्होंने तीनों हेडलाइंस को काट दिया और नए सिरे से एक हेडलाइन दी. अगले दिन यही ब्लिट्ज़ की हेडलाइन थी.... नेहरू लिव्स...