Saturday, 17 June 2017

खान अब्दुल गफ्फार खान । सीमान्त गांधी ।

खान अब्दुल गफ्फार खान ।
सीमान्त गांधी ।
बलूच बटवारे से दुखी थे ।
वे भारत के साथ रहना चाहते थे ,लेकिन भूगोल ने उन्हें मारा ।
बापूके सच्चे अनुयायी सीमान्त जब आख़िरी बार मिले तो बापू ने खान से कहा - अब भारत का मोह त्याग दो ,अपने देश की सेवा करो ।
यह अंदाजा लगाना आसान नहीं है कि क्या गुजरा होगा दोनों के दिल में ।
वही सीमान्त गांधी पाकिस्तान में ता उम्र कैद रहे ।
69 में भारत की प्रधान मंत्री श्रीमती इंदिरागांधी के विशेष आग्रह पर इलाज के लिए भारत आये।
हवाई अड्डे पर उन्हें लेने श्रीमती गांधी और जे पी गए ।
खान जब हवाई जहाज से बाहर आये तो उनके हाथ में एक गठरी थी जिसमे उनका कुर्ता पजामा था ।
मिलते ही श्रीमती गांधी ने हाथ बढ़ाया उनकी गठरी की तरफ -इसे हमे दीजिये ,हम ले चलते हैं ।
खान साहब ठहरे,बड़े ठंढे मन से बोले -यही तो बचा है ,इसे भी ले लोगी ?
बटवारे का पूरा दर्द खान साब की इस बात से बाहर आ गया ।
जे पी और श्रीमती गांधी दोनों ने सिर झुका लिया ।
जे पी अपने को संभाल नहीं पाये ,उनकी आँख से आंसू गिर रहे थे ।
सबसे निवेदन है खान साहब के बारे में जानो ।

Friday, 16 June 2017

मैं वहां कभी नहीं गया ..


तालाब और मरघट को
अलग करने वाले मेड पर एक आम का पेड़ है ,
कितना पुराना है किसी को नहीं पता
चांदनी रात में मेरे घर की छत से दिखता है.
मरघट का विस्तार और आम का पेड़/
मेरे लिए आम के पेड़ का इस जगह होने का कोई अर्थ ,या प्रयोजन नहीं
पर आम के पेड़ का इस जगह होने का अर्थ भी है ,प्रयोजन भी है
पेड़ है तो छाया है .कोटर है मधु मक्खियों का छत्ता है चिड़ियाँ है घोसला है
गलियों में लुका छिपी खेलते बच्चों की तर्ज पर आगे पीछे सरपट भागती हैं
गिलहरियाँ इस की मोती डालों के बीच /
इस पेड़ के वंहा होने की कोई योजना नहीं थी फिर भी वह वहां हैऔर
उसके होने से बहुत कुछ है /ऋतुएं आती हैं जातीं हैं
पतझड़ होता है .बसंत आता है कोयल कूकती है छाया होती है
बच्चे अमियाँ तोड़ते ह
पत्थर मार मार कर ,
मै वंहा कभी नहीं गया पर हर क्षण होता हूँ
,हर जलती चिता में हर दफ़न होती लाश में ......

भगत सिंह के जीवन के आखिरी क्षण

भगत सिंह की ज़िंदगी के वे आख़िरी 12 घंटे
रेहान फ़ज़ल
बीबीसी संवाददाता
लाहौर सेंट्रल जेल में 23 मार्च, 1931 की शुरुआत किसी और दिन की तरह ही हुई थी. फ़र्क सिर्फ़ इतना सा था कि सुबह-सुबह ज़ोर की आँधी आई थी.
लेकिन जेल के क़ैदियों को थोड़ा अजीब सा लगा जब चार बजे ही वॉर्डेन चरत सिंह ने उनसे आकर कहा कि वो अपनी-अपनी कोठरियों में चले जाएं. उन्होंने कारण नहीं बताया.
उनके मुंह से सिर्फ़ ये निकला कि आदेश ऊपर से है. अभी क़ैदी सोच ही रहे थे कि माजरा क्या है, जेल का नाई बरकत हर कमरे के सामने से फुसफुसाते हुए गुज़रा कि आज रात भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी दी जाने वाली है.
उस क्षण की निश्चिंतता ने उनको झकझोर कर रख दिया. क़ैदियों ने बरकत से मनुहार की कि वो फांसी के बाद भगत सिंह की कोई भी चीज़ जैसे पेन, कंघा या घड़ी उन्हें लाकर दें ताकि वो अपने पोते-पोतियों को बता सकें कि कभी वो भी भगत सिंह के साथ जेल में बंद थे.
बरकत भगत सिंह की कोठरी में गया और वहाँ से उनका पेन और कंघा ले आया. सारे क़ैदियों में होड़ लग गई कि किसका उस पर अधिकार हो. आखिर में ड्रॉ निकाला गया.
लाहौर कॉन्सपिरेसी केस
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अब सब क़ैदी चुप हो चले थे. उनकी निगाहें उनकी कोठरी से गुज़रने वाले रास्ते पर लगी हुई थी. भगत सिंह और उनके साथी फाँसी पर लटकाए जाने के लिए उसी रास्ते से गुज़रने वाले थे.
एक बार पहले जब भगत सिंह उसी रास्ते से ले जाए जा रहे थे तो पंजाब कांग्रेस के नेता भीमसेन सच्चर ने आवाज़ ऊँची कर उनसे पूछा था, "आप और आपके साथियों ने लाहौर कॉन्सपिरेसी केस में अपना बचाव क्यों नहीं किया."
भगत सिंह का जवाब था, "इन्कलाबियों को मरना ही होता है, क्योंकि उनके मरने से ही उनका अभियान मज़बूत होता है, अदालत में अपील से नहीं."
वॉर्डेन चरत सिंह भगत सिंह के ख़ैरख़्वाह थे और अपनी तरफ़ से जो कुछ बन पड़ता था उनके लिए करते थे. उनकी वजह से ही लाहौर की द्वारकादास लाइब्रेरी से भगत सिंह के लिए किताबें निकल कर जेल के अंदर आ पाती थीं.
जेल की कठिन ज़िंदगी
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भगत सिंह को किताबें पढ़ने का इतना शौक था कि एक बार उन्होंने अपने स्कूल के साथी जयदेव कपूर को लिखा था कि वो उनके लिए कार्ल लीबनेख़ की 'मिलिट्रिज़म', लेनिन की 'लेफ़्ट विंग कम्युनिज़म' और अपटन सिनक्लेयर का उपन्यास 'द स्पाई' कुलबीर के ज़रिए भिजवा दें.
भगत सिंह जेल की कठिन ज़िंदगी के आदी हो चले थे. उनकी कोठरी नंबर 14 का फ़र्श पक्का नहीं था. उस पर घास उगी हुई थी. कोठरी में बस इतनी ही जगह थी कि उनका पाँच फिट, दस इंच का शरीर बमुश्किल उसमें लेट पाए.
भगत सिंह को फांसी दिए जाने से दो घंटे पहले उनके वकील प्राण नाथ मेहता उनसे मिलने पहुंचे. मेहता ने बाद में लिखा कि भगत सिंह अपनी छोटी सी कोठरी में पिंजड़े में बंद शेर की तरह चक्कर लगा रहे थे.
'इंक़लाब ज़िदाबाद!'
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उन्होंने मुस्करा कर मेहता को स्वागत किया और पूछा कि आप मेरी किताब 'रिवॉल्युशनरी लेनिन' लाए या नहीं? जब मेहता ने उन्हे किताब दी तो वो उसे उसी समय पढ़ने लगे मानो उनके पास अब ज़्यादा समय न बचा हो.
मेहता ने उनसे पूछा कि क्या आप देश को कोई संदेश देना चाहेंगे? भगत सिंह ने किताब से अपना मुंह हटाए बग़ैर कहा, "सिर्फ़ दो संदेश... साम्राज्यवाद मुर्दाबाद और 'इंक़लाब ज़िदाबाद!"
इसके बाद भगत सिंह ने मेहता से कहा कि वो पंडित नेहरू और सुभाष बोस को मेरा धन्यवाद पहुंचा दें, जिन्होंने मेरे केस में गहरी रुचि ली थी. भगत सिंह से मिलने के बाद मेहता राजगुरु से मिलने उनकी कोठरी पहुंचे.
राजगुरु के अंतिम शब्द थे, "हम लोग जल्द मिलेंगे." सुखदेव ने मेहता को याद दिलाया कि वो उनकी मौत के बाद जेलर से वो कैरम बोर्ड ले लें जो उन्होंने उन्हें कुछ महीने पहले दिया था.
तीन क्रांतिकारी
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मेहता के जाने के थोड़ी देर बाद जेल अधिकारियों ने तीनों क्रांतिकारियों को बता दिया कि उनको वक़्त से 12 घंटे पहले ही फांसी दी जा रही है. अगले दिन सुबह छह बजे की बजाय उन्हें उसी शाम सात बजे फांसी पर चढ़ा दिया जाएगा.
भगत सिंह मेहता द्वारा दी गई किताब के कुछ पन्ने ही पढ़ पाए थे. उनके मुंह से निकला, "क्या आप मुझे इस किताब का एक अध्याय भी ख़त्म नहीं करने देंगे?"
भगत सिंह ने जेल के मुस्लिम सफ़ाई कर्मचारी बेबे से अनुरोध किया था कि वो उनके लिए उनको फांसी दिए जाने से एक दिन पहले शाम को अपने घर से खाना लाएं.
लेकिन बेबे भगत सिंह की ये इच्छा पूरी नहीं कर सके, क्योंकि भगत सिंह को बारह घंटे पहले फांसी देने का फ़ैसला ले लिया गया और बेबे जेल के गेट के अंदर ही नहीं घुस पाया.
आज़ादी का गीत
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थोड़ी देर बाद तीनों क्रांतिकारियों को फांसी की तैयारी के लिए उनकी कोठरियों से बाहर निकाला गया. भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव ने अपने हाथ जोड़े और अपना प्रिय आज़ादी गीत गाने लगे-
कभी वो दिन भी आएगा
कि जब आज़ाद हम होंगें
ये अपनी ही ज़मीं होगी
ये अपना आसमाँ होगा.
फिर इन तीनों का एक-एक करके वज़न लिया गया. सब के वज़न बढ़ गए थे. इन सबसे कहा गया कि अपना आखिरी स्नान करें. फिर उनको काले कपड़े पहनाए गए. लेकिन उनके चेहरे खुले रहने दिए गए.
चरत सिंह ने भगत सिंह के कान में फुसफुसा कर कहा कि वाहे गुरु को याद करो.
फांसी का तख़्ता
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भगत सिंह बोले, "पूरी ज़िदगी मैंने ईश्वर को याद नहीं किया. असल में मैंने कई बार ग़रीबों के क्लेश के लिए ईश्वर को कोसा भी है. अगर मैं अब उनसे माफ़ी मांगू तो वो कहेंगे कि इससे बड़ा डरपोक कोई नहीं है. इसका अंत नज़दीक आ रहा है. इसलिए ये माफ़ी मांगने आया है."
जैसे ही जेल की घड़ी ने 6 बजाय, क़ैदियों ने दूर से आती कुछ पदचापें सुनीं. उनके साथ भारी बूटों के ज़मीन पर पड़ने की आवाज़े भी आ रही थीं. साथ में एक गाने का भी दबा स्वर सुनाई दे रहा था, "सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है..."
सभी को अचानक ज़ोर-ज़ोर से 'इंक़लाब ज़िंदाबाद' और 'हिंदुस्तान आज़ाद हो' के नारे सुनाई देने लगे. फांसी का तख़्ता पुराना था लेकिन फांसी देने वाला काफ़ी तंदुरुस्त. फांसी देने के लिए मसीह जल्लाद को लाहौर के पास शाहदरा से बुलवाया गया था.
भगत सिंह इन तीनों के बीच में खड़े थे. भगत सिंह अपनी माँ को दिया गया वो वचन पूरा करना चाहते थे कि वो फाँसी के तख़्ते से 'इंक़लाब ज़िदाबाद' का नारा लगाएंगे.
लाहौर सेंट्रल जेल
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लाहौर ज़िला कांग्रेस के सचिव पिंडी दास सोंधी का घर लाहौर सेंट्रल जेल से बिल्कुल लगा हुआ था. भगत सिंह ने इतनी ज़ोर से 'इंकलाब ज़िंदाबाद' का नारा लगाया कि उनकी आवाज़ सोंधी के घर तक सुनाई दी.
उनकी आवाज़ सुनते ही जेल के दूसरे क़ैदी भी नारे लगाने लगे. तीनों युवा क्रांतिकारियों के गले में फांसी की रस्सी डाल दी गई. उनके हाथ और पैर बांध दिए गए. तभी जल्लाद ने पूछा, सबसे पहले कौन जाएगा?
सुखदेव ने सबसे पहले फांसी पर लटकने की हामी भरी. जल्लाद ने एक-एक कर रस्सी खींची और उनके पैरों के नीचे लगे तख़्तों को पैर मार कर हटा दिया. काफी देर तक उनके शव तख़्तों से लटकते रहे.
अंत में उन्हें नीचे उतारा गया और वहाँ मौजूद डॉक्टरों लेफ़्टिनेंट कर्नल जेजे नेल्सन और लेफ़्टिनेंट कर्नल एनएस सोधी ने उन्हें मृत घोषित किया.
अंतिम संस्कार
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एक जेल अधिकारी पर इस फांसी का इतना असर हुआ कि जब उससे कहा गया कि वो मृतकों की पहचान करें तो उसने ऐसा करने से इनकार कर दिया. उसे उसी जगह पर निलंबित कर दिया गया. एक जूनियर अफ़सर ने ये काम अंजाम दिया.
पहले योजना थी कि इन सबका अंतिम संस्कार जेल के अंदर ही किया जाएगा, लेकिन फिर ये विचार त्यागना पड़ा जब अधिकारियों को आभास हुआ कि जेल से धुआँ उठते देख बाहर खड़ी भीड़ जेल पर हमला कर सकती है.
इसलिए जेल की पिछली दीवार तोड़ी गई. उसी रास्ते से एक ट्रक जेल के अंदर लाया गया और उस पर बहुत अपमानजनक तरीके से उन शवों को एक सामान की तरह डाल दिया गया.
पहले तय हुआ था कि उनका अंतिम संस्कार रावी के तट पर किया जाएगा, लेकिन रावी में पानी बहुत ही कम था, इसलिए सतलज के किनारे शवों को जलाने का फैसला लिया गया.
लाहौर में नोटिस
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उनके पार्थिव शरीर को फ़िरोज़पुर के पास सतलज के किनारे लाया गया. तब तक रात के 10 बज चुके थे. इस बीच उप पुलिस अधीक्षक कसूर सुदर्शन सिंह कसूर गाँव से एक पुजारी जगदीश अचरज को बुला लाए.
अभी उनमें आग लगाई ही गई थी कि लोगों को इसके बारे में पता चल गया. जैसे ही ब्रितानी सैनिकों ने लोगों को अपनी तरफ़ आते देखा, वो शवों को वहीं छोड़ कर अपने वाहनों की तरफ़ भागे. सारी रात गाँव के लोगों ने उन शवों के चारों ओर पहरा दिया.
अगले दिन दोपहर के आसपास ज़िला मैजिस्ट्रेट के दस्तख़त के साथ लाहौर के कई इलाकों में नोटिस चिपकाए गए जिसमें बताया गया कि भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु का सतलज के किनारे हिंदू और सिख रीति से अंतिम संस्कार कर दिया गया.
इस ख़बर पर लोगों की कड़ी प्रतिक्रिया आई और लोगों ने कहा कि इनका अंतिम संस्कार करना तो दूर, उन्हें पूरी तरह जलाया भी नहीं गया. ज़िला मैजिस्ट्रेट ने इसका खंडन किया लेकिन किसी ने उस पर विश्वास नहीं किया.
भगत सिंह का परिवार
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इस तीनों के सम्मान में तीन मील लंबा शोक जुलूस नीला गुंबद से शुरू हुआ. पुरुषों ने विरोधस्वरूप अपनी बाहों पर काली पट्टियाँ बांध रखी थीं और महिलाओं ने काली साड़ियाँ पहन रखी थीं.
लगभग सब लोगों के हाथ में काले झंडे थे. लाहौर के मॉल से गुज़रता हुआ जुलूस अनारकली बाज़ार के बीचोबीच रूका.
अचानक पूरी भीड़ में उस समय सन्नाटा छा गया जब घोषणा की गई कि भगत सिंह का परिवार तीनों शहीदों के बचे हुए अवशेषों के साथ फिरोज़पुर से वहाँ पहुंच गया है.
जैसे ही तीन फूलों से ढ़के ताबूतों में उनके शव वहाँ पहुंचे, भीड़ भावुक हो गई. लोग अपने आँसू नहीं रोक पाए.
ब्रिटिश साम्राज्य
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वहीं पर एक मशहूर अख़बार के संपादक मौलाना ज़फ़र अली ने एक नज़्म पढ़ी जिसका लब्बोलुआब था, 'किस तरह इन शहीदों के अधजले शवों को खुले आसमान के नीचे ज़मीन पर छोड़ दिया गया.'
उधर, वॉर्डेन चरत सिंह सुस्त क़दमों से अपने कमरे में पहुंचे और फूट-फूट कर रोने लगे. अपने 30 साल के करियर में उन्होंने सैकड़ों फांसियां देखी थीं, लेकिन किसी ने मौत को इतनी बहादुरी से गले नहीं लगाया था जितना भगत सिंह और उनके दो कॉमरेडों ने.
किसी को इस बात का अंदाज़ा नहीं था कि 16 साल बाद उनकी शहादत भारत में ब्रिटिश साम्राज्य के अंत का एक कारण साबित होगी और भारत की ज़मीन से सभी ब्रिटिश सैनिक हमेशा के लिए चले जाएंगे.
और एक सावरकर थे यातना सह नहीं पाये तो माफी मांघकर बहार आये और अंग्रेजों के लिए मुखबिरी की

पंडित जवाहर लाल नेहरू के देहावसान के पश्चात संसद में अटल बिहारी वाजपेई जी के उद्बोधन के मुख्य अंश---

पंडित जवाहर लाल नेहरू के देहावसान के पश्चात संसद में अटल बिहारी वाजपेई जी के उद्बोधन के मुख्य अंश--- महोदय, एक सपना था जो अधूरा रह गया, एक गीत था जो गूँगा हो गया, एक लौ थी जो अनन्त में विलीन हो गई। सपना था एक ऐसे संसार का जो भय और भूख से रहित होगा, गीत था एक ऐसे महाकाव्य का जिसमें गीता की गूँज और गुलाब की गंध थी। लौ थी एक ऐसे दीपक की जो रात भर जलता रहा, हर अँधेरे से लड़ता रहा और हमें रास्ता दिखाकर, एक प्रभात में निर्वाण को प्राप्त हो गया। मृत्यु ध्रुव है, शरीर नश्वर है। कल कंचन की जिस काया को हम चंदन की चिता पर चढ़ा कर आए, उसका नाश निश्चित था। लेकिन क्या यह ज़रूरी था कि मौत इतनी चोरी छिपे आती? जब संगी-साथी सोए पड़े थे, जब पहरेदार बेखबर थे, हमारे जीवन की एक अमूल्य निधि लुट गई। भारत माता आज शोकमग्ना है – उसका सबसे लाड़ला राजकुमार खो गया। मानवता आज खिन्नमना है – उसका पुजारी सो गया। शांति आज अशांत है – उसका रक्षक चला गया। दलितों का सहारा छूट गया। जन जन की आँख का तारा टूट गया। यवनिका पात हो गया। विश्व के रंगमंच का प्रमुख अभिनेता अपना अंतिम अभिनय दिखाकर अन्तर्ध्यान हो गया। महर्षि वाल्मीकि ने रामायण में भगवान राम के सम्बंध में कहा है कि वे असंभवों के समन्वय थे। पंडितजी के जीवन में महाकवि के उसी कथन की एक झलक दिखाई देती है। वह शांति के पुजारी, किन्तु क्रान्ति के अग्रदूत थे; वे अहिंसा के उपासक थे, किन्तु स्वाधीनता और सम्मान की रक्षा के लिए हर हथियार से लड़ने के हिमायती थे। वे व्यक्तिगत स्वाधीनता के समर्थक थे किन्तु आर्थिक समानता लाने के लिए प्रतिबद्ध थे। उन्होंने समझौता करने में किसी से भय नहीं खाया, किन्तु किसी से भयभीत होकर समझौता नहीं किया। पाकिस्तान और चीन के प्रति उनकी नीति इसी अद्भुत सम्मिश्रण की प्रतीक थी। उसमें उदारता भी थी, दृढ़ता भी थी। यह दुर्भाग्य है कि इस उदारता को दुर्बलता समझा गया, जबकि कुछ लोगों ने उनकी दृढ़ता को हठवादिता समझा। मुझे याद है, चीनी आक्रमण के दिनों में जब हमारे पश्चिमी मित्र इस बात का प्रयत्न कर रहे थे कि हम कश्मीर के प्रश्न पर पाकिस्तान से कोई समझौता कर लें तब एक दिन मैंने उन्हें बड़ा क्रुद्ध पाया। जब उनसे कहा गया कि कश्मीर के प्रश्न पर समझौता नहीं होगा तो हमें दो मोर्चों पर लड़ना पड़ेगा तो बिगड़ गए और कहने लगे कि अगर आवश्यकता पड़ेगी तो हम दोनों मोर्चों पर लड़ेंगे। किसी दबाव में आकर वे बातचीत करने के खिलाफ थे। महोदय, जिस स्वतंत्रता के वे सेनानी और संरक्षक थे, आज वह स्वतंत्रता संकटापन्न है। सम्पूर्ण शक्ति के साथ हमें उसकी रक्षा करनी होगी। जिस राष्ट्रीय एकता और अखंडता के वे उन्नायक थे, आज वह भी विपदग्रस्त है। हर मूल्य चुका कर हमें उसे कायम रखना होगा। जिस भारतीय लोकतंत्र की उन्होंने स्थापना की, उसे सफल बनाया, आज उसके भविष्य के प्रति भी आशंकाएं प्रकट की जा रही हैं। हमें अपनी एकता से, अनुशासन से, आत्म-विश्वास से इस लोकतंत्र को सफल करके दिखाना है। नेता चला गया, अनुयायी रह गए। सूर्य अस्त हो गया, तारों की छाया में हमें अपना मार्ग ढूँढना है। यह एक महान परीक्षा का काल है। यदि हम सब अपने को समर्पित कर सकें एक ऐसे महान उद्देश्य के लिए जिसके अन्तर्गत भारत सशक्त हो, समर्थ और समृद्ध हो और स्वाभिमान के साथ विश्व शांति की चिरस्थापना में अपना योग दे सके तो हम उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित करने में सफल होंगे। संसद में उनका अभाव कभी नहीं भरेगा। शायद तीन मूर्ति को उन जैसा व्यक्ति कभी भी अपने अस्तित्व से सार्थक नहीं करेगा। वह व्यक्तित्व, वह ज़िंदादिली, विरोधी को भी साथ ले कर चलने की वह भावना, वह सज्जनता, वह महानता शायद निकट भविष्य में देखने को नहीं मिलेगी। मतभेद होते हुए भी उनके महान आदर्शों के प्रति, उनकी प्रामाणिकता के प्रति, उनकी देशभक्ति के प्रति, और उनके अटूट साहस के प्रति हमारे हृदय में आदर के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। इन्हीं शब्दों के साथ मैं उस महान आत्मा के प्रति अपनी विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ। *-श्री अटल बिहारी वाजपेयी* (29 मई, 1964 को संसद में दिया गया भाषण

Tuesday, 9 May 2017

अब्दुल रहीम खान खाना

अब्दुल रहीम खान खाना .अकबर के नौ रत्नों में सबसे नायब हीरा ,एक अद्भुत व्यक्ति .इतना बड़ा शूरमा की १६ से ७२ वर्ष की उम्र तक लडाइयां ही लड़ता और जीतता रहा /इतना बड़ा दानी की किसी ने कहा की मैंने एक लाख अशर्फियाँ एक साथ देखी नहीं.. तोउसे एक लाख अशर्फियाँ दे दी.. विनम्रता इतनी की देने के बाद भी शर्मिंदा थे ...देते समय उनकी आखे नीचे थीं ,किसी ने आँखे नीचे होने का कारन पूछा तो कहा .
देन हार कोई और है भेजत है दिन रैन
लोग भरम हमपर धरें यातें नीचे नैन ..
सहृदय ऐसे की एक सिपाही की स्त्री के एक बर्वे पर प्रसन्न हो गए ;-
प्रेम प्रीति को बिरवा चलेहु लगाय
सींचनि की सुधि लीजै मुरझ न जांय.
और सिपाही को धन धन्य देकर उसकी नवागत बधू के पास भेज दिया .और इसी चाँद पर एक पूरा ग्रन्थ ही लिख डाला
गुण के ग्राहक ऐसे की अरबी/फ़ारसी ,हिन्दी के अनेक रचना कार इनके मित्र थे.
चरित्रवान इतने की रूपवती के प्रणय निवेदन के कथन ..की मुझे अपने जैसा पुत्र दे दो .पर अपना सर उसकी गोद में डाल दिया ..माँ कहकर
.तुलसी के मित्र थे .अकबर के विस्वास पात्र थे .जहाँगीर और शाहजहाँ के द्वन्द में इस कदर फंसे की पिस गए .जेल में डाल दिए गए उनके पुत्र दरब खान का सर काट कर उनके पास भेज दिया गया .उनके पूरे परिवार को जालिमो ने मार दिया फिर भी स्वाभि मान नहीं छोड़ा ...
रहिमन मोहि न सुहाय अमिय पियावै मान बिन
.बरु विष देई बुलाय मान सहित मरिबो भलो .
और प्रेमी इतने गहरे की ..
अंतर दाव लगी रहे धुंवा न प्रगट सोय
कई जिय जाने आपनो या सर बीती होय ..
जे सुलगे ते बुझ गए बुझे ते सुलगे नाहि
रहिमन दाहे प्रेम के बुझी बुझी के सुल गाहि .
कल आप ने यहाँ तक पढ़ा था ..अब आगे पढ़िए ..
..
(२ .अब्दुल रहीम खानखाना )कल से आगे ..पढिये .
भक्त ऐसे की कृष्ण मय हो गए कवियों ने लिखा कोटिन हिन्दू वारिये मुस्लमान हरि जनन पर ,.कुल मिला कर एक ऐसा व्यक्तित्व
जिसे पढ़ कर आप पूरी एक कौम के बारे में अपनी जान कारी को अधूरी मानने पर विवास होंगे ..
कल से आगे ..कल के लेख में अशुद्धियाँ थीं बाद में दूर किया अब नही हैं .आज कोशिस की है की अशुद्ध न हो फिर भी होगा ही ..आज और अच्छा बना है पढ़िए
रहीम को पढ़ते समय मुझे लगा की उनका पूरा जीवन -राजसी विलास का रहा हो ,.दर दर,मारे मारे फिरने का रहा हो, युद्ध और फतह का रहा हो ,राजा, के क्रोध काल का हो ,कुचाली दोस्तों के विश्वास घातके समय का रहा हो, एक आंवा था जो भीतर ही दहक रहा था /
रहीम के बारे में एक कहानी मिलती है की तान सेन ने अकबर के दरबार में एक पद गाया, जो इस प्रकार था .
जसुदा बार बार यों भाखै है
कोऊ ब्रज में हितू हमारो चलत गोपालहिं राखै ...
और अकबर ने अपने सभा सदों से इसका अर्थ कहने को कहा ,
तनसेन ने कहा --यशोदा बार बार अर्थात पुनः पुनः यह पुकार लगाती है की है कोई ऐसा हितू जो ब्रज में गोपाल को रोक ले .
शेख फैजी ने अर्थ कहा ....बार बार का मतलब ..रो रो कर रट लगाती है .बीरबल ने कहा बार बार का अर्थ है द्वार द्वार जाकर यशोदा पुकार लगाती है ...खाने आजम कोका ने कहा बार का अर्थ दिन है और यशोदा प्रतिदिन यही रटती रहती है .अब रहीम की बरी थी .उन्होंने अर्थ कहा ...तानसेन गायक हैं इनको एक ही पद को अलापना रहता है इस लिए उन्हों ने बार बार का अर्थ पुनुरुक्ति किया शेख फैजी फ़ारसी का शायर हैं इन्हें रोने के सिवा कोई काम नहीं .राजा बीर बल द्वार द्वार घूमने वाले ब्राम्हण हैं इसलिए इनका बार बार का अर्थ द्वार द्वार ही उचित है, खाने आजम कोका नजूमी (ज्योतिषी) हैं उन्हें तिथि बार से ही वास्ता पड़ता है इसलिए बार बार का अर्थ उन्होंने दिन दिन किया ,.
पर हुजूर वास्तविक अर्थ यह है की
यशोदा का बार बारअर्थात रोम रोम पुकारता है की कोई तो मिले जो मेरे गोपाल को ब्रज में रोक ले .इस ब्य्ख्या से रहीम की विद्ग्घ्ता और साहित्य की समझ का पता चलता है
इस से रहीम के उस गहरे हिन्दुस्तानी रंग का पता चलता है जो रोमांच को सात्विक भाव मानता हैऔर रोम रोम में ब्रम्हांड देखता . जो शरीर के रोम जैसे अंग को भी प्राणों का सन्देश वाहक मानता है जो वनस्पति मात्र को विरत अस्तित्व का रोमांच मानता है रहीम का जीवन एक पूरा दुखांत नाटक है .जिसमे बहुत से उतर चढाव हैं .महात्मा तुलसी से उनकी प्रगाढ़ मित्रता थी .बाप बैरम खान अकबर की ही तरह तुर्किस्तान के एक बहुत बड़े कबीले के सरदार थे वे सोलह वर्ष की आयु से ही हुमायू के साथ रहे .उन्ही की कूबत थी की हुमयू को फिर से दिल्ली की राजगद्दी पर बिठाया ,हुमायूँ के मरने पर वे ही अकबर के अभिभावक बनगए.जिस साल हुमायूँ मरे उसी साल लाहौर में रहीम का जन्म हुआ .रहीम की माँ अकबर की मौसी थीं .अकबर से दूसरा रिश्ता भी था ,बैरम खान की दूसरी शादी बाबर की नतिनी सलीमा बेगम सुल्ताना से हुई थी .बैरम खान के मरने के बाद अकबर के साथ सलीमा का पुनर्विवाह हुआ ,पर भाग्य का खेल ,चुगुल खोरों ने बैरम खान और अकबर के बीच भेद की गहरी खाई खोद दी .बैतररम खान ने विद्रोह किया परास्त हुए ,उन्हें हज करने जाने की सजा मिली.वे गुजरात पहुंचे थे की उनका डेरा लुट गया बैरम खान का क़त्ल हो गया ,बफदारों ने ओ परिवार बचाया ,चार वर्ष के रहीम बारह वर्ष की सलीमा सुल्ताना बेगम .अहमद बाद पहुंचे .जब रहीम पांच वर्ष के थे तभी अकबर ने उन्हें अपने संरक्षण में ले लिया .शिक्षा दीक्षा कराई.बड़े सरदार मिर्जा अजीज कोकलताश की बहन माह बनू बेगम से निकाह करवाया .उन्नीस वर्ष की आयु में गुजरात का युद्ध जीत कर वहा के सूबेदार बने ....
वे तुलसी के परम मित्र थे .और तुलसी को बेहतरीन इंसान मानते थे ..
सुरतिय नर तिय नागतिय सब चाहत अस होय
गोद लिए हुलसी फिरें तुलसी सों सूत होय
और रामचरित मानस को बेहतरीन ग्रन्थ ........
राम चरित मांनस विमल सब ग्रंथन को सार
हिंदुआं को वेद सैम तुरकन प्रकट कुरान ....
कबीर तुलसी रहीम और रसखन मध्यकाल के चार बेहतरीन इंसान ..कबीर संत थे एक बेहतरीन इंसान थे .अनपढ़ गृहस्त थे .जाति पांति धन धर्म से परे थे .मन से साफ़ थे .कबीर की भाषा आम आदमी की भाषा थी.वे लिखते नहीं थे केवल बोलते थे लोक जीवन के बहुत नजदीक थे .उनके प्रतीक दृष्टान्त लोक जीवन से आते थे . वे राम नाम जपते जरुर थे पर पूजा और आडम्बर के विरोधी थे उनके राम दशरथ के बेटे राम नही थे .इस धरती पर कबीर से बड़ा कोई इन्सान पैदा ही नहीं हुआ ,एक मुकम्मल इन्सान क्या होता है जानने के लिए हर किसी को कबीर पढ़ना चाहिए .अनगढ़ ,सहज ,भीतर- बाहर एक ,निर्भय ,आस्थावान ,जागृत विवेक .बिना पढ़े पूरी तरह ज्ञानी ,प्रेमानुभूति की पराकाष्ठा को समझाने वाला .मनुष्यता का रक्षक ,जागृत ,त्यागी गृहस्थ ,मनुष्यता की रक्षा के लिए भगवान से भी मुठभेड़ करने को आमादा ,जीवन और जगत को पूरी तरह समझाने वाला ,उसकी नश्वरता का गायक .मनुष्य इस धरती पर दूसरा कोई नहीं ...कबीर को जानना एक तपस्या है .उसे समझना मनुष्य बनने के रस्ते में एक सफल कदम है, उसे जीना ही मनुष्य होना है .कबीर सत्य है, कबीर नित्य है, कबीर .लोक है ,कबीर लोक राग है ,कबीर जिजीविषा है ..अपने लोक को ,अपने लोकराग को .अपने सत्य को अपने नित्य में जी पाना ही कबीर होना है .उसे पढ़ना एक रोमांच है .उसे समझना ब्रम्ह को ,प्राणी को जानना है ,उसे जीना एक ताकत है ,कबीर जीवन की हिम्मत है .जीवन की कला है ..आज कबीर की ही सबसे जादा जरूरत है . कबीर धर्म की ब्याख्या है .कबीर कर्म का प्रमाण है .वह निष्काम कर्मयोगी गृहस्थ ...वेद की ब्याख्या है .पुरानो की समीक्षा है वेदांत दर्शन का निचोड़ है ....
तुलसी महात्मा थे . भक्त थे . पढ़े लिखे थे . गृहस्त नहीं थे .पर संत नहीं थे .उन्हों ने अपने काम को पीटपीट के राम बना दिया था .और राम के परम भक्त थे.संस्कृत के विद्वान थे पर अवधी में लिखते थे वे.उनमे भी वे सारे गुण थे जो कबीर में थे बल्कि वे पढ़े लिखे थे पुरानो के जादा नजदीक थे परन्तु वेद वेदांत के ज्ञाता थे . रहीम .के परम मित्र थे .और रहीम तुलसी को बेहतरीन इंसान मानते थे ..
सुरतिय नर तिय नागतिय सब चाहत अस होय
गोद लिए हुलसी फिरें तुलसी सों सूत होय
और रामचरित मानस को बेहतरीन ग्रन्थ ........
राम चरित मांनस विमल सब ग्रंथन को सांन 
हिंदुअन को वेद सम तुरकन प्रकट कुरान ....
रहीम अकबर के दरबारी थे तुलसी नही थे .हाँ अकबर ने चाहा था पर तुलसी ने अकबर को सीधा सा जबा दे दिया था .. 
होऊं चाकर रघुबीर को पटो लिखो दरबार .
तुलसी अब का होंही गे नर के मंसब दार ..
.मतलब हिम्मती थे निडर थे ब्राम्हण थे .लिखते अवधी में थे . लोक जीवन के बहुत नजदीक थे .उनके प्रतीक दृष्टान्त लोक जीवन से आते थे .रहीमऔर तुलसी दोनों समकालीन थे.रहीम संस्कृत अवधि अरवी फारसी के जानकार थे .सभी भाषाओं का आदर करते थे सभी में लिखते थे .वे मुसलमान थे पर भक्त थे .राम के भी और कृष्ण के भी .कृष्ण के एक परम भक्त और थे रसखान .इन पर फिर कभी ..
हाँ तो मैं कह रहा था की तुलसी ने कभी मुस्लिम धर्म की कोई बात नहीं की .अरवी और फारसी की चर्चा तक नहीं की ...रहीम अरवी फारसी के साथ हिन्दवी में भी लिखते रहे और नमाज के साथ साथ पूजा भी करते रहे .वे दरबारी थे .शासक थे तलवार के धनी थे फिर भी भक्त थे .महात्मा थे संत थे .उदार थे ..उन्हों ने तुलसी और मांनस दोनों की प्रशंसा की .पर तुलसी ने ऐसा कहीं नहीं किया कभी नहीं किया .एक बार भी रहीम का जिक्र नही किया अरवी फारसी का नाम तक नहीं लिया प्रशंसा की तो बात ही छोडिये .इसी लिए मैंने कहा तुलसी संत नहीं थे .उनमें हिंदुत्व .और हिंदी संकृत प्रेम तो होना लाजमी था पर अरवी फारसी को जानने की ललक भी नहीं थी यह समझ से परे है .सम्मान तो जाने दीजिये .रहीं म तो अपने को भक्त कहलाने में खुस थे पर तुलसी इस दिशा में मौन ही रहे.बाबा तुलसी दास ने मानस लिख कर राम को स्थापित किया .हिन्दुओं को संगठित किया .लेकिन अपने सम्पूर्ण लेखन में देशकी अधी जनसंख्या का कोई उल्लेख नहीं किया .शैव ,वैष्णव, स्मार्त, साधू ,संत ,योगी ,गृहस्त ऊँचनीच का भेद भाव त्याग कर एक होने और लड़ाई ख़तम करने की बात की .किन्तु उन्हों ने कहीं भी .हिन्दू मुसलमान ,अवधि फारसी संस्कृत और अरबी,की बात नहीं की ,बौद्धों की बात नहीं की जैनियों की बात नहीं की .मतलब वे हिन्दुओं को संगठित करते रहे ,पर मुसलमान बौद्ध ,जैन की चिंता नहीं की ..अवधी में लिखते रहे ..पर .अरबी और फारसी ..तथा अन्य बोलियों की चर्चा नहीं की ...जब की उस समय की सबसे बड़ी जरुरत यही थी ..आमिर खुसरो ,कबीर ,जायसी .रहीम ,रसखान ..जैसे नायक .हिन्दू मुसलमान .और भाषा की समस्या से दो चार होते रहे ..रहीम जैसे .रसखान जैसे विद्वानों ने कृष्ण भक्ति की प्रन्संशा की .रहीम ने तो तुलसी दास और मानस तक की प्रसंशा की ..पर तुलसी ने ऐसा कभी नहीं किया ..आखिर तुलसी दास ने ऐसा क्यों किया ..यह प्रश्न मेरे दिमाग को परेशान करता है .कोई भी बड़ा रचना कार अपने युग से उस काल की सबसे बड़ी समस्या से मुह मोड़ कर कैसे रह सकता है .बड़ी बड़ी लडाइयां हो रहीं थीं अकबर ने तोडर मल ने सभी ने हिन्दू मुसलमान को एक करने की कोशिस की .अकबर ने तो दीनेइलाही .लिखा .पर तुलसी ने इस दिशा में मौन क्यों साधे रखा ... .इस मायने में रहीम और रसखान दोनों कबीर की तरह तुलसी से बहुत आगे रहे .
मैं तो सोचता हूँ की अगर तुलसी ने रहीम और रसखान की तरह का आचरण किया होता तो शायदहमारी बहुत बड़ी समस्या ख़त्म हो जाती कम से कम उर्दू भाषा का जन्म तो नहीं होता .इस मायने में आमिर खुसरो की भी चर्चा कभी करूँगा . आज इतना ही ..
बहुरि बंदि खलगन सितभायें जे बिन काज दाहिने बाएं ..तुलसी की खल वंदना के साथ रहीम का चौथा एपिसोड लिखना शुरू कर रहा हूँ .सज्जन लोग पढेंगे ,आदर करेंगे ...
अमित उदार अति पावन विचारी चारू ,जहाँ तहां आदरियो गंगा जी के नीर सों /
खलन के घालिबे को खलक के पलिबे को ,खान खाना एक रामचन्द्र जी के तीर सों //
गंगा जल की तरह पवित्र राम के तीर की तरह शत्रु विनाशक परन्तु जगत पालक ब्यक्तित्व को उनकी कृति में तलाश क रने की लालसा ,ललक ,जग उठी है /
रहीम ने प्रेम पंथ का एक चित्र खींचा है ..
रहिमन मैं तुरंग चढी चलिबो पावक मांहि
प्रेम पंथ ऐसो कठिन सब सों निबहत नाहि /
घोड़े पर सवार होकर आग पर चलाना .और निबाह लेना सब के बसबूते का नहीं.रहीम जिन्दगी भर घोडेपर सवार हो कर आग में दौड़ते रहे . रहीम के काब्य तुरंग की यात्रा भी अग्नि यात्रा ही तो है .वह अग्नि है जीवन के सहज प्यार की जो कभी बड़ी सुखद कभी बड़ी दुखद रही ,पहले पड़ाव तक चढ़ती जवानी के अनुभवों से गुजरे ,पर वे भी राजसी जीवन के नहीं थे ,बिभिन्न प्रकारके सामान्य जन की मानसिक स्थितियों में प्यार के अनुभव थे ,इनमे हांस -विलाश है सजने सजाने का भाव है लालसा विदग्धता छल है मान मनौवल है प्रतीक्षा है राग रंग है ईर्ष्या है उत्कंठा है और लगन है ,कुल मिला कर लौकिक श्रृंगार की लहक दार .ललक मय छटा है .
इस काल की दो रचनाएँ हैं बरवै नईका भेद और नगर शोभा ,बरवै नईका भेदमें नायिका की बिभिन्न अवस्थाओं का चित्र है ,
एक उदाहरन .-
मितवा चलेऊ विदेसवा मन अनुरागि
-पिय की सुरति गगरिया रहि मग लागि
प्रिय की स्मृति का कलश लिए नायिका रास्ते में खड़ी है कब प्रिय लौटेंगे और स्मृतियों का कलश उनके लिए मंगल कलश बनेगा , 
दूसरा चित्र
.भोरहिं बोल कोयलिया बढ़वति ताप
घरी एक धरि अलिया रहु चुप चाप ./
रात भर स्मृतियों में खोये खोये नींद उचटी रही जरा सी आंख लगी तो कोयल सबेरे ही बोल पडी और सबेरे सबेरे ताप चढ़ गया एक घड़ी तक तो वह चुप रहती ,पहले लेखमे मैंने बताया है की अपने एक सिपाही की पत्नी के चाँद से प्रभावित हो कर रहीम ने उसे धन देकर छुट्टी भेजा और उसी छंद में पुस्तक लिख दी नईका भेद .इसी काल की दूसरी रचना नगर- शोभा में बिभिन्न ब्यावसायों वर्गों ,जातियों उपजातियों की रूपसी तरुणियों के चित्र हैं 
,कुजडिन का एक रूप देखिये.
भांटा वरन सु कौजरी बेचै सोवा साग
नीलजु भई खेलत सदा गारी दै दै फाग ,
--बैगन की तरह काली कुजडिन सोवा साग बेचती है और निर्लज्ज गली दे दे कर फाग खेलती है ..इस रचना में कोई नहीं छूटा हैदफाली गाडीवान महावत नाल वन्दिनी चिरवा दारीनि,सईस ,काम ग़री ,नगारची ,बाज दारिनी ,दाव ग़री,साबुनी ग़री ,कुंडी गरिन,जिले दारी नी तक न जाने कितनी रोजगार में लगीं महिलाओं के चित्र हैं .जिले दारिनी का चित्र ..औरन को घर सघन मन चले जो घूंघट माह ,वाके रंग सुरंग को जिले दार पर छांह रुतबा तो देखिये .जिले दार बेचारा उसके बस में है,.बस आज इतना ही
बहुरि बंदि खलगन सितभायें जे बिन काज दाहिने बाएं ..तुलसी की खल वंदना के साथ रहीम का चौथा एपिसोड लिखना शुरू कर रहा हूँ .सज्जन लोग पढेंगे ,आदर करेंगे ...
अमित उदार अति पवन विचारी चारू ,जहाँ तहां आदरियो गंगा जी के नीर सों /
खलन के घालिबे को खलक के पलिबे को ,खान खाना एक रामचन्द्र जी के तीर सों //
गंगा जल की तरह पवित्र राम के तीर की तरह शत्रुविनाशक परन्तु जगत पलक ब्यक्तित्व को उनकी कृति में तलाश्काराने की लालसा ,ललक ,जग उठी है /
रहीम ने प्रेम पंथ का एक चित्र खींचा है ..
रहिमन मैं तुरंग चढी चलिबो पावक मांहि
प्रेम पंथ ऐसो कठिन सब सों निबहत नाहि /
घोड़े पर सवार होकर आग पर चलाना .और निबाह लेना सब के बसबूते का नहीं.रहीम जिन्दगी भर घोडेपर सवार हो कर आग में दौड़ते रहे . रहीम के काब्य तुरंग की यात्रा भी अग्नि यात्रा ही तो है .वह अग्नि है जीवन के सहज प्यार की जो कभी बड़ी सुखद कभी बड़ी दुखद रही ,पहले पड़ाव तक चढ़ती जवानी के अनुभवों से गुजरे ,पर वे भी राजसी जीवन के नहीं थे ,बिभिन्न प्रकारके सामान्य जन की मानसिक स्थितियों में प्यार के अनुभव थे ,इनमे हस -विलाश है सजाने सजाने का भाव है लालसा विदग्धता छल है मन मनौवल है प्रतीक्षा है राग रंग है ईर्ष्या है उत्कंठा है और लगन है ,कुल मिला कर लौकिक श्रृंगार की लहक्दार .ललक माय छटा है .इस काल की दो रचनाएँ हैं बरवै नईका भेद और नगर शोभा ,बरवै नईका भेदमें नायिका की बिभिन्न अवस्थाओं का चित्र है ,एक उदाहरन .-मितवा चलेऊ विदेसवा मन अनुरागि
-पिय की सुरति गगरिया रहि मग लागि
प्रिय की स्मृति का कलश लिए नायिका रास्ते में खड़ी हैकब प्रिय लौटेंगे और स्मृतियों का कलश उनके लिए मंगल कलश बनेगा ,दूसरा चित्र
.भोरहिं बोल कोयलिया बढ़वति ताप
घरी एक धरि अलिया रहु चुप चाप ./
रात भर स्मृतियों में खोये खोये नींद उचटी रही जरा सी आंख लगी तो कोयल सबेरे ही बोल पडी और सबेरे सबेरे ताप चढ़ गया एक घड़ी तक तो वह चुप रहती ,पहले लेखमे मैंने बताया है की अपने एक सिपाही की पत्नी के चाँद से प्रभावित हो कर रहीम ने उसे धन देकर छुट्टी भेजा और उसी छंद में पुस्तक लिख दी नईका भेद .इसी काल की दूसरी रचना नगर- शोभा में बिभिन्न ब्यावसायों वर्गों ,जातियों उपजातियों की रूपसी तरुणियों के चित्र हैं ,कुजडिन का एक रूप देखिये.
भांटा वरन सु कौजरी बेचै सोवा साग
नीलजु भई खेलत सदा गारी दै दै फाग ,
--बैगन की तरह काली कुजडिन सोवा साग बेचती है और निर्लज्ज गली दे दे कर फाग खेलती है ..इस रचना में कोई नहीं छूटा हैदफाली गाडीवान महावत नाल वन्दिनी चिरवा दारीनि,सईस ,काम ग़री ,नगारची ,बाज दारिनी ,दाव ग़री,साबुनी ग़री ,कुंडी गरिन,जिले दारी नी तक न जाने कितनी रोजगार में लगीं महिलाओं के चित्र हैं .जिले दारिनी का चित्र ..औरन को घर सघन मन चले जो घूंघट माह ,वाके रंग सुरंग को जिले दार पर छांह रुतबा तो देखिये .जिले दार बेचारा उसके बस में है,.बस आज इतना ही

Friday, 28 April 2017

हमारी कौम है ही इसी लायक की हमारा बादशाह हमें 100 जूते भी लगाए और 100 कच्चे प्याज़ भी खिलाये।।

एक कहानी कहीं पढ़ी थी
एक कहानी कहीं पढ़ी थी जिस में एक बादशाह अपने वज़ीर को उसकी किसी बहुत ही गंभीर गलती पर सज़ा सुनाता है। बादशाह कहता है कि या तो तुम 100 कच्चे प्याज़ एक ही बैठक में खा लो या फिर भरे दरबार मे 100 जूते खा लो। वज़ीर सोचता है कि भरे दरबार मे सब के सामने 100 जूते खाने से बड़ी बेइज़्ज़ती होगी, इस से बेहतर है कि 100 कच्चे प्याज़ ही खा लिया जाए। जब वज़ीर को प्याज़ खाने के लिए दिया गया तो कुछ कच्चे प्याज़ खाने के बाद ही उसकी हालत खराब होने लगती है। आंख और नाक से पानी बहने लगते हैं। अब वज़ीर कहता है कि मुझ से अब और प्याज़ नहीं खाया जाएगा। आप मुझे 100 जूते ही लगा लो। जब वज़ीर को दो चार जूते पड़ते हैं तो उसके होश ठिकाने लग जाते हैं। अब वज़ीर कहता है कि मुझे जूते मत मारो, मैं प्याज़ खाऊंगा। ऐसा करते करते वह जूते भी खाता जाता है और प्याज़ भी खाता जाता है। आखिर में जब 100 प्याज़ की संख्या पूरी होती है तब तक वह 100 जूते भी खा चुका होता है। यहां तक तो यह एक चुटकुला था मगर वास्तविकता यह है कि हम बहुत ही निम्नस्तर की एक मूर्ख कौम हैं। हमने अपने व्यक्तिगत फायदे के लिए हर उस व्यक्ति के हाथों में अपना नेतृत्व सौंप दिया जो हमें अपने शासनकाल में 100 प्याज़ भी खिलाये और साथ में 100 जूते भी लगाए। दरअसल हम नेतृत्व के महत्व को ही नहीं समझते। जस्टिस काटजू ने भारत के 90% लोगों को मूर्ख कहा था। काटजू बिल्कुल सही थे। हमें इस बात की थोड़ी सी भी परवाह नहीं है कि जंतर मंतर पर प्रदर्शन कर रहे किसान सरकार से अपनी मांग मनवाने के लिए अपना ही मूत्र पी रहे हैं, हम तो बस योगी जी द्वारा किसानों के 1 लाख से कम के ऋण माफ किये जाने से खुश हैं। हम "एक के बदले दस सर" लाने का वादा करके सत्ता में आने वालों से यह नहीं पूछते की कुलभूषण जाधव को पाकिस्तान क्यों फांसी पर चढ़ा रहा है। हम तो मोदी जी के सियाचिन में दीवाली मनाने से ही प्रफुल्लित हैं।हमें इस बात की ज़रा भी परवाह नहीं है कि चीन भारत अरुणाचल प्रदेश छः से अधिक ज़िलों का नाम बदल क्यों बदल रहा है। हम तो यह सोचकर ही मंद मंद मुस्काते हैं कि मोदी ही दुनिया का एकमात्र ऐसा व्यक्ति है जो पाकिस्तान को करारा जवाब दे सकता है। हमें ज़रा भी फिक्र नहीं कि अमेरिका में जातीय हिंसा में अबतक 8 से अधिक भारतीय मार डाले गए। हम तो मोहसिन, इखलाक, मिन्हाज, पहलू खान इत्यादि के मारे जाने को मुल्लों का विकेट गिरने से जोड़कर देखते हैं। हमें वन रैंक वन पेंशन के लिए जंतर मंतर पर महीनों तक संघर्ष करते सैनिक नहीं दिखाई दिए लेकिन हम तथाकथित सर्जिकल स्ट्राइक पर हवा में अपनी टोपियां उछालने लगते हैं। हमें इस बात की तनिक भी चिंता नहीं है कि हमारे समाज की 10000 से अधिक विधवा औरतें मथुरा और वृन्दावन में भीख मांग कर जीवनयापन कर रही हैं। हम तो तीन तलाक जैसे वाहियात मुद्दे पर हो रही बहस से ही खुश हो जाते हैं। हम ज़रा भी नहीं सोचते कि मोदी जी ने जो प्रतिवर्ष 2 करोड़ युवाओं को रोजगार देने का वादा किया था उसका क्या हुआ लेकिन हम गौरक्षक और हिन्दू युवा वाहिनी जैसी संस्था द्वारा फैलाये गए धार्मिक उन्माद को देखकर ही अंदर अंदर खुश होते रहते हैं। हमें इस बात से कोई मतलब नहीं कि भारत में किसानों की आत्महत्या रुकी या नही, बस हम तो इस बात से खुश हैं कि मोदी जी ने लालबत्ती कल्चर खत्म कर दिया है। हमें इस बात की ज़रा भी परवाह नहीं कि गंगा कितनी साफ हुई या साफ हुई भी की नहीं, लेकिन हम मोदी जी की बनारस में गंगा आरती और अक्षरधाम में पूजा करने से ही खुश हो जाते हैं। हमें इस बात की ज़रा भी परवाह नहीं कि भारत में ट्रेन दुर्घटना कितनी अधिक बढ़ गयी है, लेकिन हम सरकार द्वारा बुलेट ट्रेन की घोषणा मात्र से ही उछलने लगते हैं। हमें आदिवासियों और अल्पसंख्यकों पर होने वाले अत्याचार की कोई फिक्र ही नहीं है। हम तो बस यह सोचकर खुश हैं कि मोदी जी ने "सबका साथ, सबका विकास" का नारा दिया है। अनेकों मिसालें ऐसी हैं जहां हम भारतीयों की संवेदनहीनता साफ दिखाई पड़ती हैं। हम बहुत गहरी नींद में सो रहे हैं। हमारी नींद इतनी गहरी हो चुकी है की हमारी संवेदना मृत हो चुकी है। हमारी कौम है ही इसी लायक की हमारा बादशाह हमें 100 जूते भी लगाए और 100 कच्चे प्याज़ भी खिलाये।।

Tuesday, 18 April 2017

अब्दुल रहीम खानखाना . प्रोफ.सरोज मिश्र·10 जनवरी 201

अब्दुल रहीम खानखाना .अकबर के नौ रत्नों में सबसे नायब हीरा ,एक अद्भुत व्यक्ति .इतना बड़ा शूरमा की १६ से ७२ वर्ष की उम्र तक लडाइयां ही लड़ता और जीतता रहा /इतना बड़ा दानी की किसी ने कहा की मैंने एक लाख अशर्फियाँ एक साथ देखी नहीं.. तोउसे एक लाख अशर्फियाँ दे दी.. विनम्रता इतनी की देने के बाद भी शर्मिंदा थे ...देते समय उनकी आखे नीचे थीं ,किसी ने आँखे नीचे होने का कारन पूछा तो कहा . देन हार कोई और है भेजत है दिन रैन लोग भरम हमपर धरें यातें नीचे नैन .. सहृदय ऐसे की एक सिपाही की स्त्री के एक बर्वे पर प्रसन्न हो गए ;- प्रेम प्रीति को बिरवा चलेहु लगाय सींचनि की सुधि लीजै मुरझ न जांय. और सिपाही को धन धन्य देकर उसकी नवागत बधू के पास भेज दिया .और इसी चाँद पर एक पूरा ग्रन्थ ही लिख डाला गुण के ग्राहक ऐसे की अरबी/फ़ारसी ,हिन्दी के अनेक रचना कार इनके मित्र थे. चरित्रवान इतने की रूपवती के प्रणय निवेदन के कथन ..की मुझे अपने जैसा पुत्र दे दो .पर अपना सर उसकी गोद में डाल दिया ..माँ कहकर .तुलसी के मित्र थे .अकबर के विस्वास पात्र थे .जहाँगीर और शाहजहाँ के द्वन्द में इस कदर फंसे की पिस गए .जेल में डाल दिए गए उनके पुत्र दरब खान का सर काट कर उनके पास भेज दिया गया .उनके पूरे परिवार को जालिमो ने मार दिया फिर भी स्वाभि मान नहीं छोड़ा ... रहिमन मोहि न सुहाय अमिय पियावै मान बिन .बरु विष देई बुलाय मान सहित मरिबो भलो . और प्रेमी इतने गहरे की .. अंतर दाव लगी रहे धुंवा न प्रगट सोय कई जिय जाने आपनो या सर बीती होय .. जे सुलगे ते बुझ गए बुझे ते सुलगे नाहि रहिमन दाहे प्रेम के बुझी बुझी के सुल गाहि .. भक्त ऐसे की कृष्ण मय हो गए कवियों ने लिखा कोटिन हिन्दू वारिये मुस्लमान हरि जनन पर ,.कुल मिला कर एक ऐसा व्यक्तित्व जिसे पढ़ कर आप पूरी एक कौम के बारे में अपनी जान कारी को अधूरी मानने पर विवास होंगे .. कल से आगे ..कल के लेख में अशुद्धियाँ थीं बाद में दूर किया अब नही हैं .आज कोशिस की है की अशुद्ध न हो फिर भी होगा ही ..आज और अच्छा बना है पढ़िए रहीम को पढ़ते समय मुझे लगा की उनका पूरा जीवन -राजसी विलास का रहा हो ,.दर दर,मारे मारे फिरने का रहा हो, युद्ध और फतह का रहा हो ,राजा, के क्रोध काल का हो ,कुचाली दोस्तों के विश्वास घातके समय का रहा हो, एक आंवा था जो भीतर ही दहक रहा था / रहीम के बारे में एक कहानी मिलती है की तान सेन ने अकबर के दरबार में एक पद गाया, जो इस प्रकार था . जसुदा बार बार यों भाखै है कोऊ ब्रज में हितू हमारो चलत गोपालहिं राखै ... और अकबर ने अपने सभा सदों से इसका अर्थ कहने को कहा , तनसेन ने कहा --यशोदा बार बार अर्थात पुनः पुनः यह पुकार लगाती है की है कोई ऐसा हितू जो ब्रज में गोपाल को रोक ले . शेख फैजी ने अर्थ कहा ....बार बार का मतलब ..रो रो कर रट लगाती है .बीरबल ने कहा बार बार का अर्थ है द्वार द्वार जाकर यशोदा पुकार लगाती है ...खाने आजम कोका ने कहा बार का अर्थ दिन है और यशोदा प्रतिदिन यही रटती रहती है .अब रहीम की बरी थी .उन्होंने अर्थ कहा ...तानसेन गायक हैं इनको एक ही पद को अलापना रहता है इस लिए उन्हों ने बार बार का अर्थ पुनुरुक्ति किया शेख फैजी फ़ारसी का शायर हैं इन्हें रोने के सिवा कोई काम नहीं .राजा बीर बल द्वार द्वार घूमने वाले ब्राम्हण हैं इसलिए इनका बार बार का अर्थ द्वार द्वार ही उचित है, खाने आजम कोका नजूमी (ज्योतिषी) हैं उन्हें तिथि बार से ही वास्ता पड़ता है इसलिए बार बार का अर्थ उन्होंने दिन दिन किया ,. पर हुजूर वास्तविक अर्थ यह है की यशोदा का बार बारअर्थात रोम रोम पुकारता है की कोई तो मिले जो मेरे गोपाल को ब्रज में रोक ले .इस ब्य्ख्या से रहीम की विद्ग्घ्ता और साहित्य की समझ का पता चलता है इस से रहीम के उस गहरे हिन्दुस्तानी रंग का पता चलता है जो रोमांच को सात्विक भाव मानता हैऔर रोम रोम में ब्रम्हांड देखता . जो शरीर के रोम जैसे अंग को भी प्राणों का सन्देश वाहक मानता है जो वनस्पति मात्र को विरत अस्तित्व का रोमांच मानता है रहीम का जीवन एक पूरा दुखांत नाटक है .जिसमे बहुत से उतर चढाव हैं .महात्मा तुलसी से उनकी प्रगाढ़ मित्रता थी .बाप बैरम खान अकबर की ही तरह तुर्किस्तान के एक बहुत बड़े कबीले के सरदार थे वे सोलह वर्ष की आयु से ही हुमायू के साथ रहे .उन्ही की कूबत थी की हुमयू को फिर से दिल्ली की राजगद्दी पर बिठाया ,हुमायूँ के मरने पर वे ही अकबर के अभिभावक बनगए.जिस साल हुमायूँ मरे उसी साल लाहौर में रहीम का जन्म हुआ .रहीम की माँ अकबर की मौसी थीं .अकबर से दूसरा रिश्ता भी था ,बैरम खान की दूसरी शादी बाबर की नतिनी सलीमा बेगम सुल्ताना से हुई थी .बैरम खान के मरने के बाद अकबर के साथ सलीमा का पुनर्विवाह हुआ ,पर भाग्य का खेल ,चुगुल खोरों ने बैरम खान और अकबर के बीच भेद की गहरी खाई खोद दी .बैतररम खान ने विद्रोह किया परास्त हुए ,उन्हें हज करने जाने की सजा मिली.वे गुजरात पहुंचे थे की उनका डेरा लुट गया बैरम खान का क़त्ल हो गया ,बफदारों ने ओ परिवार बचाया ,चार वर्ष के रहीम बारह वर्ष की सलीमा सुल्ताना बेगम .अहमद बाद पहुंचे .जब रहीम पांच वर्ष के थे तभी अकबर ने उन्हें अपने संरक्षण में ले लिया .शिक्षा दीक्षा कराई.बड़े सरदार मिर्जा अजीज कोकलताश की बहन माह बनू बेगम से निकाह करवाया .उन्नीस वर्ष की आयु में गुजरात का युद्ध जीत कर वहा के सूबेदार बने .... वे तुलसी के परम मित्र थे .और तुलसी को बेहतरीन इंसान मानते थे .. सुरतिय नर तिय नागतिय सब चाहत अस होय गोद लिए हुलसी फिरें तुलसी सों सूत होय और रामचरित मानस को बेहतरीन ग्रन्थ ........ राम चरित मांनस विमल सब ग्रंथन को सार हिंदुआं को वेद सैम तुरकन प्रकट कुरान .... कबीर तुलसी रहीम और रसखन मध्यकाल के चार बेहतरीन इंसान ..कबीर संत थे एक बेहतरीन इंसान थे .अनपढ़ गृहस्त थे .जाति पांति धन धर्म से परे थे .मन से साफ़ थे .कबीर की भाषा आम आदमी की भाषा थी.वे लिखते नहीं थे केवल बोलते थे लोक जीवन के बहुत नजदीक थे .उनके प्रतीक दृष्टान्त लोक जीवन से आते थे . वे राम नाम जपते जरुर थे पर पूजा और आडम्बर के विरोधी थे उनके राम दशरथ के बेटे राम नही थे .इस धरती पर कबीर से बड़ा कोई इन्सान पैदा ही नहीं हुआ ,एक मुकम्मल इन्सान क्या होता है जानने के लिए हर किसी को कबीर पढ़ना चाहिए .अनगढ़ ,सहज ,भीतर- बाहर एक ,निर्भय ,आस्थावान ,जागृत विवेक .बिना पढ़े पूरी तरह ज्ञानी ,प्रेमानुभूति की पराकाष्ठा को समझाने वाला .मनुष्यता का रक्षक ,जागृत ,त्यागी गृहस्थ ,मनुष्यता की रक्षा के लिए भगवान से भी मुठभेड़ करने को आमादा ,जीवन और जगत को पूरी तरह समझाने वाला ,उसकी नश्वरता का गायक .मनुष्य इस धरती पर दूसरा कोई नहीं ...कबीर को जानना एक तपस्या है .उसे समझना मनुष्य बनने के रस्ते में एक सफल कदम है, उसे जीना ही मनुष्य होना है .कबीर सत्य है, कबीर नित्य है, कबीर .लोक है ,कबीर लोक राग है ,कबीर जिजीविषा है ..अपने लोक को ,अपने लोकराग को .अपने सत्य को अपने नित्य में जी पाना ही कबीर होना है .उसे पढ़ना एक रोमांच है .उसे समझना ब्रम्ह को ,प्राणी को जानना है ,उसे जीना एक ताकत है ,कबीर जीवन की हिम्मत है .जीवन की कला है ..आज कबीर की ही सबसे जादा जरूरत है . कबीर धर्म की ब्याख्या है .कबीर कर्म का प्रमाण है .वह निष्काम कर्मयोगी गृहस्थ ...वेद की ब्याख्या है .पुरानो की समीक्षा है वेदांत दर्शन का निचोड़ है ....तुलसी महात्मा थे . भक्त थे . पढ़े लिखे थे . गृहस्त नहीं थे .पर संत नहीं थे .उन्हों ने अपने काम को पीटपीट के राम बना दिया था .और राम के परम भक्त थे.संस्कृत के विद्वान थे पर अवधी में लिखते थे वे.उनमे भी वे सारे गुण थे जो कबीर में थे बल्कि वे पढ़े लिखे थे पुरानो के जादा नजदीक थे परन्तु वेद वेदांत के ज्ञाता थे . रहीम .के परम मित्र थे .और रहीम तुलसी को बेहतरीन इंसान मानते थे .. सुरतिय नर तिय नागतिय सब चाहत अस होयगोद लिए हुलसी फिरें तुलसी सों सूत होय और रामचरित मानस को बेहतरीन ग्रन्थ ........ राम चरित मांनस विमल सब ग्रंथन को सांन हिंदुअन को वेद सम तुरकन प्रकट कुरान .... रहीम अकबर के दरबारी थे तुलसी नही थे .हाँ अकबर ने चाहा था पर तुलसी ने अकबर को सीधा सा जबा दे दिया था .. होऊं चाकर रघुबीर को पटो लिखो दरबार .तुलसी अब का होंही गे नर के मंसब दार ...मतलब हिम्मती थे निडर थे ब्राम्हण थे .लिखते अवधी में थे . लोक जीवन के बहुत नजदीक थे .उनके प्रतीक दृष्टान्त लोक जीवन से आते थे .रहीमऔर तुलसी दोनों समकालीन थे.रहीम संस्कृत अवधि अरवी फारसी के जानकार थे .सभी भाषाओं का आदर करते थे सभी में लिखते थे .वे मुसलमान थे पर भक्त थे .राम के भी और कृष्ण के भी .कृष्ण के एक परम भक्त और थे रसखान .इन पर फिर कभी ..हाँ तो मैं कह रहा था की तुलसी ने कभी मुस्लिम धर्म की कोई बात नहीं की .अरवी और फारसी की चर्चा तक नहीं की ...रहीम अरवी फारसी के साथ हिन्दवी में भी लिखते रहे और नमाज के साथ साथ पूजा भी करते रहे .वे दरबारी थे .शासक थे तलवार के धनी थे फिर भी भक्त थे .महात्मा थे संत थे .उदार थे ..उन्हों ने तुलसी और मांनस दोनों की प्रशंसा की .पर तुलसी ने ऐसा कहीं नहीं किया कभी नहीं किया .एक बार भी रहीम का जिक्र नही किया अरवी फारसी का नाम तक नहीं लिया प्रशंसा की तो बात ही छोडिये .इसी लिए मैंने कहा तुलसी संत नहीं थे .उनमें हिंदुत्व .और हिंदी संकृत प्रेम तो होना लाजमी था पर अरवी फारसी को जानने की ललक भी नहीं थी यह समझ से परे है .सम्मान तो जाने दीजिये .रहीं म तो अपने को भक्त कहलाने में खुस थे पर तुलसी इस दिशा में मौन ही रहे.बाबा तुलसी दास ने मानस लिख कर राम को स्थापित किया .हिन्दुओं को संगठित किया .लेकिन अपने सम्पूर्ण लेखन में देशकी अधी जनसंख्या का कोई उल्लेख नहीं किया .शैव ,वैष्णव, स्मार्त, साधू ,संत ,योगी ,गृहस्त ऊँचनीच का भेद भाव त्याग कर एक होने और लड़ाई ख़तम करने की बात की .किन्तु उन्हों ने कहीं भी .हिन्दू मुसलमान ,अवधि फारसी संस्कृत और अरबी,की बात नहीं की ,बौद्धों की बात नहीं की जैनियों की बात नहीं की .मतलब वे हिन्दुओं को संगठित करते रहे ,पर मुसलमान बौद्ध ,जैन की चिंता नहीं की ..अवधी में लिखते रहे ..पर .अरबी और फारसी ..तथा अन्य बोलियों की चर्चा नहीं की ...जब की उस समय की सबसे बड़ी जरुरत यही थी ..आमिर खुसरो ,कबीर ,जायसी .रहीम ,रसखान ..जैसे नायक .हिन्दू मुसलमान .और भाषा की समस्या से दो चार होते रहे ..रहीम जैसे .रसखान जैसे विद्वानों ने कृष्ण भक्ति की प्रन्संशा की .रहीम ने तो तुलसी दास और मानस तक की प्रसंशा की ..पर तुलसी ने ऐसा कभी नहीं किया ..आखिर तुलसी दास ने ऐसा क्यों किया ..यह प्रश्न मेरे दिमाग को परेशान करता है .कोई भी बड़ा रचना कार अपने युग से उस काल की सबसे बड़ी समस्या से मुह मोड़ कर कैसे रह सकता है .बड़ी बड़ी लडाइयां हो रहीं थीं अकबर ने तोडर मल ने सभी ने हिन्दू मुसलमान को एक करने की कोशिस की .अकबर ने तो दीनेइलाही .लिखा .पर तुलसी ने इस दिशा में मौन क्यों साधे रखा ... .इस मायने में रहीम और रसखान दोनों कबीर की तरह तुलसी से बहुत आगे रहे .मैं तो सोचता हूँ की अगर तुलसी ने रहीम और रसखान की तरह का आचरण किया होता तो शायदहमारी बहुत बड़ी समस्या ख़त्म हो जाती कम से कम उर्दू भाषा का जन्म तो नहीं होता .इस मायने में आमिर खुसरो की भी चर्चा कभी करूँगा . आज इतना ही .. बहुरि बंदि खलगन सितभायें जे बिन काज दाहिने बाएं ..तुलसी की खल वंदना के साथ रहीम का चौथा एपिसोड लिखना शुरू कर रहा हूँ .सज्जन लोग पढेंगे ,आदर करेंगे ... अमित उदार अति पावन विचारी चारू ,जहाँ तहां आदरियो गंगा जी के नीर सों /खलन के घालिबे को खलक के पलिबे को ,खान खाना एक रामचन्द्र जी के तीर सों //गंगा जल की तरह पवित्र राम के तीर की तरह शत्रु विनाशक परन्तु जगत पालक ब्यक्तित्व को उनकी कृति में तलाश क रने की लालसा ,ललक ,जग उठी है / रहीम ने प्रेम पंथ का एक चित्र खींचा है ..रहिमन मैं तुरंग चढी चलिबो पावक मांहिप्रेम पंथ ऐसो कठिन सब सों निबहत नाहि /घोड़े पर सवार होकर आग पर चलाना .और निबाह लेना सब के बसबूते का नहीं.रहीम जिन्दगी भर घोडेपर सवार हो कर आग में दौड़ते रहे . रहीम के काब्य तुरंग की यात्रा भी अग्नि यात्रा ही तो है .वह अग्नि है जीवन के सहज प्यार की जो कभी बड़ी सुखद कभी बड़ी दुखद रही ,पहले पड़ाव तक चढ़ती जवानी के अनुभवों से गुजरे ,पर वे भी राजसी जीवन के नहीं थे ,बिभिन्न प्रकारके सामान्य जन की मानसिक स्थितियों में प्यार के अनुभव थे ,इनमे हांस -विलाश है सजने सजाने का भाव है लालसा विदग्धता छल है मान मनौवल है प्रतीक्षा है राग रंग है ईर्ष्या है उत्कंठा है और लगन है ,कुल मिला कर लौकिक श्रृंगार की लहक दार .ललक मय छटा है .इस काल की दो रचनाएँ हैं बरवै नईका भेद और नगर शोभा ,बरवै नईका भेदमें नायिका की बिभिन्न अवस्थाओं का चित्र है ,एक उदाहरन .-मितवा चलेऊ विदेसवा मन अनुरागि-पिय की सुरति गगरिया रहि मग लागिप्रिय की स्मृति का कलश लिए नायिका रास्ते में खड़ी है कब प्रिय लौटेंगे और स्मृतियों का कलश उनके लिए मंगल कलश बनेगा , दूसरा चित्र.भोरहिं बोल कोयलिया बढ़वति तापघरी एक धरि अलिया रहु चुप चाप ./रात भर स्मृतियों में खोये खोये नींद उचटी रही जरा सी आंख लगी तो कोयल सबेरे ही बोल पडी और सबेरे सबेरे ताप चढ़ गया एक घड़ी तक तो वह चुप रहती ,पहले लेखमे मैंने बताया है की अपने एक सिपाही की पत्नी के चाँद से प्रभावित हो कर रहीम ने उसे धन देकर छुट्टी भेजा और उसी छंद में पुस्तक लिख दी नईका भेद .इसी काल की दूसरी रचना नगर- शोभा में बिभिन्न ब्यावसायों वर्गों ,जातियों उपजातियों की रूपसी तरुणियों के चित्र हैं ,कुजडिन का एक रूप देखिये.भांटा वरन सु कौजरी बेचै सोवा सागनीलजु भई खेलत सदा गारी दै दै फाग ,--बैगन की तरह काली कुजडिन सोवा साग बेचती है और निर्लज्ज गली दे दे कर फाग खेलती है ..इस रचना में कोई नहीं छूटा हैदफाली गाडीवान महावत नाल वन्दिनी चिरवा दारीनि,सईस ,काम ग़री ,नगारची ,बाज दारिनी ,दाव ग़री,साबुनी ग़री ,कुंडी गरिन,जिले दारी नी तक न जाने कितनी रोजगार में लगीं महिलाओं के चित्र हैं .जिले दारिनी का चित्र ..औरन को घर सघन मन चले जो घूंघट माह ,वाके रंग सुरंग को जिले दार पर छांह रुतबा तो देखिये .जिले दार बेचारा उसके बस में है,.बस आज इतना ही बहुरि बंदि खलगन सितभायें जे बिन काज दाहिने बाएं ..तुलसी की खल वंदना के साथ रहीम का चौथा एपिसोड लिखना शुरू कर रहा हूँ .सज्जन लोग पढेंगे ,आदर करेंगे ... अमित उदार अति पवन विचारी चारू ,जहाँ तहां आदरियो गंगा जी के नीर सों /खलन के घालिबे को खलक के पलिबे को ,खान खाना एक रामचन्द्र जी के तीर सों //गंगा जल की तरह पवित्र राम के तीर की तरह शत्रुविनाशक परन्तु जगत पलक ब्यक्तित्व को उनकी कृति में तलाश्काराने की लालसा ,ललक ,जग उठी है /रहीम ने प्रेम पंथ का एक चित्र खींचा है ..रहिमन मैं तुरंग चढी चलिबो पावक मांहिप्रेम पंथ ऐसो कठिन सब सों निबहत नाहि /घोड़े पर सवार होकर आग पर चलाना .और निबाह लेना सब के बसबूते का नहीं.रहीम जिन्दगी भर घोडेपर सवार हो कर आग में दौड़ते रहे . रहीम के काब्य तुरंग की यात्रा भी अग्नि यात्रा ही तो है .वह अग्नि है जीवन के सहज प्यार की जो कभी बड़ी सुखद कभी बड़ी दुखद रही ,पहले पड़ाव तक चढ़ती जवानी के अनुभवों से गुजरे ,पर वे भी राजसी जीवन के नहीं थे ,बिभिन्न प्रकारके सामान्य जन की मानसिक स्थितियों में प्यार के अनुभव थे ,इनमे हस -विलाश है सजाने सजाने का भाव है लालसा विदग्धता छल है मन मनौवल है प्रतीक्षा है राग रंग है ईर्ष्या है उत्कंठा है और लगन है ,कुल मिला कर लौकिक श्रृंगार की लहक्दार .ललक माय छटा है .इस काल की दो रचनाएँ हैं बरवै नईका भेद और नगर शोभा ,बरवै नईका भेदमें नायिका की बिभिन्न अवस्थाओं का चित्र है ,एक उदाहरन .-मितवा चलेऊ विदेसवा मन अनुरागि-पिय की सुरति गगरिया रहि मग लागिप्रिय की स्मृति का कलश लिए नायिका रास्ते में खड़ी हैकब प्रिय लौटेंगे और स्मृतियों का कलश उनके लिए मंगल कलश बनेगा ,दूसरा चित्र.भोरहिं बोल कोयलिया बढ़वति तापघरी एक धरि अलिया रहु चुप चाप ./रात भर स्मृतियों में खोये खोये नींद उचटी रही जरा सी आंख लगी तो कोयल सबेरे ही बोल पडी और सबेरे सबेरे ताप चढ़ गया एक घड़ी तक तो वह चुप रहती ,पहले लेखमे मैंने बताया है की अपने एक सिपाही की पत्नी के चाँद से प्रभावित हो कर रहीम ने उसे धन देकर छुट्टी भेजा और उसी छंद में पुस्तक लिख दी नईका भेद .इसी काल की दूसरी रचना नगर- शोभा में बिभिन्न ब्यावसायों वर्गों ,जातियों उपजातियों की रूपसी तरुणियों के चित्र हैं ,कुजडिन का एक रूप देखिये.भांटा वरन सु कौजरी बेचै सोवा सागनीलजु भई खेलत सदा गारी दै दै फाग ,--बैगन की तरह काली कुजडिन सोवा साग बेचती है और निर्लज्ज गली दे दे कर फाग खेलती है ..इस रचना में कोई नहीं छूटा हैदफाली गाडीवान महावत नाल वन्दिनी चिरवा दारीनि,सईस ,काम ग़री ,नगारची ,बाज दारिनी ,दाव ग़री,साबुनी ग़री ,कुंडी गरिन,जिले दारी नी तक न जाने कितनी रोजगार में लगीं महिलाओं के चित्र हैं .जिले दारिनी का चित्र ..औरन को घर सघन मन चले जो घूंघट माह ,वाके रंग सुरंग को जिले दार पर छांह रुतबा तो देखिये .जिले दार बेचारा उसके बस में है,.बस आज इतना ही ,

संघियों का हठयोग बनाम नेहरु की भारतीयता प्रोफ.सरोज मिश्र·26 दिसंबर 2016

संघियों का हठयोग बनाम नेहरु की भारतीयता
जब से भाजपा के नेतृत्व में केंद्र में सरकार बनी है तब से उसका प्रयास पंडित जवाहर लाल नेहरू के नामोनिशान मिटाने का रहा है। कुछ माह पहले ही बांडुंग सम्मेलन की वर्षगांठ मनाई गई है और उसमें हमारी विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने नेहरू का नाम भी नहीं लिया। इधर अनेक अफ्रीकी देशों के नेता भारत आए थे। हमारे प्रधानमंत्री ने उनके बीच उनका नाम भी नहीं लिया यद्यपि अफ्रीकी नेताओं ने पंडित नेहरू के योगदान को सराहा और रेखांकित किया कि नवस्वतंत्र देशों को एकजुट करने में उनके प्रयास को भुलाया नहीं जा सकता। तब से हमारे प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री ने नहीं चाहते हुए भी पंडित नेहरू का नाम लेना शुरू किया है। प्रधानमंत्री ब्रिटेन के दौरे पर थे जहां उन्होंने नेहरू का नाम अनेक बार लिया भले ही नहीं चाहते हुए। खैर, हमारा सत्तारूढ़ दल जितनी भी कोशिश करे वह न भारत का इतिहास बदल सकता है और न उसमें पं. नेहरू की भूमिका। आइए हम देखें कि नेहरू किस तरह के भारत का निर्माण आजादी के बाद करना चाहते थे। 1920 के दशक में उन्होंने पश्चिमी विश्व और तत्कालीन सोवियत संघ का दौरा किया और वहां समाजवादी उभार का अध्ययन किया। वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि राष्ट्रवादी दृष्टि भारत जैसे देश के स्वतंत्रता संग्राम के लिए बेहद जरूरी है मगर आजादी प्राप्त होने के बाद हम किस दिशा में जाएंगे उसका खाका भी तैयार होना चाहिए। उनका मानना था कि राष्ट्रवादी दृष्टि को समाजवाद से जोडऩा होगा। याद रहे कि समाजवाद की रूपरेखा भारत की परिस्थितियों के अनुकूल होगा। उन्हें पूरी उम्मीद थी कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस उसे अवश्य स्वीकार करेगी। स्वतंत्रता संग्राम में जुटे एशिया और अफ्रीका के देशों को समाजवाद के आधार पर जोड़ा जा सकता है। उनके सामने समस्या थी कि भारत की परिस्थितियों को देखते हुए समाजवाद की क्या रूपरेखा होनी चाहिए। स्पष्ट है कि सोवियत संघ में अपनाई जा रही समाजवाद की रूपरेखा की कार्बन कॉपी को भारत में लागू करने का प्रयास सफल नहीं हो सकता। वह हमारी परिस्थितियों के अनुकूल होना चाहिए। उन्होंने देश के विभिन्न भागों में जाकर अपने समाजवादी विचारों और दृष्टि पर लोगों के साथ विचार विमर्श आरंभ किया। 18 मार्च 1928 को युवा लोगों के सामने तीन बातों को रखा: 1. भारत को पूर्ण आ•ाादी मिलनी चाहिए, 2. धर्म को विशुद्ध व्यक्तिगत मामला होना चाहिए और उसे राजनैतिक, आर्थिक एवं सामाजिक मुद्दों में हस्तक्षेप की इजाजत नहीं दी जा सकती, और 3. देश के सभी नागरिकों को जाति, वर्ग और संपदा का बिना ख्याल किए समाज अवसर मिलना चाहिए। उन्होंने देश में घूमकर लोगों, विशेषकर कांग्रेस कर्मियों को, स्वतंत्रता के महत्व के विषय में समझाया और इस बात पर जोर दिया कि हमें एक नई अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की स्थापना की ओर बढऩा चाहिए। उन्होंने ऑल बंगाल स्टूडेंट्स कांफ्रेंस को बतलाया कि पूर्ण राष्ट्रीय आ•ाादी के बिना हम अपनी भावी प्रगति की दिशा और रूपरेखा तय नहीं कर सकते और न ही हम राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक स्वतंत्रता की ओर बढ़ सकते हैं। राष्ट्रीय आ•ाादी का यह मतलब कतई नहीं है कि हम दूसरे राष्ट्रों के साथ लड़ाई-भिड़ाई करने और अपना विस्तार करने में जुट जाएं। हमें एक विश्व राष्ट्रमंडल बनाने की दिशा में प्रयास करना चाहिए जिससे उनके बीच सहयोग और एकजुटता बढ़े। उन्होंने रेखांकित किया कि जब तक दुनिया में साम्राज्यवाद रहेगा तब तक उपर्युक्त विचार आगे नहीं बढ़ सकता क्योंकि साम्राज्यवाद कमजोर देशों पर कब्जा जमाने के फेर में रहता है। राजनीतिक स्वतंत्रता आवश्यक है मगर वह अंतिम लक्ष्य का मात्र एक भाग है। उसके अन्य भाग हैं : सामाजिक और आर्थिक मुक्ति और बिना भेदभाव के आर्थिक विकास हो। भारत में जनसंख्या का एक बड़ा भाग युगों से दबाया जाता रहा है और उसे धर्म या तथाकथित परंपरा के नाम पर प्रगति से वंचित रखा गया है। सारे देश में लाखों मजदूरों को उनके योगदान का उचित पारिश्रमिक नहीं मिलता है जिससे वे गरीबी और तंगहाली की जिंदगी जीने को मजबूर हैं। यह स्थिति तब तक नहीं बदलेगी जब तक हम समाजवादी व्यवस्था को नहीं अपनाएंगे। यदि हम सामाजिक समानता की दिशा में बढऩा चाहते हैं तो समाजवाद का कोई विकल्प नहीं हो सकता। पूरे देश में भ्रमण कर नेहरू ने लोगों को बतलाया कि देश की पूर्ण राजनीतिक आ•ाादी और सामाजिक-आर्थिक रूपांतरण का एक ही मार्ग है : समाजवाद। उन्होंने गरीबी और दरिद्रता को महिमामंडित करने के प्रयास पर करारा प्रहार किया। उन्होंने उन लोगों की कड़ी आलोचना की कि अभी गरीबी और दरिद्रता की जिंदगी जीने वालों को परलोक में संपूर्ण सुख एवं शांति मिलेगी। उन्होंने रेखांकित किया कि गरीबी कोई अच्छी चीज नहीं है। उसे जड़मूल से उखाड़ फेंकने की आवश्यकता है तभी आदमी का जीवन सुखमय हो सकेगा। गरीब पर न दया दिखाने की आवश्यकता है और न ही उसे किसी के दान पर निर्भर रहना चाहिए। नेहरू का मानना था कि गरीबी को जन्म देने वाली व्यवस्था का समूल नाश होना चाहिए। यह तभी संभव हो सकता है जब समाज में जन्मजात गरीबी का नाश हो। वर्तमान सामाजिक-अर्थव्यवस्था के स्थान पर भारत के लिए उपयुक्त समाजवादी व्यवस्था आए। नेहरू की इस नयी सोच को हम ''स्वराज और सोशियलिज्म में स्पष्ट रूप से देखते हैं। यह लेख 11 अगस्त 1928 को ''द न्यू लीडर नामक पत्रिका में छपा था। यहां प्रश्न उठाया गया था कि भारत के आजाद होने पर हम कौन सी व्यवस्था स्थापित करना चाहते हैं। हम भारत को आजादी के बाद किस दिशा में ले जाना चाहते हैं? इस प्रश्न का उत्तर तलाशने के लिए हमें देश की सीमाओं के बाहर देखना होगा और हमें देखना होगा कि पश्चिमी यूरोप में औद्योगिक क्रांति के बाद क्या परिवर्तन हुए हैं। आज हमारे देश में ऐसे अनेक लोग हैं जो हमारे इर्द-गिर्द क्या हो रहा है उसकी ओर ध्यान देने के बदले अब भी अतीत में जी रहे हैं। कुछ लोग वैदिक युग लाना चाहते हैं तो कई इस्लाम के आरंभिक दिनों को फिर से स्थापित करना चाहते हैं। हम इस बात को भुला रहे हैं कि हमारी प्राचीन सभ्यताएं बिल्कुल भिन्न स्थितियों में पनपी थीं। हमें बीते हुए कल को छोड़कर वर्तमान की ओर देखना होगा। पुराने मिथकों और धारणाओं को त्याग कर वर्तमान काल की परिस्थितियों और वास्तविकताओं की ओर देखना और उन्हें समझना होगा। यहां पर उन्होंने रूस का जिक्र किया और कहा कि किस प्रकार वह पूंजीवाद को त्याग कर सामाजिक-आर्थिक रूपांतरण की ओर बढ़ रहा है। उसने समझ लिया है कि पूंजीवाद का रास्ता देर-सबेर साम्राज्यवाद और औपनिवेशिक शोषण की ओर ले जाएगा। व्यापार के क्षेत्र में गैरबराबरी की शर्तों और युद्ध की ओर ढकेलेगा। आजादी के बाद भारत का सामाजिक-आर्थिक आधुनिकीकरण पूंजीवाद के रास्ते पर चल कर नहीं हो सकता क्योंकि एक व्यक्ति का शोषण दूसरे व्यक्ति तथा एक जनसमूह का शोषण दूसरे जनसमूह से बचना काफी कठिन है। हम ब्रिटिश साम्राज्यवाद और शोषण के विरुद्ध हैं। इसी से यह बात सामने आती है कि हम पूंजीवाद का रास्ता नहीं अपना सकते क्योंकि वही साम्राज्यवाद की जननी है। विकल्प है कि हम समाजवाद के किसी न किसी रूप को अपनाएं जो भारत की स्थितियों और परिस्थितियों के अनुरूप हो। इस प्रकार भारत पर ब्रिटिश दबदबे के खिलाफ हम उठ खड़े हों। ऐसा हम राष्ट्रवादी आधार पर ही न करें बल्कि सामाजिक एवं अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों को देखते हुए आवश्यक है। हम ध्यान से देखें तो पाएंगे कि पंडित नेहरू नवउपनिवेशवाद के विभिन्न पहलुओं से अवगत थे। उन्होंने रेखांकित किया कि ब्रिटेन हमें काफी हद तक राजनीतिक क्षेत्र में स्वतंत्रता दे सकता है। हम देश के अंदर चुनाव के आधार पर सरकार भी बना सकते हंै मगर वह अपना आर्थिक आधिपत्य नहीं छोड़ सकता। स्पष्ट है कि आर्थिक आजादी के बिना राजनीतिक स्वतंत्रता बेमानी है। एक स्वतंत्र अर्थव्यवस्था के बिना राजनीतिक आजादी काफी कुछ निरर्थक है। हम देश की आजादी की मांग अनेक दृष्टियों से कर सकते हैं मगर आर्थिक आ•ाादी के बिना यह सब बेमानी है। असल चीज तो आर्थिक आजादी है। हमें देश की जनता की समस्याओं को देखते हुए अर्थव्यवस्था की दिशा और उसकी आंतरिक स्थितियों को नियोजित करने की पूरी आजादी होनी चाहिए। नेहरू ने बार-बार इस बात की ओर ध्यान दिलाया कि हमारी आजादी की लड़ाई को अन्य देशों के स्वतंत्रता संग्राम के साथ जोड़कर देखना चाहिए। हम अलग-थलग नहीं रह सकते। देश की सीमाओं के बाहर जो कुछ हो रहा है हम उसकी उपेक्षा नहीं कर सकते। हमें आजादी मिलने के बाद देश के सामाजिक-आर्थिक रूपांतरण की दिशा क्या होगी उस पर पहले से विचार कर उसकी रूपरेखा बनानी चाहिए। आज नरेंद्र मोदी की सरकार मुख्य रूप से विदेशी प्रत्यक्ष निवेश पर निर्भर दिखती है। वह इस बात को नजरअंदाज कर रही है कि मूडी ने क्या कहा है। मूडी दुनिया की तीन बड़ी रेटिंग एजेंसियों में एक है। बाहर से आकर यहां निवेश करने वाले उससे मार्गदर्शन लेते हैं। मूडी ने रेखांकित किया है कि देश के अंदर ऐसी ताकतें हैं जो देश का सांप्रदायिक विभाजन करना चाहते हैं। इस स्थिति में यहां निवेश करना भारी जोखिम उठाना है। कहना न होगा कि नरेंद्र मोदी के तमाम विदेश भ्रमण के बावजूद आशानुकूल मात्रा में विदेशी निवेश नहीं आया है।

अयोध्या की पूरी कहानी…


1528: अयोध्या में एक ऐसे स्थल पर एक मस्जिद का निर्माण किया गया जिसे कुछ हिंदू अपने आराध्य देवता राम का जन्म स्थान मानते हैं. समझा जाता है कि मुग़ल सम्राट बाबर के सिपहसालार मीर बांकी ने यह मस्जिद बनवाई थी जिस कारण इसे बाबरी मस्जिद के नाम से जाना जाता था. When the Muslim m emperor Zāhir ud-Dīn Muḥammad Babur came down from Farghana in 1527, he defeated the Hindu King of Chittorgarh, Rana Sangram Singh at Fatehpur Sikri, using cannon and artillery. After this victory, Babur took over the region, leaving his general, Mir Banki, in charge as Viceroy.
1853: पहली बार इस स्थल के पास सांप्रदायिक दंगे हुए.
पुरानी कहानी
1885: इस विवादित मामले की गहराई में जाए तो पता चलता है कि यह अभी का झगड़ा नहीं है बल्कि 1885 से चला आ रहा है। कुछ हिंदू संगठन के दस्तावेजों पर नजर डाली जाए तो उससे पता चलता है कि बाबर ने मंदिर तोड़ कर इस विवादित स्थल पर मस्जिद बनवाई थी। लेकिन इतिहास कुछ और ही कहता है। जिसके तहत बाबर कभी अयोध्या गया ही नहीं। अंग्रेजी शासनकाल के दौरान 1885 में महंत रघुवीर दास ने फैजाबाद न्यायालय में एक मुकदमा दायर किया था जिसमें कहा गया था कि जन्म स्थान एक चबूतरा जो मस्जिद से अलग उसके सामने है जिसकी लंबाई पूर्व-पश्चिम इक्कीस फिट और चैड़ाई उत्तर दक्षिण सतरह फीट है। महंत स्वयं व हिंदू इसकी पूजा करते हैं। इस दावे में यह भी कहा गया था कि यह चबूतर चारों ओर से खुला है। सर्दी गर्मी और बरसात में पूजा करने वालों को कठिनाई होती है। इस लिए इस पर मंदिर बनाने की अनुमति दी जाए। सरकार ने मंदिर बनाने से रोक दिया है। इस लिए न्यायालय सरकार को आदेश दे कि वह मंदिर बनाने दे। प्राप्त आंकड़ों के आधार पर 24 दिसंबर 1885 को फैजाबाद के सब जज पं. हरिकृष्ण ने महंत रघुवीरदास की अपील यह कहते हुए खारिज कर दी थी कि मस्जिद के सामने मंदिर की इजाजत देने से हिंदू-मुसलमान के बीच झगड़े और खून खराबे की बुनियाद पड़ जाएगी। फैसले में यह भी कहा गया था कि मंदिर मस्जिद के बीच एक दीवार है जो दोनों पूजा स्थलों को एक दूसरे से अलग साबित करती है। मंदिर और मस्जिद के बीच यह दीवार 1857 से पहले बनाई गई थी। फैजाबाद के सब जज पं. हरि कृष्ण के फैसले के खिलाफ राम जन्म स्थान के महंत रघुवीर दास ने फैजाबाद के जिला जज कर्नल जे आर्य के यहां अपील की जिसका मुआयना करने के बाद इसे 16 मार्च 1886 को खारिज दिया गया। जिला जज के इस फैसले के खिलाफ महंत रघुवीर दास ने ज्यूडीशिनल कमिश्नर जिसके पास पूरे अवध के लिए हाईकोर्ट के समान अधिकार थे, ने भी अपने फैसले के जरिए इस अपील को एक नवंबर 1886 को खारिज कर दिया।
इस फैसले के बाद बाबरी मस्जिद में नमाज पढ़ी जाती रही, राम जन्म स्थान चबूतरों पर हिन्दू पूजा अर्चना करते रहे। हिंदू-मुस्लिम के बीच कभी कोई विवाद नहीं हुआ। सन 1934 में गो-वध को लेकर अयोध्या में एक दंगा हुआ, जिसमें बाबरी मस्जिद की एक दीवार को छति पहुंची। जिसे सरकार ने अपने खर्चे से बनवा दिया। 15 अगस्त 1947 को देश आजाद हुआ। कहा तो यह जाता है कि आजाद मिलने के बाद कांग्रेस ने राजनीतिक फायदा उठाने के लिए (इस समय देश के प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू थे) बाबरी मस्जिद पर कब्जा करने की योजना बनाई, 22/23 दिसंबर 1949 की रात्रि कुछ शरारती लोगों ने बाबरी मस्जिद में मूर्तियां रख दी। जिसकी सूचना संबंधित थाने के कांस्टेबल माता प्रसाद ने थाना इंचार्ज राम दुबे को दी। राम दुबे ने एक नामदर्ज एफ आई आर की जिसमें कहा गया कि मुल्जिमान रामास, राम शुक्ल दास सुदर्शन दास व पचास साठ आदमी अज्ञात ने बलवा करके मस्जिद में मूर्तियां रख कर उसे नापाक किया। मुल्जिमान को ड्यूटी पर लगे लोगों और दूसरे आदमियों ने देखा। जिससे मुदकमा तैयार किया गया जो सही है। थाना इंचार्ज राम दुबे की एफ आई आर की बुनियाद पर मार्कण्डे सिंह एडीशनल सिटी मजिस्ट्रेट ने 29 दिसंबर 1949 को धारा 145 के तहत बाबरी मस्जिद कुर्क कर दी। इसके बाद बाबरी मस्जिद-रामजन्म भूमि के तमाम मुकदमों को यकजा कर दावा नंबर 12, 1261 हाईकोर्ट लखनऊ के हवले कर दिया गया।
1859: ब्रितानी शासकों ने विवादित स्थल पर बाड़ लगा दी और परिसर के भीतरी हिस्से में मुसलमानों को और बाहरी हिस्से में हिंदुओं को प्रार्थना करने की अनुमति दे दी.
1949: वैसे तो राम मंदिर बाबरी मस्जिद पर मालिकाना हक़ का मामला तो सौ बरस से भी अधिक पुराना है. लेकिन यह अदालत पहुँचा 1949 में. यह विवाद 23 दिसंबर 1949 को शुरू हुआ जब सवेरे बाबरी मस्जिद का दरवाज़ा खोलने पर पाया गया कि उसके भीतर हिंदुओं के आराध्य देव राम के बाल रूप की मूर्ति रखी थी. इस जगह हिंदुओं के आराध्य राम की जन्मभूमि होने का दावा करने वाले हिंदू कट्टरपंथियों ने कहा था कि “रामलला यहाँ प्रकट हुए हैं.” लेकिन मुसलमानों का आरोप है कि रात में किसी ने चुपचाप बाबरी मस्जिद में घुसकर ये मूर्ति वहां रख दी थी.
9 अगस्त 1991 को भारतीय संसद में पेश की गई जानकारी के अनुसार फ़ैज़ाबाद के तत्कालीन ज़िलाधिकारी केके नैयर ने घटना की जो रिपोर्ट राज्य सरकार को भेजी थी उसमें लिखा था, “रात में जब मस्जिद में कोई नहीं था तब कुछ हिंदुओं ने बाबरी मस्जिद में घुसकर वहाँ एक मूर्ति रख दी.”
अगले दिन वहां हज़ारों लोगों की भीड़ जमा हो गई और पाँच जनवरी 1950 को जिलाधिकारी ने सांप्रदायिक तनाव की आशंका से बाबरी मस्जिद को विवादित इमारत घोषित कर दिया और उस पर ताला लगाकर इसे सरकारी कब्ज़े में ले लिया.
16 जनवरी 1950 को गोपाल सिंह विशारद ने फैज़ाबाद की ज़िला अदालत में अर्ज़ी दी कि हिंदुओं को उनके भगवान के दर्शन और पूजा का अधिकार दिया जाए. मुकदमा संख्या 2 /1950 दर्ज करवाकर अनुरोध किया कि गर्भगृह में रखी मूर्तियां न हटाने और पूजा व दर्शन की अनुमति मांगी। उसी दिन इसका अस्थायी आदेश दिया गया।
पूजा शुरू- 19 जनवरी 1950 को फ़ैजाबाद के सिविल जज ने इन दोनों अर्ज़ियों पर एक साथ सुनवाई की और मूर्तियां हटाने की कोशिशों पर रोक लगाने के साथ साथ इन मूर्तियों के रखरखाव और हिंदुओं को बंद दरवाज़े के बाहर से ही इन मूर्तियों के दर्शन करने की इजाज़त दे दी.
साथ ही, अदालत ने मुसलमानों पर पाबंदी लगा दी कि वे इस ‘विवादित मस्जिद’ के तीन सौ मीटर के दायरे में न आएँ.
दिगंबर अखाड़ा के महंत और राम जन्मभूमि न्यास के अध्यक्ष परमहंस रामचंद्र दास (अब दिवंगत) ने भी ऐसी ही एक अर्ज़ी दी.
1959: में हिन्दू पक्ष की ओर से तीसरा दावा निर्मोही अखाड़े की ओर से दाखिल किया गया जो मुकदमा संख्या 26 /1959 दर्ज किया गया। इस मुकदमे में रिसीवर से कब्जा दिलाए जाने की बात कही गई।
1961: इन तीनों मुकदमों के लंबित रहने के कारण 1961 तक नहीं हो सका तो मूर्तियां रखने की तारीख से 12 साल के अन्दर मुसलमानों की ओर से एक दावा मालिकाना हक और कब्जा वापसी के बाबत 18 दिसम्बर, 1961 को दाखिल किया गया।
In 1961, yet another suit was filed by Mohammad Hashim (He is still alive), pleading restoration of property to Muslims. By 1964, the issues were settled and date was fixed for final hearing. However, the appointment of a new receiver in 1968 was obstructed by yet another appeal before the Allahabad High Court in 1971.
Subsequently, the case was not taken up until 1983, when the Vishwa Hindu Parishad launched its temple movement in a big way.
1984: कुछ हिंदुओं ने विश्व हिंदू परिषद के नेतृत्व में भगवान राम के जन्म स्थल को “मुक्त” करने और वहाँ राम मंदिर का निर्माण करने के लिए एक समिति का गठन किया. बाद में इस अभियान का नेतृत्व भारतीय जनता पार्टी के एक प्रमुख नेता लालकृष्ण आडवाणी ने संभाल लिया.
1 फरवरी, 1986 ताला खुला: उमेश चंद्र पांडे की एक याचिका पर फ़ैज़ाबाद के ज़िला मजिस्ट्रेट के एम पांडे ने एक फ़रवरी 1986 को विवादित मस्जिद के ताले खोलने का आदेश दिया और हिंदुओं को उसके भीतर जाकर पूजा करने की इजाज़त दे दी. मुसलमानों ने इसके विरोध में बाबरी मस्जिद संघर्ष समिति (एकशन कमेटी) का गठन किया.
Judge KM Pandey observed, “After having heard the parties, it is clear that the members of the other community — namely Muslims– are not going to be affected by any stretch of imagination if the locks of the gates were opened and idols inside the premises are allowed to be seen and worshipped by the pilgrims and devotees.”
His observation, “heavens will not fall if the locks of the gates are removed”, however, fell flat as the order sparked off nationwide rioting and communal violence.
पहली फरवरी, 1986 के इस आदेश को मोहम्मद हाशिम अंसारी की ओर एक रिट पिटीशन दायर करके चुनौती दी गई जिसमें 3 फरवरी, 1986 ई. को हाईकोर्ट ने विवादित भवन में कोई बदलाव न करते हुए यथास्थिति बनाए रखने के आदेश जारी कर दिए।
The Sunni Waqf Board and Babri Masjid Action Committee moved the Allahabad High Court against the district judge’s order. However, the order was not stayed. Meanwhile, all cases pertaining to the Ayodhya dispute were referred to the Lucknow bench of the court.
11 नवंबर 1986 को विश्व हिंदू परिषद ने विवादित मस्जिद के पास की ज़मीन पर गड्ढे खोदकर शिला पूजन किया.
1987 में उत्तर प्रदेश सरकार ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ में एक याचिका दायर की कि विवादित मस्जिद के मालिकाना हक़ के लिए ज़िला अदालत में चल रहे चार अलग अलग मुक़दमों को एक साथ जोड़कर उच्च न्यायालय में उनकी एक साथ सुनवाई की जाए.
इस अर्ज़ी पर विचार चल ही रहा था कि 1989 में अयोध्या की ज़िला अदालत में एक याचिका दायर कर मांग की गई कि विवादित मस्जिद को मंदिर घोषित किया जाए.
10 जुलाई 1989 उच्च न्यायालय ने पाँचों मुक़दमों को साथ जोड़कर तीन जजों की एक बेंच को सौंप दिया. तीन जजों की एक बेंच 21 साल (1989-2010) से सुनवाई कर रही थी. इस बीच कई जज रिटायर हो गए या उनके तबादले हो गए.
1989: विश्व हिंदू परिषद ने राम मंदिर निर्माण के लिए अभियान तेज़ किया और विवादित स्थल के नज़दीक राम मंदिर की नींव रखी. 10 नवंबर 1989 को अयोध्या में मंदिर का शिलान्यास हुआ लेकिन अगले ही दिन फ़ैज़ाबाद के ज़िलाधीश ने आगे निर्माण पर रोक लगा दी.
1989-91: Meanwhile, a ‘shilaniyas’ (laying of foundation stone) for the proposed temple in 1989 gave the whole issue a hype and the police firing ordered on violent karsevaks by the Mulayam Singh government in 1990 polarised votes in favour of the BJP, forging Kalyan Singh to power in 1991. Kalyan ordered acquisition of 2.75 acres of land around the mosque in his bid to show his party’s seriousness towards building the temple.
However, BMAC convenor Zafaryab Jilani promptly moved yet another writ to prevent any kind of construction on the acquired land.
Meanwhile, Aslam Bhure moved the Supreme Court against the acquisition. But the apex court transferred the case to high court here directing for maintenance of status quo until the high court decided the five writs that were by then pending there.
1990- Advani’s Rath Yatra: Chariot of fire
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1986 May: Becomes chief of the BJP 1989 June: Drafts the Palampur resolution, aligning the BJP with VHP’s Ram temple agitation. December: Allies with JD for LS polls. Lends outside support to the V.P. Singh government, as does the Left. 1990 September 25: Launches rath yatra from Somnath for temple construction. October 23: Yatra is stopped at Samastipur, Bihar; withdraws support to VP government. 1992 December: Babri Masjid demolished by kar sevaks on Dec 6. Advani prime accused. Advani’s phenomenal rath yatra changed the course of the BJP.
It was in September 1990 when BJP president L.K. Advani decided to go for a padyatra to educate the people about the Ayodhya movement. This had been the BJP’s main election plank during the 1989 elections. However, when the late Pramod Mahajan heard about this, he pointed out that Advani would make slow progress on foot. “A jeep yatra, then ?” asked Advani. It was then that Mahajan suggested that they take a mini-bus and redesign it as a rath.
And that is how Advani embarked on his first Toyota rath yatra, catalysing a chain of events that resulted in the demolition of the Babri Masjid two years later. He took off from Somnath in Gujarat and worked his way to Ayodhya via central India. The idea of a chariot worked as a great mobiliser. Hindutva supporters rang temple bells, beat thalis and shouted slogans to welcome the rath. Some smeared the rath with a tilak and smeared the dust from its wheels on their forehead.
As expected, there was a communal backlash as riots broke out in Gujarat, Karnataka, Uttar Pradesh and Andhra. Advani was arrested in Samastipur on October 23 by then chief minister Lalu Prasad Yadav before he could reach the kar seva at Ayodhya on October 30. Although in his autobiography, My Country My Life, Advani calls this rath yatra, “an exhilarating period in my political life”, it was much more than that.
It whipped up a strong Hindu fervour and increased the party’s votebank from 85 in 1989 to 120 in the 1991 general elections. It also launched Advani’s career as the Eternal Yatri as he undertook four other rath yatras. However, the rath yatra also hung the albatross of Hindutva round the BJP’s neck, an accessory that the BJP and Advani alternately embrace and at times try hard to shrug off.
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The main event: The Mandal report
The crisis, the likes of which has rarely engulfed the nation with such overwhelming intensity and rage,was of his own making and,as it mounted with increasing ferocity, PM V.P. Singh found himself facing it almost alone. The very people who had pushed him into taking the controversial decision were nowhere to be seen. Having taken the big bite from the forbidden apple of the Mandal Commission, Singh found himself unable to swallow it or to spit it out. Even as he found himself paralysed in grappling with the consequences of the hasty decision he had made, his government watched in stunned horror as city after city exploded in violent anti-Mandal agitations.
पंडित दीनदयाल उपाध्याय के जन्मदिवस पर सोमनाथ गुजरात से 25 सितम्बर 1990 से शुरू हुई रथयात्रा को 30 अक्टूबर तक अयोध्या में ख़त्म होना था. आडवाणी को 23अक्टूबर को समस्तीपुर बिहार में ग़िरफ़्तार कर लिया गया।
1990: विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ताओं ने बाबरी मस्जिद को कुछ नुक़सान पहुँचाया. तत्कालीन प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने वार्ता के ज़रिए विवाद सुलझाने के प्रयास किए मगर अगले वर्ष वार्ताएँ विफल हो गईं.
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1990 में देश के पूर्व प्रधान मंत्री चंद्र शेखर ने इस विवाद का हल निकालना चाहा उन्होंने बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी और विश्व हिंदू परिषद को आमने सामने बैठा दिया। दोनों के बीच सरकार ने भैरोसिंह शेखावत और शरद पवार को नियुक्त किया। बातचीत के कई दौर चले आखिर में यह तय हुआ कि दोनों पक्ष अपने-अपने कागज और सबूत पेश करें, बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी ने तो दस्तावेज पेश किए लेकिन विश्व हिन्दू परिषद ने दस्तावेज नहीं पेश किए।
30 अक्टूबर 1992: the fifth Dharma Sansad met in Keshavpuram New Delhi and decided to start the Kara Save on 6th December, 1992.
On the morning of 8th December, 1992 the Central Government took over the complete Shri Rama Janmabhoomi Parisar area under its control. The pooja for Ram Lala did continue.
अंत में 6 दिसंबर 1992 को केन्द्र में कांग्रेस की नरसिम्हा राव सरकार के रहते कार सेवा के दौरान मस्जिद को ढहा दिया गया। पूरे देश में सांप्रदायिक दंगे हुए। विदेशों में भी इस घटना की निंदा हुई। जिसके दबाव में आकर केन्द्र में स्थापित कोंग्रेस सरकार के तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिंहराव ने 26 जनवरी 1993 को लाल किले से घोषणा की कि वह उसी स्थान पर पुनः मस्जिद का निर्माण कराएंगे।
1992, 6 दिसंबर को क्या हुआ, कैसे हुआ
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1992: विश्व हिंदू परिषद, शिव सेना और भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं ने 6 दिसंबर को बाबरी मस्जिद को ध्वस्त कर दिया. इसके परिणामस्वरूप देश भर में हिंदू और मुसलमानों के बीच सांप्रदायिक दंगे भड़क उठे जिसमें 2000 से ज़्यादा लोग मारे गए.
5 दिसंबर, 1992
•इस दिन अयोध्या में लाखों कारसेवक एक और नारा बार-बार लगा रहे थे। मिट्टी नहीं सरकाएंगे, ढांचा तोड़ कर जाएंगे। ये तैयारी एक दिन पहले की थी।
•कारसेवकों ने अगले दिन 12 बजे का वक्त तय किया था कारसेवा शुरू करने का। एक अजीब का जोश सबसे चेहरे पर साफ देखा जा सकता था।
6 दिसंबर, सुबह 11 बजे
•सुबह 11 बजे के करीब कारसेवकों के एक बड़े जत्थे ने सुरक्षा घेरा तोड़ने की कोशिश की लेकिन उन्हें वापस धकेल दिया गया। इसी वक्त वहां नजर आए वीएचपी नेता अशोक सिंघल, कारसेवकों से घिरे हुए और उन्हें कुछ समझाते हुए।
•थोड़ी ही देर में उनके साथ बीजेपी नेता मुरली मनोहर जोशी भी जुड़ गए।
•तुरंत ही इस भीड़ में लाल कृष्ण आडवाणी भी नजर आए। सभी सुरक्षा घेरे के भीतर मौजूद थे और लगातार बाबरी मस्जिद की तरफ बढ़ रहे थे। तभी पहली बार मस्जिद का बाहरी दरवाजा तोड़ने की कोशिश हुई लेकिन पुलिस ने उसे नाकाम कर दिया।
•तस्वीरें गवाह हैं कि इस दौरान पुलिस अधिकारी दूर खड़े होकर तमाशा देख रहे थे।
6 दिसंबर, सुबह साढ़े 11 बजे
•मस्जिद अब भी सुरक्षित खड़ी थी। तभी वहां पीली पट्टी बांधे कारसेवकों का आत्मघाती दस्ता आ पहुंचा। उसने पहले से मौजूद कारसेवकों को कुछ समझाने की कोशिश की। जैसे वो किसी बड़ी घटना के लिए सबको तैयार कर रहे थे।
•कुछ ही देर में बाबरी मस्जिद की सुरक्षा में लगी पुलिस की इकलौती टुकड़ी वहां से बाहर निकलती नजर आई। न कोई विरोध, न मस्जिद की सुरक्षा की परवाह।
•पुलिस की इस टुकड़ी को दूर मचान पर बैठे पुलिस अधिकारी सिर्फ देखते रहे, कुछ किया नहीं। मस्जिद से पुलिस के हटने के तुरंत बाद मेन गेट पर दूसरा और बड़ा धावा बोला गया। जो कुछ पुलिसवाले वहां बचे रह गए थे वो भी पीठ दिखाकर भाग खड़े हुए।
6 दिसंबर, दोपहर के 12 बजे
•दोपहर 12 बजे एक शंखनाद पूरे इलाके में गूंज उठा। कारसेवकों के नारों की आवाज पूरे इलाके में गूंजती जा रही थी। कारसेवकों का एक बड़ा जत्था मस्जिद की दीवार पर चढ़ने लगा। बाड़े में लगे गेट का ताला भी तोड़ दिया गया।
•कुछ ही देर में मस्जिद कारसेवकों के कब्जे में थी। इस वक्त की एक और तस्वीर गौर करने लायक है। तत्कालीन एसएसपी डीबी राय पुलिसवालों को मुकाबला करने के लिए कह रहे थे लेकिन किसी ने उनकी नहीं सुनी।
•उस वक्त भी ये सवाल उठा था कि क्या ये पुलिस का विद्रोह था या फिर कैमरे के सामने किया गया सोचा-समझा ड्रामा। इस वक्त तक पुलिसवाले पूरी तरह हथियार डाल चुके थे।
•कुदाल लिए हुए कारसेवक तब तक मस्जिद गिराने का काम शुरू कर चुके थे। एक दिन पहले की गई रिहर्सल काम आई और कुछ ही घंटों में बाबरी मस्जिद को पूरी तरह ढहा दिया गया।
1990 बैच की आईपीएस अधिकारी अंजु गुप्ता का बयान: 1990 बैच की आईपीएस अधिकारी अंजु गुप्ता 6 दिसंबर 1992 को ढांचे के ध्वस्त होने के समय फैजाबाद जिले की असिस्टेंट एसपी थीं और उन्हें आडवाणी की सुरक्षा का जिम्मा दिया गया था। वे फिलहाल रिसर्च एंड एनालाइसिस विंग (रॉ) में पदस्थ हैं। उनका बयान भी कोर्ट में दर्ज हुआ है। जिसके मुताबिक़ –
•6 दिसंबर 1992 को विवादित स्थल से 150 मीटर दूर मंच बनाया गया था।
•इस मंच पर आडवाणी के अलावा मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती, विनय कटियार, विहिप के अशोक सिंघल, गिरिराज किशोर, विष्णु हरि डालमिया और साध्वी ऋतंभरा मौजूद थे।
•तीनों गुंबद गिरने के बाद मंच पर खुशी और जश्न का माहौल था।
•विवादित ढांचे का पहला गुंबद दोपहर 2 बजे, दूसरा 3 बजे और तीसरा 4:30 बजे गिरा।
•अंजु गुप्ता के मुताबिक, घटना वाले दिन वहां मौजूद भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी ने कारसेवकों को खुश करने के लिए जोशीला भाषण दिया था। वे बार-बार कह रहे थे कि मंदिर वहीं बनेगा।
•गुप्ता ने यह भी कहा कि विनय कटियार, उमा भारती व साध्वी ऋतंभरा ने भी उकसाने वाले भाषण दिए थे।
•गुप्ता ने कहा कि आडवाणी के रामकथा कुंज में आते ही माहौल गर्म हो गया था। तब कुंज में भाजपा के कलराज मिश्र, दिवंगत प्रमोद महाजन और आचार्य धर्मेंद्र के अलावा भाजपा व विहिप के करीब 100 नेता मौजूद थे। आडवाणी ने अपने भाषण में बार-बार कहा कि मंदिर विवादित करार दिए गए 2.77 एकड़ में ही बनेगा।
•गुप्ता के अनुसार उन्होंने आडवाणी के पूछने पर बताया था कि लोग गुंबदों पर चढ़ने की कोशिश कर रहे हैं। इस पर आडवाणी ने विवादित स्थल पर जाने और लोगों से गुंबद से उतरने की अपील करने की इच्छा जताई। वरिष्ठ अधिकारियों से चर्चा के बाद आडवाणी को बताया गया कि वहां जाना ठीक नहीं होगा। यदि वे किसी दुर्घटना की चपेट में आ गए तो स्थिति नियंत्रण से बाहर हो जाएगी।
•गुप्ता के मुताबिक, बाद में आडवाणी ने भारती को भेजा। वे जल्द ही वापस आ गईं। भारती ने बताया कि उन्होंने लोगों को छड़ों, हथौड़े आदि के साथ देखा है। जब मस्जिद के गुंबद गिरा दिए गए तब भारती व ऋतंभरा परस्पर गले लग र्गई और उन्होंने मिठाइयां बांटीं। उन्होंने आडवाणी और भाजपा नेता मुरली मनोहर जोशी को भी बधाई दी। किसी भी नेता ने विध्वंस रोकने की अपील नहीं की।
•गुप्ता ने बताया कि तत्कालीन डीजीपी एससी दीक्षित ने ड्यूटी पर तैनात सुरक्षाकर्मियों को बधाई दी। दीक्षित ने यह भी कहा कि सहयोग करने और कोई कार्रवाई नहीं करने के लिए उनका नाम इतिहास के पन्नों में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज होगा।
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1992: Demolition of the mosque on December 6, 1992 led the Muslims to move contempt application against which Kalyan Singh was awarded a day’s imprisonment.
While January 15 was fixed for the next hearing , the then Central government under PV Narasimha Rao issued an ordinance for acquisition of as many as 67 acres in and around the disputed site.
दिसंबर 1992 में बाबरी मस्जिद गिराए जाने के बाद तत्कालीन नरसिंह राव सरकार ने विश्व हिंदू परिषद पर प्रतिबंध लगाने का फैसला लिया था. जस्टिस बाहरी आयोग की सिफारिश पर नरसिंह राव की सरकार ने विहिप पर प्रतिबंध लगाने का फैसला किया था. Kalyan Singh lets down the Supreme Court
कल्याण ने इंटरव्यू में बताया कि
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I had submitted an affidavit before the Supreme Cour. I had given in writing that no harm would be done to the structure.
I submitted my resignation to the governor, the Govt that was dismissed in UP was not there at that time. I had submitted my resignation at 5:15 PM, on 6th December 1992.
I resigned from my post at 5:15 PM on 6th DECEMBER, and the Central Govt took over, even then the construction by the Kar Sewaks continued for two more days. On the 7th of December when the Kar Sewaks continued the construction, the Central Govt, did not resort to any firing which means that the decision taken by me was followed by the Centre as well.
Supreme Court found that there was blatant, deliberate and intentional disobedience and flouting of orders by Kalyan Singh, the then UP chief minister and his government.
In a landmark judgment SC awarded him imprisonment for a day and asked him to pay fine of Rs 2000.
After his release he declared, “In the demolition of Babri Mosque no policemen were involved. It’s my own deed and I am proud of it. If I have to go to jail repeatedly for this offence, I am ready for this. In fact I would feel pride in going to jail for this noble purpose.”
On 26th November 1992, the Supreme Court also said that no assurances were forthcoming from the State Government regarding the safety of the Babri structure, and that the Supreme Court knew how to expect action from the state government and if necessary ‘exact’ action.
After the demolition of Babri structure on 6th December 1992, the Supreme Court lamented and observed that:
The demolition was in brazen defiance of Constitution, and the authorities of state and central Governments. It was an unprecedented attack on secular foundations. The Court thus stands betrayed as never before. जनवरी 2002: अयोध्या विवाद सुलझाने के लिए प्रधानमंत्री वाजपेयी ने अयोध्या समिति का गठन किया. वरिष्ठ अधिकारी शत्रुघ्न सिंह को हिंदू और मुसलमान नेताओं के साथ बातचीत के लिए नियुक्त किया गया.
फ़रवरी 2002: भारतीय जनता पार्टी ने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए अपने घोषणापत्र में राम मंदिर निर्माण के मुद्दे को शामिल करने से इनकार कर दिया. विश्व हिंदू परिषद ने 15 मार्च से राम मंदिर निर्माण कार्य शुरु करने की घोषणा कर दी. सैकड़ों हिंदू कार्यकर्ता अयोध्या में इकठ्ठा हुए. अयोध्या से लौट रहे हिंदू कार्यकर्ता जिस रेलगाड़ी में यात्रा कर रहे थे उस पर गोधरा में हुए हमले में 58 कार्यकर्ता मारे गए.
13 मार्च, 2002: सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फ़ैसले में कहा कि अयोध्या में यथास्थिति बरक़रार रखी जाएगी और किसी को भी सरकार द्वारा अधिग्रहीत ज़मीन पर शिलापूजन की अनुमति नहीं होगी. केंद्र सरकार ने कहा कि अदालत के फ़ैसले का पालन किया जाएगा.
15 मार्च, 2002: विश्व हिंदू परिषद और केंद्र सरकार के बीच इस बात को लेकर समझौता हुआ कि विहिप के नेता सरकार को मंदिर परिसर से बाहर शिलाएं सौंपेंगे. रामजन्मभूमि न्यास के अध्यक्ष महंत परमहंस रामचंद्र दास और विहिप के कार्यकारी अध्यक्ष अशोक सिंघल के नेतृत्व में लगभग आठ सौ कार्यकर्ताओं ने सरकारी अधिकारी को अखाड़े में शिलाएं सौंपीं.
जनवरी 2003: रेडियो तरंगों के ज़रिए ये पता लगाने की कोशिश की गई कि क्या विवादित राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद परिसर के नीचे किसी प्राचीन इमारत के अवशेष दबे हैं, कोई पक्का निष्कर्ष नहीं निकला.
मार्च 2003: केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से विवादित स्थल पर पूजापाठ की अनुमति देने का अनुरोध किया जिसे ठुकरा दिया गया.
अप्रैल 2003: इलाहाबाद हाइकोर्ट के निर्देश पर पुरातात्विक सर्वेक्षण विभाग ने विवादित स्थल की खुदाई शुरू की, जून महीने तक खुदाई चलने के बाद आई रिपोर्ट में कोई ठोस निष्कर्ष नहीं निकला.
मई 2003: सीबीआई ने 1992 में अयोध्या में बाबरी मस्जिद गिराए जाने के मामले में उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी सहित आठ लोगों के ख़िलाफ पूरक आरोपपत्र दाखिल किए.
जून 2003: काँची पीठ के शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती ने मामले को सुलझाने के लिए मध्यस्थता की और उम्मीद जताई कि जुलाई तक अयोध्या मुद्दे का हल निश्चित रूप से निकाल लिया जाएगा, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ.
अगस्त 2003: भाजपा नेता और उप प्रधानमंत्री ने विहिप के इस अनुरोध को ठुकराया कि राम मंदिर बनाने के लिए विशेष विधेयक लाया जाए.
जुलाई 2005: पाँच हथियारबंद चरमपंथियों ने अयोध्या के विवादित परिसर पर हमला किया जिसमें पाँचों चरमपंथियों सहित छह लोग मारे गए, हमलावर बाहरी सुरक्षा घेरे के नज़दीक ही मार डाले गए
06 जुलाई 2005 : इलाहाबाद हाई कोर्ट ने बाबरी मस्जिद गिराए जाने के दौरान ‘भड़काऊ भाषण’ देने के मामले में लालकृष्ण आडवाणी को भी शामिल करने का आदेश दिया. इससे पहले उन्हें बरी कर दिया गया था.
28 जुलाई 2005 : लालकृष्ण आडवाणी 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले में गुरूवार को रायबरेली की एक अदालत में पेश हुए. अदालत ने लालकृष्ण आडवाणी के ख़िलाफ़ आरोप तय किए.
04 अगस्त 2005: फ़ैजाबाद की अदालत ने अयोध्या के विवादित परिसर के पास हुए हमले में कथित रूप से शामिल चार लोगों को न्यायिक हिरासत में भेजा.
20 अप्रैल 2006 : कांग्रेस के नेतृत्ववाली यूपीए सरकार ने लिब्रहान आयोग के समक्ष लिखित बयान में आरोप लगाया कि बाबरी मस्जिद को ढहाया जाना सुनियोजित षड्यंत्र का हिस्सा था और इसमें भाजपा, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ, बजरंग दल और शिव सेना की ‘मिलीभगत’ थी.
19 मार्च 2007 : कांग्रेस सांसद राहुल गाँधी ने चुनावी दौरे के बीच कहा कि अगर नेहरू-गाँधी परिवार का कोई सदस्य प्रधानमंत्री होता तो बाबरी मस्जिद न गिरी होती. उनके इस बयान पर तीखी प्रतिक्रिया हुई.
30 जून 2009: बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के मामले की जाँच के लिए गठित लिब्रहान आयोग ने 17 वर्षों के बाद अपनी रिपोर्ट प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को सौंपी.
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7 जुलाई, 2009: उत्तरप्रदेश सरकार ने एक हलफ़नामे में स्वीकार किया कि अयोध्या विवाद से जुड़ी 23 महत्वपूर्ण फ़ाइलें सचिवालय से ग़ायब हो गई हैं.
24 नवंबर, 2009: लिब्रहान आयोग की रिपोर्ट संसद के दोनों सदनों में पेश. आयोग ने अटल बिहारी वाजपेयी और मीडिया को दोषी ठहराया और नरसिंह राव को क्लीन चिट दी.
20 मई, 2010: बाबरी विध्वंस के मामले में लालकृष्ण आडवाणी और अन्य नेताओं के ख़िलाफ़ आपराधिक मुक़दमा चलाने को लेकर दायर पुनरीक्षण याचिका हाईकोर्ट में ख़ारिज.
26 जुलाई, 2010: रामजन्मभूमि और बाबरी मस्जिद के स्वत्व निर्धारण या Title Suit पर सुनवाई पूरी. अपने दावे के पक्ष में हिंदुओं ने 54 और मुस्लिम पक्ष ने 34 गवाह पेश किए. इनमे धार्मिक विद्वान, इतिहासकार और पुरातत्व जानकार शामिल हैं. मुस्लिम पक्ष ने अपने समर्थन में 12 हिंदुओं को भी गवाह के तौर पर पेश किया. दोनों पक्षों ने लगभग 15 हज़ार पेज दस्तावेज़ी सबूत पेश किए. कई पुस्तकें भी अदालत में पेश की गईं.
अयोध्या में विवादित जमीन के मालिकाना हक के चार मामलों की सुनवाई करने वाली हाईकोर्ट की विशेष पीठ पिछले 21 साल में 13 बार बदल चुकी है. इस तरह 1989 से अब तक कुल 18 हाईकोर्ट जज इस मामले की सुनवाई कर चुके हैं.
30 सितंबर 2010- अयोध्या मामले पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने अपना फैसला सुना दिया है। विवादित जमीन के मालिकाना हक को लेकर किसी एक पक्ष में फैसला नहीं आया है। सुन्नी वक्फ बोर्ड की पूरे जमीन पर मालिकाना हक के दावे को कोर्ट ने खारिज कर दिया है। फैसले के मुताबिक विवादित स्थल को तीन हिस्सों में बांटा जाएगा। एक हिस्सा हिंदुओं को दूसरा सुन्नी वक्फ बोर्ड और तीसरा हिस्सा निर्मोही अखाड़े को मिलेगा। हाईकोर्ट ने माना है जिस स्थान पर भगवान राम की मूर्ति रखी हुई है वही रामजन्म स्थान है और यही हिस्सा हिंदुओं को मिलेगा। हालांकि तीन महीने तक विवादित स्थल पर यथास्थिति बनी रहेगी। कोर्ट ने कहा है कि फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाने के लिए सभी पक्षों के पास तीन महीने का वक्त रहेगा।
September 30, 2010
17 Nov 2011- सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या में विवादास्पद राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद स्थल को तीन भाग में विभाजित करने के इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगाते हुए कहा कि यह ‘कुछ अजीब’ फैसला है क्योंकि किसी पक्ष ने भूमि को तीन भाग में बांटने की मांग नहीं की थी।
अयोध्या स्वत्व निर्धारण Title Suits: कितने दीवानी मामले
अयोध्या विवाद से सम्बंधित 4 मुकदमे चल रहे हैं
Sunni Central Waqf Board (UP) and others Vs Gopal Singh Visharad (now dead) and others
Bhagwan Shri Ram Virajman and others Vs Rajendra Singh and others,
Nirmohi Akhara and others Vs Baboo Priya Dutt Ram and others
Gopal Singh Visharad (now dead) and others Vs Zahoor Ahmed and others
प्रथम वाद 1950 में गोपाल सिंह विशारद द्वारा (सिविल वाद संख्या 2/1950) सिविल जज फैजाबाद की अदालत में दायर किया था जिसमें मांग की गयी थी कि भगवान के निकट जाकर दर्शन और पूजा करने का वादी का अधिकार सुरक्षित रखा जाए, इसमें किसी प्रकार की बाधा या विवाद प्रतिवादियों द्वारा खड़ा न किया जाए तथा ऐसी निषेधाज्ञा जारी की जाए ताकि प्रतिवादी भगवान को अपने वर्तमान स्थान से हटा न सके। On 16-1-1950 a suit for permanent injunction (Regular Suit No. 2 of 1950 now marked as O.O.S. No. 1 of 1989) was filed by Sri Gopal Singh Visharad in the court of Civil Judge at Faizabad in which temporary injuction was granted against the removal of Idols from the Mosque as well as for performance of Puja and Darshan of the same.
इसी प्रकार की मांग करते हुए दूसरा वाद (संख्या 25/1950) परमहंस रामचन्द्रदास महाराज ने दायर किया। श्री विशारद के वाद में निचली अदालत (ट्रायल कोर्ट) ने अन्तरिम निर्णय देकर श्रीरामलला की मूर्तियाँ उसी स्थान पर बनाए रखने तथा हिन्दुओं द्वारा उनकी पूजा अर्चा, आरती व भोग निर्बाध जारी रखने का आदेश दिया तथा एक रिसीवर नियुक्त कर दिया। इस अन्तरिम आदेश की पुष्टि इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा अप्रैल, 1955 में कर दी गई। As the First Suit (Regular Suit No. 2 of 1950) filed by Sri Gopal Singh Visharad was defective on account of having been filed without giving notice to the State of U.P. and Collector Faizabad etc., under section 80 C.P.C., another suit for similar relief was filed by Sri Param Hans Ram Chardra Das which was numbered as Regular Suit No. 25 of 1950 (now marked as O.O.S. No. 2 of 1989).
तृतीय वाद सन् 1959 में निर्मोही अखाड़ा द्वारा (संख्या 26/1959) दायर करके मांग की गई कि श्रीराम जन्मभूमि की पूजा व्यवस्था की देखभाल का दायित्व निर्मोही अखाड़े को दिया जाए और रिसीवर को हटा दिया जाए। The third Suit on behalf of Hindu community was filed in 1959 by Nirmohi Akhara which was numbered as Regular Suit No. 26 of 1959 (now marked as O.O.S. No. 3 of 1989).
चतुर्थ वाद 18 दिसम्बर, 1961 को (11 वर्ष 11 माह व 26 दिन बाद) उत्तर प्रदेश सुन्नी सेन्ट्रल वक्फ बोर्डद्वारा (संख्या 12/1961) दायर किया गया। अपने वाद में विवादित ढांचे को ”मस्जिद” घोषित करने तथा पूजा सामग्री हटाने और ढांचे के चारों ओर के आसपास के भू-भाग को कब्रिस्तान घोषित करने की मांग की। The fourth suit was filed by the U.P. Sunni Central Board of Waqf and 8 other Muslims in a representative capacity on 18th December, 1961 in the court of Civil Judge Faizabad. This suit was numbered as Regular Suit No.12 of 1961 (now marked as O.O.S. No. 4 of 1989). In this suit the Muslims have claimed the relief of declaration as well as possession.
यह भी उल्लेखनीय है कि सुन्नी वक्फ बोर्ड ने फरवरी, 1996 में कब्रिस्तान सम्बंधी अपनी प्रार्थना को वापस ले लिया। परिणामस्वरूप विवाद केवल तीन गुम्बदों वाले ढांचे तक ही सीमित रह गया। यही छोटा सा स्थान अदालत के समक्ष आज विचाराधीन है।
The four title suits, on which the hearings have been completed, were filed by Gopal Singh Visharad (1950), the Nirmohi Akhara (1959), the UP Sunni Central Wakf Board (1961) and a group of Hindus (1989). All four suits were initially heard in the Faizabad civil court till a Special Bench was constituted in July 1989 by the Allahabad High Court, acting on the plea of the then UP government for speedy trial of the case.
60 years on, Babri site title claimants still friends
Hashim Ansari
In a small room in Kutya Panji Tola of Ayodhya, 93-year-old Hashim Ansari is busy reading a newspaper. He doesn’t need spectacles. “Aankh theek hai, sunai thoda kam par raha hai (My eyesight is okay, I am a little hard of hearing).” Three policemen guard his hasimhouse — Ansari is Plaintiff No. 7 in Title Suit No. 4.
“In the beginning, I used to appear for people who used to be Gopal Singh Visharad’s opposite party (Visharad filed the first title suit in 1950). Later, some community members from Lucknow asked me to become a plaintiff in a title suit. I agreed.” That suit was filed in 1961.
Ansari does not want to discuss the case now that judgment is on its way. “It is history. I did my job. But it never struck me that this would become such a big issue one day.” He says he will go to Lucknow to listen to the verdict.
“I have always enjoyed good relations with the opposite parties in the case. Ramchandra Das Paramhans and I used to share a tonga to go to Faizabad court before the matter went to High Court.”
He misses friend Sita Ram who died 15 years ago. “Sita Ram used to run a newspaper stall near the old bus stand. I used to sit at his stall. Sita Ram padhte the, main sunta tha (He used to read, I used to listen).”
Ansari’s family has no interest in the Ayodhya dispute. They don’t complain that he had time for nothing else except the case. “He has his own life, we want him to see happy,” says grandson Zahiruddin.
Mahant Bhaskar Das
Mahant Bhaskar Das, head of the Nirmohi Akhara in Ayodhya, is now 82. He came to Ayodhya when he was 18. Ever since, the Akhara has been his life.
Born in 1928 in a village in Gorakhpur, Bhaskar Das lives in a room in the Naka Hanumangarhi temple. “We will honour the court verdict in the matter.”
The Akhara filed its suit in 1959. “It was never such a big issue then.” He has good relations with Hashim Ansari. “Whenever Hashim visits this area, he never fails to look me up. I welcome him, offer him water and prasad.”
Bhaskar Das says he has always opposed political interference in the matter. “What has politics got to do with religion? Some VHP leaders wanted to handle our case but I said no.”
He says fighting a legal battle is difficult. “It has badly affected the growth of our Akhara. We are supposed to propagate our religion, but our focus has been on the legal battle.”
The first priority, he maintains, has to be communal peace. “Kya Hindu, Kya Mussalman. Sabhi milkar rahte the (Both Hindu and Muslims used to live in peace).”
An Ambassador car brought from the Chitrakoot Akhara used to ferry him to court. “In 2002, we bought a new Marshal jeep.” They are still using it to travel to Lucknow for the case in court.
Rajendra Singh
In 1940, when Rajendra Singh was just three-years-old, his father Gopal Singh Visharad moved to Ayodhya from Jhansi. Visharad first stayed in BawanTemple on the banks of the Saryu and then rented a house. He opened a shop called Bundelkhand General Stores. But much of his time was spent in the company of sadhus and mahants.
In 1950, Visharad filed the first title suit in the civil court of Faizabad — the original plaintiff. He died in 1985 while on a trip to Baroda where had gone to meet Rajendra’s brother Darshan.
Rajendra, who lives in Balrampur, retired as manager from the State Bank of India in 1994. He now represents his father in court. “Ramchandra Das Paramhans, my father’s friend, asked me to get associated with the case after my father’s death.”
His father, a member of the Hindu Mahasabha, never had any property — Rajendra lives in a rented house in Balrampur. “You won’t find any immovable property in my name. My two sons make their own living. Neelendra is in Singapore while Sheelendra runs a small business in Lucknow.”
He says he rarely discussed the Ayodhya dispute with his father. “I joined SBI in 1959. My first posting was in Akbarpur. My mother died in 1973. I asked my father to stay with us but he did not agree. His stay in Ayodhya left very little time for us to discuss anything.”
Ranjit Lal Verma Nirmohi Akhada counsel
Naseem Iqtidar Ali, AIMPLB board member
Maulana Sajjad Nomani AIMPLB Board member
Ram Vilas Vedanti, Ramjanmabhoomi Nyas
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अमन सिखाती अयोध्या
अयोध्या में फूलबंगले की सजावट से लेकर विभिन्न मेले-त्योहारों तक तमाम मौकों पर शहर के हिन्दू-मुसलिम साथ-साथ दिखाई देते हैं
‘सरयू नदी में पंडे धर्म-कर्म कराते थे और मुसलिम समुदाय के लोग फूल चढ़वाने का काम करते थे. जहूर मियां बाबरी मस्जिद का केस भी लड़ते थे और संत-महंत सामने से गुजर जाएं तो दुआ-सलाम व आदर देने में कहीं भी कोताही नहीं करते थे. हाशिम मियां के क्या कहने, उनका महंत परमहंस जी से तो याराना जैसा था. हाशिम मियां आज भी हैं वे बाबरी मस्जिद के एक पक्षकार भी हैं और इसी मामले में हिंदू पक्ष की ओर से पक्षकार रहे रामचंद्र परमहंस के साथ एक ही गाड़ी में बैठकर रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद का मुकदमा लड़ने के लिए जाते थे.’
September 30, 2010-1
भाजपा के सांसद रहे ब्रह्मचारी विश्वनाथ दास शास्त्री की यह बात उस अयोध्या की झलक देती है जिसकी हर ईंट में गंगा-जमुनी तहजीब और सद्भाव की मिट्टी बसी है. फूलबंगले की सजावट से लेकर विभिन्न मेले-त्योहारों तक तमाम मौकों पर शहर के हिन्दू-मुसलिम साथ-साथ दिखाई देते हैं. पूजा के लिए दिए जाने वाले फूलों से लेकर मंदिरों में चढ़ने वाली माला को पिरोने के काम में लगे मुसलिम समुदाय के लोग शहर के ताने-बाने में ऐसे रचे बसे हैं कि यदि ये न हों तो शायद अयोध्या की जिंदगी ही ठहर जाए.
कनकभवन के बगल में स्थित सुंदरभवन में रामजानकी का मंदिर है. अन्सार हुसैन उर्फ चुन्ने मियां 1945 से लेकर जीवन के अंतिम क्षणों तक इस मंदिर के मैनेजर रहे. मेले में तो वे पुजारी के काम में मंदिर में हाथ भी बंटाते थे. वे पंचवक्ती नमाजी थे लेकिन क्या मजाल इसे लेकर अयोध्या में कोई विवाद हुआ हो.
अयोध्या के साधु-संतों के लिए विशेष तौर पर अयोध्या के मुसलिम कारीगरों द्वारा जो खड़ाऊं बनायी जाती है उसे ‘चुन्नी-मुन्नी’ कहते हैं. इसका वजन 50 से लेकर 100 ग्राम तक होता है. इसे बनाने वाले एक मोहम्मद इकबाल बताते हैं कि यह एक खास हुनर है . इनके पिता भी यही काम करते थे और खानदान के लगभग एक दर्जन लोग इसे अपना व्यवसाय और सेवा बनाए हुए हैं. 6 दिसम्बर, 1992 को बाहरी उपद्रवी लोगों ने इनका घर जलाकर खाक कर दिया फिर भी इन्होंने न तो अयोध्या छोड़ी और न खड़ाऊं बनाना. हनुमानगढ़ी सहित तमाम मंदिरों में ये खड़ाऊं चढ़ाई जाती है. जब विश्व हिंदू परिषद के अयोध्या आंदोलन के कारण स्थितियां खराब होने के अंदेशे में खड़ाऊं के कारोबार में लगे मुसलिम कारीगर थोड़े दिनों के लिए अयोध्या छोड़कर दूसरी जगहों पर चले गए तो विश्व हिंदू परिषद को भरतकुंड के खड़ाऊ पूजन का कार्यक्रम पूरा करने के लिए जरूरी खड़ाऊं उपलब्ध नहीं हो सकी.
इतिहास पर नजर डाली जाए तो पता चलता है कि अयोध्या में कई मंदिर और अखाड़े हैं जिन्हें मुसलिम शासकों ने समय-समय पर जमीन और वित्तीय संरक्षण दिया. फैजाबाद के सेटिलमेंट कमिश्नर रहे पी कारनेगी ने भी 1870 में लिखी अपनी रिपोर्ट में इस आशय के कई उल्लेख किए हैं. रामकोट क्षेत्र, जहां अयोध्या विवाद का मुख्य केंद्र बिंदु विवादित परिसर है, उसी के उत्तर में स्थित जन्मस्थान मंदिर 300 वर्ष पुराना है. यह वैष्णवों के तड़गूदड़ संप्रदाय का मंदिर है और कार्नेगी ने लिखा है कि इसके लिए जमीन अवध के नवाब मंसूर अली खान ने दी थी. रामकोट में प्रवेश द्वार पर ही एक टीलेनुमा किले के रूप में दिखती है हनुमानगढ़ी. सीढ़ियां देख लीजिए तो लगता है जैसे पहाड़ी पर चढ़ना है. हनुमानगढ़ी को नवाबों के समय में दी गई भूमि पर बनाया गया था और आसफुदौला के नायब वजीर राजा टिकैतराय ने इसे राजकोष के धन से बनवाया. आज भी यहां फारसी में लिपिबद्ध पंचायती व्यवस्था चल रही है. जिसका मुखिया गद्दीनशीन कहलाता है. इस समय रमेशदास जी इसके गद्दीनशीन हैं. हनुमानगढ़ी के महंत ज्ञानदास ने 2003 में अयोध्या के इतिहास में हनुमानगढ़ी परिसर में रोजा इफ्तार का आयोजन करके हिन्दू-मुसलिम के बीच अयोध्या आंदोलन के फलस्वरूप आई कुछ दूरियों को समाप्त करने के लिए एक नया अध्याय खोला और इसके बाद सादिक खां उर्फ बाबू टेलर ने मस्जिद परिसर में हनुमान चालीसा का पाठ कराकर अवध की उसी गंगा-जमुनी तहजीब का परिचय दिया जिसका अयोध्या भी एक हिस्सा है.
हनुमानगढ़ी के महंत, षटदर्शन अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत ज्ञानदास कहते हैं कि नागापनी संस्कार में उनके गुरू द्वारा बताया गया था कि अवध के नवाब आसफुदौला और सूबेदार मंसूर अली खान के समय में मंदिर को दान मिला था. महन्त ज्ञानदास फारसी में लिखे उस फरमान को दिखाते हैं जिसके अनुसार मंदिर को दान मिला. वे कहते हैं, ‘जहां तक मुझे ज्ञात है कि नवाब के नायब नवल राय द्वारा अयोध्या के कई मंदिरों का जीर्णोद्धार हुआ. बाबा अभयराम दास को भी नवाबों के काल में भूमि दी गई थी.’
इसी अयोध्या में बाबर के समकालीन मुसलिम शासकों ने दंतधावन कुंड से लगे अचारी मंदिर जिसे दंतधावनकुण्ड मंदिर के रूप में भी जाना जाता है, को पांच सौ बीघे जमीन ठाकुर के भोग, राग, आरती के लिए दान में दी थी. महंत नारायणाचारी बताते हैं कि अंग्रेजों ने भी इस जमीन पर मंदिर का मालिकाना हक बरकरार रखा और जमीन को राजस्व कर से भी मुक्त रखा, इस शर्त पर कि मंदिर द्वारा ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ कोई कार्य नहीं किया जाएगा.
अयोध्या में ही उदासीन संप्रदाय का नानकशाही रानोपाली मंदिर भी है. यह वही मंदिर है जिसकी चौखट पर ऐतिहासिक ‘धनदेव’ शिलालेख जड़ा है जिसमें पुष्यमित्र के वंशजों द्वारा यहां एक ऐतिहासिक यज्ञ करने का वर्णन है. इस मंदिर का क्षेत्र ही इतना बड़ा है कि मंदिर परिसर के अंदर खेती भी होती है. तहलका ने कुछ साल पहले जब यहां महंत दामोदरदास से मुलाकात की थी तो उन्होंने नवाब आसफुद्दौला का एक दस्तावेज दिखाया था जो फारसी में लिखा था. उन्होंने बताया था, ‘नवाब ने मंदिर के लिए एक हजार बीघे जमीन दान में दी थी लेकिन इसकी जानकारी हमें नहीं थी. 1950 में इसका पता चला जब महंत केशवदास से मार्तंड नैयर और शकुंतला नैयर ने मंदिर की जमीन का बैनामा करा लिया. मामला आगे बढ़ा तो पता चला कि यह तो हो ही नहीं सकता क्योंकि जमीन दान की थी उसी दौरान हमें आसफुद्दौला की ग्राण्ट का यह प्रमाण पत्र प्राप्त हुआ था जिसे कोर्ट में लगाया गया और बैनामा खारिज हुआ. कोर्ट ने कहा कि दान की भूमि को बेचा नहीं जा सकता.’ गौरतलब है कि शकुंतला नैयर तत्कालीन जिलाधिकारी केकेके नैयर की पत्नी तथा मार्तंड नैयर उनके बेटे थे. केकेके नैयर के समय ही 22/23 दिसंबर 1949 को मूर्तियां बाबरी मस्जिद के अंदर रखी गई थीं. बाद में ये पति-पत्नी जनसंघ के टिकट पर सांसद भी निर्वाचित हुए थे.
सरयू किनारे स्थित लक्ष्मण किले के बारे में उल्लेख मिलता है कि यह मुबारक अली खान नाम के एक प्रभावशाली व्यक्ति ने बनवाया था. यह अब रसिक संप्रदाय का मंदिर है जिसके अनुयायी रासलीलानुकरण को अपनी उपासना के अंग के रूप में मान्यता देते हैं. अयोध्या-फैजाबाद दो जुड़वां शहर हैं. फैजाबाद नवाबों की पहली राजधानी रही है. गंगा-जमुनी संस्कृति का प्रभाव फैजाबाद की दुर्गापूजा पर भी दिखता है जब चौक घंटाघर की मस्जिद से दुर्गा प्रतिमाओं के जुलूस पर फूलों की वर्षा की जाती है. यह परंपरा कब शुरू हुई यह कहना मुश्किल है, लेकिन यह उसी रूप में आज भी जारी है.
अयोध्या में हिन्दू-मुस्लिमों के अटूट रिश्तों का जीवंत उदाहरण
अयोध्या। पूरे देश को झकझोर कर रख देने वाली अयोध्या की छह दिसम्बर 1992 को विवादित ढांचा ढहने की घटना के बाद भी यहां हिन्दू-मुस्लिमों के अटूट रिश्तों पर कोई फर्क नहीं पडा़ है जिसके कई जीवंत उदाहरण अभी भी मौजूद हैं।
विवादित ढांचा ध्वस्त होने के बाद देश के कई हिस्सों में खूनखराबा हुआ था। यहां भी कुछ लोगों की जान गई, इसके बावजूद हिन्दू मुसलमानों के अटूट रिश्तों पर कोई फर्क नहीं पडा़। दुनिया की नजरों में संवेदनशील बन गया यह धार्मिक शहर आज भी गंगा-जमुनी तहजीब का संदेश दे रहा है।
अयोध्या से सटे मुमताज नगर के करीब दस साल तक ग्राम प्रधान रहने वाले डॉक्टर मेराज हों या अधिग्रहीत परिसर से सटे कजियाना मोहल्ले के अनीस। इन लोगों के साथ ही कई ऐसे लोग हैं जो न सिर्फ मिलजुल कर रहने की संस्कृति को बढा़ रहे हैं बल्कि भाईचारे की अनूठी मिसाल बन गए हैं।
पूरे क्षेत्र में मुमताज नगर की रामलीला मशहूर है। इस रामलीला कमेटी के संयोजक डॉक्टर मेराज हैं। छह दिसम्बर 1992 की घटना से पैदा हुई टीस भी उन्हें उनके इरादे से डिगा नहीं सकी और वह आज भी सफलतापूर्वक रामलीला आयोजित करा रहे हैं।
‘हिंदुओं से भाईचारा, खानपान‘… अयोध्या की कहानी हाशिम अंसारी की जुबानी
63 साल से बाबरी मस्जिद की क़ानूनी लड़ाई लड़ रहे 93 वर्षीय हाशिम गज़ब के आदमी हैं. स्थानीय हिंदू साधु-संतों से उनके रिश्ते कभी ख़राब नहीं हुए. जब भी उनके घर जाएंगे, हमेशा अड़ोस पड़ोस के हिंदू युवक चचा-चचा कहते हुए उनसे बतियाते हुए मिलेंगे.
हाशिम कहते हैं, “मैं सन 49 से मुक़दमे कि पैरवी कर रहा हूँ, लेकिन आज तक किसी हिंदू ने हमको एक लफ़्ज़ ग़लत नहीं कहा. हमारा उनसे भाईचारा है. वो हमको दावत देते हैं. मै उनके यहाँ सपरिवार दावत खाने जाता हूँ.”
विवादित स्थल के दूसरे प्रमुख दावेदारों में निर्मोही अखाड़ा के राम केवल दास और दिगंबर अखाड़ा के राम चंद्र परमहंस से हाशिम की अंत तक गहरी दोस्ती रही. परमहंस और हाशिम तो अक्सर एक ही रिक्शे या कार में बैठकर मुक़दमे की पैरवी के लिए अदालत जाते थे और साथ ही चाय-नाश्ता करते थे.
उनके ये दोनों दोस्त अब जीवित नहीं रहे. मुक़दमे के एक और वादी भगवान सिंह विशारद भी नहीं रहे. हाशिम के समकालीन लोगों में निर्मोही अखाड़ा की ओर से मुक़दमे के मुख्य पैरोकार महंत भास्कर दास जीवित हैं.
अयोध्या में फूल बन रहे मजहबी एकता की मिसाल
फूलों से जेहन में खुशबू का अहसास होता है, लेकिन अयोध्या में मुस्लिम समुदाय के कुछ लोग इन्हीं फूलों के जरिए कौमी एकता का एक खूबसूरत पैगाम भी दे रहे हैं। इनके द्वारा बनाई गईं फूल की मालाएं श्रद्धालु यहां के मंदिरों में पूरे भक्ति भाव से अर्पित करते हैं।
अयोध्या के अशर्फी भवन के पास रहने वाले करीब 15 मुस्लिम परिवार दशकों से हिंदू श्रद्धालुओं के लिए फूलों के हार-मालाएं व अन्य सजावटी सामान बनाने का काम कर रहे हैं। 40 साल के अशरफ अली ने कहा कि मंदिरों के लिए फूल-मालाएं बनाने का काम हमारे यहां पीढ़ियों से चला आ रहा है। हिंदू-देवी देवताओं के लिए मुसलमानों का फूलों की मालाएं बनाना बाहर के लोगों के लिए अनोखी बात होगी, लेकिन अयोध्या के लोगों के लिए यह सामान्य बात है।
उन्होंने कहा कि हिंदू श्रद्धालु या तो हम से सीधे संपर्क करके फूलों के हार व अन्य सजावटी सामान खरीद लेते हैं या वे मंदिरों के बाहर लगने वाले फूलों की दुकानों से खरीददारी करते हैं। इन दुकानों पर हम लोग फूलों की आपूर्ति करते हैं। धार्मिक त्योहारों के दौरान जब बड़ी मात्रा में फूल-मालाओं की आवश्यकता होती है तो उस समय विभिन्न मंदिरों के पुजारी भी हमसे संपर्क करके आर्डर देते हैं।
कई मुस्लिम परिवारों के खुद के फूलों के बागीचे हैं तो कुछ मालाएं बनाने के लिए बाहर से भी फूल खरीदकर लाते हैं। ज्यादा मुनाफा वाला व्यवसाय न होने के बावजूद ये लोग इससे लगातार जुड़े हुए हैं। उनका मानना है कि हिंदू श्रद्धालुओं के लिए मालाएं बनाना अब उनके लिए एक व्यवसाय से ज्यादा जिम्मेदारी बन गई है
यहां के निवासी सलीम के मुताबिक वह खुद को भाग्यशाली मानते हैं कि ईश्वर ने उन्हें श्रद्धालुओं की मदद करने वाला काम सौंपा है। फूल की मालाएं बनाने वाले मुस्लिम परिवार रोज 200 से 250 रुपये कमाते हैं, लेकिन उत्सव के दौरान उनकी कमाई बढ़ जाती है। फूल व्यवसायी महताब ने बताया कि वह धार्मिक त्योहारों और उत्सवों के दौरान आम दिनों के मुकाबले दो से तीन गुना कमाई कर लेते हैं। अयोध्या मामले पर मालिकाना हक को लेकर आने वाले अदालत के फैसले के बारे में पूछने पर वह कहते हैं कि फैसले से उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ेगा।