Friday, 18 August 2017

..हर बार की तरह लौटा हूँ घर .

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हर बार की तरह लौटा हूँ घर .और
घर लौट आया है मुझ में ..
वह घर जो मेरा है ..मेरा नहीं है .!
इसकी दीवारों पर लिखे अनगिनत किस्से ,सपने मेरे अपने हैं ,..
पर यह अलग बात है ..जो कोई मायने नहीं रखते ..
जब भी मैं लौटता हूँ घर ,मेरा घर दौड़ कर लिपट जाता है
मुझसे ढूंढता है मेरी आँखों में अपने लिए सहानुभूति
बताता है अपनी बदहाली के किस्से
किस तरह चुपके से अपनों ने ही कुतर दिया घरेलू रिश्तों की बुनियाद .
किस तरह धीरे धीरे मर गया घर का चरित्र
आज वह मुझे पढवाता है
तनहाइयों में दीवारों पर लिखे कुछ शब्द
बताता है की कैसे कैसे उलझनों में वह उलझ गया ,
खामोश खड़ी दीवारें
निःशब्द कह जाती है अपनी ब्यथा कथा
बीमार हवाएं रिश्तों में फूटते दुर्गन्ध का बयान करती हैं
खुद को सम्हालने की असफल कोशिस करता मै
सहेजता हूँ ठंढी होती दिनचर्या में जीवन की गर्माहट,
मन का हरापन भोलापन दिल का ,अक्खड़ पन, जुझारू पन ,
एक शाश्वत प्रश्न खड़ा होता है क्यों ?
किसके लिए ?
पर वह मेरे भीतर जो एक मन और है ..
जो नहीं जनता दैन्य हार मानता नहीं ..
कहता है डटे रहो मोर्चे पर
लड़ना है अपने हिस्से का महाभारत अकेले ही
इस दौर में भी बचाने को बहुत कुछ बचा है हमारे पास ///

घूमी पुरुवा सोंधी सोंधी


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घूमी पुरुवा सोंधी सोंधी ,महक उठे सीवान
चढ़े आकाश तैरते बादल,ब्याकुल हुआ किसान
दंवागारा आस चढी /

चढ़ा अषाढ़ गगन घन गरजा ,पपीहा पीव पुकारे
आम्मा झोर चली पूर्वी ,बरखा सगुन उतारे
पहली बूँद परी /


रातों रात ऋतुमती धरती ,नथुनों सोंधी गंध
अंगूर अंगूर खेत चीरते पढ़ें करम के छंद
भाग की रेख खींची /


डीभी डीभी इच्छा उठती ,अन्खुवा स्वप्न जगाये
धनी रंग चुनरिया पहने ,धरती सावन गाये
स्वाती बूँद झरी /


झडी झर रहीं बीर बहूटी वर्षा चढी जवानी
नदी नल तलब सरोवर केवल पानी पानी
भादों झडी लगी /


काली रात अन्धेरा डरपे ,हाँथ न सूझत हाँथ
बदरा गरजे गोरी लरजे ,टपकत पानी पात
प्रिय सों प्रीति बढी /

पत्नी


पिछले ५० वर्षों से
चूल्हा फूँकते फूँकते
वह
फुंकनी बन गयी
और
न जाने कब
फुंकनी से चूल्‍हे मे
तब्दील हो गयी |
नित्य
सुबहो शाम
आंटागूँथते लोई बनाते
वह गुँथी गयी
और
न जाने कब लोई बन गयी
वह ख़ुसी ख़ुसी
रोटी मे तब्दील हो गयी |
वर्षों
सुई मे धागा पिरोते पिरोते
वह सुई धागा बन गयी
और धीरे धीरे करघा मे
तब्दील हो गयी |
मुँह अंधेरे
बुहारी से घर आँगन
बुहारते बुहारते
वह बुहारी बन गयी और
पूरी निष्ठा से
घर आँगन मे तब्दील हो गयी |
क्या इतना आसान है
अपने को धरती बना लेना ?

सुनो दुखी मत हो

सुनो दुखी मत हो
ये दिन भी बीत जायेंगे
हौसला बनाये रखो
कुछ भी ठहरा नहीं रहता
सुख नही तो दुःख भी नही
देखो तुम्हारे पति के पास
किसान की विरासत है
उसने कभी अपनी मा की आँखों में
सांझ नही देखी
अपने पिता को कभी हारते नहीं देखा .
देखना
मै जीत ही जाऊंगा एक दिन.
बस तुम मेरा हाथ पकड़ी रहो
मुस्कराती रहो
एक दिन पलकों पर सहेज कर
फिर लाऊंगा बहारों को
तब तुम
धीरे से उतार लेना उन्हें अपने जीवन में
.
देखो .मेरी तरफ देखो
थका नहीं हूँ मै ..अभी
अभी उम्र भी नहीं है मेरी थकने की
तुम पगली जाने क्यों घबराती हो
चलो अच्छा है
इसी बहाने आस पास तो मंडराती हो
लेकिन सुनो ..जोर से हंसो
तुमको मालूम नहीं
सचमुच
तुम कितनी अच्छी लगती हो
जब दिल खोलकर हस्ती हो
सच मानो
जितनी हंसी तुम्हारे ओंठों पर
उतनी खुसी हमारे जीवन में

Saturday, 15 July 2017

धर्म ...क्या है !!

*धर्म (Dharma)*
किसी भी वस्तु के स्वाभाविक गुणों को उसका धर्म कहते है जैसे अग्नि का धर्म उसकी गर्मी और तेज है। गर्मी और तेज के बिना अग्नि की कोई सत्ता नहीं।अत: *मनुष्य का स्वाभाविक गुण मानवता है। यही उसका धर्म है।*
*कुरान* कहती है – *मुस्लिम बनो।*
*बाइबिल* कहती है – *ईसाई बनो।*
किन्तु *वेद* कहता है – *मनुर्भव अर्थात मनुष्य बन जावो (ऋग्वेद 10-53-6)।*
अत: *वेद (Ved) मानवधर्म का नियम शास्त्र है।* जब भी कोई समाज, सभा या यंत्र आदि बनाया जाता है तो उसके सही संचालन के लिए नियम पूर्व ही निर्धारित कर दिये जाते है परमात्मा (god) ने सृष्टि के आरंभ में ही मानव कल्याण के लिए वेदों के माध्यम से इस अद्भुत रचना सृष्टि के सही संचालन व सदुपयोग के लिए दिव्य ज्ञान प्रदान किया। *अत: यह कहना गलत है कि वेद केवल आर्यों (हिंदुओं) के लिए है, उन पर जितना हक हिंदुओं का है उतना ही मुस्लिमों का भी है।*
मानवता का संदेश देने वाले वैदिक धर्म (vedic religion) के अलावा दूसरे अन्य मत किसी व्यक्ति विशेष द्वारा चलाये गए। मत चलाते समय उन्होने अपने को ईश्वर का दूत व ईश्वर पुत्र बताया, ताकि लोग उनका अनुसरण करें। जैसे – *इस्लाम धर्म पैगंबर मुहम्मद (Prophet Muhammad) द्वारा, ईसाई धर्म ईसा-मसीह (Jesus-Christ) द्वारा और बौद्ध धर्म महात्मा बुद्ध (Buddha) द्वारा आदि।* क्योंकि सभी अनुयायियों को धर्म के चलाने वाले पर विश्वास लाना आवश्यक है। अत: ये धर्म नहीं, मत है। ये सब मत वैज्ञानिक (scientific) भी नहीं है, जबकि धर्म और विज्ञान का आपस में अभिन्न संबंध है। जहाँ धर्म है वहाँ विज्ञान है। *देखो, बाइबिल में सूर्य को पृथ्वी के चारों ओर परिक्रमा करना बताया है जबकि वेद कहता है कि पृथ्वी सूर्य के चारों ओर जल सहित घूमती है।* इतना ही नहीं विज्ञान का कोई भी क्षेत्र हो, वेदों से नहीं छूटा। अत: जो मत विज्ञान की कसौटी पर खरे नहीं उतरते, वे धर्म भी नहीं है। गीता में श्रीकृष्ण जी कहते है कि *‘यतो धर्मस्ततो जय:’* अर्थात जहाँ धर्म है वहाँ विजय है आगे आता है कि *‘वेदोsखिलो धर्ममुलं’* अर्थात वेद धर्म का मूल है।
वेदों के आधार पर महर्षि मनु (manu) ने धर्म के 10 लक्षण बताए है :-
*धृति क्षमा दमोsस्तेयं शौचमिन्द्रिय निग्रह:*
*धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्म लक्षणमं ॥*
*(1) धृति कठिनाइयों से न घबराना।
*(2) क्षमा शक्ति होते हुए भी दूसरों को माफ करना।
*(3) दम मन को वश में करना (समाधि के बिना यह संभव नहीं) ।
*(4) अस्तेय चोरी न करना। मन, वचन और कर्म से किसी भी परपदार्थ या धन का लालच न करना ।
*(5) शौच शरीर, मन एवं बुद्धि को पवित्र रखना।
*(6) इंद्रिय-निग्रह इंद्रियों अर्थात आँख, वाणी, कान, नाक और त्वचा को अपने वश में रखना और वासनाओं से बचना।
*(7) धी बुद्धिमान बनना अर्थात प्रत्येक कर्म को सोच-विचारकर करना और अच्छी बुद्धि धारण करना।
*(8) विद्या सत्य वेद ज्ञान ग्रहण करना।
*(9) सत्य सच बोलना, सत्य का आचरण करना।
*(10) अक्रोध क्रोध न करना। क्रोध को वश में करना।
*इन दश नियमों का पालन करना धर्म है।* यही धर्म के दस लक्षण है। यदि *ये गुण या लक्षण किसी भी व्यक्ति में है तो वह धार्मिक है।* मनुष्य बिना सिखाये अपने आप कुछ नहीं सीखता है। जबकि ईश्वर ने अन्य जीवों को कुछ स्वाभाविक ज्ञान दिया है जिससे उनका जीवन चल जावे। जैसे :- मनुष्य को बिना सिखाये न चलना आवे, न बोलना, न तैरना और न खाना आदि। जबकि हिरण का बच्चा पैदा होते ही दौड़ने लगता है, तैरने लगता है। यही बात अन्य गाय,भैंस,शेर,मछ्ली,सर्प,कीट-पतंग आदि के साथ है। अत: *ईश्वर ने मनुष्य के सीखने के लिए भी तो कोई ज्ञान दिया होगा जिसे धर्म कहते है।* जैसे भारत के संविधान को पढ़कर हम भारत के धर्म, कानून, व्यवस्था, अधिकार आदि को जानते है वैसे ही *ईश्वरीय संविधान वेद को पढ़कर ही हम मानवता व इस ईश्वर की रचना सृष्टि को जानकर सही उन्नति को प्राप्त कर सकते है।* आर्यसमाज निरंतर इसी वेद प्रचार के विश्व शांति व उन्नति के कार्य में यथासामर्थ्य लगा हुआ है। *यदि विश्व के किसी भी कोने के मनुष्य को वेदों को समझने के लिए आर्यसमाज का सहयोग लेना ही होगा अन्यथा गलत व्याख्या रूप में आपको मेक्समूलर आदि के किए ग्वारु भाष्य वाले वेद ही मिलेंगे । पूर्ण वैज्ञानिक वैदिक ज्ञान के लिए प्रयत्नशील सभी मनुष्य कृपया आर्यसमाज में जावे ओर अपनी, अपने राष्ट्र की व सारे विश्व की उन्नति के लिए वैदिक धर्म को यथास्वरूप अपनावे।

एक सवाल भी आया है कि गंगा जमुनी तहजीब है क्या

एक सवाल भी आया है कि गंगा जमुनी तहजीब है क्या..... हो सकता है गुस्से में पूछा गया हो " अबे क्या है ये गंगाजमुनी??" या फिर ऐसे " भाई साहब गंगा जमुनी तहजीब किसे कहते हैं?" तो मैं दूसरा वाला ही समझ कर उत्तर दे रहा हूँ.....
गंगा गंगोत्री से चलने के बाद हरिद्वार, ऋषिकेश, फर्रुखाबाद, कानपूर, इलाहबाद, मिर्ज़ापुर, बनारस, बक्सर, बलिया पटना मुंगेर होती हुई चली जाति है जबकि यमुना यमुनोत्री से चल कर यमुनानगर, दिल्ली, आगरा, मथुरा, इटावा होती हुई इलाहाबाद तक पहुँचती है...
गंगा नदी से जुड़े अधिकतर शहर या तो हिन्दू राजाओं नवाबों की रियासत थे या उनके तीर्थ तो दूसरी नदी यमुना  के किनारे बड़ी बड़ी मुग़ल रियासतें.... यानी इन दोनों नदियों के बीच हिन्दू मुस्लिम रियासतों और मान्यताओं की एक खिचड़ी सी बनी हुई थी ..... बची खुची मुस्लिम रियासतों से बहने वाली घाघरा सरयू गोमती राप्ती जैसी नदियाँ भी गंगा में ही मिल जाया करतीहैं
इसी खिचड़ी के अंतर्गत एक जो हिन्दू मुस्लिम ताना-बाना बुना गया और जिस तरह धर्म, संस्कृति, भाषाओं की दीवार टूट एक मिली जुली तहजीब का जन्म हुआ इसे ही गंगाजमुनी तहजीब का नाम दिया गया.....
भाषाई तहजीब के नाम पर इसमें उत्तराखंड की ज़बानों से लेकर उर्दू, फारसी, संस्कृत, ब्रज, अवधि, दिल्लीकी उर्दू, आगरे की उर्दू, लखनऊ की उर्दू.... आगे चल कर बिहार की अलग हिन्दियां सब का समावेश होता चला गया.... और आज जो भाषा हमारे पास आई है जिसे हम हिंदी कहते हैं इसी गंगा जमुनी तहजीब के मंथन से प्राप्त हुई है....
ठीक इसी तरह हमारी जीने मरने कीरस्में शादी बियाह जैसी सभी बातों में आज आश्चर्यजनक समानता पायी जाति है यह भी सैंकड़ों सालों में इन्ही दोनों नदियों की देन रही है.....तो जनाब, बस इसी को बचाने का झगड़ा है....

Tuesday, 27 June 2017

कबीर की प्रासंगिकता

"चौदह सौ पचपन साल गये,चंद्रवार एक ठाट ठये.
जेठ सुदी बरसायत को ,पूरनमासी प्रगट भये .."   

'कबीर चरित्र बोध' ग्रन्थ के अनुसार कबीर-पंथियों ने सन्त कबीर का जन्म सम्वत १४५५ की जेठ शुक्ल पूर्णिमा को माना है.अतः आज ६१४ वीं जयंती पर सन्त कबीर को श्रन्धान्ज्ली देने का यही उचित विकल्प लगा कि आज भी उनकी प्रासंगिकता क्यों है ?इस तथ्य पर विचार किया जाए.कबीर स्कूली शिक्षा से वंचित रहे-'मसि कागद छूह्यो नहीं'कह कर उन्होंने यही जतलाया है.उन्होंने' सूफी सन्त शेख तकी' से दीक्षा ली थी ,किन्तु अपनी रचनाओं में जिस श्रद्धा और सम्मान के साथ 'रामानन्द' का उल्लेख किया है उससे यही सिद्ध होता है कि रामानन्द ही इनके गुरु थे.

कबीर की रचनाओं में काव्य के तीन रूप मिलते हैं-साखी,रमैनी और सबद .साखी दोहों में,रमैनी चौपाइयों में और सबद पदों में हैं.साखी और रमैनी मुक्तक तथा सबद गीत-काव्य के अंतर्गत आते हैं .इनकी वाणी इनके ह्रदय से स्वभाविक रूप में प्रवाहित है और उसमें इनकी अनुभूति की तीव्रता पाई जाती है.

इधर कुछ समय पूर्व ब्लाग जगत में सन्त कबीर का उपहास रामविलास पासवान की रेलवे के कुत्ते की भविष्यवाणी के रूप में जम कर किया गया था.आज के आपा-धापी के युग में जब माडर्न लोग 'मेरा पेट हाउ मैं न जानू काऊ'के सिद्धांत पर चल रहे हों तो उनसे इससे अधिक की अपेक्षा भी नहीं की जा सकती!वैसे सभी रोते रहते हैं भ्रष्टाचार को और कोसते रहते हैं राजनेताओं को ;लेकिन वास्तविकता समझने की जरूरत और फुर्सत किसी को भी नहीं है.भ्रष्टाचार-आर्थिक,सामजिक,राजनीतिक,आध्यात्मिक और धार्मिक सभी क्षेत्रों में है और सब का मूल कारण है -ढोंग-पाखंड पूर्ण धर्म का बोल-बाला.

कबीर के अनुसार धर्म  

कबीर का धर्म-'मानव धर्म' था.मंदिर,तीर्थाटन,माला,नमाज,पूजा-पाठ आदि बाह्याडम्बरों ,आचार-व्यवहार तथा कर्मकांडों की इन्होने कठोर शब्दों में निंदा की और 'सत्य,प्रेम,सात्विकता,पवित्रता,सत्संग (अच्छी सोहबत न कि ढोल-मंजीरा का शोर)इन्द्रिय -निग्रह,सदाचार',आदि पर विशेष बल दिया.पुस्तकों से ज्ञान प्राप्ति की अपेक्षा अनुभव पर आधारित ज्ञान को ये श्रेष्ठ मानते थे.ईश्वर की सर्व व्यापकता और राम-रहीम की एकता के महत्त्व को बता कर इन्होने समाज में व्याप्त भेद-भाव को मिटाने प्रयास किया.यह मनुष्य मात्र को एक समान मानते थे.वस्तुतः कबीर के धार्मिक विचार बहुत ही उदार थे.इन्होने विभिन्न मतों की कुरीतियों संकीर्णताओं  का डट कर विरोध किया और उनके श्रेयस्कर तत्वों को ही ग्रहण किया.

लोक भाषा को महत्त्व 

कबीर ने सहज भावाभिव्यक्ति के लिए साहित्य की अलंकृत भाषा को छोड़ कर 'लोक-भाषा' को अपनाया-भोजपुरी,अवधी,राजस्थानी,पंजाबी,अरबी ,फारसी के शब्दों को उन्होंने खुल कर प्रयोग किया है.यह अपने सूक्ष्म मनोभावों और गहन विचारों को भी बड़ी सरलता से इस भाषा के द्वारा व्यक्त कर लेते थे.कबीर की साखियों की भाषा अत्यंत सरल और प्रसाद गुण संपन्न है.कहीं-कहीं सूक्तियों का चमत्कार भी दृष्टिगोचर होता है.हठयोग और रहस्यवाद की विचित्र अनुभूतियों का वर्णन करते समय कबीर की भाषा में लाक्षणिकता आ गयी है.'बीजक''कबीर-ग्रंथावली'और कबीर -वचनावली'में इनकी रचनाएं संगृहीत हैं.
(उपरोक्त विवरण का आधार हाई-स्कूल और इंटर में चलने वाली उत्तर-प्रदेश सरकार की पुस्तकों से लिया गया है)

कबीर के कुछ  उपदेश 

ऊंचे कुल क्या जनमियाँ,जे करणी उंच न होई .
सोवन कलस सुरी भार्या,साधू निंदा सोई..

हिन्दू मूये राम कही ,मुसलमान खुदाई.
कहे कबीर सो जीवता ,दुई मैं कदे न जाई..

सुखिया सब संसार है ,खावै अरु सोवै.
दुखिया दास कबीर है ,जागे अरु रोवै..

दुनिया ऐसी बावरी कि,पत्थर पूजन जाए.
घर की चकिया कोई न पूजे जेही का पीसा खाए..

कंकर-पत्थर जोरी कर लई मस्जिद बनाये.
ता पर चढ़ी मुल्ला बांग दे,क्या बहरा खुदाय

..इस प्रकार हम देखते हैं कि,सन्त कबीर की वाणी आज भी ज्यों की त्यों जनोपयोगी है.तमाम तरह की समस्याएं ,झंझट-झगडे  ,भेद-भाव ,ऊँच-नीच का टकराव ,मानव द्वारा मानव का शोषण आदि अनेकों समस्याओं का हल कबीर द्वारा बताये गए धर्म-मार्ग में है.कबीर दास जी ने कहा है-

दुःख में सुमिरन सब करें,सुख में करे न कोय.
जो सुख में सुमिरन करे,तो दुःख काहे होय..


अति का भला न बरसना,अति की भली न धुप.
अति का भला न बोलना,अति की भली न चूक..

मानव जीवन को सुन्दर,सुखद और समृद्ध बनाने के लिए कबीर द्वारा दिखाया गया मानव-धर्म अपनाना ही एकमात्र विकल्प है-भूख और गरीबी दूर करने का,भ्रष्टाचार और कदाचार समाप्त करने का तथा सर्व-जन की मंगल कामना का.

Saturday, 17 June 2017

खान अब्दुल गफ्फार खान । सीमान्त गांधी ।

खान अब्दुल गफ्फार खान ।
सीमान्त गांधी ।
बलूच बटवारे से दुखी थे ।
वे भारत के साथ रहना चाहते थे ,लेकिन भूगोल ने उन्हें मारा ।
बापूके सच्चे अनुयायी सीमान्त जब आख़िरी बार मिले तो बापू ने खान से कहा - अब भारत का मोह त्याग दो ,अपने देश की सेवा करो ।
यह अंदाजा लगाना आसान नहीं है कि क्या गुजरा होगा दोनों के दिल में ।
वही सीमान्त गांधी पाकिस्तान में ता उम्र कैद रहे ।
69 में भारत की प्रधान मंत्री श्रीमती इंदिरागांधी के विशेष आग्रह पर इलाज के लिए भारत आये।
हवाई अड्डे पर उन्हें लेने श्रीमती गांधी और जे पी गए ।
खान जब हवाई जहाज से बाहर आये तो उनके हाथ में एक गठरी थी जिसमे उनका कुर्ता पजामा था ।
मिलते ही श्रीमती गांधी ने हाथ बढ़ाया उनकी गठरी की तरफ -इसे हमे दीजिये ,हम ले चलते हैं ।
खान साहब ठहरे,बड़े ठंढे मन से बोले -यही तो बचा है ,इसे भी ले लोगी ?
बटवारे का पूरा दर्द खान साब की इस बात से बाहर आ गया ।
जे पी और श्रीमती गांधी दोनों ने सिर झुका लिया ।
जे पी अपने को संभाल नहीं पाये ,उनकी आँख से आंसू गिर रहे थे ।
सबसे निवेदन है खान साहब के बारे में जानो ।

Friday, 16 June 2017

मैं वहां कभी नहीं गया ..


तालाब और मरघट को
अलग करने वाले मेड पर एक आम का पेड़ है ,
कितना पुराना है किसी को नहीं पता
चांदनी रात में मेरे घर की छत से दिखता है.
मरघट का विस्तार और आम का पेड़/
मेरे लिए आम के पेड़ का इस जगह होने का कोई अर्थ ,या प्रयोजन नहीं
पर आम के पेड़ का इस जगह होने का अर्थ भी है ,प्रयोजन भी है
पेड़ है तो छाया है .कोटर है मधु मक्खियों का छत्ता है चिड़ियाँ है घोसला है
गलियों में लुका छिपी खेलते बच्चों की तर्ज पर आगे पीछे सरपट भागती हैं
गिलहरियाँ इस की मोती डालों के बीच /
इस पेड़ के वंहा होने की कोई योजना नहीं थी फिर भी वह वहां हैऔर
उसके होने से बहुत कुछ है /ऋतुएं आती हैं जातीं हैं
पतझड़ होता है .बसंत आता है कोयल कूकती है छाया होती है
बच्चे अमियाँ तोड़ते ह
पत्थर मार मार कर ,
मै वंहा कभी नहीं गया पर हर क्षण होता हूँ
,हर जलती चिता में हर दफ़न होती लाश में ......

भगत सिंह के जीवन के आखिरी क्षण

भगत सिंह की ज़िंदगी के वे आख़िरी 12 घंटे
रेहान फ़ज़ल
बीबीसी संवाददाता
लाहौर सेंट्रल जेल में 23 मार्च, 1931 की शुरुआत किसी और दिन की तरह ही हुई थी. फ़र्क सिर्फ़ इतना सा था कि सुबह-सुबह ज़ोर की आँधी आई थी.
लेकिन जेल के क़ैदियों को थोड़ा अजीब सा लगा जब चार बजे ही वॉर्डेन चरत सिंह ने उनसे आकर कहा कि वो अपनी-अपनी कोठरियों में चले जाएं. उन्होंने कारण नहीं बताया.
उनके मुंह से सिर्फ़ ये निकला कि आदेश ऊपर से है. अभी क़ैदी सोच ही रहे थे कि माजरा क्या है, जेल का नाई बरकत हर कमरे के सामने से फुसफुसाते हुए गुज़रा कि आज रात भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी दी जाने वाली है.
उस क्षण की निश्चिंतता ने उनको झकझोर कर रख दिया. क़ैदियों ने बरकत से मनुहार की कि वो फांसी के बाद भगत सिंह की कोई भी चीज़ जैसे पेन, कंघा या घड़ी उन्हें लाकर दें ताकि वो अपने पोते-पोतियों को बता सकें कि कभी वो भी भगत सिंह के साथ जेल में बंद थे.
बरकत भगत सिंह की कोठरी में गया और वहाँ से उनका पेन और कंघा ले आया. सारे क़ैदियों में होड़ लग गई कि किसका उस पर अधिकार हो. आखिर में ड्रॉ निकाला गया.
लाहौर कॉन्सपिरेसी केस
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अब सब क़ैदी चुप हो चले थे. उनकी निगाहें उनकी कोठरी से गुज़रने वाले रास्ते पर लगी हुई थी. भगत सिंह और उनके साथी फाँसी पर लटकाए जाने के लिए उसी रास्ते से गुज़रने वाले थे.
एक बार पहले जब भगत सिंह उसी रास्ते से ले जाए जा रहे थे तो पंजाब कांग्रेस के नेता भीमसेन सच्चर ने आवाज़ ऊँची कर उनसे पूछा था, "आप और आपके साथियों ने लाहौर कॉन्सपिरेसी केस में अपना बचाव क्यों नहीं किया."
भगत सिंह का जवाब था, "इन्कलाबियों को मरना ही होता है, क्योंकि उनके मरने से ही उनका अभियान मज़बूत होता है, अदालत में अपील से नहीं."
वॉर्डेन चरत सिंह भगत सिंह के ख़ैरख़्वाह थे और अपनी तरफ़ से जो कुछ बन पड़ता था उनके लिए करते थे. उनकी वजह से ही लाहौर की द्वारकादास लाइब्रेरी से भगत सिंह के लिए किताबें निकल कर जेल के अंदर आ पाती थीं.
जेल की कठिन ज़िंदगी
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भगत सिंह को किताबें पढ़ने का इतना शौक था कि एक बार उन्होंने अपने स्कूल के साथी जयदेव कपूर को लिखा था कि वो उनके लिए कार्ल लीबनेख़ की 'मिलिट्रिज़म', लेनिन की 'लेफ़्ट विंग कम्युनिज़म' और अपटन सिनक्लेयर का उपन्यास 'द स्पाई' कुलबीर के ज़रिए भिजवा दें.
भगत सिंह जेल की कठिन ज़िंदगी के आदी हो चले थे. उनकी कोठरी नंबर 14 का फ़र्श पक्का नहीं था. उस पर घास उगी हुई थी. कोठरी में बस इतनी ही जगह थी कि उनका पाँच फिट, दस इंच का शरीर बमुश्किल उसमें लेट पाए.
भगत सिंह को फांसी दिए जाने से दो घंटे पहले उनके वकील प्राण नाथ मेहता उनसे मिलने पहुंचे. मेहता ने बाद में लिखा कि भगत सिंह अपनी छोटी सी कोठरी में पिंजड़े में बंद शेर की तरह चक्कर लगा रहे थे.
'इंक़लाब ज़िदाबाद!'
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उन्होंने मुस्करा कर मेहता को स्वागत किया और पूछा कि आप मेरी किताब 'रिवॉल्युशनरी लेनिन' लाए या नहीं? जब मेहता ने उन्हे किताब दी तो वो उसे उसी समय पढ़ने लगे मानो उनके पास अब ज़्यादा समय न बचा हो.
मेहता ने उनसे पूछा कि क्या आप देश को कोई संदेश देना चाहेंगे? भगत सिंह ने किताब से अपना मुंह हटाए बग़ैर कहा, "सिर्फ़ दो संदेश... साम्राज्यवाद मुर्दाबाद और 'इंक़लाब ज़िदाबाद!"
इसके बाद भगत सिंह ने मेहता से कहा कि वो पंडित नेहरू और सुभाष बोस को मेरा धन्यवाद पहुंचा दें, जिन्होंने मेरे केस में गहरी रुचि ली थी. भगत सिंह से मिलने के बाद मेहता राजगुरु से मिलने उनकी कोठरी पहुंचे.
राजगुरु के अंतिम शब्द थे, "हम लोग जल्द मिलेंगे." सुखदेव ने मेहता को याद दिलाया कि वो उनकी मौत के बाद जेलर से वो कैरम बोर्ड ले लें जो उन्होंने उन्हें कुछ महीने पहले दिया था.
तीन क्रांतिकारी
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मेहता के जाने के थोड़ी देर बाद जेल अधिकारियों ने तीनों क्रांतिकारियों को बता दिया कि उनको वक़्त से 12 घंटे पहले ही फांसी दी जा रही है. अगले दिन सुबह छह बजे की बजाय उन्हें उसी शाम सात बजे फांसी पर चढ़ा दिया जाएगा.
भगत सिंह मेहता द्वारा दी गई किताब के कुछ पन्ने ही पढ़ पाए थे. उनके मुंह से निकला, "क्या आप मुझे इस किताब का एक अध्याय भी ख़त्म नहीं करने देंगे?"
भगत सिंह ने जेल के मुस्लिम सफ़ाई कर्मचारी बेबे से अनुरोध किया था कि वो उनके लिए उनको फांसी दिए जाने से एक दिन पहले शाम को अपने घर से खाना लाएं.
लेकिन बेबे भगत सिंह की ये इच्छा पूरी नहीं कर सके, क्योंकि भगत सिंह को बारह घंटे पहले फांसी देने का फ़ैसला ले लिया गया और बेबे जेल के गेट के अंदर ही नहीं घुस पाया.
आज़ादी का गीत
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थोड़ी देर बाद तीनों क्रांतिकारियों को फांसी की तैयारी के लिए उनकी कोठरियों से बाहर निकाला गया. भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव ने अपने हाथ जोड़े और अपना प्रिय आज़ादी गीत गाने लगे-
कभी वो दिन भी आएगा
कि जब आज़ाद हम होंगें
ये अपनी ही ज़मीं होगी
ये अपना आसमाँ होगा.
फिर इन तीनों का एक-एक करके वज़न लिया गया. सब के वज़न बढ़ गए थे. इन सबसे कहा गया कि अपना आखिरी स्नान करें. फिर उनको काले कपड़े पहनाए गए. लेकिन उनके चेहरे खुले रहने दिए गए.
चरत सिंह ने भगत सिंह के कान में फुसफुसा कर कहा कि वाहे गुरु को याद करो.
फांसी का तख़्ता
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भगत सिंह बोले, "पूरी ज़िदगी मैंने ईश्वर को याद नहीं किया. असल में मैंने कई बार ग़रीबों के क्लेश के लिए ईश्वर को कोसा भी है. अगर मैं अब उनसे माफ़ी मांगू तो वो कहेंगे कि इससे बड़ा डरपोक कोई नहीं है. इसका अंत नज़दीक आ रहा है. इसलिए ये माफ़ी मांगने आया है."
जैसे ही जेल की घड़ी ने 6 बजाय, क़ैदियों ने दूर से आती कुछ पदचापें सुनीं. उनके साथ भारी बूटों के ज़मीन पर पड़ने की आवाज़े भी आ रही थीं. साथ में एक गाने का भी दबा स्वर सुनाई दे रहा था, "सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है..."
सभी को अचानक ज़ोर-ज़ोर से 'इंक़लाब ज़िंदाबाद' और 'हिंदुस्तान आज़ाद हो' के नारे सुनाई देने लगे. फांसी का तख़्ता पुराना था लेकिन फांसी देने वाला काफ़ी तंदुरुस्त. फांसी देने के लिए मसीह जल्लाद को लाहौर के पास शाहदरा से बुलवाया गया था.
भगत सिंह इन तीनों के बीच में खड़े थे. भगत सिंह अपनी माँ को दिया गया वो वचन पूरा करना चाहते थे कि वो फाँसी के तख़्ते से 'इंक़लाब ज़िदाबाद' का नारा लगाएंगे.
लाहौर सेंट्रल जेल
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लाहौर ज़िला कांग्रेस के सचिव पिंडी दास सोंधी का घर लाहौर सेंट्रल जेल से बिल्कुल लगा हुआ था. भगत सिंह ने इतनी ज़ोर से 'इंकलाब ज़िंदाबाद' का नारा लगाया कि उनकी आवाज़ सोंधी के घर तक सुनाई दी.
उनकी आवाज़ सुनते ही जेल के दूसरे क़ैदी भी नारे लगाने लगे. तीनों युवा क्रांतिकारियों के गले में फांसी की रस्सी डाल दी गई. उनके हाथ और पैर बांध दिए गए. तभी जल्लाद ने पूछा, सबसे पहले कौन जाएगा?
सुखदेव ने सबसे पहले फांसी पर लटकने की हामी भरी. जल्लाद ने एक-एक कर रस्सी खींची और उनके पैरों के नीचे लगे तख़्तों को पैर मार कर हटा दिया. काफी देर तक उनके शव तख़्तों से लटकते रहे.
अंत में उन्हें नीचे उतारा गया और वहाँ मौजूद डॉक्टरों लेफ़्टिनेंट कर्नल जेजे नेल्सन और लेफ़्टिनेंट कर्नल एनएस सोधी ने उन्हें मृत घोषित किया.
अंतिम संस्कार
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एक जेल अधिकारी पर इस फांसी का इतना असर हुआ कि जब उससे कहा गया कि वो मृतकों की पहचान करें तो उसने ऐसा करने से इनकार कर दिया. उसे उसी जगह पर निलंबित कर दिया गया. एक जूनियर अफ़सर ने ये काम अंजाम दिया.
पहले योजना थी कि इन सबका अंतिम संस्कार जेल के अंदर ही किया जाएगा, लेकिन फिर ये विचार त्यागना पड़ा जब अधिकारियों को आभास हुआ कि जेल से धुआँ उठते देख बाहर खड़ी भीड़ जेल पर हमला कर सकती है.
इसलिए जेल की पिछली दीवार तोड़ी गई. उसी रास्ते से एक ट्रक जेल के अंदर लाया गया और उस पर बहुत अपमानजनक तरीके से उन शवों को एक सामान की तरह डाल दिया गया.
पहले तय हुआ था कि उनका अंतिम संस्कार रावी के तट पर किया जाएगा, लेकिन रावी में पानी बहुत ही कम था, इसलिए सतलज के किनारे शवों को जलाने का फैसला लिया गया.
लाहौर में नोटिस
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उनके पार्थिव शरीर को फ़िरोज़पुर के पास सतलज के किनारे लाया गया. तब तक रात के 10 बज चुके थे. इस बीच उप पुलिस अधीक्षक कसूर सुदर्शन सिंह कसूर गाँव से एक पुजारी जगदीश अचरज को बुला लाए.
अभी उनमें आग लगाई ही गई थी कि लोगों को इसके बारे में पता चल गया. जैसे ही ब्रितानी सैनिकों ने लोगों को अपनी तरफ़ आते देखा, वो शवों को वहीं छोड़ कर अपने वाहनों की तरफ़ भागे. सारी रात गाँव के लोगों ने उन शवों के चारों ओर पहरा दिया.
अगले दिन दोपहर के आसपास ज़िला मैजिस्ट्रेट के दस्तख़त के साथ लाहौर के कई इलाकों में नोटिस चिपकाए गए जिसमें बताया गया कि भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु का सतलज के किनारे हिंदू और सिख रीति से अंतिम संस्कार कर दिया गया.
इस ख़बर पर लोगों की कड़ी प्रतिक्रिया आई और लोगों ने कहा कि इनका अंतिम संस्कार करना तो दूर, उन्हें पूरी तरह जलाया भी नहीं गया. ज़िला मैजिस्ट्रेट ने इसका खंडन किया लेकिन किसी ने उस पर विश्वास नहीं किया.
भगत सिंह का परिवार
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इस तीनों के सम्मान में तीन मील लंबा शोक जुलूस नीला गुंबद से शुरू हुआ. पुरुषों ने विरोधस्वरूप अपनी बाहों पर काली पट्टियाँ बांध रखी थीं और महिलाओं ने काली साड़ियाँ पहन रखी थीं.
लगभग सब लोगों के हाथ में काले झंडे थे. लाहौर के मॉल से गुज़रता हुआ जुलूस अनारकली बाज़ार के बीचोबीच रूका.
अचानक पूरी भीड़ में उस समय सन्नाटा छा गया जब घोषणा की गई कि भगत सिंह का परिवार तीनों शहीदों के बचे हुए अवशेषों के साथ फिरोज़पुर से वहाँ पहुंच गया है.
जैसे ही तीन फूलों से ढ़के ताबूतों में उनके शव वहाँ पहुंचे, भीड़ भावुक हो गई. लोग अपने आँसू नहीं रोक पाए.
ब्रिटिश साम्राज्य
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वहीं पर एक मशहूर अख़बार के संपादक मौलाना ज़फ़र अली ने एक नज़्म पढ़ी जिसका लब्बोलुआब था, 'किस तरह इन शहीदों के अधजले शवों को खुले आसमान के नीचे ज़मीन पर छोड़ दिया गया.'
उधर, वॉर्डेन चरत सिंह सुस्त क़दमों से अपने कमरे में पहुंचे और फूट-फूट कर रोने लगे. अपने 30 साल के करियर में उन्होंने सैकड़ों फांसियां देखी थीं, लेकिन किसी ने मौत को इतनी बहादुरी से गले नहीं लगाया था जितना भगत सिंह और उनके दो कॉमरेडों ने.
किसी को इस बात का अंदाज़ा नहीं था कि 16 साल बाद उनकी शहादत भारत में ब्रिटिश साम्राज्य के अंत का एक कारण साबित होगी और भारत की ज़मीन से सभी ब्रिटिश सैनिक हमेशा के लिए चले जाएंगे.
और एक सावरकर थे यातना सह नहीं पाये तो माफी मांघकर बहार आये और अंग्रेजों के लिए मुखबिरी की

पंडित जवाहर लाल नेहरू के देहावसान के पश्चात संसद में अटल बिहारी वाजपेई जी के उद्बोधन के मुख्य अंश---

पंडित जवाहर लाल नेहरू के देहावसान के पश्चात संसद में अटल बिहारी वाजपेई जी के उद्बोधन के मुख्य अंश--- महोदय, एक सपना था जो अधूरा रह गया, एक गीत था जो गूँगा हो गया, एक लौ थी जो अनन्त में विलीन हो गई। सपना था एक ऐसे संसार का जो भय और भूख से रहित होगा, गीत था एक ऐसे महाकाव्य का जिसमें गीता की गूँज और गुलाब की गंध थी। लौ थी एक ऐसे दीपक की जो रात भर जलता रहा, हर अँधेरे से लड़ता रहा और हमें रास्ता दिखाकर, एक प्रभात में निर्वाण को प्राप्त हो गया। मृत्यु ध्रुव है, शरीर नश्वर है। कल कंचन की जिस काया को हम चंदन की चिता पर चढ़ा कर आए, उसका नाश निश्चित था। लेकिन क्या यह ज़रूरी था कि मौत इतनी चोरी छिपे आती? जब संगी-साथी सोए पड़े थे, जब पहरेदार बेखबर थे, हमारे जीवन की एक अमूल्य निधि लुट गई। भारत माता आज शोकमग्ना है – उसका सबसे लाड़ला राजकुमार खो गया। मानवता आज खिन्नमना है – उसका पुजारी सो गया। शांति आज अशांत है – उसका रक्षक चला गया। दलितों का सहारा छूट गया। जन जन की आँख का तारा टूट गया। यवनिका पात हो गया। विश्व के रंगमंच का प्रमुख अभिनेता अपना अंतिम अभिनय दिखाकर अन्तर्ध्यान हो गया। महर्षि वाल्मीकि ने रामायण में भगवान राम के सम्बंध में कहा है कि वे असंभवों के समन्वय थे। पंडितजी के जीवन में महाकवि के उसी कथन की एक झलक दिखाई देती है। वह शांति के पुजारी, किन्तु क्रान्ति के अग्रदूत थे; वे अहिंसा के उपासक थे, किन्तु स्वाधीनता और सम्मान की रक्षा के लिए हर हथियार से लड़ने के हिमायती थे। वे व्यक्तिगत स्वाधीनता के समर्थक थे किन्तु आर्थिक समानता लाने के लिए प्रतिबद्ध थे। उन्होंने समझौता करने में किसी से भय नहीं खाया, किन्तु किसी से भयभीत होकर समझौता नहीं किया। पाकिस्तान और चीन के प्रति उनकी नीति इसी अद्भुत सम्मिश्रण की प्रतीक थी। उसमें उदारता भी थी, दृढ़ता भी थी। यह दुर्भाग्य है कि इस उदारता को दुर्बलता समझा गया, जबकि कुछ लोगों ने उनकी दृढ़ता को हठवादिता समझा। मुझे याद है, चीनी आक्रमण के दिनों में जब हमारे पश्चिमी मित्र इस बात का प्रयत्न कर रहे थे कि हम कश्मीर के प्रश्न पर पाकिस्तान से कोई समझौता कर लें तब एक दिन मैंने उन्हें बड़ा क्रुद्ध पाया। जब उनसे कहा गया कि कश्मीर के प्रश्न पर समझौता नहीं होगा तो हमें दो मोर्चों पर लड़ना पड़ेगा तो बिगड़ गए और कहने लगे कि अगर आवश्यकता पड़ेगी तो हम दोनों मोर्चों पर लड़ेंगे। किसी दबाव में आकर वे बातचीत करने के खिलाफ थे। महोदय, जिस स्वतंत्रता के वे सेनानी और संरक्षक थे, आज वह स्वतंत्रता संकटापन्न है। सम्पूर्ण शक्ति के साथ हमें उसकी रक्षा करनी होगी। जिस राष्ट्रीय एकता और अखंडता के वे उन्नायक थे, आज वह भी विपदग्रस्त है। हर मूल्य चुका कर हमें उसे कायम रखना होगा। जिस भारतीय लोकतंत्र की उन्होंने स्थापना की, उसे सफल बनाया, आज उसके भविष्य के प्रति भी आशंकाएं प्रकट की जा रही हैं। हमें अपनी एकता से, अनुशासन से, आत्म-विश्वास से इस लोकतंत्र को सफल करके दिखाना है। नेता चला गया, अनुयायी रह गए। सूर्य अस्त हो गया, तारों की छाया में हमें अपना मार्ग ढूँढना है। यह एक महान परीक्षा का काल है। यदि हम सब अपने को समर्पित कर सकें एक ऐसे महान उद्देश्य के लिए जिसके अन्तर्गत भारत सशक्त हो, समर्थ और समृद्ध हो और स्वाभिमान के साथ विश्व शांति की चिरस्थापना में अपना योग दे सके तो हम उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित करने में सफल होंगे। संसद में उनका अभाव कभी नहीं भरेगा। शायद तीन मूर्ति को उन जैसा व्यक्ति कभी भी अपने अस्तित्व से सार्थक नहीं करेगा। वह व्यक्तित्व, वह ज़िंदादिली, विरोधी को भी साथ ले कर चलने की वह भावना, वह सज्जनता, वह महानता शायद निकट भविष्य में देखने को नहीं मिलेगी। मतभेद होते हुए भी उनके महान आदर्शों के प्रति, उनकी प्रामाणिकता के प्रति, उनकी देशभक्ति के प्रति, और उनके अटूट साहस के प्रति हमारे हृदय में आदर के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। इन्हीं शब्दों के साथ मैं उस महान आत्मा के प्रति अपनी विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ। *-श्री अटल बिहारी वाजपेयी* (29 मई, 1964 को संसद में दिया गया भाषण

Tuesday, 9 May 2017

अब्दुल रहीम खान खाना

अब्दुल रहीम खान खाना .अकबर के नौ रत्नों में सबसे नायब हीरा ,एक अद्भुत व्यक्ति .इतना बड़ा शूरमा की १६ से ७२ वर्ष की उम्र तक लडाइयां ही लड़ता और जीतता रहा /इतना बड़ा दानी की किसी ने कहा की मैंने एक लाख अशर्फियाँ एक साथ देखी नहीं.. तोउसे एक लाख अशर्फियाँ दे दी.. विनम्रता इतनी की देने के बाद भी शर्मिंदा थे ...देते समय उनकी आखे नीचे थीं ,किसी ने आँखे नीचे होने का कारन पूछा तो कहा .
देन हार कोई और है भेजत है दिन रैन
लोग भरम हमपर धरें यातें नीचे नैन ..
सहृदय ऐसे की एक सिपाही की स्त्री के एक बर्वे पर प्रसन्न हो गए ;-
प्रेम प्रीति को बिरवा चलेहु लगाय
सींचनि की सुधि लीजै मुरझ न जांय.
और सिपाही को धन धन्य देकर उसकी नवागत बधू के पास भेज दिया .और इसी चाँद पर एक पूरा ग्रन्थ ही लिख डाला
गुण के ग्राहक ऐसे की अरबी/फ़ारसी ,हिन्दी के अनेक रचना कार इनके मित्र थे.
चरित्रवान इतने की रूपवती के प्रणय निवेदन के कथन ..की मुझे अपने जैसा पुत्र दे दो .पर अपना सर उसकी गोद में डाल दिया ..माँ कहकर
.तुलसी के मित्र थे .अकबर के विस्वास पात्र थे .जहाँगीर और शाहजहाँ के द्वन्द में इस कदर फंसे की पिस गए .जेल में डाल दिए गए उनके पुत्र दरब खान का सर काट कर उनके पास भेज दिया गया .उनके पूरे परिवार को जालिमो ने मार दिया फिर भी स्वाभि मान नहीं छोड़ा ...
रहिमन मोहि न सुहाय अमिय पियावै मान बिन
.बरु विष देई बुलाय मान सहित मरिबो भलो .
और प्रेमी इतने गहरे की ..
अंतर दाव लगी रहे धुंवा न प्रगट सोय
कई जिय जाने आपनो या सर बीती होय ..
जे सुलगे ते बुझ गए बुझे ते सुलगे नाहि
रहिमन दाहे प्रेम के बुझी बुझी के सुल गाहि .
कल आप ने यहाँ तक पढ़ा था ..अब आगे पढ़िए ..
..
(२ .अब्दुल रहीम खानखाना )कल से आगे ..पढिये .
भक्त ऐसे की कृष्ण मय हो गए कवियों ने लिखा कोटिन हिन्दू वारिये मुस्लमान हरि जनन पर ,.कुल मिला कर एक ऐसा व्यक्तित्व
जिसे पढ़ कर आप पूरी एक कौम के बारे में अपनी जान कारी को अधूरी मानने पर विवास होंगे ..
कल से आगे ..कल के लेख में अशुद्धियाँ थीं बाद में दूर किया अब नही हैं .आज कोशिस की है की अशुद्ध न हो फिर भी होगा ही ..आज और अच्छा बना है पढ़िए
रहीम को पढ़ते समय मुझे लगा की उनका पूरा जीवन -राजसी विलास का रहा हो ,.दर दर,मारे मारे फिरने का रहा हो, युद्ध और फतह का रहा हो ,राजा, के क्रोध काल का हो ,कुचाली दोस्तों के विश्वास घातके समय का रहा हो, एक आंवा था जो भीतर ही दहक रहा था /
रहीम के बारे में एक कहानी मिलती है की तान सेन ने अकबर के दरबार में एक पद गाया, जो इस प्रकार था .
जसुदा बार बार यों भाखै है
कोऊ ब्रज में हितू हमारो चलत गोपालहिं राखै ...
और अकबर ने अपने सभा सदों से इसका अर्थ कहने को कहा ,
तनसेन ने कहा --यशोदा बार बार अर्थात पुनः पुनः यह पुकार लगाती है की है कोई ऐसा हितू जो ब्रज में गोपाल को रोक ले .
शेख फैजी ने अर्थ कहा ....बार बार का मतलब ..रो रो कर रट लगाती है .बीरबल ने कहा बार बार का अर्थ है द्वार द्वार जाकर यशोदा पुकार लगाती है ...खाने आजम कोका ने कहा बार का अर्थ दिन है और यशोदा प्रतिदिन यही रटती रहती है .अब रहीम की बरी थी .उन्होंने अर्थ कहा ...तानसेन गायक हैं इनको एक ही पद को अलापना रहता है इस लिए उन्हों ने बार बार का अर्थ पुनुरुक्ति किया शेख फैजी फ़ारसी का शायर हैं इन्हें रोने के सिवा कोई काम नहीं .राजा बीर बल द्वार द्वार घूमने वाले ब्राम्हण हैं इसलिए इनका बार बार का अर्थ द्वार द्वार ही उचित है, खाने आजम कोका नजूमी (ज्योतिषी) हैं उन्हें तिथि बार से ही वास्ता पड़ता है इसलिए बार बार का अर्थ उन्होंने दिन दिन किया ,.
पर हुजूर वास्तविक अर्थ यह है की
यशोदा का बार बारअर्थात रोम रोम पुकारता है की कोई तो मिले जो मेरे गोपाल को ब्रज में रोक ले .इस ब्य्ख्या से रहीम की विद्ग्घ्ता और साहित्य की समझ का पता चलता है
इस से रहीम के उस गहरे हिन्दुस्तानी रंग का पता चलता है जो रोमांच को सात्विक भाव मानता हैऔर रोम रोम में ब्रम्हांड देखता . जो शरीर के रोम जैसे अंग को भी प्राणों का सन्देश वाहक मानता है जो वनस्पति मात्र को विरत अस्तित्व का रोमांच मानता है रहीम का जीवन एक पूरा दुखांत नाटक है .जिसमे बहुत से उतर चढाव हैं .महात्मा तुलसी से उनकी प्रगाढ़ मित्रता थी .बाप बैरम खान अकबर की ही तरह तुर्किस्तान के एक बहुत बड़े कबीले के सरदार थे वे सोलह वर्ष की आयु से ही हुमायू के साथ रहे .उन्ही की कूबत थी की हुमयू को फिर से दिल्ली की राजगद्दी पर बिठाया ,हुमायूँ के मरने पर वे ही अकबर के अभिभावक बनगए.जिस साल हुमायूँ मरे उसी साल लाहौर में रहीम का जन्म हुआ .रहीम की माँ अकबर की मौसी थीं .अकबर से दूसरा रिश्ता भी था ,बैरम खान की दूसरी शादी बाबर की नतिनी सलीमा बेगम सुल्ताना से हुई थी .बैरम खान के मरने के बाद अकबर के साथ सलीमा का पुनर्विवाह हुआ ,पर भाग्य का खेल ,चुगुल खोरों ने बैरम खान और अकबर के बीच भेद की गहरी खाई खोद दी .बैतररम खान ने विद्रोह किया परास्त हुए ,उन्हें हज करने जाने की सजा मिली.वे गुजरात पहुंचे थे की उनका डेरा लुट गया बैरम खान का क़त्ल हो गया ,बफदारों ने ओ परिवार बचाया ,चार वर्ष के रहीम बारह वर्ष की सलीमा सुल्ताना बेगम .अहमद बाद पहुंचे .जब रहीम पांच वर्ष के थे तभी अकबर ने उन्हें अपने संरक्षण में ले लिया .शिक्षा दीक्षा कराई.बड़े सरदार मिर्जा अजीज कोकलताश की बहन माह बनू बेगम से निकाह करवाया .उन्नीस वर्ष की आयु में गुजरात का युद्ध जीत कर वहा के सूबेदार बने ....
वे तुलसी के परम मित्र थे .और तुलसी को बेहतरीन इंसान मानते थे ..
सुरतिय नर तिय नागतिय सब चाहत अस होय
गोद लिए हुलसी फिरें तुलसी सों सूत होय
और रामचरित मानस को बेहतरीन ग्रन्थ ........
राम चरित मांनस विमल सब ग्रंथन को सार
हिंदुआं को वेद सैम तुरकन प्रकट कुरान ....
कबीर तुलसी रहीम और रसखन मध्यकाल के चार बेहतरीन इंसान ..कबीर संत थे एक बेहतरीन इंसान थे .अनपढ़ गृहस्त थे .जाति पांति धन धर्म से परे थे .मन से साफ़ थे .कबीर की भाषा आम आदमी की भाषा थी.वे लिखते नहीं थे केवल बोलते थे लोक जीवन के बहुत नजदीक थे .उनके प्रतीक दृष्टान्त लोक जीवन से आते थे . वे राम नाम जपते जरुर थे पर पूजा और आडम्बर के विरोधी थे उनके राम दशरथ के बेटे राम नही थे .इस धरती पर कबीर से बड़ा कोई इन्सान पैदा ही नहीं हुआ ,एक मुकम्मल इन्सान क्या होता है जानने के लिए हर किसी को कबीर पढ़ना चाहिए .अनगढ़ ,सहज ,भीतर- बाहर एक ,निर्भय ,आस्थावान ,जागृत विवेक .बिना पढ़े पूरी तरह ज्ञानी ,प्रेमानुभूति की पराकाष्ठा को समझाने वाला .मनुष्यता का रक्षक ,जागृत ,त्यागी गृहस्थ ,मनुष्यता की रक्षा के लिए भगवान से भी मुठभेड़ करने को आमादा ,जीवन और जगत को पूरी तरह समझाने वाला ,उसकी नश्वरता का गायक .मनुष्य इस धरती पर दूसरा कोई नहीं ...कबीर को जानना एक तपस्या है .उसे समझना मनुष्य बनने के रस्ते में एक सफल कदम है, उसे जीना ही मनुष्य होना है .कबीर सत्य है, कबीर नित्य है, कबीर .लोक है ,कबीर लोक राग है ,कबीर जिजीविषा है ..अपने लोक को ,अपने लोकराग को .अपने सत्य को अपने नित्य में जी पाना ही कबीर होना है .उसे पढ़ना एक रोमांच है .उसे समझना ब्रम्ह को ,प्राणी को जानना है ,उसे जीना एक ताकत है ,कबीर जीवन की हिम्मत है .जीवन की कला है ..आज कबीर की ही सबसे जादा जरूरत है . कबीर धर्म की ब्याख्या है .कबीर कर्म का प्रमाण है .वह निष्काम कर्मयोगी गृहस्थ ...वेद की ब्याख्या है .पुरानो की समीक्षा है वेदांत दर्शन का निचोड़ है ....
तुलसी महात्मा थे . भक्त थे . पढ़े लिखे थे . गृहस्त नहीं थे .पर संत नहीं थे .उन्हों ने अपने काम को पीटपीट के राम बना दिया था .और राम के परम भक्त थे.संस्कृत के विद्वान थे पर अवधी में लिखते थे वे.उनमे भी वे सारे गुण थे जो कबीर में थे बल्कि वे पढ़े लिखे थे पुरानो के जादा नजदीक थे परन्तु वेद वेदांत के ज्ञाता थे . रहीम .के परम मित्र थे .और रहीम तुलसी को बेहतरीन इंसान मानते थे ..
सुरतिय नर तिय नागतिय सब चाहत अस होय
गोद लिए हुलसी फिरें तुलसी सों सूत होय
और रामचरित मानस को बेहतरीन ग्रन्थ ........
राम चरित मांनस विमल सब ग्रंथन को सांन 
हिंदुअन को वेद सम तुरकन प्रकट कुरान ....
रहीम अकबर के दरबारी थे तुलसी नही थे .हाँ अकबर ने चाहा था पर तुलसी ने अकबर को सीधा सा जबा दे दिया था .. 
होऊं चाकर रघुबीर को पटो लिखो दरबार .
तुलसी अब का होंही गे नर के मंसब दार ..
.मतलब हिम्मती थे निडर थे ब्राम्हण थे .लिखते अवधी में थे . लोक जीवन के बहुत नजदीक थे .उनके प्रतीक दृष्टान्त लोक जीवन से आते थे .रहीमऔर तुलसी दोनों समकालीन थे.रहीम संस्कृत अवधि अरवी फारसी के जानकार थे .सभी भाषाओं का आदर करते थे सभी में लिखते थे .वे मुसलमान थे पर भक्त थे .राम के भी और कृष्ण के भी .कृष्ण के एक परम भक्त और थे रसखान .इन पर फिर कभी ..
हाँ तो मैं कह रहा था की तुलसी ने कभी मुस्लिम धर्म की कोई बात नहीं की .अरवी और फारसी की चर्चा तक नहीं की ...रहीम अरवी फारसी के साथ हिन्दवी में भी लिखते रहे और नमाज के साथ साथ पूजा भी करते रहे .वे दरबारी थे .शासक थे तलवार के धनी थे फिर भी भक्त थे .महात्मा थे संत थे .उदार थे ..उन्हों ने तुलसी और मांनस दोनों की प्रशंसा की .पर तुलसी ने ऐसा कहीं नहीं किया कभी नहीं किया .एक बार भी रहीम का जिक्र नही किया अरवी फारसी का नाम तक नहीं लिया प्रशंसा की तो बात ही छोडिये .इसी लिए मैंने कहा तुलसी संत नहीं थे .उनमें हिंदुत्व .और हिंदी संकृत प्रेम तो होना लाजमी था पर अरवी फारसी को जानने की ललक भी नहीं थी यह समझ से परे है .सम्मान तो जाने दीजिये .रहीं म तो अपने को भक्त कहलाने में खुस थे पर तुलसी इस दिशा में मौन ही रहे.बाबा तुलसी दास ने मानस लिख कर राम को स्थापित किया .हिन्दुओं को संगठित किया .लेकिन अपने सम्पूर्ण लेखन में देशकी अधी जनसंख्या का कोई उल्लेख नहीं किया .शैव ,वैष्णव, स्मार्त, साधू ,संत ,योगी ,गृहस्त ऊँचनीच का भेद भाव त्याग कर एक होने और लड़ाई ख़तम करने की बात की .किन्तु उन्हों ने कहीं भी .हिन्दू मुसलमान ,अवधि फारसी संस्कृत और अरबी,की बात नहीं की ,बौद्धों की बात नहीं की जैनियों की बात नहीं की .मतलब वे हिन्दुओं को संगठित करते रहे ,पर मुसलमान बौद्ध ,जैन की चिंता नहीं की ..अवधी में लिखते रहे ..पर .अरबी और फारसी ..तथा अन्य बोलियों की चर्चा नहीं की ...जब की उस समय की सबसे बड़ी जरुरत यही थी ..आमिर खुसरो ,कबीर ,जायसी .रहीम ,रसखान ..जैसे नायक .हिन्दू मुसलमान .और भाषा की समस्या से दो चार होते रहे ..रहीम जैसे .रसखान जैसे विद्वानों ने कृष्ण भक्ति की प्रन्संशा की .रहीम ने तो तुलसी दास और मानस तक की प्रसंशा की ..पर तुलसी ने ऐसा कभी नहीं किया ..आखिर तुलसी दास ने ऐसा क्यों किया ..यह प्रश्न मेरे दिमाग को परेशान करता है .कोई भी बड़ा रचना कार अपने युग से उस काल की सबसे बड़ी समस्या से मुह मोड़ कर कैसे रह सकता है .बड़ी बड़ी लडाइयां हो रहीं थीं अकबर ने तोडर मल ने सभी ने हिन्दू मुसलमान को एक करने की कोशिस की .अकबर ने तो दीनेइलाही .लिखा .पर तुलसी ने इस दिशा में मौन क्यों साधे रखा ... .इस मायने में रहीम और रसखान दोनों कबीर की तरह तुलसी से बहुत आगे रहे .
मैं तो सोचता हूँ की अगर तुलसी ने रहीम और रसखान की तरह का आचरण किया होता तो शायदहमारी बहुत बड़ी समस्या ख़त्म हो जाती कम से कम उर्दू भाषा का जन्म तो नहीं होता .इस मायने में आमिर खुसरो की भी चर्चा कभी करूँगा . आज इतना ही ..
बहुरि बंदि खलगन सितभायें जे बिन काज दाहिने बाएं ..तुलसी की खल वंदना के साथ रहीम का चौथा एपिसोड लिखना शुरू कर रहा हूँ .सज्जन लोग पढेंगे ,आदर करेंगे ...
अमित उदार अति पावन विचारी चारू ,जहाँ तहां आदरियो गंगा जी के नीर सों /
खलन के घालिबे को खलक के पलिबे को ,खान खाना एक रामचन्द्र जी के तीर सों //
गंगा जल की तरह पवित्र राम के तीर की तरह शत्रु विनाशक परन्तु जगत पालक ब्यक्तित्व को उनकी कृति में तलाश क रने की लालसा ,ललक ,जग उठी है /
रहीम ने प्रेम पंथ का एक चित्र खींचा है ..
रहिमन मैं तुरंग चढी चलिबो पावक मांहि
प्रेम पंथ ऐसो कठिन सब सों निबहत नाहि /
घोड़े पर सवार होकर आग पर चलाना .और निबाह लेना सब के बसबूते का नहीं.रहीम जिन्दगी भर घोडेपर सवार हो कर आग में दौड़ते रहे . रहीम के काब्य तुरंग की यात्रा भी अग्नि यात्रा ही तो है .वह अग्नि है जीवन के सहज प्यार की जो कभी बड़ी सुखद कभी बड़ी दुखद रही ,पहले पड़ाव तक चढ़ती जवानी के अनुभवों से गुजरे ,पर वे भी राजसी जीवन के नहीं थे ,बिभिन्न प्रकारके सामान्य जन की मानसिक स्थितियों में प्यार के अनुभव थे ,इनमे हांस -विलाश है सजने सजाने का भाव है लालसा विदग्धता छल है मान मनौवल है प्रतीक्षा है राग रंग है ईर्ष्या है उत्कंठा है और लगन है ,कुल मिला कर लौकिक श्रृंगार की लहक दार .ललक मय छटा है .
इस काल की दो रचनाएँ हैं बरवै नईका भेद और नगर शोभा ,बरवै नईका भेदमें नायिका की बिभिन्न अवस्थाओं का चित्र है ,
एक उदाहरन .-
मितवा चलेऊ विदेसवा मन अनुरागि
-पिय की सुरति गगरिया रहि मग लागि
प्रिय की स्मृति का कलश लिए नायिका रास्ते में खड़ी है कब प्रिय लौटेंगे और स्मृतियों का कलश उनके लिए मंगल कलश बनेगा , 
दूसरा चित्र
.भोरहिं बोल कोयलिया बढ़वति ताप
घरी एक धरि अलिया रहु चुप चाप ./
रात भर स्मृतियों में खोये खोये नींद उचटी रही जरा सी आंख लगी तो कोयल सबेरे ही बोल पडी और सबेरे सबेरे ताप चढ़ गया एक घड़ी तक तो वह चुप रहती ,पहले लेखमे मैंने बताया है की अपने एक सिपाही की पत्नी के चाँद से प्रभावित हो कर रहीम ने उसे धन देकर छुट्टी भेजा और उसी छंद में पुस्तक लिख दी नईका भेद .इसी काल की दूसरी रचना नगर- शोभा में बिभिन्न ब्यावसायों वर्गों ,जातियों उपजातियों की रूपसी तरुणियों के चित्र हैं 
,कुजडिन का एक रूप देखिये.
भांटा वरन सु कौजरी बेचै सोवा साग
नीलजु भई खेलत सदा गारी दै दै फाग ,
--बैगन की तरह काली कुजडिन सोवा साग बेचती है और निर्लज्ज गली दे दे कर फाग खेलती है ..इस रचना में कोई नहीं छूटा हैदफाली गाडीवान महावत नाल वन्दिनी चिरवा दारीनि,सईस ,काम ग़री ,नगारची ,बाज दारिनी ,दाव ग़री,साबुनी ग़री ,कुंडी गरिन,जिले दारी नी तक न जाने कितनी रोजगार में लगीं महिलाओं के चित्र हैं .जिले दारिनी का चित्र ..औरन को घर सघन मन चले जो घूंघट माह ,वाके रंग सुरंग को जिले दार पर छांह रुतबा तो देखिये .जिले दार बेचारा उसके बस में है,.बस आज इतना ही
बहुरि बंदि खलगन सितभायें जे बिन काज दाहिने बाएं ..तुलसी की खल वंदना के साथ रहीम का चौथा एपिसोड लिखना शुरू कर रहा हूँ .सज्जन लोग पढेंगे ,आदर करेंगे ...
अमित उदार अति पवन विचारी चारू ,जहाँ तहां आदरियो गंगा जी के नीर सों /
खलन के घालिबे को खलक के पलिबे को ,खान खाना एक रामचन्द्र जी के तीर सों //
गंगा जल की तरह पवित्र राम के तीर की तरह शत्रुविनाशक परन्तु जगत पलक ब्यक्तित्व को उनकी कृति में तलाश्काराने की लालसा ,ललक ,जग उठी है /
रहीम ने प्रेम पंथ का एक चित्र खींचा है ..
रहिमन मैं तुरंग चढी चलिबो पावक मांहि
प्रेम पंथ ऐसो कठिन सब सों निबहत नाहि /
घोड़े पर सवार होकर आग पर चलाना .और निबाह लेना सब के बसबूते का नहीं.रहीम जिन्दगी भर घोडेपर सवार हो कर आग में दौड़ते रहे . रहीम के काब्य तुरंग की यात्रा भी अग्नि यात्रा ही तो है .वह अग्नि है जीवन के सहज प्यार की जो कभी बड़ी सुखद कभी बड़ी दुखद रही ,पहले पड़ाव तक चढ़ती जवानी के अनुभवों से गुजरे ,पर वे भी राजसी जीवन के नहीं थे ,बिभिन्न प्रकारके सामान्य जन की मानसिक स्थितियों में प्यार के अनुभव थे ,इनमे हस -विलाश है सजाने सजाने का भाव है लालसा विदग्धता छल है मन मनौवल है प्रतीक्षा है राग रंग है ईर्ष्या है उत्कंठा है और लगन है ,कुल मिला कर लौकिक श्रृंगार की लहक्दार .ललक माय छटा है .इस काल की दो रचनाएँ हैं बरवै नईका भेद और नगर शोभा ,बरवै नईका भेदमें नायिका की बिभिन्न अवस्थाओं का चित्र है ,एक उदाहरन .-मितवा चलेऊ विदेसवा मन अनुरागि
-पिय की सुरति गगरिया रहि मग लागि
प्रिय की स्मृति का कलश लिए नायिका रास्ते में खड़ी हैकब प्रिय लौटेंगे और स्मृतियों का कलश उनके लिए मंगल कलश बनेगा ,दूसरा चित्र
.भोरहिं बोल कोयलिया बढ़वति ताप
घरी एक धरि अलिया रहु चुप चाप ./
रात भर स्मृतियों में खोये खोये नींद उचटी रही जरा सी आंख लगी तो कोयल सबेरे ही बोल पडी और सबेरे सबेरे ताप चढ़ गया एक घड़ी तक तो वह चुप रहती ,पहले लेखमे मैंने बताया है की अपने एक सिपाही की पत्नी के चाँद से प्रभावित हो कर रहीम ने उसे धन देकर छुट्टी भेजा और उसी छंद में पुस्तक लिख दी नईका भेद .इसी काल की दूसरी रचना नगर- शोभा में बिभिन्न ब्यावसायों वर्गों ,जातियों उपजातियों की रूपसी तरुणियों के चित्र हैं ,कुजडिन का एक रूप देखिये.
भांटा वरन सु कौजरी बेचै सोवा साग
नीलजु भई खेलत सदा गारी दै दै फाग ,
--बैगन की तरह काली कुजडिन सोवा साग बेचती है और निर्लज्ज गली दे दे कर फाग खेलती है ..इस रचना में कोई नहीं छूटा हैदफाली गाडीवान महावत नाल वन्दिनी चिरवा दारीनि,सईस ,काम ग़री ,नगारची ,बाज दारिनी ,दाव ग़री,साबुनी ग़री ,कुंडी गरिन,जिले दारी नी तक न जाने कितनी रोजगार में लगीं महिलाओं के चित्र हैं .जिले दारिनी का चित्र ..औरन को घर सघन मन चले जो घूंघट माह ,वाके रंग सुरंग को जिले दार पर छांह रुतबा तो देखिये .जिले दार बेचारा उसके बस में है,.बस आज इतना ही

Friday, 28 April 2017

हमारी कौम है ही इसी लायक की हमारा बादशाह हमें 100 जूते भी लगाए और 100 कच्चे प्याज़ भी खिलाये।।

एक कहानी कहीं पढ़ी थी
एक कहानी कहीं पढ़ी थी जिस में एक बादशाह अपने वज़ीर को उसकी किसी बहुत ही गंभीर गलती पर सज़ा सुनाता है। बादशाह कहता है कि या तो तुम 100 कच्चे प्याज़ एक ही बैठक में खा लो या फिर भरे दरबार मे 100 जूते खा लो। वज़ीर सोचता है कि भरे दरबार मे सब के सामने 100 जूते खाने से बड़ी बेइज़्ज़ती होगी, इस से बेहतर है कि 100 कच्चे प्याज़ ही खा लिया जाए। जब वज़ीर को प्याज़ खाने के लिए दिया गया तो कुछ कच्चे प्याज़ खाने के बाद ही उसकी हालत खराब होने लगती है। आंख और नाक से पानी बहने लगते हैं। अब वज़ीर कहता है कि मुझ से अब और प्याज़ नहीं खाया जाएगा। आप मुझे 100 जूते ही लगा लो। जब वज़ीर को दो चार जूते पड़ते हैं तो उसके होश ठिकाने लग जाते हैं। अब वज़ीर कहता है कि मुझे जूते मत मारो, मैं प्याज़ खाऊंगा। ऐसा करते करते वह जूते भी खाता जाता है और प्याज़ भी खाता जाता है। आखिर में जब 100 प्याज़ की संख्या पूरी होती है तब तक वह 100 जूते भी खा चुका होता है। यहां तक तो यह एक चुटकुला था मगर वास्तविकता यह है कि हम बहुत ही निम्नस्तर की एक मूर्ख कौम हैं। हमने अपने व्यक्तिगत फायदे के लिए हर उस व्यक्ति के हाथों में अपना नेतृत्व सौंप दिया जो हमें अपने शासनकाल में 100 प्याज़ भी खिलाये और साथ में 100 जूते भी लगाए। दरअसल हम नेतृत्व के महत्व को ही नहीं समझते। जस्टिस काटजू ने भारत के 90% लोगों को मूर्ख कहा था। काटजू बिल्कुल सही थे। हमें इस बात की थोड़ी सी भी परवाह नहीं है कि जंतर मंतर पर प्रदर्शन कर रहे किसान सरकार से अपनी मांग मनवाने के लिए अपना ही मूत्र पी रहे हैं, हम तो बस योगी जी द्वारा किसानों के 1 लाख से कम के ऋण माफ किये जाने से खुश हैं। हम "एक के बदले दस सर" लाने का वादा करके सत्ता में आने वालों से यह नहीं पूछते की कुलभूषण जाधव को पाकिस्तान क्यों फांसी पर चढ़ा रहा है। हम तो मोदी जी के सियाचिन में दीवाली मनाने से ही प्रफुल्लित हैं।हमें इस बात की ज़रा भी परवाह नहीं है कि चीन भारत अरुणाचल प्रदेश छः से अधिक ज़िलों का नाम बदल क्यों बदल रहा है। हम तो यह सोचकर ही मंद मंद मुस्काते हैं कि मोदी ही दुनिया का एकमात्र ऐसा व्यक्ति है जो पाकिस्तान को करारा जवाब दे सकता है। हमें ज़रा भी फिक्र नहीं कि अमेरिका में जातीय हिंसा में अबतक 8 से अधिक भारतीय मार डाले गए। हम तो मोहसिन, इखलाक, मिन्हाज, पहलू खान इत्यादि के मारे जाने को मुल्लों का विकेट गिरने से जोड़कर देखते हैं। हमें वन रैंक वन पेंशन के लिए जंतर मंतर पर महीनों तक संघर्ष करते सैनिक नहीं दिखाई दिए लेकिन हम तथाकथित सर्जिकल स्ट्राइक पर हवा में अपनी टोपियां उछालने लगते हैं। हमें इस बात की तनिक भी चिंता नहीं है कि हमारे समाज की 10000 से अधिक विधवा औरतें मथुरा और वृन्दावन में भीख मांग कर जीवनयापन कर रही हैं। हम तो तीन तलाक जैसे वाहियात मुद्दे पर हो रही बहस से ही खुश हो जाते हैं। हम ज़रा भी नहीं सोचते कि मोदी जी ने जो प्रतिवर्ष 2 करोड़ युवाओं को रोजगार देने का वादा किया था उसका क्या हुआ लेकिन हम गौरक्षक और हिन्दू युवा वाहिनी जैसी संस्था द्वारा फैलाये गए धार्मिक उन्माद को देखकर ही अंदर अंदर खुश होते रहते हैं। हमें इस बात से कोई मतलब नहीं कि भारत में किसानों की आत्महत्या रुकी या नही, बस हम तो इस बात से खुश हैं कि मोदी जी ने लालबत्ती कल्चर खत्म कर दिया है। हमें इस बात की ज़रा भी परवाह नहीं कि गंगा कितनी साफ हुई या साफ हुई भी की नहीं, लेकिन हम मोदी जी की बनारस में गंगा आरती और अक्षरधाम में पूजा करने से ही खुश हो जाते हैं। हमें इस बात की ज़रा भी परवाह नहीं कि भारत में ट्रेन दुर्घटना कितनी अधिक बढ़ गयी है, लेकिन हम सरकार द्वारा बुलेट ट्रेन की घोषणा मात्र से ही उछलने लगते हैं। हमें आदिवासियों और अल्पसंख्यकों पर होने वाले अत्याचार की कोई फिक्र ही नहीं है। हम तो बस यह सोचकर खुश हैं कि मोदी जी ने "सबका साथ, सबका विकास" का नारा दिया है। अनेकों मिसालें ऐसी हैं जहां हम भारतीयों की संवेदनहीनता साफ दिखाई पड़ती हैं। हम बहुत गहरी नींद में सो रहे हैं। हमारी नींद इतनी गहरी हो चुकी है की हमारी संवेदना मृत हो चुकी है। हमारी कौम है ही इसी लायक की हमारा बादशाह हमें 100 जूते भी लगाए और 100 कच्चे प्याज़ भी खिलाये।।