Thursday, 1 December 2011

अछूतों की आह

अछूतों की आह
(सुभद्रा कुमारी चव्हाण की प्रसिद्द दो बाल कविताओं में एक
यह दलित साहित्य रचना की शुरुआत है )
एक दिन हम भी किसी के लाल थे
... आँख के तारे किसीके थे कभी
... बूँद भर गिरता पसीना देख कर
था बहा देता घड़ों लोहो कोई
देवता देवी अनेको पूज कर
निर्जला रह कर कई एकदशी
तीर्थों में जा द्विजों को दान दे
गर्भ में पाया हमें माँ ने कंही
जन्म के दिन फूल की थाली बजी
दुःख की राते कटीं सुख दिन हुए
प्यार से मुखड़ा हमारा चूम कर
स्वर्ग सुख पाने लगे माता पिता
हाय हमने भी कुलीनों की तरह
जन्म पाया प्यार से पाले गए
जो बचे फूले फले सो क्या हुवा
कीट से भी नीचतम मने गए/
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· · · 27 minutes ago

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